Bhartiya Jain Samaj

Bhartiya Jain Samaj page for social reform thinker. Highlighting issues faced by our community.

If any of my article or quote inspire you, please forward in your groups for social awareness and empowerment of jain community.

05/09/2026

*गौशाला से आगे — क्या हमें हिंसा की जड़ पर भी प्रहार करना चाहिए?*
-मानकचंद राठौड़
हम रोज़ घायल पशुओं की सेवा करते हैं, और उसी समय एक ऐसी व्यवस्था चलने देते हैं जो प्रतिदिन अनगिनत पशुओं को पीड़ा देती है। क्या हमारी भूमिका सिर्फ मरहम लगाने तक सीमित रहनी चाहिए?

जैन समाज ने जीवदया को हमेशा जीवन-मूल्य माना है, और देश की अधिकांश गौशालाएं जैन समाज के सहयोग से चलती हैं (हालांकि सटीक आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि ज़रूरी है)। यह करुणा सराहनीय है — पर गौशाला समस्या का उपचार है, समस्या की जड़ नहीं।

जैन दर्शन हर जीव के प्रति करुणा सिखाता है — केवल गाय तक सीमित नहीं। बैल, भैंस, बकरी, भेड़, पक्षी — सबके लिए व्यापक जीवदया ज़रूरी है। पर एक कड़वी सच्चाई भी समझनी होगी — अहिंसा में विश्वास रखने वाले जैन समाज के पास आर्थिक बल तो प्रचुर है, पर इन व्यवस्थाओं को संभालने के लिए प्रशिक्षित अहिंसक कार्यकर्ताओं की भारी कमी है। ऐसे में आने वाले 25-30 सालों में, जैन समाज द्वारा स्थापित ये गौशालाएं भी धीरे-धीरे उन्हीं क्रूर व्यावसायिक तरीकों पर न चल पड़ें, जिनसे बचाने के लिए वे बनाई गई थीं। इस अंतर को गंभीरता से समझना होगा।

अब समय है एक कदम आगे बढ़ने का:

🔹 पशु-क्रूरता पर रिसर्च और डॉक्यूमेंटेशन
🔹 नीतिगत और कानूनी प्रयास
🔹 प्रभावी जन-जागरूकता अभियान
🔹 डेयरी-चमड़े के अहिंसक विकल्प

सवाल यह नहीं कि कितने पशु बचाए, बल्कि यह कि ऐसी परिस्थितियां कम कैसे हों जिनमें उन्हें बचाना पड़े।

गौशाला बंद करने की बात नहीं — दायरा बढ़ाने की बात है। अहिंसा सिर्फ पीड़ित के प्रति करुणा नहीं, पीड़ा पैदा करने वाली व्यवस्था बदलने का प्रयास भी है। 🌱🙏

-मानकचंद राठौड़

30/08/2026
30/08/2026

“एक सकारात्मक सपना जब समाज में सही सोच और सही कार्यान्वयन से साकार होता है, तो वह अगले सकारात्मक सपने को जन्म देता है। JBN से लेकर JITO मैट्रीमोनी और Varkana Vidyarthi Seva Foundation (VVSF) तक की अपनी यात्रा में मैंने यही देखा है — *व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और करुणा* जैसे क्षेत्रों में हमारी जैन संस्थाओं की सार्थक पहल ही इस श्रृंखला को आगे बढ़ाती है।

क्योंकि आने वाले समय में मजबूत जैन समाज केवल अपनी परंपराओं से नहीं, बल्कि अपने नए सपनों को साकार करने की क्षमता से बनता है।”
- मानकचंद राठौड़

*सत्ता, पद और वजूद: असली नेतृत्व की पहचान"सत्ता के घेरे में रहने वाला हर व्यक्ति सक्षम और प्रभावशाली नहीं होता। कई बार व...
30/08/2026

