15/11/2025
अपना गुस्सा और आक्रोश फिलहाल संभालकर रखो। बेवजह सुझाव देना, गलतियों को नियति बताना और बिना आधार के विचार परोसना बंद करो। देख रहा हूँ कई लोग ऐसे भी हैं जो हर जगह अपनी राय देने में पीछे नहीं रहते। जो पक्ष को भी पसंद करते हैं, विपक्ष को भी, और तटस्थ को भी, जबकि उनकी अपनी कोई निश्चित सोच ही नहीं है। सुबह एक विचार रखते हैं, दोपहर में दूसरा, और शाम में कुछ और देते हैं। एक दिन में कई रंग बदलने वाले लोग भी आज सलाह, मशविरा दे रहे हैं और ज्ञान बाँट रहे हैं। नालायकी की भी हद होती है।
जिस फुर्ती से तुम सोशल मीडिया पर अपनी बातें लिख लेते हो, काश उसका आधा भी साहस तुम घर, परिवार, समाज और आसपास के लोगों के बीच दिखाते तो आज परिणाम कुछ और होता। जो परिणाम सामने आया है, उसका जिम्मेवार केवल नेता ही नहीं है। कार्यकर्ता भी उतने ही दोषी हैं, क्योंकि न सुनने की आदत है, न समझने की, न विचार करने की क्षमता, न समन्वय स्थापित करने की सूझबूझ, लेकिन दिखावा करने में सबसे आगे हैं। ऐसे लोगों से समझदार लोग बातचीत से बचते हैं, और जो बहस करते हैं उन्हें लगता है कि वही सबसे बड़े बहादुर हैं। जबकि इन्हीं छोटी छोटी घटनाओं और गलतियों ने मिलकर ऐसी स्थिति पैदा की है।
प्रत्याशी चाहे जैसा भी हो, उसकी जिम्मेदारी संगठन की थी, लेकिन उसे जिताना कार्यकर्ताओं का काम था। पर हुआ ठीक इसके उलट। संगठन में पद संभालने वाले कई लोग चुनाव के समय खुद को नेता साबित करने में लग गए। पंचायत स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के संगठन पदाधिकारियों में न सुनने की इच्छा थी, न समझने की, न समन्यव स्थापित करने की मंशा! सब संगठन पदाधिकारीगण अपनी डफली अपना राग में लिपटा रहा! किसी को समय पर भोजन नहीं मिला, किसी को गाड़ी नहीं मिली, किसी को पर्ची नहीं मिली। कोई कह रहा था मुझे पूछा नहीं गया, कोई कहता था मुझे सम्मान नहीं मिला। तो अब लो पूरा सम्मान! जबकि चुनाव के समय नेता भी कार्यकर्ता की तरह काम करता है, तभी वह परिणाम के आधार पर नेता कहलाने लायक बनता है। लेकिन तुम लोगों ने न खुद को कहीं का रखा, न प्रत्याशी को, न संगठन को, न वोटरों को और न नेता को रहने दिया। वही महागठबंधन द्वारा जारी घोषणा प्रण को जनता तक पहुँचाने और समझाने में पूरी तरह नाकाम रहा। जिसे घर घर समझाना था, उसे तुम लोग खुद ही नहीं समझ पाए। आखिर में सारी मेहनत पर पानी फेर दिया।