30/08/2026
*सत्ता, पद और वजूद: असली नेतृत्व की पहचान"
सत्ता के घेरे में रहने वाला हर व्यक्ति सक्षम और प्रभावशाली नहीं होता। कई बार व्यक्ति वर्षों तक सत्ताधारियों के आसपास रहते-रहते धीरे-धीरे अपना स्वतंत्र वजूद, अपनी सोच और अपनी आवाज़ खो देता है।
वह एक कमिटी से दूसरी कमिटी का सदस्य तो बना रहता है, पद भी मिलते रहते हैं, लेकिन समाज या संस्था की दिशा और विजन तय करने में उसकी अपनी कोई भूमिका नहीं रह जाती। धीरे-धीरे उसकी पहचान उसके विचारों से नहीं, बल्कि सत्ता के साथ उसकी निकटता से होने लगती है।
और यहीं से चापलूसी जन्म लेती है—जब व्यक्ति अपनी बात रखने के बजाय वही कहने लगता है जो सत्ता सुनना चाहती है।
लेकिन हर व्यक्ति के भीतर एक दृष्टि होती है, एक अंतरात्मा की आवाज़ होती है और एक स्वतंत्र वजूद होता है। उसे बचाना, उसे बोलने देना और उसे सही दिशा देना—यही व्यक्तिगत विकास है और यही सामाजिक बदलाव की पहली सीढ़ी है।
असहमति का साहस
सत्ता या व्यवस्था के सामने असहमति व्यक्त करना सहज नहीं होता; इसके लिए विशेष प्रकार के साहस की आवश्यकता होती है:
• अप्रिय होने का साहस: पद, सम्मान या निकटता खोने के भय को छोड़कर सच बोलने की क्षमता।
• बौद्धिक स्पष्टता: बिना उग्रता या व्यक्तिगत द्वेष के, तर्क और तथ्यों के साथ अपनी बात रखने का धैर्य।
• अकेले खड़े रहने का नैतिक बल: जब पूरी सभा मौन हो या हाँ में हाँ मिला रही हो, तब भी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर टिके रहने का साहस।
असहमति का अर्थ विरोध या विद्रोह नहीं, बल्कि संस्था को सही दिशा दिखाने का एक जिम्मेदार प्रयास है।
सोच और आवाज़ को जीवित रखना
आदमी मरने के बाद न कुछ बोलता है, न कुछ सोचता है।
लेकिन जीवन में रहते हुए यदि वह सोचना और बोलना ही छोड़ दे, तो उसका जीवंत वजूद धीरे-धीरे मरने लगता है।
क्योंकि विचारहीन मौन केवल चुप्पी नहीं है; कई बार वह व्यक्ति के भीतर के स्वतंत्र व्यक्तित्व के क्षय की शुरुआत होता है।
इसलिए अपनी बात कहना केवल अधिकार नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है—विशेषकर तब, जब वह बात संस्था और समाज के व्यापक हित में हो।
सत्ता की निकटता नहीं, अपनी सोच बचाइए
आप सत्ता के घेरे में बने रहने के लिए उनके इशारों पर आयोजन कर सकते हैं, समर्थन जुटा सकते हैं और अपनी उपयोगिता साबित करते रह सकते हैं। लेकिन ये चीज़ें आपके पद या सत्ता से आपकी निकटता तो बनाए रख सकती हैं, *आपका वजूद नहीं।*
आपकी असली पहचान आपकी सोच और आपकी आवाज़ से बनती है।
क्योंकि सत्ता और पद स्थायी नहीं होते। आज जिसके साथ आप हैं, कल उसकी जगह कोई और हो सकता है। और जब सत्ता का समीकरण बदलता है, तो केवल सत्ता के सहारे बनी पहचान भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है।
*दूसरे के इशारों पर चलकर आप कुछ समय तक सत्ता के घेरे में बने रह सकते हैं, लेकिन अपनी सोच और अपनी आवाज़ के बिना लंबे समय तक अपना वजूद नहीं बचा सकते।*
संस्थाएँ भी बदल सकती हैं
यदि अधिक से अधिक लोग अपना स्वतंत्र वजूद और विचार बचाए रखें, तो संस्थाएँ भी धीरे-धीरे बदलने लगती हैं।
जहाँ विचारों को सम्मान मिलेगा, वहाँ चापलूसी अपने आप कम होगी।
जहाँ असहमति को भी स्थान मिलेगा, वहाँ बेहतर निर्णय जन्म लेंगे।
और जहाँ मौन को योग्यता नहीं माना जाएगा, वहाँ साहसिक और सच्ची बातें सुनाई देंगी।
किसी भी संस्था की वास्तविक ताकत केवल उसके पदों या पदाधिकारियों में नहीं होती। उसकी असली ताकत उन लोगों में होती है जो पद के साथ अपना विवेक नहीं खोते।
*क्योंकि सत्ता के करीब रहना उपलब्धि नहीं है; सत्ता के बीच रहकर भी अपनी सोच, अपनी आवाज़ और अपना वजूद बचाए रखना ही असली नेतृत्व है।*
- मानकचंद राठौड़