*सत्ता, पद और वजूद: असली नेतृत्व की पहचान"
सत्ता के घेरे में रहने वाला हर व्यक्ति सक्षम और प्रभावशाली नहीं होता। कई बार व्यक्ति वर्षों तक सत्ताधारियों के आसपास रहते-रहते धीरे-धीरे अपना स्वतंत्र वजूद, अपनी सोच और अपनी आवाज़ खो देता है।

वह एक कमिटी से दूसरी कमिटी का सदस्य तो बना रहता है, पद भी मिलते रहते हैं, लेकिन समाज या संस्था की दिशा और विजन तय करने में उसकी अपनी कोई भूमिका नहीं रह जाती। धीरे-धीरे उसकी पहचान उसके विचारों से नहीं, बल्कि सत्ता के साथ उसकी निकटता से होने लगती है।

और यहीं से चापलूसी जन्म लेती है—जब व्यक्ति अपनी बात रखने के बजाय वही कहने लगता है जो सत्ता सुनना चाहती है।

लेकिन हर व्यक्ति के भीतर एक दृष्टि होती है, एक अंतरात्मा की आवाज़ होती है और एक स्वतंत्र वजूद होता है। उसे बचाना, उसे बोलने देना और उसे सही दिशा देना—यही व्यक्तिगत विकास है और यही सामाजिक बदलाव की पहली सीढ़ी है।

असहमति का साहस

सत्ता या व्यवस्था के सामने असहमति व्यक्त करना सहज नहीं होता; इसके लिए विशेष प्रकार के साहस की आवश्यकता होती है:

• अप्रिय होने का साहस: पद, सम्मान या निकटता खोने के भय को छोड़कर सच बोलने की क्षमता।

• बौद्धिक स्पष्टता: बिना उग्रता या व्यक्तिगत द्वेष के, तर्क और तथ्यों के साथ अपनी बात रखने का धैर्य।

• अकेले खड़े रहने का नैतिक बल: जब पूरी सभा मौन हो या हाँ में हाँ मिला रही हो, तब भी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर टिके रहने का साहस।

असहमति का अर्थ विरोध या विद्रोह नहीं, बल्कि संस्था को सही दिशा दिखाने का एक जिम्मेदार प्रयास है।

सोच और आवाज़ को जीवित रखना

आदमी मरने के बाद न कुछ बोलता है, न कुछ सोचता है।
लेकिन जीवन में रहते हुए यदि वह सोचना और बोलना ही छोड़ दे, तो उसका जीवंत वजूद धीरे-धीरे मरने लगता है।

क्योंकि विचारहीन मौन केवल चुप्पी नहीं है; कई बार वह व्यक्ति के भीतर के स्वतंत्र व्यक्तित्व के क्षय की शुरुआत होता है।

इसलिए अपनी बात कहना केवल अधिकार नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है—विशेषकर तब, जब वह बात संस्था और समाज के व्यापक हित में हो।

सत्ता की निकटता नहीं, अपनी सोच बचाइए

आप सत्ता के घेरे में बने रहने के लिए उनके इशारों पर आयोजन कर सकते हैं, समर्थन जुटा सकते हैं और अपनी उपयोगिता साबित करते रह सकते हैं। लेकिन ये चीज़ें आपके पद या सत्ता से आपकी निकटता तो बनाए रख सकती हैं, *आपका वजूद नहीं।*

आपकी असली पहचान आपकी सोच और आपकी आवाज़ से बनती है।

क्योंकि सत्ता और पद स्थायी नहीं होते। आज जिसके साथ आप हैं, कल उसकी जगह कोई और हो सकता है। और जब सत्ता का समीकरण बदलता है, तो केवल सत्ता के सहारे बनी पहचान भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है।

*दूसरे के इशारों पर चलकर आप कुछ समय तक सत्ता के घेरे में बने रह सकते हैं, लेकिन अपनी सोच और अपनी आवाज़ के बिना लंबे समय तक अपना वजूद नहीं बचा सकते।*

संस्थाएँ भी बदल सकती हैं

यदि अधिक से अधिक लोग अपना स्वतंत्र वजूद और विचार बचाए रखें, तो संस्थाएँ भी धीरे-धीरे बदलने लगती हैं।

