02/04/2026
लालू जी के द्वारा बिहार की कला एवं सांस्कृतिक विरासत के एक अहम् स्वरुप "लौंडा नृत्य " करवाए जाने पर कुछ लोगों की अनावश्यक आपत्ति है , ये ऐसे लोग हैं जिन्हें पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर कुछ भी बोलना है और जिन्हें बिहार की परंपरागत सांस्कृतिक विरासत के बारे में तनिक भी जानकारी नहीं है l
सरकारी समारोहों - राजकीय - महोत्सवों आयोजनों के मंचों पर बॉलीवुड के फूहड़ गानों पर अश्लील नृत्य की प्रस्तुति पर मौन रहने वाले लोगों को बयान देने से पहले ये जानना चाहिए कि 'लौंडा नृत्य ' बिहार और पूर्वांचल (पूर्वी उत्तर प्रदेश) का एक पारंपरिक लोक नाट्य और नृत्य रूप है, जिसमें पुरुष महिलाओं के वेश में सामाजिक - सांस्कृतिक समारोहों और शादियों में अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले महान लोक कलाकार स्व . भिखारी ठाकुर जी के द्वारा नृत्य की इस विधा को लोकप्रिय बनाया गया था और सदियों से चली आ रही ये नृत्य की परंपरा , सामाजिक संदेश और व्यंग्य सम्प्रेषण का एक सशक्त माध्यम है।
नृत्य की यह परंपरा सदियों पुरानी है, और उस समय से ज्यादा लोकप्रिय हुई जब महिलाओं को पुरुषों की सभाओं में नृत्य करने के पीछे असामाजिक निषेध - वर्जनाएं प्रभावी थीं और जिसके कारण पुरुषों को महिलाओं की भूमिका निभानी पड़ी। स्व. भिखारी ठाकुर जी के द्वारा पलायन, दहेज, शराबखोरी, विरह की जिंदगी जी रही विवाहिताओं और लैंगिक समानता जैसे सामाजिक मुद्दों को उजागर करने के माध्यम के रूप में इस नृत्य का प्रयोग किया गया और लालू जी भी एक अर्से से इस लोक परंपरा को विलुप्त होने से बचाने और वैचारिक सम्प्रेषण के लिए इसका आयोजन करवाते आ रहे हैं, लालू जी सामाजिक - सांस्कृतिक परम्पराओं को संजोने के लिए ही जाने जाते हैं l गौरतलब है कि पद्मश्री से सम्मानित रामचंद्र मांझी जी जैसे ख्यातिप्राप्त कलाकार ने भी इस परंपरा को जीवित रखने में अपना अहम् योगदान दिया और 90 वर्ष की आयु में भी इसका प्रदर्शन करते रहे।
जिन लोगों के पास जानकारी का अभाव है , वही नृत्य की इस शैली के बारे में अनर्गल बयानबाजी करते हैं और ये भूल जाते हैं की भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में आज भी ये एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रदर्शन है l कैरिबियन देशों में आज भी, जहाँ अच्छी खासी संख्या में भोजपुरी भाषी लोग हैं , इस का आयोजन किया जाता है l