INDIA nahi Bharat

INDIA nahi  Bharat 15 AUGUST 2014,LAL KILE se Desh ka naamkaran "BHARAT" ho

दैनिक भास्कर नागपुर‌ ने आज "एक देश एक नाम भारत‌, इंडिया नही भारत का शंखनाद आंदोलन‌ रूप में , 24 घंटे का उपवास‌ बनकर  नाग...
08/09/2023

दैनिक भास्कर नागपुर‌ ने आज "एक देश एक नाम भारत‌, इंडिया नही भारत का शंखनाद आंदोलन‌ रूप में , 24 घंटे का उपवास‌ बनकर नागपुर से हुआ था को प्रमुखता से स्थान दिया...आभार

मंत्र मे ही कपालभाती छुपी है,मंत्र मे ही अनुलोम विलोम छुपा है,औरमंत्र मे ही भ्रामरी प्राणायाम भी है....जानने का अद्भुत अ...
29/08/2023

मंत्र मे ही कपालभाती छुपी है,
मंत्र मे ही अनुलोम विलोम छुपा है,
और
मंत्र मे ही भ्रामरी प्राणायाम भी है....

जानने का अद्भुत अवसर न‌ खोएं....

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त
भक्तामर स्तोत्र हीलर‌ डॉ अनीश जैन से
भक्तामर स्तोत्र, एक एक श्लोक को, शरीर के विभिन्न रोगों के निवारण मे, सपोर्टिंग ड्रग के रुप में कैसे प्रयोग किया जा सकता है,सीखेने अवश्य पधारें....

भक्तामर गर्भ संस्कार (प्रणेता) डॉ अनीश जैन
पिछले 4 वर्ष में‌ 7000 स्वस्थ संतानों‌ का जन्म , 400 से ज्यादा वो संताने जो डाक्टर्स ने कह दिया था...इन्हे गिरा दें.....ने भी धरती पर स्वस्थ जन्म लिया.
आयुष मंत्रालय (भारत‌‌ सरकार) के प्रेषित पत्र में मंत्र-चिकित्सा के रुप में,
प्राचीन भक्तामर‌-स्तोत्र को
विश्व पटल पर प्रथम बार, ध्यान-कला के रुप में प्रस्तुति के लिए विशेष प्रशंसा की गयी,

मध्यप्रदेश विधानसभा की तत्कालीन उपाध्यक्ष सुश्री हीना कावरे जी (2019) द्वारा भी विशेष पत्र के माध्यम से डॉ अनीश जैन के कार्यों की प्रशंसा की गयी.

अभिमंत्रित फिटकरी जल के माध्यम से लाखों लोगों को कोरोना काल मे मदद पहुंचायी. (वर्ष 2019,2020,2021)

लाखों लोगों तक ड्रग लेश थेरेपी चिकित्सा पहुंचायी.

वर्ष 2022-23 में
नक्सलाईड क्षेत्र‌ बालाघाट म.प्र. के जंगल से जुड़े गांवों के 150 स्कूलों मे दमोह जिले के गांवों में अहिंसा संदेश‌ दे लगभग 10,000 स्कूल यूनिफार्म वितरण करवायी.

सन 2021,2022,2023 से अब तक

2000 गौ वंश को तीन वर्ष मे लगभग 5 लाख किलो हरी सब्जियां व फल‌ खिलवाये यह कार्य जारी है

अनेक‌ सेवा कार्य पिछले 25 वर्ष से अब तक कर चुके हैं....

जूम मीटिंग के माध्यम से प्रतिदिन‌ नि:शुल्क भक्तामर गर्भ संस्कार क्लासेस ,मुस्कुराती मैया मुस्कुराता भैया जारी हैं...