जहाँ विचारों को सम्मान मिलेगा, वहाँ चापलूसी अपने आप कम होगी।

जहाँ असहमति को भी स्थान मिलेगा, वहाँ बेहतर निर्णय जन्म लेंगे।

और जहाँ मौन को योग्यता नहीं माना जाएगा, वहाँ साहसिक और सच्ची बातें सुनाई देंगी।

किसी भी संस्था की वास्तविक ताकत केवल उसके पदों या पदाधिकारियों में नहीं होती। उसकी असली ताकत उन लोगों में होती है जो पद के साथ अपना विवेक नहीं खोते।

*क्योंकि सत्ता के करीब रहना उपलब्धि नहीं है; सत्ता के बीच रहकर भी अपनी सोच, अपनी आवाज़ और अपना वजूद बचाए रखना ही असली नेतृत्व है।*
- मानकचंद राठौड़

*मन का सच: आप जो सोचते हैं, वही बनते हैं?*एक ही बीमारी से जूझ रहे दो लोगों की कल्पना कीजिए।एक को बार-बार बताया जाता है —...
29/08/2026

*मन का सच: आप जो सोचते हैं, वही बनते हैं?*
एक ही बीमारी से जूझ रहे दो लोगों की कल्पना कीजिए।
एक को बार-बार बताया जाता है — "आपकी स्थिति बहुत खराब है।"
दूसरे से कहा जाता है — "स्थिति कठिन है, लेकिन उपचार के विकल्प मौजूद हैं और हम पूरी कोशिश करेंगे।"

बीमारी वही है, लेकिन दोनों के मन में बनी अपेक्षा अलग है।

यहीं से समझ में आता है Placebo और Nocebo Effect का महत्व।

जब किसी व्यक्ति को उपचार से लाभ होने की उम्मीद होती है, तो उसकी सकारात्मक अपेक्षाएँ दर्द, तनाव और उपचार के अनुभव को प्रभावित कर सकती हैं। इसे Placebo Effect से जोड़ा जाता है।

इसके विपरीत, जब व्यक्ति लगातार यह मानने लगता है कि दवा काम नहीं करेगी, बीमारी बढ़ेगी या स्थिति बिगड़ने वाली है, तो नकारात्मक अपेक्षाएँ उसके लक्षणों और अनुभव को प्रभावित कर सकती हैं। इसे Nocebo Effect कहा जाता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि "सिर्फ़ सोचने से बीमारी ठीक हो जाती है।"

बल्कि यह समझना ज़रूरी है कि मन और शरीर अलग-अलग दुनिया नहीं हैं। हमारी अपेक्षाएँ, भावनाएँ और तनाव शरीर के अनुभव और उपचार की प्रक्रिया पर असर डाल सकते हैं।

**इसे रोज़मर्रा की जिंदगी में कैसे अपनाएँ?**

"आज मैं बहुत थका हुआ हूँ" कहने के बजाय खुद से पूछें — "आज मैं अपने दिन को थोड़ा बेहतर कैसे बना सकता हूँ?"

बीमारी में दवा और डॉक्टर की सलाह के साथ उम्मीद और सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखें।

बच्चों और बुज़ुर्गों से बात करते समय ऐसे शब्दों से बचें जो अनावश्यक भय पैदा करें।

हर दिन कुछ मिनट अपने मन को शांत करने, अच्छी बात सोचने और कृतज्ञता व्यक्त करने में लगाएँ।

*ध्यान रहे* - गंभीर बीमारी में डॉक्टरी इलाज और चिकित्सकीय सलाह कभी न छोड़ें। सकारात्मक सोच उपचार में सहायक ज़रूर है, लेकिन वह दवा और चिकित्सा का विकल्प नहीं है।

*सबसे महत्वपूर्ण सवाल*

हम अपने बारे में और अपने आसपास के लोगों के बारे में रोज़ कौन-सी बातें दोहराते हैं?

क्या हम अनजाने में डर की स्क्रिप्ट लिख रहे हैं —
या उम्मीद की?

