25/06/2021
एक बात समझ नहीं आई कि जब कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश बन के खुश है..
और, वहाँ महबूबा, अब्दुल्ला परिवार तथा अन्य आंतकवादी समर्थक अप्रासंगिक हो चुके हैं तो फिर वहाँ इतनी जल्दी चुनाव करवा कर मुख्यमंत्री बनाने का औचित्य है ???
एक तर्क यह दिया जा रहा है कि... वहाँ परिसीमन के बाद चुनाव होंगे.
और, परिसीमन का मतलब होगा कि जम्मू के पास ज्यादा सीट होंगी और कश्मीर घाटी के कम.
इसी आधार पर यह मान कर चला जा रहा है कि.... जब जम्मू के पास ज्यादा सीटें होंगी तो वहाँ जम्मू का ही (शायद कोई हिन्दू ) मुख्यमंत्री होगा जो आतंकवाद को प्रश्रय नहीं देगा...!
चलो... ये सोच अच्छी है...!
फिर तो... बंगाल, UP, कर्नाटक, और झारखंड आदि में हिन्दू 70% से ज्यादा हैं.
तो क्या बंगाल, UP और झारखंड आदि में गलत नेता नहीं चुने जाते हैं ???
क्या हर हिनू बहुल राज्य में हमेशा BJP ही चुन कर आ जाती है ??
क्या ये अच्छा नहीं होता कि... पहले कश्मीर घाटी को पूरी तरह शांत कर लिया जाता और वहाँ के सभी विस्थापित हिन्दुओं को पुनः केंद्र सरकार अपनी निगरानी में बसा लेती... उसके बाद चुनाव करवाती ???
क्योंकि, चुनाव तो चुनाव है....!
और, चुनाव के बाद अगर कश्मीर में भी बंगाल की तर्ज पर फिर महबूबा या अब्दुल्ला फैमिली चुन कर आ गई तो...
अभी तक के सारे किये कराए पर पानी न फिर जाए...!
इसीलिए, मुझे आज तक ये समझ नहीं आया है कि....
आखिर , BJP और संघ के लोगों को ज्यादा निष्पक्ष दिखने की इतनी चुल्ल क्यों मची रहती है ????
और, क्यों इन्हें वामपंथी ब्रिगेड से सर्टिफिकेट की लालसा रहती है कि वे इन्हें अच्छा कहें...!
ज्यादा अच्छा दिखने के चक्कर में कहीं अपने ही किये पर पानी मत फेर देना प्रभु...!!
ये लोग तो तुम कितना ही सेकुलर बन जाओ तुम्हें वोट नहीं देंगे ऐसा ना हो कि इनको खुश करने के चक्कर में... इधर से भी हमेशा के लिए चले जाओ
जय महाकाल...!!!