भजन संग्रह

भजन संग्रह जय श्री श्याम

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31/08/2025

श्री विन्ध्यवासिनी स्त्रोतम्

"मोहि पुकारत देर भई जगदम्ब बिलम्ब कहाँ करती हो"

दैत्य संहारन वेद उधारन, दुष्टन को तुमहीं खलती हो !
खड्ग त्रिशूल लिये धनुबान, औ सिंह चढ़े रण में लड़ती हो !!
दास के साथ सहाय सदा, सो दया करि आन फते करती हो !
मोहि पुकारत देर भई, जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो !!

आदि की ज्योति गणेश की मातु, कलेश सदा जन के हरती हो !
जब जब दैत्यन युद्ध भयो, तहँ शोणित खप्पर लै भरती हो !!
कि कहुँ देवन गाँछ कियो, तहँ धाय त्रिशूल सदा धरती हो !
मोहि पुकारत देर भई, जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो !!

सेवक से अपराध परो, कछु आपन चित्त में ना धरती हो !
दास के काज सँभारि नितै, जन जान दया को मया करती हो !!
शत्रु के प्राण संहारन को, जग तारन को तुम सिन्धु सती हो !
मोहि पुकारत देर भई, जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो !!

कि तो गई बलि संग पताल, कि तो पुनि ज्योति अकाशगती हो !
कि धौं काम परो हिंगलाजहिं में, कै सिन्धु के विन्दु में जा छिपती हो !!
चुग्गुल चोर लबारन को, बटमारन को तुमहीं दलती हो !
मोहि पुकारत देर भई, जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो !!

बान सिरान कि सिँह हेरान कि, ध्यान धरे प्रभु को जपती हो !
कि कहुँ सेवक कष्ट परो, तहँ अष्टभुजा बल दे लड़ती हो !!
सिँह चढ़े सिर छत्र विराजत, लाल ध्वजा रण में फिरती हो !
मोहि पुकारत देर भई, जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो !!

देवि तुम्हारि करौं विनती, इतना तुम काज करौ सुमती हो !
ब्रह्मा, विष्णु, महेश कि हौं रथ, हाँक सदा जग में फिरती हो !!
चण्डहि मुण्डहि जाय बधो, तब जाय के शत्रु निपात गती हो !
मोहि पुकारत देर भई, जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो !!

मारि दियो महिषासुर को, हरि केहरि को तुमहिं पलती हो !
मधु कैटभ दैत्य विध्वंस कियो, नर देवन पति के ईशपती हो !!
दुष्टन मारि आनन्द कियो, निज दासन के दुःख को हरती हो !
मोहि पुकारत देर भई, जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो !!

साधु समाधि लगावत हैं, तिनके तन को तू तुरत तरती हो !
जो जन ध्यान धरै तुमरो, तिनकी प्रभुता चित्त दै करती हो !!
तेरो प्रताप तिहूँ पुर में, तुलसी जन की मनसा भरती हो !
मोहि पुकारत देर भई, जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो !!

23/08/2025

~ तू राधे, तेरा श्याम बनुं मैं ~

तू राधे, तेरा श्याम बनुं मैं।
हर पल तेरे, साथ रहूं मैं।।

सावन का महीना होगा, उसमें होंगे झूले।
तू झूला, तेरी डोरी बनु मैं।
हर पल तेरे, साथ रहूं मैं।।

भादो का महीना होगा, उसमें होंगे बादल।
तू बादल, तेरा नीर बनुं मैं।
हर पल तेरे, साथ रहूं मैं।।

कार्तिक का महीना होगा, उसमें होंगे दीपक।
तू दीपक, तेरी ज्योत बनुं मैं।
हर पल तेरे, साथ रहूं मैं।।

फागुन का महीना होगा, उसमें होगी होली।
तू पिचकारी, तेरा रंग बनुं मैं।
हर पल तेरे, साथ रहूं मैं।।

छींके ऊपर छींका होगा, उसमें होगा माखन।
तू माखन, तेरा चोर बनुं मैं।
हर पल तेरे, साथ रहूं मैं।।

23/08/2025

~ श्री श्याम स्तुति ~
भाग - १

हाथ जोड़ विनती करूं, सुणियो चित्त लगाय।
दास आ गयो शरण में, रखियो इसकी लाज।
धन्य ढूंढारो देश है, खाटू नगर सुजान।
अनुपम छवि श्री श्याम की, दर्शन से कल्याण।

