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व्यक्तित्व विकास- सामाजिक बाधा।।जैसे-जैसे व्यक्ति उम्र और अनुभव में बढ़ता है, उसे जीवन में कई उतार-चढ़ावों से गुजरना पड़...
09/01/2026

व्यक्तित्व विकास- सामाजिक बाधा।।

जैसे-जैसे व्यक्ति उम्र और अनुभव में बढ़ता है, उसे जीवन में कई उतार-चढ़ावों से गुजरना पड़ता है। कभी-कभी थोड़ी आज़ादी या आराम मिलता है, लेकिन जीवन को सही ढंग से संभालने की कोशिश हमेशा चलती रहती है। जीवन कई हिस्सों से मिलकर बना है; अगर कोई हिस्सा बिगड़ जाए तो संतुलन और संतोष दोनों खत्म हो जाते हैं।
हर व्यक्ति की जिम्मेदारी होती है। आज नहीं तो कल, जीवन की कसौटी और कठिन हो जाती है। जीवन आसान नहीं है, वह बार-बार हमारी क्षमताओं और हुनर की परीक्षा लेता है। इन चुनौतियों से हमें सीख मिलती है। हार से निराशा या सामान्य स्थिति आती है, और जीत से नए अवसर व नई ऊर्जा मिलती है। यह प्रक्रिया जीवन भर चलती रहती है।
समाज की व्यवस्था ऐसी है कि सफल व्यक्ति को सम्मान मिलता है और सामान्य लोगों को साथ लेकर आगे बढ़ाया जाता है। इससे सकारात्मक माहौल बनता है और सभी को आगे प्रयास करने की प्रेरणा मिलती है।
व्यक्तित्व विकास का अर्थ है—वह रूप बनना जो हम अपने लिए चाहते हैं और जिसे समाज भी स्वीकार करे। इसमें व्यक्ति का अपना प्रयास होता है, लेकिन समाज भी उसे दिशा देता है। यही सामाजिक बाधा है, जो व्यक्ति को सही-गलत के बीच बार-बार सोचने पर मजबूर करती है।
संतुलित और मानवीय गुणों वाला व्यक्ति ही सही निर्णय ले सकता है। भावनाओं या गुस्से में बहकर लिया गया फैसला नुकसान पहुँचा सकता है। इसलिए ज़रूरी है कि हम खुद को ईमानदारी से परखें। जब यह समझ आ जाए कि हमारे काम से न केवल हमें बल्कि समाज को भी लाभ होगा, तब बिना झिझक आगे बढ़ना चाहिए।

28/08/2025

हरकत में बरकत है।
यह बात व्यवहारिक रूप से सिद्ध है। स्वयं की वयस्तता व समद्धी के लिए यह प्रारम्भिक प्रयास है । व्यक्ति को अपने को उपयोगी बनाए रखने के लिए निरन्तर कुछ करते रहना चाहिए । यह कर्मभूमि है , अपने अस्तित्व को बनाए रखने से लेकर विशेष उपलब्धि अर्जित करने तक सभी को कर्म करना ही पड़ता है । जितनी अधीक मेहनत उतनी ही बडी़ सफलता, यह नियम सार्वभौमिक है । अपनेआप सब ठीक हो जाएगा या कोई देवी शक्ति सम्भाल लेगी यह मानसिकता साहस भरने के लिए ठीक है, किन्तु ऐसा सोचकर केवल प्रतिक्षा करने वाले पिछड़ जाते हैं । ऐसे मनुष्यों को सब नये सीरे करना पड़ता है , ऐसी अवस्था बडी़ दयनीय होती है , क्योंकि जो कभी आपके साथ थे यहाँ तक कि आपसे पीछे भी थे वे सब बहूत आगे निकल जाते हैं। जिस तरह कोई भी वस्तु यदि प्रयोग में न लाई जाए तो थोडे़ ही समय में बेकार हो जाती है, ठीक वैसे ही मनुष्य भी कार्यशील न रहे तो उसकी प्रगति रुक जाती है । मानसिक कार्य करने वाले हों या शारीरिक , किसी संस्था में कार्यरत हों या स्व नियोजित, जो लोग अपने व्यवसाय के प्रति समर्पित हैं , वे सदा इसकी गुणवता एवं मूल्य संवर्धन के लिए प्रयासरत रहते हैं। इसे स्वचालित होना कहते हैं , यानि आप जो कर रहे हैं वह अपनी इच्छा और प्रसन्नता से कर रहे हैं । ऐसी अवस्था में पहुंचने पर व्यक्ति का दृष्टिकोण सामान्य नहीं रहता, बडे़ से बडे़ लक्ष्य सरलता से प्राप्त किए जा सकते हैं ।
अपने कार्यों को समय सीमा में पूर्ण करने का अभ्यास ड़ालें । लचिलापन अतिशीघ्र त्यागें ।

