MahaKumbhmela

MahaKumbhmela Maha Kumbhmela Nashik, Maharashtra, India.... In Maharastra, the festival is held in Trimbakeshwar, Nashik. Sinhastha Kumbhamela, Why every 12 Years?

By far the most spectacular of all the events, the Kumbh Mela is a religious festival that occurs once every 12 years, and is celebrated in four major pilgrim centres around the country. The Nashik Kumbh Mela is generally acknowledged to be the most sacred of all the festivals. Amrut had to be saved from Danavas. So Gods had to hide it at different places - Swargalok, Mrutyulok and Patallok. Gods

were on Mrutyulok (earth) for twelve days. Gods twelve days are equal to 12 years for Mrutyulok . Thus Gods were on earth for 12 years with Amrut. Hence every 12 years Kumbha Mela is celebrated at the four places, where a few drops of Amrut had fallen.

01/06/2025

भारताच्या सांस्कृतिक आणि अध्यात्मिक आत्म्याला जोडणारा महाकुंभ !

इतिहासात पहिल्यांदाच सर्व १३ आखाड्यांचे महंत एकत्र येत एकमुखाने निर्णय घेण्यात आला ; नाशिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभमेळा २०२६-२७ चे कार्यक्रम आता निश्चित.

प्रमुख धार्मिक कार्यक्रमांची रूपरेषा
📍 सिंहस्थ ध्वजारोहण शुभारंभ – ३१ ऑक्टोबर २०२६
📍 साधुग्राम ध्वजारोहण – २४ जुलै २०२७
📍 प्रथम अमृतस्नान – २ ऑगस्ट २०२७ (आषाढ, सोमवती अमावस्या)
📍 महाकुंभस्नान – ३१ ऑगस्ट २०२७ (श्रावण, अमावस्या)
📍 तृतीय अमृतस्नान – ११ सप्टेंबर २०२७ (भाद्रपद, शुद्ध एकादशी)

08/08/2024
23/03/2023

Shri. Kalaram Temple, Panchvati, Nashik (MH) India.

श्री रामनवमी उत्सवाचे वेळापत्रक....
18/03/2023

श्री रामनवमी उत्सवाचे वेळापत्रक....

अवधनाथ ब्रजनाथ तुम्हारा , सदा सदा मैं दास रहूंजहां जहां भी जनमू जग में , पद पंकज के पास रहूं।
10/03/2023

अवधनाथ ब्रजनाथ तुम्हारा , सदा सदा मैं दास रहूं
जहां जहां भी जनमू जग में , पद पंकज के पास रहूं।

आत्मा-परमात्मा का ही अंश है। जिस प्रकार जल की धारा किसी पत्थर से टकराकर छोटे छींटों के रूप में बदल जाती है, उसी प्रकार प...
17/02/2023

आत्मा-परमात्मा का ही अंश है। जिस प्रकार जल की धारा किसी पत्थर से टकराकर छोटे छींटों के रूप में बदल जाती है, उसी प्रकार परमात्मा की महान सत्ता अपने क्रीड़ा विनोद के लिए अनेक भागों में विभक्त होकर अगणित जीवों के रूप में दृष्टिगोचर होती हैं। सृष्टि सञ्चालनका क्रीड़ा कौतुक करने के लिए परमात्मा ने इस संसार की रचना की। वह अकेला था। अकेला रहना उसे अच्छा न लगा, सोचा एक से बहुत हो जाऊँ। उसकी यह इच्छा ही फलवती होकर प्रकृति के रूप में परिणित हो गई। इच्छा की शक्ति महान है। आकाँक्षा अपने - अनुरूप परिस्थितियाँ तथा वस्तुयें एकत्रित कर ही लेती है। विचार ही कार्य रूप में परिणित होते हैं और उन कार्यों की साक्षी देने के लिए पदार्थ सामने आ खड़े होते हैं। परमात्मा की एक से बहुत होने की इच्छा अपना विस्तार किया तो यह सारी वसुधा बन कर तैयार हो गई।

परमात्मा ने अपने आपको बखेरने का झंझट भरा कार्य इसलिए किया कि बिखरे हुए कणों को फिर एकत्रित होते समय असाधारण आनन्द प्राप्त होता रहे। बिछुड़ने में जो कष्ट है उसकी पूर्ति मिलन के आनन्द से हो जाती है। परमात्मा ने अपने टुकड़ों को अंश, - व को बिखेरने का विछोह कार्य इसलिए किया कि वे जीव परस्पर एकता, प्रेम, सद्भाव, संगठन, सहयोग का जितना जितना प्रयत्न करें - उतने आनन्दमग्न होते रहें। प्रेम और आत्मीयता से बढ़कर उल्लास शक्ति का स्रोत और कहीं नहीं है। अनेक प्रकार के बल इस संसार में मौजूद हैं पर प्राणियों की एकता के द्वारा जो शक्ति उत्पन्न होती है उसकी तुलना और किसी से भी नहीं की जा सकती। पति-पत्नी, भाई- भाई, मित्र - मित्र, गुरु-शिष्य, आदि की आत्मीयता जब उच्च स्तर तक पहुंचती है तो उस मिलन का आनन्द और उत्साहवर्धक प्रतिफल इतना सुन्दर होता है कि प्राणी अपने को कृत्य कृत्य मानता है।
🚩जय सियाराम 🚩
🚩जय हनुमान 🚩