श्याम श्याम तो मैं रटूं, श्याम है जीवन प्राण।
श्याम भक्त जग में बड़े, उनको करूँ प्रणाम।
खाटू नगर के बीच में, बण्यो आपको धाम।
फाल्गुन शुक्ला मेला भरे, जय जय बाबा श्याम।।

फाल्गुन शुक्ला द्वादशी, उत्सव भारी होय।
बाबा के दरबार से, खाली जाय न कोय।
उमापति लक्ष्मीपति, सीतापति श्री राम।
लज्जा सबकी राखियो, खाटू के बाबा श्याम।।

पान सुपारी इलायची, अत्तर सुगंध भरपूर।
सब भक्तों की विनती, दर्शन देवो हुजूर।
आलू सिंह तो प्रेम से, धरे श्याम को ध्यान।
श्याम भक्त पावे सदा, श्याम कृपा से मान।।

हाथ जोड़ विनती करूं, धरूं चरण में शीश।
ज्ञान भक्ति मोहे दीजिए, परम पिता जगदीश।।

10/07/2025

~ जरा बंशी बजा मोहना ~

जरा बंशी बजा मोहना, हम रास रचाएंगे।
जरा सामने तो आओ छलिये, तुम्हें दिल में बसाएंगे।

तेरी बंशी है बहुत सुन्दर, तेरा नाम है श्याम सुन्दर।
सुन्दर तेरी गोपियों संग, महारास रचाएंगे।
जरा सामने तो आओ छलिये, तुम्हें दिल में बसाएंगे।

मेरे मन के मधुवन में, जरा आया भी जाया करो।
मेरे मन की बगिया में, बहारों को भी लाया करो।
तेरे आने की चाहत में, राहों को सजाएंगे।
जरा सामने तो आओ छलिये, तुम्हें दिल में बसाएंगे।

दिल जान-ओ-जिगर सब कुछ, हम तुम पे लुटा बैठे।
क्या दिल पे गुजरती है, हम तुमको सुना बैठे।
अब बोलो वचन हमको, कब दरश दिखाओगे।
जरा सामने तो आओ छलिये, तुम्हें दिल में बसाएंगे।

जरा बंसी बजा मोहना, हम रास रचाएंगे।
जरा सामने तो आओ छलिये, तुम्हें दिल में बसाएंगे।

जय राधा राधा श्री राधा
जय राधा राधा श्री राधा
जय राधा राधा श्री राधा
जय राधा राधा श्री राधा
जरा बंसी बजा मोहना, हम रास रचाएंगे।
जरा सामने तो आओ छलिये, तुम्हें दिल में बसाएंगे।
जरा बंसी बजा मोहना, हम रास रचाएंगे।

10/06/2025

~ 'ख' से खरोरा म्हारा ~
(तर्ज - पत्थर की राधा प्यारी)

'ख' से खरोरा म्हारा.. 'ख' से खाटू का द्वारा...
घर घर खुशियां बरसाता, वो लीले घोड़े वाला...

हम भी एक मंदिर बनवाएं, मन में आस यही है... बाबा तुमको लाय बिठाएं...
ईंट मंगायी, रेत मंगायी, तुमसे अरज लगायी... बाबा कैसे और मनाएं...

क्या हुयी है खता... जरा ये तो बता...
तू ही तो बाबा सारे, जग का रखवाला...
'ख' से खरोरा म्हारा.. 'ख' से खाटू का द्वारा...
घर घर खुशियां बरसाता, वो लीले घोड़े वाला...

दास खड़े हैं पलक बिछाए, दिल में आस लगाए... मेरे बाबा क्यूं न आए...
लीले चढ़ कर आने वाला, ऐसे देर लगाए... कैसे मन को कोई समझाए...

क्या हुयी है खता... जरा ये तो बता...
तूने ही बाबा जग का, संकट हर टाला...
'ख' से खरोरा म्हारा.. 'ख' से खाटू का द्वारा...
घर घर खुशियां बरसाता, वो लीले घोड़े वाला...

- रचनाकार
अमित अग्रवाल 'मीत'

06/06/2025

~ भर दे रे श्याम झोली भर दे ~

भर दे रे....... श्याम झोली भर दे, भर दे,
ना बहलाओ बातों में...
हो ना बहलाओ, बातों में...