क्योंकि शब्द हमेशा बीमारी को ठीक नहीं कर सकते,
लेकिन वे हमारे मन की दिशा ज़रूर बदल सकते हैं।

और कई बार, मन की दिशा बदलना भी उपचार की यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
- मानक चंद राठौड़

*धर्मभाई-बहन: रिश्तों की विश्वास भरी संस्कृति*रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम का पर्व नहीं, बल्कि विश्वास, आत्मीयता और स...
28/08/2026

*धर्मभाई-बहन: रिश्तों की विश्वास भरी संस्कृति*
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम का पर्व नहीं, बल्कि विश्वास, आत्मीयता और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक है।

हमारे गोडवाड़ समाज में कभी धर्म भाई-बहन की एक सुंदर परंपरा थी। रक्त-संबंध न होते हुए भी ये रिश्ते विश्वास और सम्मान पर टिके होते थे। धर्मभाई बहन को परिवार के सभी समारोहों में जुड़ने का अधिकार मिलना इस बात का प्रमाण था कि ये रिश्ते केवल रस्म नहीं, बल्कि समाज की नैतिक व्यवस्था का हिस्सा थे।

इतिहास भी इस परंपरा की गवाही देता है। मेवाड़ की रानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजी थी और उनसे सुरक्षा की गुहार लगाई थी। हुमायूं, जो एक मुस्लिम शासक थे, ने इस राखी के सम्मान में मदद के लिए सेना भेजी — यह धार्मिक सीमाओं से परे धर्मभाई के रिश्ते का एक क्लासिक उदाहरण है। यह घटना बताती है कि विश्वास और सम्मान का धागा धर्म, जाति या रक्त-संबंध की सीमाओं से कहीं ऊपर होता है।

यह परंपरा केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं, बल्कि मेरे अपने परिवार से भी जुड़ी है। मेरे पिताजी का हमारे गांव के एक राजपूत परिवार में धर्मबहन का रिश्ता था। आज इतने वर्षों बाद भी हमारे दोनों परिवार उसी आत्मीयता और विश्वास के धागे से बंधे हुए हैं। यह मेरे लिए इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि सच्चे रिश्ते रक्त से नहीं, बल्कि निभाई गई निष्ठा से बनते और पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रहते हैं।

आज हम सोशल मीडिया पर सैकड़ों-हजारों लोगों से जुड़े हैं, लेकिन क्या हमारे जीवन में किसी ऐसे रिश्ते के लिए जगह है, जो बिना किसी स्वार्थ के हमारे सुख-दुःख में साथ खड़ा हो? यह भावना केवल धर्मभाई-बहन तक सीमित नहीं — अपने परिवार में चचेरे-ममेरे भाई-बहनों के साथ भी हमें उसी अपनेपन को सींचते रहना चाहिए, ताकि वह रिश्ता भी औपचारिकता न बनकर विश्वास का बंधन बना रहे।

यही तो समाज की नैतिकता का मापदंड है—रिश्तों की संख्या नहीं, रिश्तों में निःस्वार्थ आत्मीयता।

पुरानी परंपरा शायद उसी रूप में वापस न आए, लेकिन उसकी आत्मा—विश्वास, सम्मान, अपनापन और जिम्मेदारी—आज भी जीवित की जा सकती है।

इस रक्षाबंधन पर केवल कलाई पर राखी न बाँधें,
किसी रिश्ते में विश्वास का धागा भी बाँधें।

क्योंकि रिश्ते मजबूत होंगे तो समाज मजबूत होगा, और नैतिक मूल्य मजबूत होंगे तो समाज संस्कारित होगा।

🙏 शुभ रक्षाबंधन — रिश्तों को नया अर्थ देने का पर्व।

- मानकचंद राठौड़

25/08/2026

*जैन कर्ज व्यवस्था: जब आर्थिक लेन-देन भी अहिंसा और विश्वास पर आधारित था*
भारत के आर्थिक इतिहास में *जैन समाज का योगदान केवल व्यापार तक सीमित नहीं था।* उसने कर्ज और वित्त व्यवस्था को भी एक मानवीय, नैतिक और सामाजिक स्वरूप दिया, जहाँ धन के साथ विश्वास भी चलता था।