24/07/2025

शिथिलता के बाहर।

इस पृथ्वी पर मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो अपने विवेक से इस पृथ्वी की रचना को प्रभावित कर सकता है। यह सत्यापित है तभी तो मानवीय कृत्यों से जलवायु परिवर्तन, आपदाओं में वृद्धि, बंजर भूखंडों में कृषी और गगनचुंबी इमारतों के निर्माण से लेकर पृथ्वी के गर्भ से अनेकों रत्नों की खोज से लेकर ज्ञान तक का मार्ग प्रशस्त हुआ है।मानव मस्तिष्क अद्भुत सम्भावनाओं से भरा है।
मन से ही मानव शब्द बना है जो अनन्त अनुभवों को समावेशित कर वर्तमान में पहुंचा है और भविष्य के प्रति जागरूक होकर सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण हेतु योजनाएं बनाता है।
मन की खुराक है, विचारों का प्रवेश और सृजन तथा उचित समय पर अनुप्रयोग। अंत में व्यक्ति के द्वारा किसी ध्येय को पूर्ण कर लेने पर ही जीवन का अर्थ में लगना माना जाएगा। यह लम्बी यात्रा है जिसमें विपुलता या सर्व उपलब्धता होने के पश्चात भी उत्साह और उल्लास जैसी खुबसूरत अनुभूतियां खो जाती हैं। इनकी कमीं से सम्पन्नता होने पर भी निरस और कठोर व्यक्तित्व का आवरण चढ़ जाता है। जिसे जीवन भर इस शिथिलता को ढ़ोते रहना जटील अभ्यास है।
स्थिरता, शिथिलता की जनक है और यह उत्साह को समाप्त कर देती है। इससे निपटने के लिए समय निकाल कर उत्सव और पर्व अथवा अनुष्ठान आयोजित करते रहें। किसी भी अवसर को हाथ से न जाने दें ताकि जीवन में नव तरंग का प्रवेश होता रहे और ऊर्जा को दिशा मिलती जाए।

Small steps to get successful.

जब कोई व्यक्ति किसी गंभीर समस्या में फँस जाता है और समाधान उसकी सामर्थ्य से बाहर हो जाता है, तभी उसके वास्तविक चरित्र का...
27/06/2025

जब कोई व्यक्ति किसी गंभीर समस्या में फँस जाता है और समाधान उसकी सामर्थ्य से बाहर हो जाता है, तभी उसके वास्तविक चरित्र का पता चलता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं—प्राकृतिक आपदाएँ, गंभीर बीमारियाँ, युद्ध या सामाजिक संकट—जहाँ अचानक आए नुकसान या उसके डर से मन अस्थिर हो जाता है।

चूँकि समाधान अक्सर समय पर निर्भर करता है, व्यक्ति को प्रतिदिन प्रयास करने पड़ते हैं। इसी प्रक्रिया में कई लोग सिर्फ समस्या पर केंद्रित होकर उसमें सिमट जाते हैं। जब समस्या लंबी चलती है, तो यह आदत बन जाती है कि बस बैठे रहें और इंतजार करते रहें। किसी ने कहा भी है—

