अपना काम बनता भाड़ में जाये जनता

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अपना काम बनता भाड़ में जाये जनता यह देश था वीर जवानों का, अब रह गया बेईमानों का....

16/05/2014

-----शोक सनदेश------
अत्यंत दुख से सुचित किया जाता की
हमारी प्यारी कांग्रेसी देवी w/o गांधी & co. ( आजादी वाले )
का देहांत हो गया है.
जीनकी अंतीम यात्रा 17
अप्रेल 2014 को हो गयी ( durghatna
इटली से भारत आ रही भ्रस्ताचार
की गाडी की मोदी नामक
बूल ड़ोज़र से भयंकर टक्कर से हो गई )
दाह संस्कार वही कर दीया गया है

उठावना -16 मई 2014 को 10 जनपथ पे रखा गया है।।

शोकाकुल-
अर्विन्द केजरीवाल (दतक पुत्र)
मुलायम सिंह ( जेठ)
लालू,नीतीश,faarukh abdulla ( देवर)
अखिलेश,माया,ममता,आजम(पाकिस्तान वाले),उम्र
abulla,ओवेसी (जेठ देवर पुत्र)
इटली,चाइना,पाकिसतान,बंगलादेश(पीहर पक्ष)

प्रतिष्ठान- स्वीश बैंक,बैंक ऑफ़ इटली
निवास स्थान-10 जनपथ दिल्ली
( पेरावनी ओढ़नी नहीं लावे)

15/05/2014

No one did not dare to save the women instead of making video

12/05/2014

कुए में उतरने
वाली बाल्टी यदि झुकती है,
तो भरकर बाहर आती है...
जीवन का भी यही गणित है,
जो झुकता है वह
प्राप्त करता है...
जीवन में किसी का भला करोगे,
तो लाभ होगा...
क्योंकि भला का उल्टा लाभ
होता है ।
और
जीवन में किसी पर दया करोगे,
तो वो याद करेगा...
क्योंकि दया का उल्टा याद
होता है।
भरी जेब ने ' दुनिया ' की पहेचान
करवाई और खाली जेब ने ' इन्सानो '
की.
जब लगे पैसा कमाने, तो समझ आया,
शौक तो मां-बाप के पैसों से पुरे होते
थे,
अपने पैसों से तो सिर्फ जरूरतें
पुरी होती है।
जन्म लिया है तो सिर्फ साँसे मत
लीजिये,
जीने का शौक भी रखिये..
शमशान ऐसे लोगो की राख से...
भरा पड़ा है
जो समझते थे...
दुनिया उनके बिना चल नहीं सकती.
हाथ में टच फ़ोन,
बस स्टेटस के लिये अच्छा है…
सबके टच में रहो,
जींदगी के लिये ज्यादा अच्छा है…

08/05/2014

Becoz of Global Warming........
Our Next generation will not b able to see
Tigers !!!!
Toh
Hum kya kare?
Humne bhi to Dinosaur nahi dekha hai.
Kabhi Shikayat ki kya? ???????????????????
Only 842 girls are left for every 1000
boys in India .........
SAVE GIRLS !!!.
we can save the tigers later....
Bike pe piche ladki chahiye ya tiger ??
choice is yours....
Jan heet Mein Jaari.... bachao Naari..!!

05/05/2014

Family is not about blood. Its about who is willing to hold your hand when you need it the most.

