22/05/2026
इसमें कोई शक नहीं कि हमारा धर्म एक तरह का जुनून और पागलपन है। जब तक कोई इंसान अपनी मान्यताओं के हिसाब से पूजा-पाठ, देवी-देवताओं के दर्शन वगैरह करता है, तब तक सब ठीक है। हमारे संविधान ने सबको ऐसा बुनियादी हक दिया है। (भारतीय संविधान के आर्टिकल 25 और 26)। लेकिन धर्म के बहाने हज़ारों या लाखों लोगों को इकट्ठा करके सड़कों पर नाचते या परेड कराते हैं, देर रात तक माइक्रोफोन बजाते हैं, कानून के नियमों को तोड़ते हैं, और त्योहारों के नाम पर लाखों मन अनाज और घी जैसी कीमती चीज़ें बर्बाद करते हैं। जब हम किसी इंसान पर सिर्फ इसलिए ज़ुल्म करते हैं क्योंकि वह हमारा धर्म न मानकर किसी और धर्म को मानता है, तो हमें कहना चाहिए कि नहीं, यह तो धर्म ही नहीं है।