“आजकल मैं बस वक्त गुजार रहा हूँ, यह सच है कि मैं बहुत दिनों से परेशान हूँ।”

धीरे-धीरे यही दिन महीनों और सालों में बदल जाते हैं और व्यक्ति पूरी तरह बदल जाता है। आपकी समस्या पहले जैसी नहीं रहती, और कुछ समय बाद वह उतनी महत्वपूर्ण भी नहीं लगती। परंतु इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि आपने सही समय पर अन्य महत्वपूर्ण काम छोड़ दिए, या उनको सही नजरिये से हल नहीं किया। इससे आपका सामाजिक, व्यवसायिक और व्यक्तिगत विकास प्रभावित हो जाता है।

निष्कर्ष यही है कि हमें जागरूक रहकर जीवन जीना चाहिए। कौन-सा समय किस रूप में सामने आएगा, यह हमारी कल्पना से परे होता है। हर स्थिति का सामना करने के लिए मानसिक रूप से मजबूत रहना जरूरी है। जब अनावश्यक विचारों में उलझ जाते हैं, तब भी हमें अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग रहकर निर्णय लेना चाहिए।

इस समय का सदुपयोग अपनी रुचियों और आत्म-विकास के लिए करें। किसी एक विषय पर लगातार सोचते रहने और खुद को कोसने से मानसिक और शारीरिक ऊर्जा क्षीण होती है। वहीं नई चीजों को सीखने, खुद को व्यस्त रखने और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने से आपका आत्मबल बढ़ता है, सकारात्मकता उत्पन्न होती है और जीवन को सही दिशा मिलती है।

पर चिन्ता।दूसरों के कार्यों में बार-बार झांकना और उनके बारे में सोचते रहना हमारे कीमती समय को उसी तरह बर्बाद करता है, जै...
17/02/2025

पर चिन्ता।

दूसरों के कार्यों में बार-बार झांकना और उनके बारे में सोचते रहना हमारे कीमती समय को उसी तरह बर्बाद करता है, जैसे दीमक किताब को चुपचाप खोखला कर देती है। जितनी जल्दी हम इस बात को समझ लें, उतना ही अच्छा होगा।

अक्सर हम दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करने, उनके बारे में सोचने या अपनी जगह बनाए रखने में ही अपना अधिकांश समय खर्च कर देते हैं। परिवार हो, समाज हो या कार्यक्षेत्र – हर जगह हम अपने समय को बांटते रहते हैं और अंत में खुद को समझने के लिए समय नहीं निकाल पाते। यही वह बिंदु होता है, जहां समस्या की शुरुआत होती है।

जब ध्यान लगातार बाहरी बातों पर टिका रहता है, तो अपने भीतर की आवाज़ सुनना कठिन हो जाता है। हमारा मन तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने में ही उलझ जाता है, और इस दौड़ में हम वास्तविक संतुष्टि से दूर हो जाते हैं। सफलता केवल दूसरों को खुश करने से नहीं मिलती; यह तब मिलती है जब हम अपने मन और क्षमताओं का सही दिशा में उपयोग करें।

इसलिए, ज़रूरी है कि हम दूसरों की अपेक्षाओं में उलझने की बजाय अपने लक्ष्यों और इच्छाओं पर ध्यान केंद्रित करें। हमारी योग्यता, अनुभव और मेहनत का सही उपयोग तभी संभव है, जब हम अपने अंदर झांकें और समझें कि हमें वास्तव में क्या चाहिए। बाहरी चीजों में उलझने से बचें और अपनी ऊर्जा को उन कार्यों में लगाएं, जो हमारे विकास और सच्ची संतुष्टि का कारण बनें।

क्रोध से मुक्ति।हमें अपने सर्वोत्तम समय की प्रतीक्षा अवश्य करनी चाहिए। जीवन में अनेक बार ऐसी अप्रत्याशित चुनौतियाँ आती ह...
10/11/2024