Dr Anish Jain
B.Sc.(Maths),
Master in Yoga and Science of Living (Jain Vishwa Bharti Ladnu),
DYNS(Akhil Bhartiya Chikitsa Parishad Rajghat Colony Delhi) ,
Honoured, Honarary PhD from American University ,

Pursuing PhD in Bhaktamar Garbha Sanskar (Tirthamkar Mahaveer University Moradabad U.P.)
CMD, International Bhaktamar Healing and Research Foundation (NGO) , Editor Vidarbha Jain News
9420569115,8788538962

https://www.youtube.com/live/qolhAWNBHyA?feature=share  भक्तामर गर्भ संस्कार क्यों  जरूरी.....जरूर सुनिए..... डॉ अनीश जै...
19/07/2023

https://www.youtube.com/live/qolhAWNBHyA?feature=share भक्तामर गर्भ संस्कार क्यों जरूरी.....जरूर सुनिए..... डॉ अनीश जैन की भक्ति व *परम् पूज्य* *आचार्य धर्म धुरंधर* गुरुदेव के शब्दों में....( *गर्भ संस्कारित भारत और गर्भ संस्कारित विश्व* ) अब देखना यह है *क्या लाल किले के प्रांगढ़ से डॉ अनीश जैन ,1008 माता मरुदेवियों की गोदभराई करवा पाएंगे.....? हर संतान की चाह रखी माता को साधु-सन्तों का आशीष प्राप्त मूल्यवान साड़ी गोदभराई मे कर पाएंगे?* समय की कोख मे यह रहस्य छुपा हुआ है........आशीष बनाए रखिए.... 9420569115,8788538962

08/11/2018

जहां होती है भगवान की आरत
दुनिया कहती है उसे भारत
जो करते है भगवान की आरती वो कहलाते है भारती

02/11/2018
08/10/2016

सभी शाकाहारी हो जाएं तो क्या होगा?
राचेल नूअर
बीबीसी फ़्यूचर

कोई इंसान क्या खाए और क्या ना खाए ये उसकी पसंद का मामला है. कुछ लोग शाकाहारी होते हैं तो कुछ मांसाहारी. लेकिन जो शाकाहारी हैं वो चाहते हैं कि सारी दुनिया शाकाहारी हो जाए. अगर कोई शाकाहारी है तो उसके पीछे उसकी अपनी वजह हैं.
मसलन कुछ लोगों को जानवरों की तकलीफ़ देखकर दुख होता है तो वो शाकाहारी हो जाते हैं. कुछ लोग अपना रहन-सहन बदलने के लिए शाकाहारी हो जाते हैं. शाकाहारी बनने के उनके अपने तर्क होते हैं. लेकिन क्या ये मुमकिन है कि सारी दुनिया शाकाहारी हो जाए. पहली बात तो ये कि ये संभव ही नहीं है. दूसरे ये कि अगर ऐसा हो भी गया तो इससे बहुत नुक़सान.
कोलंबिया में इंटरनेशनल सेंटर फॉर ट्रॉपिकल एग्रीकल्चर में काम करने वाले एंड्र्यू जार्विस कहते हैं कि विकसित देशों में शाकाहारी होने के बहुत से फ़ायदे हैं. ये पर्यावरण और सेहत दोनों के लिए बेहतर है. लेकिन विकासशील देशों में ये गरीबी को बढ़ावा देने की वजह भी बन सकता है. अगर सारी दुनिया से रातों-रात मांस खाने वालों को हटा दिया जाए तो क्या होगा? इसके लिए जार्विस और दूसरे जानकार बहुत से तर्क देते हैं.
उनका कहना है हमारे खाने की आदतें हमारे माहौल पर असर डालती हैं. लेकिन इसे लोग गंभीरता से नहीं लेते. मिसाल के लिए अमरीका में चार लोगों का मांसाहारी परिवार दो कारें से भी ज़्यादा ग्रीन हाऊस गैस छोड़ता है. लेकिन जब ग्लोबल वॉर्मिंग की बात होती है तो सिर्फ कारों की बात की जाती है. मांस खाने वालों की नहीं.
जिसकी वजह से ज़्यादा ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन ज़्यादा होता है. ब्रिटेन के फूड सिक्यूरिटी एक्सपर्ट टिम बेन्टन का कहना है कि हमारी खाने की आदतों का हमारे माहौल पर असर पड़ता है. लेकिन इस पर किसी का ध्यान जाता ही नहीं. अगर आज हम सभी मांस खाना बंद ना भी करें, सिर्फ उसकी तादाद कम कर दें तो भी काफ़ी अच्छे नतीजे आ सकते हैं.

