09/04/2014
लोकतंत्र के भक्षक नहीं रक्षक बनें
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में न लोक है और न तंत्र। अब तो ऐसे लगता है कि जैसे लोकतंत्र के नाम पर जो पार्टियां भारत में सक्रिय हैं उनमें से कुछ ऐसी भी हैं, जो अब डेमोक्रेसी को कलंकित करने का काम करने लगी हैं। जब आप नैतिकता को पांव तले रौंदते हैं तो नियमों का खात्मा भी साथ ही साथ होने लगता है। सत्ता को दूर से देखना और फिर सत्ता में आ जाना, ये दो अलग-अलग बातें थीं, जो अब एक-दूसरे की पूरक हो गई हैं। जिस आम आदमी के नाम को लेकर पार्टी गठित हुई, उसके संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में केवल 28 सीटें लेकर कांग्रेस से राजनीतिक समझौता करके सरकार क्या बनाई कि उनकी महत्वाकांक्षा आसमान तक पहुंच गई है। यह बात अलग है कि उन्हें लगभग 40 दिन बाद ही इस्तीफा देना पड़ा और अब आप पार्टी उसी जगह पर है जहां से वह सत्ता में आने का ख्वाब देख रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार ख्वाब लोकसभा की जमीन से देखा जा रहा है। शायद इसीलिए अरविंद केजरीवाल गुजरात जा पहुंचे, लेकिन हश्र वही हुआ जो दिल्ली में हुआ था। वहां भी बेनकाब हुए यहां भी बेनकाब हुए, परनाला वहीं का वहीं रहा। पिछले दिनों अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम ने योजनाबद्घ तरीके से चुनाव कार्यक्रम घोषित होते ही इलाहाबाद, झांसी, लखनऊ और दिल्ली में भाजपा के दफ्तरों पर हमला कराया। दिल्ली में तो पार्टी के कई नेताओं के खिलाफ केस भी दर्ज हुए। कुल मिलाकर अराजकता की तरफ बढ़ रही आम आदमी पार्टी जनता के सामने इस बार भी बेनकाब हुई और अब कानून अपना शिकंजा कसने जा रहा है। तभी तो केजरीवाल ने जनता से माफी भी मांग ली है।
हमारा सवाल यह है कि केजरीवाल ने सीधा सा सिस्टम बना रखा है कि हर सरकार और हर मंत्री के खिलाफ भ्रष्टïाचार और बेईमानी का शोर मचाओ, धरना-प्रदर्शन करो, पथराव करो और प्रचार पाओ। मीडिया में बने रहने के लिए केजरीवाल यही हथकंडे अपना रहे हैं। सच बात तो यह है कि केजरीवाल ने कांग्रेस सरकार के साथ-साथ भाजपा के पीएम पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी को भी नहीं बख्शा। हम यह कहते हैं कि केजरीवाल को आखिरकार मोदी से दिक्कत क्या है? दरअसल, सारा देश मोदी को प्यार कर रहा है और उन्हें पीएम पद की तरफ ले जाने के लिए संकल्प ले चुका है तो यही कांटा केजरीवाल को चुभा हुआ है। इसीलिए वह गांधी नगर जा पहुंचे। उनका काफिला क्या रोक लिया कि केजरीवाल बौखला गए। पुलिस ने यही तो पूछा था न कि आप क्या करने आए हैं? इस पर केजरीवाल ने वही पुराने सोशल नैटवर्क के माध्यम से अपने वर्करों को हंगामा करने का आदेश दे दिया। दिल्ली में भाजपा के दफ्तर पर केजरीवाल की टीम के अराजक वर्करों ने अंधाधुंध पथराव किया, जिसमें 22 भाजपा वर्कर घायल भी हो गए। सबसे बड़ी बात यह है कि निर्वाचन आयोग और अदालत ने टीम केजरीवाल आक्रमण का गंभीर नोटिस लिया है। तभी तो केजरीवाल से जवाब तलब किया गया है। उसके नेताओं को पुलिस के पास जा-जाकर सफाई देनी पड़ रही है।