क्रोध से मुक्ति।

हमें अपने सर्वोत्तम समय की प्रतीक्षा अवश्य करनी चाहिए। जीवन में अनेक बार ऐसी अप्रत्याशित चुनौतियाँ आती हैं जो हमारे मन को विचलित कर देती हैं, और हम किसी भी निर्णय में असमर्थ हो जाते हैं। विचारों की उलझन और वर्तमान की जटिलताएँ इस कदर भारी हो जाती हैं कि हमारे पिछले अनुभव और उपलब्धियाँ भी धुंधली लगने लगती हैं।

कहते हैं कि मोह ही क्रोध का जनक है। हमारे सारे दुखों और चिंताओं का मूल यही मोह है। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि हम समझें कि हमारे लिए सबसे अहम क्या है। जिस चीज़ को हम किसी भी कीमत पर छोड़ नहीं सकते, वही हमारे मोह का केंद्र बन जाती है और हमें एक अदृश्य बंधन में जकड़ लेती है। जब मोह में खोने का भय समा जाता है, तो मन अशांत हो उठता है, निर्णय क्षमता कमजोर हो जाती है और सोच में असंतुलन आ जाता है। परिणामस्वरूप, हम गलत निर्णय लेते हैं, जो क्रोध का कारण बनता है।

जब क्रोध का प्रभाव बढ़ जाता है, तो मस्तिष्क अपनी स्थिरता खो देता है, और हमारे अन्य विचारों पर संवेदनशीलता कम हो जाती है। व्यक्ति का दृष्टिकोण सीमित हो जाता है, नये विचारों का आगमन रुक जाता है, और एक ही सोच पर अटक कर वह समय को व्यर्थ गंवाने लगता है। ऐसे समय में अक्सर व्यक्ति छोटी-बड़ी भूलों का शिकार हो जाता है।

इसलिए यह समझना आवश्यक है कि कुछ भी स्थायी नहीं है। जीवन की हर समस्या का हल संभव है, यदि हम संयम और धैर्य से काम लें। थोड़े समय के बाद स्थितियाँ बदलती हैं, और जीवन नई दिशा में प्रकट होता है। हमें अपनी संवेदनशीलता बनाए रखनी चाहिए, लेकिन उत्तेजना पर नियंत्रण भी आवश्यक है।

धीरे-धीरे परिस्थितियाँ स्पष्ट होंगी, और जो हमने चाहा है, वह हमें अवश्य मिलेगा।

कार्य पूर्ण करने की आदत। अपने कार्य को पूरा करना भी एक कार्य है और यह किसी कला या चुनौती से कम नहीं। मनुष्य का स्वभाव हो...
29/06/2024