अपना काम बनता भाड़ में जाये जनता
12/04/2014

अपना काम बनता भाड़ में जाये जनता

11/04/2014

किसी को पैसे का सहारा किसी को मोदी का,जनता जाए भाड़ में

श्रीगंगानगर-जनता की सेवा करने की बात करने वाले नेता श्रीगंगानगर में थे. साथ थे उनके बड़े बड़े दूसरे नेता. लेकिन किसी ने भी उन लोगों की सुध नहीं ली जिनको भारी बरसात से परेशानी हुई. किसी एक ने भी नहीं देखा कि खुदी,टूटी सड़कों की वजह से कितने लोगों को चोट लगी. कितने वाहन सडकों में धंसे और फंसे. एमपी का चुनाव लड़ने वाले और उनके संगी साथियों को उस क्षेत्र की दुर्दशा दिखाई नहीं दी जहां सीवरेज के लिए शहर को खोद दिया गया है. पैसे के दम पर मीडिया और जनता को अपने पक्ष में करने वाले नेता भी जनता से दूर रहे और सत्ता भोग चुके नेता भी. कुछ घंटे की बरसात. सभी पार्टियों के नेता भी शहर में मौजूद. इसके बावजूद किसी ने शहर की हालत और लोगों की परेशानी के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं कहा. जनता के बीच जाना उचित नहीं समझा. इससे अधिक विडम्बना और क्या होगी. जमींदारा पार्टी को ये गुमान है कि वह खरीदना की क्षमता रखती है और बीजेपी को ये अहंकार कि इस बार मोदी के आम पर वोट मिलेंगे. कांग्रेस तो पूरी तरह से बैक फुट पर है. आप में इधर कोई दम नहीं, ऐसे में पब्लिक राम भरोसे ही है. पब्लिक भी ऐसी ही है. किसी को कुछ नहीं कहती. जब जनता ही ऐसी है तो फिर नेता वैसी ही होंगे.

10/04/2014

WINDOWS XP का हुआ अंत, जानें कैसे बचा सकते हैं अपने कम्प्यूटर को

विंडोज एक्सपी और माइक्रोसॉफ्ट का नाता मंगलवार को टूट गया इसी के साथ कंपनी के सबसे लंबे समय से चल रहे ऑपरेटिंग सिस्टम (ओएस) का अंत हो गया। अब से माइक्रोसॉफ्ट से विंडोज एक्सपी को कोई अपडेट या टेक्निकल सपोर्ट नहीं मिलेगा। एक्सपी को अक्टूबर 2001 में लॉन्च किया गया था। एक्सपी के बंद होने से एटीएम समेत कई बैंकिंग सेवाओं पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि, बैंक एसोसिएशन के मुताबिक, नए एटीएम को इससे खतरा नहीं है। कुछ पुराने एटीएम ही इससे प्रभावित होंगे। पर्सनल यूजर्स पर भी सपोर्ट खत्म होने का असर होगा। हालांकि, सपोर्ट खत्म होने के बाद भी विंडोज एक्सपी का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन इससे हैकिंग का खतरा बढ़ जाएगा। वहीं, नए हार्डवेयर सिस्टम को सपोर्ट नहीं करेंगे।

अपना काम बनता भाड़ में जाये जनता...
09/04/2014

अपना काम बनता भाड़ में जाये जनता...

