16/08/2025
सर्वं मयि विलीयते मुरलीस्वरेण…..🪈🪐🌏
“In the melody of Krishna’s flute, the entire universe dissolves.” 💐💐
——श्रीमद् भगवद् गीता पुराण 🐚🪐
जिस “मुरली” से भगवान वासुदेव की पहचान है, मुरलीधर - वंशीधर, इत्यादि कई नामकरण दिए गए ! श्री कृष्ण के हर स्वरूप - प्रतीक चिह्न में बांसुरी दिख जाएगी।किंतु यह उनके पास आया कहाँ से ??
श्री कृष्ण की “बाँसुरी” का नाम ही “सम्मोहिनी” था। द्वापरयुग के समय जब भगवान श्री कृष्ण ने धरती में जन्म लिया तब देवी-देवता वेश बदलकर समय-समय पर, उनसे मिलने धरती पर आने लगे. इस दौड़ में “भगवान शिव” कहाँ पीछे रहने वाले थे? अपने प्रिय भगवान से मिलने के लिए वह भी धरती में आने के लिए उत्सुक हुए❗️🔱🔥
किंतु जाने की अपनी व्याकुलता, यह सोच कर छुपा गए, की जा ही रहे हैं, तो कुछ “उपहार” स्वरूप ले लिया जाये, ऐसा जो “प्रभु” सदा अपने सानिध्य में रख सकें ?? 🤷♂️ भगवान के पास तब, महर्षि “दधीचि” की एक महाशक्तिशाली “हड्डी” का टुकड़ा पड़ा था। ऋषि दधीचि वही महान ऋषि है जिन्होंने धर्म के लिए अपने शरीर को त्याग दिया था व अपनी शक्तिशाली शरीर की सभी हड्डिया दान कर दी थीं ! उन “हड्डियों” की सहायता से तब “विश्कर्मा जी” ने तीन धनुष - “पिनाक, गाण्डीव, शारंग” तथा इंद्र देव के लिए “व्रज” का निर्माण किया था।☝️
महादेव शिव ने उस हड्डी को घिसकर एक सुन्दर व मनोहर “बाँसुरी” का निर्माण किया।जब शिव जी भगवान श्रीकृष्ण से मिलने गोकुल पहुचे, तो उन्होंने श्री कृष्ण को भेट स्वरूप वह बंसी प्रदान की तथा उन्हें आशीर्वाद दिया।तभी से भगवान श्री कृष्ण उस बंसी को अपने पास रखते हैं ! 💐💐🙏
सभी भक्तजनों को “कृष्ण जन्माष्टमी” की अशेष बधाई ! 🎉👏
ISKCON 🕉️🦚🦚