कार्य पूर्ण करने की आदत।
अपने कार्य को पूरा करना भी एक कार्य है और यह किसी कला या चुनौती से कम नहीं। मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह नए कार्यों को प्रारंभ बड़ी शिघ्रता से कर लेता है किंतु उन्हें अंजाम तक पहुंचाते - पहुंचाते भटक जाता है। इसके अनेकों कारण हैं जैसे लक्ष्य का बोध न होना या फिर विभिन्न समस्याओं में पड़ जाना कई बार दूसरों के ऊपर निर्भरता इसके अतिरिक्त सही लय में ना रह पाना। यदि आप केवल अपने सामान्य क्रियाकलापों में हैं और फिर भी अपनी जिम्मेदारियों को पूर्ण करने में असमर्थ हैं तो यह समझ लें कि आपकी व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है।
कई बार सामान्य आदमी भी हमें हैरान कर देते हैं और वे महत्वपूर्ण लगते हैं क्योंकि इनके पास वे गुण होते हैं जो हमें लगता है कि हमारे पास नहीं है। जरा विचार करें ऐसे लोग जो किसी भी कार्य को अंजाम तक पहुंचाने में कामयाब हो जाते हैं । इनके स्वभाव में तेजी तो होती ही है साथ ही अपनी बात बोलने व कार्य को दिखाने की जो क्षमता होती है वह भी अद्भुत होती है। रत्न चंद जी सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य हैं और लगभग पैंतीस वर्ष तक शिक्षा विभाग में सजग रहकर सेवाएं देने के पश्चात सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं। कुछ लोगों का यह मानना है कि वे किसी हिरण के जैसे हैं जो अपने ही मल की आवाज सुनकर ड़र जाते हैैं। यदि ऐसा है तो भी इसमें कोई बुरी बात नहीं क्योंकि स्वयं को किसी भी तरह सही रखना व कार्य सिद्ध करना बड़ी बात है। अपने व्यवसाय से प्रेम करने वाले लोगों में से एक रत्न चंद जी किसी भी कार्य को पूरा करके ही मानते थे। मनुष्य के लिए टाल-मटोल या देरी करना सहज है तथा जिनको यह आदत है वे दूसरों को भी आसानी में रखते हैं। आज के समय में ऐसे ही लोग सही जान पड़ते हैं। घर में यदि माता-पिता सख्ती दिखाते हैं तो वे बच्चों के अनुसार सही नहीं हैं, व्यवसाय में यदि उच्च अधिकारी किसी कार्य की निगरानी करे तो वह अखरने लगता है। समाज में कोई व्यक्ति स्पष्ट और सही पक्ष रखे तो वह बेकार जान पड़ता है। समय बीत जाने के बाद ही मनुष्य की कीमत व संदेश का पता चलता है। वे जो वर्तमान में ही ऐसी समझ तैयार कर लेते हैं तथा रत्न चंद जैसे लोगों के साथ काम करना सीख जाते हैं वे भविष्य में पछताते नहीं बल्कि निपुण खिलाड़ी की तरह अपना खेल खेलते हैं।
जिन लोगों के पास धन व अन्य संसाधन इकट्ठा हो जाते हैं, वे यह मान लेते हैं कि वे किसी भी कार्य को करने में सक्षम हैं। हमारी सामाजिक व्यवस्था भी अजीब जैसी है इसमें वे लोग जो चाटुकारिता व अपने संसाधनों का उपयोग करना सिख जाएं उनका थोड़ा सा निवेश भविष्य में कई गुना दिलवा देता है। देश और समाज को दिशा व निर्देश देने वाले लोग जिन्हें नेता के रूप में चुनकर विभिन्न संस्थानों में इसलिए भेजा जाता है कि वे सर्वहितकारी निर्णय लेंगे। लेकिन आज के दौर में घुड़दौड़ की तरह इन पर दांव लगाए जाते हैं तथा आर्थिक व अन्य दबाव बनाकर भविष्य में उनका वैचारिक शोषण किया जाता है तथा अपने कार्यों को उचित अथवा अनुचित तरीके से पूरा कर दिया जाता है। ऐसे ही लोग कामयाब दिखते हैं । ऐसे लोग अवसरवादी होते हैं जो केवल अपने मतलब के लिए इंतजार में रहते हैं। सरल व सामान्य लोगों के लिए प्रत्येक कार्य कठिन और उलझन वाला है।मूल बात तो यह है कि आपके सपने जितने बड़े हों, आपके पास यदि कुछ दांव पर लगाने को नहीं है तो केवल सोचते ही रह जाएंगे। वे लोग जो आपसे क्षमता में कम हैं, दूसरे तरीके निकालकर आगे निकल जाएंगे।
खींचातानी सदा रहती है, अंत में जीत केवल उसी की निश्चित है जो अपने उद्देश्यों के बीच में आने वाली किसी भी रूकावट के सामने झुकता नहीं है। यह अलग बात है कि मनुष्य के जीवन में एक उद्देश्य ही मुख्य नहीं हो सकता।समकालीन दौर में अनेकों कार्य व महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाने आवश्यक होते हैं। यदि आप अकेले हैं और और आपने समाज के प्रति कुछ बेहतर सोचा है लेकिन वही समाज आपके साथ चलने को तैयार नहीं है तो यह भी एक बड़ी समस्या हो जाती है।
अब मान लिजिए आपको सही का बोध हो, परिणाम का भी पता हो, आप करने में भी सक्षम हैं और प्रत्यक्ष रूप से बड़ी बाधाएं भी नजर नहीं आतीं फिर भी आप यूं ही छोड़ दें तो दोष कहां है? अब यह जानना जरुरी है कि क्या कारण हैं जो आपको आगे बढ़ने से रोक रहे हैं। सबसे पहले तो यह होता है कि आप एकदम से किसी भी निर्णय तक नहीं पहुंच सकते साथ ही जिस बारे में दिमाग की कोई तैयारी न हो उसके प्रति आप प्रथम बार में ना ही करेंगे।
सबसे महत्वपूर्ण है कि व्यक्ति अपनी क्षमताओं को न गिरने दे और यह संभव है यदि आपका मनोबल न गीरने पाए। कार्यों के महत्व व संवेदना को समझते हुए उन्हें प्रमुखता के आधार पर बांटना ही सही रहेगा।यह भी मान लें कि आपकी समझ कम नहीं है। जो कार्य आज आपको बोझ लग रहा है किन्तु यह प्रयास कि आप इसकी सफलता के हिस्सेदार होंगे यह एहसास सदा जिवित रहना चाहिए। एक और बात सदा स्मरण रहे कि अपने अपने लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए नित्य समय निकालें। धीरे-धीरे आप पाएंगे की आपने एक जटिल और कठिन कार्य परिणाम तक पहुंचा दिया है।