09/04/2014

लोकतंत्र के भक्षक नहीं रक्षक बनें

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में न लोक है और न तंत्र। अब तो ऐसे लगता है कि जैसे लोकतंत्र के नाम पर जो पार्टियां भारत में सक्रिय हैं उनमें से कुछ ऐसी भी हैं, जो अब डेमोक्रेसी को कलंकित करने का काम करने लगी हैं। जब आप नैतिकता को पांव तले रौंदते हैं तो नियमों का खात्मा भी साथ ही साथ होने लगता है। सत्ता को दूर से देखना और फिर सत्ता में आ जाना, ये दो अलग-अलग बातें थीं, जो अब एक-दूसरे की पूरक हो गई हैं। जिस आम आदमी के नाम को लेकर पार्टी गठित हुई, उसके संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में केवल 28 सीटें लेकर कांग्रेस से राजनीतिक समझौता करके सरकार क्या बनाई कि उनकी महत्वाकांक्षा आसमान तक पहुंच गई है। यह बात अलग है कि उन्हें लगभग 40 दिन बाद ही इस्तीफा देना पड़ा और अब आप पार्टी उसी जगह पर है जहां से वह सत्ता में आने का ख्वाब देख रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार ख्वाब लोकसभा की जमीन से देखा जा रहा है। शायद इसीलिए अरविंद केजरीवाल गुजरात जा पहुंचे, लेकिन हश्र वही हुआ जो दिल्ली में हुआ था। वहां भी बेनकाब हुए यहां भी बेनकाब हुए, परनाला वहीं का वहीं रहा। पिछले दिनों अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम ने योजनाबद्घ तरीके से चुनाव कार्यक्रम घोषित होते ही इलाहाबाद, झांसी, लखनऊ और दिल्ली में भाजपा के दफ्तरों पर हमला कराया। दिल्ली में तो पार्टी के कई नेताओं के खिलाफ केस भी दर्ज हुए। कुल मिलाकर अराजकता की तरफ बढ़ रही आम आदमी पार्टी जनता के सामने इस बार भी बेनकाब हुई और अब कानून अपना शिकंजा कसने जा रहा है। तभी तो केजरीवाल ने जनता से माफी भी मांग ली है।
हमारा सवाल यह है कि केजरीवाल ने सीधा सा सिस्टम बना रखा है कि हर सरकार और हर मंत्री के खिलाफ भ्रष्टïाचार और बेईमानी का शोर मचाओ, धरना-प्रदर्शन करो, पथराव करो और प्रचार पाओ। मीडिया में बने रहने के लिए केजरीवाल यही हथकंडे अपना रहे हैं। सच बात तो यह है कि केजरीवाल ने कांग्रेस सरकार के साथ-साथ भाजपा के पीएम पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी को भी नहीं बख्शा। हम यह कहते हैं कि केजरीवाल को आखिरकार मोदी से दिक्कत क्या है? दरअसल, सारा देश मोदी को प्यार कर रहा है और उन्हें पीएम पद की तरफ ले जाने के लिए संकल्प ले चुका है तो यही कांटा केजरीवाल को चुभा हुआ है। इसीलिए वह गांधी नगर जा पहुंचे। उनका काफिला क्या रोक लिया कि केजरीवाल बौखला गए। पुलिस ने यही तो पूछा था न कि आप क्या करने आए हैं? इस पर केजरीवाल ने वही पुराने सोशल नैटवर्क के माध्यम से अपने वर्करों को हंगामा करने का आदेश दे दिया। दिल्ली में भाजपा के दफ्तर पर केजरीवाल की टीम के अराजक वर्करों ने अंधाधुंध पथराव किया, जिसमें 22 भाजपा वर्कर घायल भी हो गए। सबसे बड़ी बात यह है कि निर्वाचन आयोग और अदालत ने टीम केजरीवाल आक्रमण का गंभीर नोटिस लिया है। तभी तो केजरीवाल से जवाब तलब किया गया है। उसके नेताओं को पुलिस के पास जा-जाकर सफाई देनी पड़ रही है।