नादान हैं.. अनजान हैं.. श्याम तू ही तो मेरा भगवान है...
तुझे चाहूं.. तुझे पाऊं.. मेरे दिल का यही तो अरमान है...
हो पढ़ ले रे....... श्याम दिल की पढ़ ले, पढ़ ले,
सब लिखा है आंखों में...
हो सब लिखा है आंखों में...
भर दे रे....... श्याम झोली भर दे, भर दे,
ना बहलाओ बातों में...

दिन बीते.. बीती रातें.. अपनी कितनी हुई रे मुलाकातें...
तुझे जाना.. पहचाना.. तेरे झूठे हुए रे सारे वादे...
हो भूले रे....... श्याम तुम तो भूले, भूले,
क्या रखा है बातों में...
हो क्या रखा है बातों में...
भर दे रे....... श्याम झोली भर दे, भर दे,
ना बहलाओ बातों में...

मेरी नैया.. ओ कन्हैया.. पार कर दे तू बन के खिवैया...
मैं तो हारा.. गम का मारा.. आजा आजा ओ बंशी के बजैया...
हो ले ले रे....... श्याम अब तो ले ले, ले ले,
मेरा हाथ हाथों में...
हो मेरा हाथ हाथों में...
भर दे रे....... श्याम झोली भर दे, भर दे,
ना बहलाओ बातों में...

मैं हूं तेरा.. तू है मेरा.. मैंने डाला तेरे दर पे डेरा...
मुझे आस है.. विश्वास है.. श्याम भर देगा दामन तू मेरा...
हो झूमे रे........ श्याम ‘नन्दू’ झूमें, झूमें,
झूमें तेरी बांहों में...
हो झूमें तेरी बांहों में...
भर दे रे....... श्याम झोली भर दे, भर दे,
ना बहलाओ बातों में...

13/04/2025

~ सेवा में बाग लगाए हो माॅं ~
(छत्तीसगढ़ी पचरा जस गीत)

हस के उठे वि हस के माता,
जा चंदन पर थार भवानी,
नींबू जटा, जटा पर नरियर,
आस पास नरियर के बाड़ी,
केकती केवड़ा सदा सरवर,
सरवर देखत हंस विराजे,
हंस म दाई के पहुना साजे,
पहुना ऊपर दाई विराजे,
दाई के संग म भैरव साजे,
भैरव संग लंगूर विराजे,
अन्नस मन्नस कुंज निवारे,
धर्म ध्वजा लहराए... लहराए ओ मईया...
सेवा में बाग लगाए हो माॅं...
सेवा में बाग लगाए... लगाए हो मईया...
सेवा मे बाग लगाए हो माँ...
हे भवानी... सेवा में बाग लगाए हो माँ...
ओ मेरी मईया... सेवा में बाग लगाए हो माँ...

जब इंद्र लोक ले उतरे लांगुरवा,
खैरा घोड़ा भये सांवरिया,
हाथ चंदन तोर पांव खड़ऊवा,
गंगा जमुना खड़ा पखारे,
सवा हाथ धरती तोरे पाटे,
उठे गुललेवा हाथ कमनिया,
रहीई खाये कुंजनिवारे,
कारी बदन तोरे भय महामाई,
पान खाते मुख लाल भवानी,
जिभिया हा तोरे ललियारे... ललियाये हो मईया...
सेवा में बाग लगाए हो माॅं...
सेवा में बाग लगाए... लगाए हो मईया...
सेवा मे बाग लगाए हो माँ...
हे भवानी... सेवा में बाग लगाए हो माँ...
ओ मेरी मईया... सेवा में बाग लगाए हो माँ...

जब कोख नगर में उतरे भवानी,
सोनी सिंहासन भवर पालकी,
छत्तीसगढ़ ले जाके आए,
एक लाख देवता सेवा गाए,
ताल बाजे महूर बाजे,
झांज बाजे मंजीरा बाजे,
दानव मारे असुर संहारे,
जहाँ भुईंया पर तै तो ठहरे,
जाहन पड़ गे आठ सैकड़ा,
जहां निरंजन तै तो‌ खेले,
चार कूट में छत्र तने‌ है,
शासन अपना‌ चलाये... चलाये हो मईया...
सेवा में बाग लगाए हो माॅं...
सेवा में बाग लगाए... लगाए हो मईया...
सेवा मे बाग लगाए हो माँ...
हे भवानी... सेवा में बाग लगाए हो माँ...
ओ मेरी मईया... सेवा में बाग लगाए हो माँ...