सहभागिता।जीवन की शुरुआत से लेकर आज तक या मनुष्य ने जब से मस्तिष्क का उपयोग सीखा तब से लेकर आज तक सबसे मुश्किल कार्य है द...
02/02/2024

सहभागिता।
जीवन की शुरुआत से लेकर आज तक या मनुष्य ने जब से मस्तिष्क का उपयोग सीखा तब से लेकर आज तक सबसे मुश्किल कार्य है दूसरों से कार्य लेना। दूसरे शब्दों में एक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दूर दृष्टि रखते हुए आगे बढ़ना तथा योग्यता के अनुसार मानव संसाधन को उपयोग में लाना। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और मिलकर एक समुदाय का हिस्सा है। इसीलिए अकेले रहकर प्रगति संभव नहीं है । हम जो सोचते हैं या जो करना चाहते हैं वह केवल एक विचार ही रह जाएगा यदि समाज के प्रति जिम्मेदारी व इसकी सही समझ नहीं होगी। इस समाज में व्यक्तिगत जरूरत की आपूर्ति से लेकर इसी के लिए समर्पित हो जाना दो अलग बातें नहीं है बल्कि सृजन से लेकर पूर्णता की प्राप्ति तक की यात्रा है।इस सफ़र में अनेकों पड़ाव आते हैं जहां व्यक्ति दूसरों पर निर्भर हो जाता है। यह निर्भरता ही सामाजिक होने का अहसास करवाती है तथा शक्ति के विस्तार के लिए भी प्रेरित करती है । जब व्यक्ति अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पूर्ण कर ले तथा स्वयं को आने वाले समय के अनुरूप सुरक्षित महसूस कर ले जो की भौतिक व आध्यात्मिक स्तर तक की जरूरत को शामिल करता है तो उसका कर्तव्य बनता है कि वह आने वाली पीढ़ियों को भी इस अर्जित ज्ञान का बोध करवाए। यहीं से शुरुआत होती है दूसरों की क्षमताओं को समझने की, साथ ही उन्हें सही दिशा देने की। यह कार्य किसी पौधे का अवांछित रूप से बढ़ने से रोकना तथा इसकी कांट- छांट करके इसे फल योग्य बनाने के जैसा है।
जब हम दुसरों से कार्य लेने की बात करते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आप केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करना सिख चुके हैं और काम निकल जाने के पश्चात आत्ममुग्ध होते रहते हैं। यह सामान्य सोच है जो आपको सिमित से चक्र में घुमाती रहेगी और आपके लिए बड़े मौके पैदा नहीं होने देगी।यदि आप बड़े काम करना चाहतें हैं,आपका लक्ष्य नाम कमाना हैै या फिर जीवन को किसी के लिए उदाहरण के रूप में छोड़ना है तो फिर छोटे फायदे या नुक्सान नहीं देखने चाहिए।यह नेतृत्व की कसौटी है जिसके बल पर छोटे-छोटे कार्यों जैसे अपने परिवार को सही से चलाने से लेकर किसी संस्था की प्रगति के लिए अथवा किसी निर्माण या फिर उत्पादन में सब की सहभागिता सुनिश्चित करने से लेकर अंत में उत्कृष्ट परिणाम हाशिल करने के लिए तैयार हैं।