हमारा सवाल यह है कि केजरीवाल जोकि धरने-प्रदर्शन में यकीन रखते हैं और अब अगर उनमें दमखम है तो वे भारत के टॉप उद्योगपति अंबानी के खिलाफ मुंबई जाकर धरना-प्रदर्शन क्यों नहीं करते? अगर उनकी सरकारों में सैटिंग है तो केजरीवाल इसके खिलाफ आंदोलन क्यों नहीं करते? ऐसा लगता है कि खुद केजरीवाल अब अंबानी से सैटिंग चाहते हैं, तभी वह उनके खिलाफ बयानों की फायरिंग करके अपना काम चला रहे हैं। 'भाड़ में जाए जनता और अपना काम बनता' ही अब केजरीवाल का मकसद रह गया है। उनकी महत्वाकांक्षा अब पीएम पद तक जा पहुंची है। सीधा सा गणित है कि मिशन मोदी को प्रभावित किया जाए लेकिन मोदी और भाजपा के बढ़ते कदम अब वह इन घटिया हथकंडों से रोक नहीं पाएंगे। चंद बिकाऊ चैनलों के दम पर सियासत कर रहे केजरीवाल केवल नैगेटिव पब्लिसिटी से मकसद नहीं हासिल कर पाएंगे। उनके अपने बिन्नी जैसे विधायक साथ छोड़ चुके हैं। कई और उनका साथ छोडऩे को तैयार हैं। सारा झाड़ू अब बिखर गया है। अगर केजरीवाल में नैतिकता और हिम्मत नाम की कोई चीज है, तो वह राजनीति में सब कुछ अच्छे आचरण के साथ करें। अगर ऐसा नहीं करते, तो उन्हें कोई और काम करना चाहिए। केजरीवाल अगर ईमानदार राजनीतिज्ञ होते तो सीएम बनते ही घोटालों के आरोपों से घिरी श्रीमती शीला दीक्षित के खिलाफ सीधे एक्शन लेकर दिखाते लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया और खुद मैदान से भाग गए।
इनका हर मंत्री विवादित सिद्घ हुआ और आप भी विवादित ही रहे और आगे भी विवादित ही रहेंगे। तो इसलिए अब पूरे लोकतंत्र और पूरी कार्यप्रणाली को ही विवादित बनाना चाहते हैं। आखिर क्यों? कई बार हैरानी होती है कि केजरीवाल की पार्टी कोष में जो अन्तर्राष्टï्रीय फंडिंग हो रही है और जिस प्रकार से हाई कोर्ट ने उनसे जवाब तलब किया गया, उसे लेकर उन पर गाज क्यों नहीं गिरती? केजरीवाल ने पार्टी बनाने से लेकर, सरकार बनाने से लेकर सरकार गिरने तक अगर कोई काम किया है, तो वह यही है कि धरने और प्रदर्शन बस। अब सब कुछ खत्म होता देखकर भाजपा जैसी पार्टी के दफ्तर पर ही हमले करने शुरू कर दिए, ताकि चुनाव घोषणा के दिन उन्हें राष्टï्रीय स्तर पर नैगेटिव पब्लिसिटी मिल सके लेकिन जिस तरह से दिल्ली वालों ने उन्हें कोसा तो अब उनके खिलाफ लोकसभा में वोटिंग भी नैगेटिव ही रहेगी। आने वाला समय बहुत जल्द इसका जवाब भी दे देगा। केजरीवाल को अगर अपनी देशभक्ति और जोश पर नाज है तो वह अपना वचन निभा कर दिखाएं और जहां से नरेन्द्र मोदी चुनाव लड़ रहे हैं उनके खिलाफ ही लड़कर दिखाएं। कदम-कदम पर मोदी के विरोध का इतना ही शौक है तो फिर उनके खिलाफ मुकाबले में उतर ही जाएं।
ताज्जुब इस बात का है कि जिस गांधीवादी नेता अन्ना हजारे से केजरीवाल ने धरना-प्रदर्शन में शामिल होना सीखा, उस अन्ना से अहिंसा न सीखकर केजरीवाल ने यह पत्थरबाजी कहां से सीख ली? महात्मा गांधी ने तो कभी हिंसा का पक्ष नहीं लिया और अब उसी महात्मा गांधी का प्रपौत्र राजमोहन आम आदमी पार्टी से जुड़ गया है। आने वाला समय लोकतंत्र में कैसी परिभाषा लिखेगा यह फिलहाल नहीं कहा जा सकता, लेकिन जब कोई भी पार्टी और कोई भी नेता अपनी हदें पार कर लेता है तो फिर उसका हश्र बहुत बुरा होता है। नदी भी जब अपनी हदें पार कर लेती है, तो फिर वह नदी नहीं रहती और समुद्र का ही हिस्सा बन जाती है। क्या राजनीति में झुंड बनाकर, पत्थर लेकर और जेब में टोपी रखकर, जब चाहे सिर पर लगाकर माओवादी गतिविधियों की तरह आप लोकतंत्र को सुरक्षित रख सकते हैं? हमारा जवाब है नहीं, नहीं, नहीं। हिंसक माओवादी गतिविधियां कभी भी लोकतंत्र का हिस्सा नहीं बन सकतीं। भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य यह है कि लोकसभा के अंदर कभी हजार-हजार के नोट लहराए जाते हैं, कभी मिर्ची पाउडर का स्प्रे किया जाता है और अब दुर्भाग्य से लोकसभा के बाहर केजरीवाल के लोग पार्टियों के दफ्तरों पर हमला कर रहे हैं। सड़क से संसद तक अराजकता फैलाने के लिए केजरीवाल को लोकतंत्र में विश्वास करने वाला अवाम कभी माफ नहीं करेगा। आने वाले वक्त में केजरीवाल को इसका जवाब देना होगा।
@ आदित्य चोपड़ा

