24/02/2026
एक अजीब करिश्मा : कुवैत के मशहूर दाई, शेख अब्दुर्रहमान अस्सुमैत रहिमहुल्लाह को खबर मिली कि अफ्रीका की एक ऐसी बस्ती है जहाँ अभी तक इस्लाम की रोशनी नहीं पहुँची। उनके दिल में दर्द जगा और उन्होंने तुरंत इरादा कर लिया कि वहाँ जाना है। साथियों ने रोकते हुए चिंता के साथ कहा: “आप नहीं जा सकते। हमारे और उस बस्ती के बीच एक नदी है जो मगरमच्छों से भरी हुई है।”
शेख ने पूरी शांति और यक़ीन के साथ जवाब दिया: “मुझे वहाँ ले चलो… जिम्मेदारी मेरी है।” वे लोग नाव में बैठे। नदी में लहरें उठ रही थीं और इधर-उधर से डरावने मगरमच्छ सिर उठाए देख रहे थे। मगर नाव बढ़ती गई और अल्लाह की मदद से वे नदी पार कर गए। जब वे बस्ती पहुँचे तो लोग हैरानी से उन्हें देखने लगे। उन्होंने पूछा: “आप यहाँ कैसे पहुँचे?”
साथियों ने कहा: “अल्लाह ने हमारी हिफाज़त की, क्योंकि हम उसके दीन का पैग़ाम लेकर आए हैं।” शेख अस्सुमैत रहिमहुल्लाह ने बड़ी सादगी और मोहब्बत से उन्हें इस्लाम के बुनियादी अकीदे और तालीमात समझाईं। बात खत्म हुई तो बस्ती के सरदार ने कहा: “हमारी एक शर्त है… अगर आप उसे पूरा कर दें, तो हम सब इस्लाम क़ुबूल कर लेंगे।”
शेख ने मुस्कराकर पूछा, “वह क्या है?”
सरदार ने उदासी से कहा: “हमारी बस्ती में कई सालों से बारिश नहीं हुई। आप अपने रब से दुआ कीजिए कि बारिश हो जाए।” शेख ने कहा: “ठीक है… लेकिन पहले बस्ती के सभी लोगों को इकट्ठा कर लो।” जब पूरी बस्ती मैदान में जमा हो गई, तो शेख ने वुज़ू किया और नमाज़ के लिए खड़े हो गए। रुकू और सज़्दा की लय से माहौल में गहरा सुकून उतर आया। वे एक लंबे सज़्दे में चले गए। सज़्दे में उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे और उनकी ज़बान पर लगातार यह दुआ थी: “ऐ मेरे रब… अपने दीन को अब्दुर्रहमान के गुनाहों की वजह से रुसवा न करना।”
वे देर तक अल्लाह के सामने रोते रहे। अचानक आसमान में गरज की आवाज़ आई। उन्होंने सज़्दे से सिर उठाया तो रहमत के बादल छाए हुए थे और मोटी-मोटी बारिश की बूँदें बरसने लगीं। जब बस्ती वालों ने यह नज़ारा देखा तो बेइख़्तियार पुकार उठे: “हम गवाही देते हैं कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसके आखिरी रसूल हैं!” शेख अब्दुर्रहमान अस्सुमैत की आँखें नम हो गईं। उन्होंने अल्लाह का शुक्र अदा किया और पूरी बस्ती यक़ीन के साथ इस्लाम में दाखिल हो गई।