जब लोहपुर ले उतरे लोअंजर,
मांग भर सिंदूर नयन में काजर,
कौरव पांडव बात सुनावे,
हाथ में शंकर वेद बतावे,
नव दस पालकी लिए सजाए,
बायें उंगली तोर उठे भवानी,
खड़ग क्षार खप्पर डारे,
कोटि कोटि मुक्तन उठ जाए,
जभे पुजारी पूजा पावे,
घोरी घोरी चंदन महल लगाए,
सर्प सोन के कलश मढ़ाये,
दाई टोला उमा बुलाएं,
भैरव तोरे पालकी सजाए,
लंगूरे हल्दिया न लगाये, लगाए हो मईया...
सेवा में बाग लगाए हो माॅं...
सेवा में बाग लगाए... लगाए हो मईया...
सेवा मे बाग लगाए हो माँ...
हे भवानी... सेवा में बाग लगाए हो माँ...
ओ मेरी मईया... सेवा में बाग लगाए हो माँ...

जब गढ़ाई कुवछले उतरे लंगूरवा,
डम डम डम डम बाजे डमरूवा,
करिया घोड़ा भए सांवरिया,
पांव में पायल हाथ खड़गवा,
गंगा तीर मा खड़ा पखारे,
तै हर तो रणजीत कहाये,
बात चिन्ह, चिन्ह तै ह चिन्हाये,
चार कूट में धुनही गडाए,
देवता आए मंगल गए,
ऋषि मुनि सब यज्ञ कराए,
ब्रह्मा आए वेद उच्चारे,
विष्णु आए शंख बजाए,
सदाशिव तोर धुनी रमाए,
क्षमा धर तोर दिया जराए,
मदन‌ जस तोर गाए, हो गाए हो मईया...
सेवा में बाग लगाए हो माॅं...
सेवा में बाग लगाए... लगाए हो मईया...
सेवा मे बाग लगाए हो माँ...
हे भवानी... सेवा में बाग लगाए हो माँ...
ओ मेरी मईया... सेवा में बाग लगाए हो माँ...

23/01/2025

~ आया मैं आया,, बाबा मैं तो आया ~

आया मैं आया,, बाबा मैं तो आया...
तुझे अपना हाल दिखाने, सोई तकदीर जगाने...
तुझे अपना श्याम बनाने, तुझे दिल से श्याम रिझाने...
आया मैं आया,, बाबा मैं तो आया...

कहते हैं लोग, तुझे लखदातारी...
खाटू के श्याम बाबा, संकट हारी...
मेरे संकट दूर भगा दे, मुरझाये फूल खिला दे...
रोते को श्याम हंसा दे, प्रभु प्रेम सुधा छलका दे...
आया मैं आया,, बाबा मैं तो आया...

दीन जनों का बाबा, काम बनेगा...
श्याम तुम्हारा, डंका बजेगा...
मेरी नैया पार लगा दो, मुझे साहिल तक पहुंचा दो...
कुछ चमत्कार दिखला दो, हारे को जीत दिला दो...
आया मैं आया,, बाबा मैं तो आया...

नंदू तुम्हीं से बाबा, अर्ज लगाई...
तेरे पास आके मेरी, आंख भर आई...
इस निर्बल को अपना ले, चरणों का दास बना ले...
हिवड़े में ज्योत जगा दे, मुझे अपना दर्श दिखा दे...
आया मैं आया,, बाबा मैं तो आया...

20/01/2025

~ ये चमक ये दमक ~

ये चमक, ये दमक, फूलवन मा महक,
सब कुछ सरकार तुम्हई से है...
इठला के पवन, चूमे सैंया के चरण,
बगियन मा बहार तुम्हई से है...

मेरे सुख दुःख की, रखते हो खबर,
मेरे सर पर साया तुम्हारा है...
मेरी नैया के, खेवनहार तुम्हीं,
मेरा बेड़ा पार तुम्हई से है...

मैं तो भूल गयी, कुछ भी कहना,
तोरी प्रीत में रोवत है नैना...
रग रग में बसी, है प्रीत तोरी,
अंखियन में खुमार तुम्हई से है...

मेरा दिल ले लो, मेरी जां ले लो...
मेरा तन ले लो, मेरा मन ले लो...
मेरे इश्क को निस्बत है तुमसे,
जीवन श्रृंगार तुम्हई से है...