यदि आप सच में कुछ अच्छा चाहते हैं और स्वयं को निरंतर तराशने के लिए चिंतित रहते हैं तो आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर रहें यह आधार है जिसके बल पर बड़े से बड़ा लक्ष्य भेदा जा सकता है।

21/01/2024

राम अवध में , काशी में शिव, कांहा वृन्दावन में।
दया करो प्रभू देखें इन को
हर घर के आँगन में।

व्यक्ति के जीवन में इच्छाएं कभी समाप्त नहीं होतीं। इनमें चाहे भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति हो या मानसिक व आत्मिक शांति की स...
28/06/2023

व्यक्ति के जीवन में इच्छाएं कभी समाप्त नहीं होतीं। इनमें चाहे भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति हो या मानसिक व आत्मिक शांति की स्थापना।शुरू से लेकर अंत तक अनेकों अभ्यास व अनुभव परत-दर-परत सामने आते हैं। किसी भी समय मन दूसरी इच्छाओं की तरफ प्रेरित हो सकता है।
आपने जो भी अपने लिए सोचा है वह सब पूरा हो सकता है। आपकी समस्त इच्छाएं पूर्ण हो सकती हैं।यह सम्भव है, बस एक बार तय कर लिजिए कि यह आपको वास्तव में चाहिए। अब आपको बैठकर केवल इंतजार नहीं करना है, रोज अपने लक्ष्य को थोड़ा थोड़ा समय व श्रम निवेश शुरू कर देना है। निरन्तर धैर्य के साथ आगे बढ़ना है। सफलता का यही मूल मंत्र है। प्रकृति भी इसी नियम पर कार्य करती है।
मनुष्य ने अपनी इच्छाओं के चलते तथा समय की पर्वाह किए बिना केवल लक्ष्य प्राप्ति को ही अपना सर्वस्व मान लिया है। इसके विपरित शुरू से लेकर अंत तक की समयावधि निश्चित कर लेना सही रहता है। समय के उपयोग व निर्धारण के बगैर कोई भी कार्य सड़क पर पड़े पत्थर के जैसा होता है। समय के निर्धारित हो जाने से कार्य में स्वत: ऊर्जा भर जाती है तथा इसके सिद्ध होने के संयोग बन जाते हैं। प्रकृति ने भी प्रत्येक कार्य के लिए समय को सर्वोपरि माना है। जीवों के गर्भाधान से लेकर पृथ्वी की परिक्रमा तक कुछ भी समय से बाहर नहीं है।

आसक्ति और प्राप्यता शिघ्रता से मानसिक पतन की तरफ धकेलती हैं। इन दोनों  का सही प्रबंधन जरूरी है। आसक्तियों की पूर्ति के ल...
11/06/2023