ऑक्सफोर्ड मार्टिन स्कूल के मार्को स्प्रिंगमैन का कहना हैं अगर सिर्फ रेड मीट को ही हटा दिया जाए तो खाने से निकलने वाली ग्रीन हाऊस गैस में 60 फ़ीसद की कमी आ जाएगी. और अगर साल 2050 तक सारे इंसान शाकाहारी हो जाते हैं तो इसमें 70 फ़ीसद की कमी आएगी. स्प्रिंगमैन कहते हैं सारी दुनिया का शाकाहारी होना एक कल्पना भर ही है. लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि भविष्य में खान-पान से पैदा होने वाली ग्रीन हाउस गैस पर फिक्र की बड़ी वजह बनने वाली है.
मांसाहारियों के लिए बड़े पैमाने पर जानवर पाले जाते हैं. जिसके लिए पर्याप्त मात्रा में जगह चाहिए. एक अंदाज़े के मुताबिक़ दुनिया में बारह अरब एकड़ ज़मीन खेती और उससे जुड़े काम में इस्तेमाल होती है. इसका 68 फीसद हिस्सा जानवरों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. अगर सभी सब्ज़ी खाने वाले हो जाएंगे तो करीब 80 फ़ीसद ज़मीन चरागाहों और जंगलों के लिए इस्तेमाल में लाई जाएगी.
इससे माहौल में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा कम होगी और जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद मिलेगी. बची हुई 10 से 20 फीसद ज़मीन का इस्तेमाल फसलें उगाने में किया जा सकेगा. अभी जितनी ज़मीन पर खेती होती है, उसके एक तिहाई हिस्से पर जानवरों के लिए ही चारा उगाया जाता है.
पर्यावरण बेहतर करने और खेती के लायक़ जमीन तैयार करने के लिए बड़े पैमाने पर प्लानिंग और पूंजी की ज़रूरत है. इसके अलावा जो जम़ीन चरागाहों के लिए उपलब्ध है, उसे खेती के लायक़ बनाने लिए काफ़ी मेहनत करनी होगी. इसमें अच्छी ख़ासी रक़म भी लगेगी. अगर ये माना जाए कि सिर्फ़ उस ज़मीन से जानवरों को हटा लिया जाए और उसे ऐसे ही छोड़ देने से वो खेती के लिए तैयार हो जाएगी, तो, ये खयाल बेमानी है.
दुनिया भर में गोश्त खाने वालों की कमी नहीं है. इसीलिए इसका कारोबार भी व्यापक पैमाने पर फैला हुआ है. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के बेन फालान कहते हैं कि दुनिया में करीब साढ़े तीन अरब जानवर जुगाली करने वाले हैं. और, करीब 10 अरब से भी ज़्यादा मुर्गियां-मुर्गे हैं. इतनी ही तादाद में हर साल इन्हें काटा भी जाता है. ज़रा सोचिए कितनी बड़ी संख्या में लोग इनके पालने से लेकर इन्हें काटने और लोगों तक पहुंचाने में लगे हैं.

एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के पीटर एलेक्ज़ेंडर कहते हैं कि मीट के कारोबार में लगे लोगों के लिए नया रोज़गार पैदा करना ज़रूरी है. तभी हम दुनिया को मांसाहारी से शाकाहारी बनाने की तरफ़ आगे बढ़ सकेंगे. अगर ऐसा नहीं किया गया तो बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी का संकट खड़ा हो जाएगा. सबसे पहले ये समझाना होगा कि वो जानवरों के पालने के साथ साथ पर्यावरण के लिए कैसे मदद कर सकते हैं. मसलन, वो अपने जानवरों के लिए जिस चारे का इस्तेमाल करते हैं, उससे वो कैसे बायो-एनर्जी पैदा कर सकते हैं? या चरागाहों को ही कैसे बेहतर बनाकर पर्यावरण को बचा सकते हैं? उन्हें समझाना होगा कि इससे उन्हें रोज़गार के दूसरे मौक़े मिलेंगे.
दुनिया की कुल ज़मीन का एक तिहाई हिस्सा या तो पूरी तरह से बंजर या कुछ हद तक बंजर ज़मीन है. इस ज़मीन का इस्तेमाल जानवरों को चराने के लिए ही किया जा सकता है. अफ़्रीका जैसे देशों ने कुछ हिस्सों में चरागाहों को खेती के लायक़ बनाने की कोशिश की गई. लेकिन ऐसा हो न सका. रिसर्चर बेन फालान कहते हैं कि दुनिया में बहुत से ऐसे इलाक़े हैं जहां जानवरों के बिना कुछ लोगों का रहना मुमकिन ही नहीं है.
घुमंतू जातियों के लिए तो ये बात पुख्ता तौर पर कही जा सकती है. जानवर उनके रहन-सहन का अटूट हिस्सा हैं. अगर इन जातियों को शहरों में बसा दिया जाएगा, तो, उनकी सांस्कृतिक पहचान ही गुम होने लगेगी. जब तक इंसान ने खेती करना नहीं सीखा था वो ज़्यादातर मांस ही खाता था. यहां तक कि शादी ब्याह में भी तोहफ़े के तौर पर जानवर दिये जाते थे. जिसके पास जितने ज़्यादा जानवर होते थे, वो उतना ही ताक़तवर समझा जाता था. बड़ी दावत या त्यौहार पर मीट के ही पकवान बनाए जाते थे. लिहाज़ा गोश्त का खाया जाना हमारे इतिहास की जड़ों में बसा है. इसे आसनी से अलग नहीं किया जा सकता.

अलबत्ता शाकाहारी होने के अपने फ़ायदे हैं, इसमें कोई शक नहीं. स्प्रिंगमैन की कंप्यूटर मॉडल स्टडी कहती है कि अगर 2050 तक सारी दुनिया के लोग शाकाहारी हो जाएंगे तो बेवक़्त मरने वालों की तादाद में छह से दस फ़ीसद तक की कमी आ सकती है. लोगों को कैंसर, शुगर, हार्ट अटैक जैसी बीमारियों से भी छुटकारा मिल जाएगा. लोग बीमार कम होंगे तो उनके मेडिकल बिल भी कम हो जाएंगे.

22/01/2016

पठानकोट विशेष:

जब वो युद्ध में घायल हो जाता है तो अपने साथी से बोलता है :

“साथी घर जाकर मत कहना, संकेतो में बतला देना;
यदि हाल मेरी माता पूछे तो, जलता दीप बुझा देना!
इतने पर भी न समझे तो, दो आंसू तुम छलका देना!!"

“साथी घर जाकर मत कहना, संकेतो में बतला देना;
यदि हाल मेरी बहना पूछे तो, सूनी कलाई दिखला देना!
इतने पर भी न समझे तो, राखी तोड़ देखा देना !!"

“साथी घर जाकर मत कहना, संकेतो में बतला देना;
यदि हाल मेरी पत्नी पूछे तो, मस्तक तुम झुका लेना!
इतने पर भी न समझे तो, मांग का सिन्दूर मिटा देना!!"

“साथी घर जाकर मत कहना, संकेतो में बतला देना;
यदि हाल मेरे पापा पूछे तो, हाथो को सहला देना!
इतने पर भी न समझे तो, लाठी तोड़ दिखा देना!!"

“साथी घर जाकर मत कहना, संकेतो में बतला देना;
यदि हाल मेरा बेटा पूछे तो, सर उसका तुम सहला देना!
इतने पर भी ना समझे तो, सीने से उसको लगा लेना!!"

“साथी घर जाकर मत कहना, संकेतो में बतला देना;
यदि हाल मेरा भाई पूछे तो, खाली राह दिखा देना!
इतने पर भी ना समझे तो, सैनिक धर्म बता देना!!"
🌹🙏🙏🙏🙏🌹

Jai-Ho
20/03/2015

Jai-Ho

04/10/2014

मोदी ,शब्द के प्रथम अक्षर "मो" को
बारम्बार बोलने पर ॐ हो जाता है ,
द्वितीय अक्षर "दी" को बारम्बार धाराप्रवाह
बोलने पर ,
दी दी दी दी दी दी.
"ईद " शब्द की ध्वनि बनती है।
संदेश मोदीजी
ईश्वर और अल्लाह का भेजा गया एक सन्देश हैं
उनपे भरोसा ही सबका भला करेगा।
-अनीश जैन संपादक विदर्भ जैन न्यूज़ नागपुर

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