05/03/2026
बिहार के विकास के मुद्दे पर मेरा और नीतीश कुमार जी का मतभेद हमेशा रहा है। उनकी कई नीतियों का मैंने खुलकर विरोध किया है, क्योंकि मुझे लगता है कि उन फैसलों का खामियाजा बिहार की जनता, खासकर किसानों और युवाओं को भुगतना पड़ा है। लेकिन राजनीतिक असहमति के बावजूद उनके प्रति मेरी व्यक्तिगत संवेदना हमेशा रही है। 🙏🏾
Arun Kumar
मैंने कई बार सार्वजनिक मंचों से कहा है कि जब हम दिल्ली में रहते थे तो नीतीश कुमार जी हमारे लिए लोकल गार्डियन थे। इसलिए आज जब उनके राजनीतिक जीवन के इस मोड़ को देखता हूँ तो मन में कई तरह के भाव आते हैं।
राज्यसभा जाना उनका निजी निर्णय हो सकता है, लेकिन बिहार की राजनीति को करीब से देखने वाला हर व्यक्ति समझ रहा है कि आज जो कुछ हो रहा है, उसमें केवल व्यक्तिगत इच्छा नहीं बल्कि कुछ लोगों का दबाव भी शामिल है। राजनीति में अक्सर ऐसा होता है कि जिस व्यक्ति ने एक दौर में व्यवस्था बनाई होती है, वही व्यक्ति अंत में उसी व्यवस्था का शिकार बन जाता है।
मेरी दिली इच्छा हमेशा यह रही कि 2006 में बिहार की कृषि मंडियों को समाप्त करने का जो फैसला वह लिए थे, उसे वापस वह स्वयं ले। क्योंकि उस फैसले ने बिहार के किसानों को बाजार से बेदखल कर दिया। किसान आज भी अपनी उपज को उचित मूल्य पर बेचने के लिए दर-दर भटकता है। यदि उस समय कृषि मंडियों को समाप्त करने के बजाय उन्हें मजबूत किया जाता, तो शायद आज बिहार का किसान इतना असहाय नहीं होता।
आपके एक फैसले ने बिहार के किसानों की कमर तोड़ दी, यह भी एक सच्चाई है जिसे इतिहास कभी नजरअंदाज नहीं करेगा।
फिर भी, राज्यसभा के लिए आपको मेरी ओर से शुभकामनाएं। राजनीति का यह भी एक सत्य है कि समय हर व्यक्ति का हिसाब लेता है और इतिहास अपने तरीके से न्याय करता है।
“वक्त का काम है चलना, वो चलता ही रहेगा,
सच के चेहरे से मगर पर्दा उठता ही रहेगा।”
खैर, बिहार को बर्बादी की राह पर धकेलने वाले एक अध्याय का बिहार से दिल्ली की ओर जाना कई लोगों को राहत देगा।
इतिहास में यह समय भी दर्ज होगा — कि फैसले किसने लिए थे और उनकी कीमत किसने चुकाई। Arun Mandal