मैं तो भूल गयी, सब सुख चैना...
मोरे जबसे लड़े, तुम संग नैना...
मोरी नस नस में, है प्रीत तोरी,
मेरा सब आधार तुम्हई से है...

मेरा कोई नहीं, है दुनिया में,
मेरा तौल करार तुम्हई से है...
मैं जा के कहां, सौदा बेचूं,
मेरा सब व्यापार तुम्हई से है...

20/01/2025

~ ॐ जय जगदीश हरे ~

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे ।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे ।।
।। ॐ जय जगदीश हरे ।।

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनशे मन का, स्वामी दुःख विनशे मन का ।
सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का ।।
।। ॐ जय जगदीश हरे ।।

मात पिता तुम मेरे, शरण गहुं मैं किसकी, स्वामी शरण गहुं मैं किसकी ।
तुम बिन और न दूजा, प्रभु बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी ।।
।। ॐ जय जगदीश हरे ।।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी ।
पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी ।।
।। ॐ जय जगदीश हरे ।।

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता ।
मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता ।।
।। ॐ जय जगदीश हरे ।।

तुम हो एक अगोचर, सब के प्राणपति, स्वामी सब के प्राणपति ।
किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति ।।
।। ॐ जय जगदीश हरे ।।

दीन-बन्धु दुःख-हर्ता, तुम ठाकुर मेरे, स्वामी तुम रक्षक मेरे ।
अपने हाथ उठाओ, अपने शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे ।।
।। ॐ जय जगदीश हरे ।।

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वमी पाप हरो देवा ।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
महिमा अपनी दिखाओ, सन्तन की सेवा ।।
।। ॐ जय जगदीश हरे ।।

20/01/2025

~ आरती कुंजबिहारी की ~

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला, श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला ।
नंद के नंद, श्री आनंद कंद, मोहन बृज चंद, राधिका रमण बिहारी की ।
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।

गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली, लतन में ठाढ़े बनमाली ।
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक, ललित छवि श्यामा प्यारी की ।
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं, गगन सों सुमन रासि बरसै ।
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिनी संग, अतुल रति गोप कुमारी की ।
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।

जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्री गंगा, स्मरण ते होत मोह भंगा ।
बसी शिव शीश, जटा के बीच, हरै अघ कीच, चरन छवि श्री बनवारी की ।
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।

चमकती उज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू, चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू ।
हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद, टेर सुन दीन दुखारी की ।
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।

05/12/2024

~ फूलों में सज रहे हैं, श्री वृन्दावन बिहारी ~
(संशोधित)

फूलों में सज रहे हैं, श्री वृन्दावन बिहारी...
और साथ सज रही हैं, वृषभान की दुलारी...

टेढ़ा सा मुकुट सर पर, रखा है किस अदा से...
करुणा बरस रही है, करुणा भरी निगाह से...
बिन मोल बिक गया हूँ, कन्हैया.....
बिन मोल बिक गया हूं, जब से छबि निहारी...
फूलों में सज रहे हैं.....

बहियां गले में डाले, जब दोनों मुस्कुराते...
सब को ही प्यारे लगते, सब के ही मन को भाते...
इन दोनों पे मैं सदके, हो सदके.....
इन दोनों पे मैं सदके, इन दोनों पे मैं वारी...
फूलों में सज रहे हैं.....

श्रृंगार तेरा प्यारे, शोभा कहूँ क्या उसकी...
जिसने तुम्हें सजाया, किस्मत निराली उसकी...
इत पे गुलाबी फटका, हो फटका.....
इत पे गुलाबी फटका, उत पे गुलाबी साड़ी...
फूलों में सज रहे हैं.....

नीलम से सोहे मोहन, स्वर्णिम सी सोहे राधा...
डोरी ये प्रेम की है, जिसने सभी को बांधा...
इत नन्द का है छोरा, हो छोरा.....
इत नन्द का है छोरा, उत भानु की दुलारी...
फूलों में सज रहे हैं.....

चुन चुन के कलियां जिसने, बंगला तेरा बनाया...
दिव्य आभूषणों से, जिसने तुझे सजाया...
उन हाथों पे मैं सदके, हो सदके.....
उन हाथों पे मैं सदके, उन हाथों पे मैं वारी...
फूलों में सज रहे हैं.....

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