आसक्ति और प्राप्यता शिघ्रता से मानसिक पतन की तरफ धकेलती हैं। इन दोनों का सही प्रबंधन जरूरी है। आसक्तियों की पूर्ति के लिए अधिक समय व संसाधन खर्च होते हैं साथ ही दुसरों पर निर्भरता बढ़ती जाती है। अंततः सक्षमता रखने वाले लोगों का सम्मान भी जाता रहता है। प्राप्यता सम्पन्नता का प्रतीक है जब व्यक्ति को सब सहज लगता है। समस्या तब है कि इसे सम्भालना न आए। वास्तव में आसक्ति व प्राप्यता के कारण व्यक्ति की निर्णय क्षमता समाप्त हो जाती है या फिर निर्णयों पर टिके रहना मुश्किल होता है।

11/04/2023

एक समय की बात है, एक बहुत मजबूत लकड़हारे ने लकड़ी के व्यापारी के यहां नौकरी मांगी और उसे मिल गई। वेतन वास्तव में अच्छा था और काम की स्थिति भी। उन कारणों से, लकड़हारे ने अपना सर्वश्रेष्ठ करने का निश्चय किया।

उसके मालिक ने उसे एक कुल्हाड़ी दी और उसे वह क्षेत्र दिखाया जहाँ उसे काम करना था।

पहले दिन लकड़हारा 18 पेड़ लेकर आया।

"बधाई हो," मालिक ने कहा। "उस रास्ते पर जाओ!"

इन शब्दों से प्रेरित होकर, लकड़हारे ने अगले दिन बहुत कोशिश की, लेकिन वह केवल 15 पेड़ ही ला सका। तीसरे दिन उसने और भी कोशिश की, लेकिन वह केवल 10 पेड़ ही ला सका। दिन पर दिन वह कम से कम पेड़ ला रहा था।

लकड़हारा चिन्ता में पड़ गया। वह अपने मालिक के पास गया और क्षमा याचना करते हुए कहा कि वह समझ नहीं पा रहा है कि क्या हो रहा है।

"पिछली बार तुमने अपनी कुल्हाड़ी कब तेज की थी?" मालिक ने पूछा।

पैनापन? मेरे पास अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज करने का समय नहीं था। मैं पेड़ों को काटने की कोशिश में बहुत व्यस्त रहा हूँ…”

हमारा जीवन ऐसा भी ही है। हम कभी-कभी इतने व्यस्त हो जाते हैं कि हमें "कुल्हाड़ी" की धार तेज करने का समय ही नहीं मिलता। आज की दुनिया में ऐसा लगता है कि हर कोई पहले से ज्यादा व्यस्त है, लेकिन पहले से कम खुश व उत्पादक होता जा रहा है।

ऐसा क्यों? क्या ऐसा हो सकता है कि हम "तेज़" बने रहना भूल गए हैं? गतिविधि और कड़ी मेहनत में कुछ भी गलत नहीं है।

लेकिन हमें इतना व्यस्त नहीं हो जाना चाहिए कि हम जीवन में वास्तव में महत्वपूर्ण चीजों की उपेक्षा करें, जैसे कि हमारा निजी जीवन, अपने शौक को पूरा करने के लिए समय निकालना, अपने परिवार के लिए अधिक समय देना, पढ़ने के लिए समय निकालना, अपने कौशल को बढ़ाना, अपने ज्ञान को उन्नत करना, अपनी ताकत और कमजोरियों से अवगत होना, अपने आत्म-विकास और स्वास्थ्य आदि के लिए समय व्यतीत करना।

हम सभी को आराम करने, सोचने और ध्यान लगाने, सीखने और बढ़ने के लिए समय चाहिए। यदि हम इन सब विषयों के बारे में अवगत नहीं रहेंगे तो निसंदेह अपनी ऊर्जा व्यर्थ करते रहेंगे। "कुल्हाड़ी" की धार तेज करने के लिए समय नहीं निकालेंगे, तो हम सुस्त हो जाएंगे और अपनी प्रभावशीलता खो देंगे। किसी भी व्यवसाय में मनवांछित परिणाम तभी मिल सकते हैैं जब निरन्तर नयेपन के साथ उतरेंगे।

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