*विश्वास पर आधारित कर्ज व्यवस्था*

पारंपरिक जैन कर्ज व्यवस्था में *कर्जदाता और कर्जदार का संबंध केवल लेन-देन का नहीं, बल्कि आपसी विश्वास और सामाजिक जिम्मेदारी का था।* उस समय न कोई क्रेडिट स्कोर था, न अकाउंट नंबर; व्यक्ति की पहचान उसके चरित्र, प्रतिष्ठा और संबंधों से होती थी।

*अर्थव्यवस्था में भी अहिंसा*

जैन दर्शन का मूल आधार *अहिंसा* है—अर्थात किसी को अनावश्यक पीड़ा न पहुँचाना। यही भावना आर्थिक व्यवहार में भी दिखाई देती थी। कर्ज का उद्देश्य केवल ब्याज कमाना नहीं, बल्कि संकट में फँसे व्यक्ति को संभालना था। *कठिन परिस्थिति में समय देना, सहिष्णुता रखना और मानवीय रवैया अपनाना इस व्यवस्था की नैतिक शक्ति थी।*

*महाजन और सेठ का वास्तविक अर्थ*

समाज में *‘महाजन’ और ‘सेठ’* का सम्मान केवल धनवान होने से नहीं मिलता था। यह सम्मान तीन आधारों पर खड़ा था:

*धन कमाने की क्षमता*

*ज़रूरतमंद को कर्ज देने की क्षमता*

*दान के माध्यम से समाज को लौटाने की उदारता*

इसीलिए जैन महाजन केवल वित्तदाता नहीं, बल्कि समाज के संरक्षक माने जाते थे।

*कर्ज और दान का संतुलन*

जैन आर्थिक परंपरा का सबसे सुंदर पक्ष यह था कि *कर्ज व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़ा करने का माध्यम था, जबकि दान समाज को मजबूत बनाने का।* धन का उद्देश्य केवल संपत्ति बढ़ाना नहीं, बल्कि सामाजिक कल्याण भी था।

*आधुनिक व्यवस्था की चुनौती*

सदियों से विकसित यह पारंपरिक व्यवस्था आज सरकारी कानूनों और औपचारिक बैंकिंग ढाँचे के कारण लगभग समाप्त हो चुकी है। *पुरानी व्यवस्था में लौटना व्यावहारिक नहीं है, लेकिन उसके मूल्य आज भी प्रासंगिक हैं।*

आज की तस्वीर और अधिक जटिल है। *कई ऐप-आधारित वित्त कंपनियाँ विदेशी पूंजी से संचालित होती हैं*, जहाँ प्राथमिक लक्ष्य तेज़ रिटर्न होता है। दूसरी ओर, *सिबिल स्कोर* जैसी व्यवस्था कर्जदार की हर छोटी चूक को उसके भविष्य की वित्तीय क्षमता से जोड़ देती है। परिणामस्वरूप अनेक लोग अलग-अलग लोन ऐप्स और क्रेडिट कार्ड के जाल में फँसकर लगातार मानसिक तनाव झेलते हैं।

*अब समय है अहिंसक वित्तीय मॉडल का*

अनियंत्रित लोन ऐप्स, डेटा का दुरुपयोग, अपमानजनक वसूली और आत्महत्या जैसी दुखद घटनाएँ हमें चेतावनी देती हैं कि *वित्तीय व्यवस्था केवल तकनीक से नहीं, नैतिकता से भी चलती है।*

आज आवश्यकता है कि आधुनिक बैंकिंग और डिजिटल वित्त में *जैन मॉडल के अहिंसा, सहिष्णुता, विश्वास और सामाजिक उत्तरदायित्व* जैसे सिद्धांतों को स्थान मिले, ताकि कोई भी कर्जदार संकट के समय स्वयं को अपमानित या बेबस महसूस न करे।