भक्त प्रह्लाद के द्वारा दिया गया नवविद्या भक्ति का ज्ञान श्रीमद्भागवत महापुराण के ७ वे स्कन्द के ५ में अध्याय के २३ एवं ...
14/02/2023

भक्त प्रह्लाद के द्वारा दिया गया नवविद्या भक्ति का ज्ञान श्रीमद्भागवत महापुराण के ७ वे स्कन्द के ५ में अध्याय के २३ एवं २४ श्लोक में अंकित है, प्रसंग कुछ इस प्रकार है।

हिरण्यकशिपु ( भक्त प्रह्लाद के पिता ) ने उनके पुत्र की श्रीहरि भक्ति देख उनको अपने गुरुपुत्रों ( षण्ड और अमर्क ) के पास राजनीति और कूटनीति की शिक्षा एवं किस प्रकार प्रजा को नियंत्रण में रखा जाये, दुसरो को कैसे अधीन बनाया जाये और मेरे जैसा शक्तिशाली कैसे बना जाये शिक्षा ग्रहण करने भेजा। ( षण्ड का अर्थ "बैल" और अमर्क का अर्थ "अलोकरहित" अर्थात "अंधकारमय" )

उन दोनों गुरुपुत्रों ने भक्त प्रह्लाद को भय दिखाकर धर्म ( आसुरिक धर्म, अर्थ, काम ) की शिक्षा दी। कुछ समय बाद वह भक्त प्रह्लाद को हिरण्यकशिपु के समक्ष लेकर आये।

हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद से पूछा - हे प्रह्लाद, हे आयुष्मान् ! तुमने अपनी पाठशाला में जो शिक्षा ग्रहण की है, उसमें से कुछ मुझे बताओं।

प्रह्लाद जी ने उत्तर देते हुए कहा :

श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ २३
इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा ।
क्रियेत भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ॥ २४

भगवान् के नाम, रूप, गुण, लीला, परिकर और धामादि के सम्बन्ध में श्रवण, कीर्तन तथा स्मरण करना, उनके चरणकमलों की सेवा करना, अनेक श्रेष्ठ द्रव्यों से उनका पूजन करना, उनकी स्तुति करना, उनका दास बनना, उन्हें अपना सर्वश्रेष्ठ मित्र समझना और उनके प्रति पूर्ण समर्पण - ये नौ ( ९ ) भक्ति के अंग है। जो प्रथमतः स्वयं को भगवान् विष्णु के प्रति समर्पण करने के उपरान्त इस नवविद्या भक्ति का साक्षात् अनुष्ठान करता है, मेरे मतानुसार उसने ही उत्तम अध्ययन अथवा शिक्षा प्राप्त की है।

शरीर के जीवन का आधार प्राण है, क्रियाभेद से उसके प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान - ये पाँच नाम हैं। उनके लक्षण इस प्रका...
06/02/2023

शरीर के जीवन का आधार प्राण है, क्रियाभेद से उसके प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान - ये पाँच नाम हैं। उनके लक्षण इस प्रकार हैं -

१. प्राण - यह इन पाँचों में प्रधान है, इसकी गति मुख और नासिका द्वारा होती है। नासिका के अग्रभाग से लेकर ह्रदय तक शरीर में इसका देश हैं।

२. अपान - यह नीचे की ओर गमन करने वाला है, नाभि से लेकर पादतल तक इसका देश है। मूत्र, विष्ठा और गर्भ आदि इसी के वेग से नीचे उतरते हैं।

३. समान - ह्रदय से लेकर नाभि तक इसका देश है, खान-पान के रस को समस्त शरीर में यथा योग्य पहुँचा देना इसका काम है, इसकी गति सम है।

४. व्यान - यह समस्त शरीर में व्याप्त रहता हुआ ही समस्त नाड़ियों में विचरता है।

५. उदान - यह ऊपर की ओर गमन करने वाला है; कण्ठ में रहने वाला और सिर तक गमन करने वाला है। मृत्यु के समय इसी के सहारे सूक्ष्म शरीर का गमन होता है।

धर्म की रक्षा कैसे करे?मनुस्मृति के अध्याय ८ के १५ वें और महाभारत वनपर्व के अध्याय ३१३ के १२८ वे श्लोक में कहा हैं :धर्म...
02/02/2023

धर्म की रक्षा कैसे करे?

मनुस्मृति के अध्याय ८ के १५ वें और महाभारत वनपर्व के अध्याय ३१३ के १२८ वे श्लोक में कहा हैं :

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
(मनुस्मृति ८.१५)

धर्म का लोप कर देने से वह लोप करने वालों का नाश कर देता है और रक्षित किया हुआ धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन कभी नहीं करना चाहिए, जिससे नष्ट धर्म कभी हमको न समाप्त कर दे।

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद् धर्मं न त्यजामि मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
(महाभारत, वनपर्व ३१३.१२८)

यदि धर्म का नाश किया जाय, तो वह नष्ट किया हुआ धर्म ही कर्ता को भी नष्ट कर देता है और यदि उसकी रक्षा की जाए, तो वही कर्ता की भी रक्षा कर लेता है। इसी से मैं धर्म का त्याग नहीं करता कि कहीं नष्ट होकर वह धर्म मेरा ही नाश न कर दे।

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