हमारा सवाल यह है कि केजरीवाल जोकि धरने-प्रदर्शन में यकीन रखते हैं और अब अगर उनमें दमखम है तो वे भारत के टॉप उद्योगपति अंबानी के खिलाफ मुंबई जाकर धरना-प्रदर्शन क्यों नहीं करते? अगर उनकी सरकारों में सैटिंग है तो केजरीवाल इसके खिलाफ आंदोलन क्यों नहीं करते? ऐसा लगता है कि खुद केजरीवाल अब अंबानी से सैटिंग चाहते हैं, तभी वह उनके खिलाफ बयानों की फायरिंग करके अपना काम चला रहे हैं। 'भाड़ में जाए जनता और अपना काम बनता' ही अब केजरीवाल का मकसद रह गया है। उनकी महत्वाकांक्षा अब पीएम पद तक जा पहुंची है। सीधा सा गणित है कि मिशन मोदी को प्रभावित किया जाए लेकिन मोदी और भाजपा के बढ़ते कदम अब वह इन घटिया हथकंडों से रोक नहीं पाएंगे। चंद बिकाऊ चैनलों के दम पर सियासत कर रहे केजरीवाल केवल नैगेटिव पब्लिसिटी से मकसद नहीं हासिल कर पाएंगे। उनके अपने बिन्नी जैसे विधायक साथ छोड़ चुके हैं। कई और उनका साथ छोडऩे को तैयार हैं। सारा झाड़ू अब बिखर गया है। अगर केजरीवाल में नैतिकता और हिम्मत नाम की कोई चीज है, तो वह राजनीति में सब कुछ अच्छे आचरण के साथ करें। अगर ऐसा नहीं करते, तो उन्हें कोई और काम करना चाहिए। केजरीवाल अगर ईमानदार राजनीतिज्ञ होते तो सीएम बनते ही घोटालों के आरोपों से घिरी श्रीमती शीला दीक्षित के खिलाफ सीधे एक्शन लेकर दिखाते लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया और खुद मैदान से भाग गए।
इनका हर मंत्री विवादित सिद्घ हुआ और आप भी विवादित ही रहे और आगे भी विवादित ही रहेंगे। तो इसलिए अब पूरे लोकतंत्र और पूरी कार्यप्रणाली को ही विवादित बनाना चाहते हैं। आखिर क्यों? कई बार हैरानी होती है कि केजरीवाल की पार्टी कोष में जो अन्तर्राष्टï्रीय फंडिंग हो रही है और जिस प्रकार से हाई कोर्ट ने उनसे जवाब तलब किया गया, उसे लेकर उन पर गाज क्यों नहीं गिरती? केजरीवाल ने पार्टी बनाने से लेकर, सरकार बनाने से लेकर सरकार गिरने तक अगर कोई काम किया है, तो वह यही है कि धरने और प्रदर्शन बस। अब सब कुछ खत्म होता देखकर भाजपा जैसी पार्टी के दफ्तर पर ही हमले करने शुरू कर दिए, ताकि चुनाव घोषणा के दिन उन्हें राष्टï्रीय स्तर पर नैगेटिव पब्लिसिटी मिल सके लेकिन जिस तरह से दिल्ली वालों ने उन्हें कोसा तो अब उनके खिलाफ लोकसभा में वोटिंग भी नैगेटिव ही रहेगी। आने वाला समय बहुत जल्द इसका जवाब भी दे देगा। केजरीवाल को अगर अपनी देशभक्ति और जोश पर नाज है तो वह अपना वचन निभा कर दिखाएं और जहां से नरेन्द्र मोदी चुनाव लड़ रहे हैं उनके खिलाफ ही लड़कर दिखाएं। कदम-कदम पर मोदी के विरोध का इतना ही शौक है तो फिर उनके खिलाफ मुकाबले में उतर ही जाएं।
ताज्जुब इस बात का है कि जिस गांधीवादी नेता अन्ना हजारे से केजरीवाल ने धरना-प्रदर्शन में शामिल होना सीखा, उस अन्ना से अहिंसा न सीखकर केजरीवाल ने यह पत्थरबाजी कहां से सीख ली? महात्मा गांधी ने तो कभी हिंसा का पक्ष नहीं लिया और अब उसी महात्मा गांधी का प्रपौत्र राजमोहन आम आदमी पार्टी से जुड़ गया है। आने वाला समय लोकतंत्र में कैसी परिभाषा लिखेगा यह फिलहाल नहीं कहा जा सकता, लेकिन जब कोई भी पार्टी और कोई भी नेता अपनी हदें पार कर लेता है तो फिर उसका हश्र बहुत बुरा होता है। नदी भी जब अपनी हदें पार कर लेती है, तो फिर वह नदी नहीं रहती और समुद्र का ही हिस्सा बन जाती है। क्या राजनीति में झुंड बनाकर, पत्थर लेकर और जेब में टोपी रखकर, जब चाहे सिर पर लगाकर माओवादी गतिविधियों की तरह आप लोकतंत्र को सुरक्षित रख सकते हैं? हमारा जवाब है नहीं, नहीं, नहीं। हिंसक माओवादी गतिविधियां कभी भी लोकतंत्र का हिस्सा नहीं बन सकतीं। भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य यह है कि लोकसभा के अंदर कभी हजार-हजार के नोट लहराए जाते हैं, कभी मिर्ची पाउडर का स्प्रे किया जाता है और अब दुर्भाग्य से लोकसभा के बाहर केजरीवाल के लोग पार्टियों के दफ्तरों पर हमला कर रहे हैं। सड़क से संसद तक अराजकता फैलाने के लिए केजरीवाल को लोकतंत्र में विश्वास करने वाला अवाम कभी माफ नहीं करेगा। आने वाले वक्त में केजरीवाल को इसका जवाब देना होगा।
@ आदित्य चोपड़ा