*अंतिम प्रश्न*

*क्या हम ऐसी आधुनिक वित्तीय व्यवस्था बना सकते हैं जहाँ लाभ और व्यापार तो चले, लेकिन इंसानियत भी बची रहे?*

यही प्रश्न भविष्य की सबसे बड़ी आर्थिक और नैतिक चुनौती है।

- *मानकचंद राठौड़*

*प्यार हो परिवार में — एक फिल्म, जो परिवार को जोड़े रखने का संदेश देती है*कल जवाहर नगर हॉल, गोरेगांव में *राष्ट्रीय कवि ...
24/08/2026

*प्यार हो परिवार में — एक फिल्म, जो परिवार को जोड़े रखने का संदेश देती है*
कल जवाहर नगर हॉल, गोरेगांव में *राष्ट्रीय कवि श्री युवराजजी जैन द्वारा निर्मित फिल्म प्यार हो परिवार में* देखने का अवसर मिला।

आज जब *छोटी-छोटी गलतफहमियों, अहंकार और संवाद की कमी के कारण परिवार बिखर रहे हैं,* ऐसे समय में परिवार के रिश्तों को जोड़ने वाली यह संदेशपूर्ण फिल्म एक अत्यंत सार्थक पहल है।

बागवान में जिस तरह हमने पारिवारिक भावनाओं की ऊंचाइयों को महसूस किया था, *वैसी ही भावनात्मक छाप प्यार हो परिवार में भी छोड़ती है।* श्री युवराजजी जैन सहित सभी कलाकारों का अभिनय प्रभावी है। *संगीत और निर्देशन भी फिल्म को प्रभावशाली बनाते हैं।*

यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, *परिवार के साथ बैठकर देखने, रिश्तों को समझने और आपसी प्रेम को फिर से महसूस करने का अवसर है।*

इस अवसर पर श्री युवराजजी जैन ने एक *सुंदर और अनुकरणीय घोषणा* भी की कि यदि कोई *संस्था संघ चातुर्मास के दौरान इस फिल्म का शो आयोजित करना चाहती है*, तो वे स्वयं उस आयोजन में फिल्म के प्रदर्शन की पूरी व्यवस्था का जिम्मा उठाने के लिए तैयार हैं।

*यह पहल फिल्म को केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसके संदेश को समाज और परिवारों तक पहुंचाने का माध्यम बन सकती है।*

*मेरा आग्रह है—मौका मिले तो यह फिल्म परिवार के साथ अवश्य देखें और दूसरों को भी देखने के लिए प्रेरित करें।*
क्योंकि आज परिवारों को जोड़ने वाले संदेश की जरूरत शायद किसी भी समय से अधिक है।

- *मानकचंद राठौड़*

*Wake-Up Call for GenZ Jain Samaj*Our society is sitting on massive wealth. But ask yourself — how much of it is buildin...
19/08/2026

*Wake-Up Call for GenZ Jain Samaj*
Our society is sitting on massive wealth. But ask yourself — how much of it is building our future, and how much is going up in smoke for a two-day spectacle?

It's time GenZ Jains called this out.

Wherever money is being burned for prestige and self-glorification, young people need to speak up. Silence protects the system. Only dissent changes it.

Now imagine redirecting even half that money into education, healthcare, housing, and skill-building. Not two days of applause — two generations of impact.

We don't need more events built to glorify individuals. We need institutions that empower people.

This isn't against religion.
This isn't against genuine seva.
This is against a culture of showing off that's quietly eating our community from inside.

*What GenZ can actually do:*
- Show your frustration — wear black at the event, a quiet but visible symbol
- Refuse return-gift culture

The real question isn't whether we can afford grand events.

It's whether we can afford NOT to invest that money in our own future.

Change doesn't start with someone else. It starts the day GenZ says — enough.

Trade showmanship for substance. Publicity for purpose. Applause for institutions that outlast us.

This isn't just a wake-up call.
It's a responsibility.
- Manakchand Rathod

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Mumbai

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9820054078

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