09/04/2014

चचा सुखराम की स्कूली शिक्षा न के बराबर है लेकिन उनका दिमाग गजब की विश्लेषण क्षमता रखता है। यही कारण है कि उनके इर्दगिर्द पढ़ेलिखों की भीड़ सदैव रहती है। बहुत सी बातें बहुतों की समझ में नहीं आती पर इहें समझना चचा के लिए मानो बच्चों का खेल है।खचाखच भरी बैठक में कहावतों पर बात चल रही थी। चचा का कहना था का शानदार और जानदार कहावतों को गढ़ने वाले विद्वान ही नहीं होते बल्कि बिना डिग्री वाले लोग कहावतों को जन्म देकर समज को रोशनी दिखाते हैं।
इसके बाद चचा मुख्य बात पर आए। बोले- 'मैंने अपने इलाके के विधायक पिद्दीलाल से पूछा कि तुम अपनी जनता से वोट बड़ी विनम्रता से माँगते हो, षानदार जीत हासिल करते हो लेकिन कुर्सी मिलते ही ऐसे ऑंखें फेर लेते हो जैसे जानते ही नहीं।' इस पर विधायक जी बोले- 'देखो चचा ! चुनाव में वोटर हमारी बड़ी दुर्गति करता है। हम घर-घर जाते हैं, हाथ जोड़ते हैं, पैर पकड़ते हैं। किसी को चाची, किसी को माताजी,किसी को बहनजी तो किसी को बूआजी कहकर अपनी जुबान सुखाते हैं तब जाकर उनके कलेजे में समाकर जीत हासिल करते हैं।छोटीसी मषीन का नन्हा सा बटन दबाने में वोटर की मानो नानी मरती है। चचा ! अब आप ही बताओ। एक भलामानस हारने पर गाली देगा और जीतने पर मुंह फेरेगा कि नहीं। अपुन का सिध्दान्त है 'अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता।'

विधायक पिद्दी की कहावत में तर्क की कोई कमी नहीं थी सभी को भाया। चचा बोले-'एक किस्सा और सुनो। '
यह बात उच्च शिक्षा के कामयाब दुकानदार की है। कई इंजीनियरिंग कालेज का मालिक है वह। विधायक पिद्दी का यार है सो उसकी कहावत को सीने से लगाए फिरता है। एक दिन बोला कि ' मैं अपने कालेज में 7-8 हजार में मास्टर रखता हूं। ये मास्टर 4-5 वर्ष में तरक्की पाकर 13-14 हजार तक पहुँच जाते हैं। तब मास्टरों का यह वेतन मेरी आंखों में खटकने लगता है। उन्हें नौकरी से निकालने का फैसला कर लेता हूँ। कालेज से निकालने से 6 माह पूर्व उसकी कमियां निकालना, मीमो थमाना, डांटना-डपटना षुरू कर देता हूं। इतना टेंशन देता हूं कि वह खुद बखुद इस्तीफा देकर नौ-दो ग्यारह हो जाता है। उसके जाने के बाद मैं उसकी जगह 7-8 हजार पर फिर से नियुक्ति कर लेता हूं। यह सब 'अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता' के सिध्दान्त पर करता हूँ।

चचा ने अफसरों, अपने नजदीकी रिश्तेदारों, पड़ोसियों, मित्रों के ऐसे अनेक किस्से सुनाए जो विधायक पिद्दी की कहावत पर अमल कर तरक्की की चौपड़ पर कुलांचें मार रहे हैं। बैठक में बैठे कई लोग पछता रहे थे कि विधायक पिद्दी को उन्होंने गुरू क्यों नहीं बनाया। चचा ने अपनी वाणी को विराम इस नैतिक सलाह से दी- 'निजी उत्थान करना है तो उठते-बैठते इस कहावत का जाप करो और मिलजुल कर समाज का भला करना है तो जैसे वैष्णों देवी के दर्षन के लिए चढ़ाई करते भक्तजन उद्धोष करते हैं 'जोर से बोलो जय माता की ', वैसे ही सुबह पार्क में और षाम को गली मोहल्लों में नारे लगाओ, 'अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता।'
@ प्रोफेसर अशोक बंसल

08/04/2014

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1759 ईसवी में मुगल बादशाह आलमगीर द्वितीय की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अलीगौहर शाह आलम द्वितीय के नाम से मुगल बादशाह बना । कहने को वह मुगल बादशाह था लेकिन पूरी ताकत उसके वज़ीर गाज़ीउद्दीन खान फ़िरोज़जंग तृतीय के हाथों में थी ।
वैसे शाह आलम शब्द का अर्थ अखिल विश्व का शासक होता है परन्तु स्थितियाँ ऐसी बन गयीं थी कि एक कहावत उस समय प्रचलित हो गयी 'शाह-ए-आलम, दिल्ली से पालम' क्योंकि उसका हुक्म दिल्ली से पालम तक ही बमुश्किल चलता था ।
बादशाह को अपनी स्थिति का ज्ञान था इसलिए वह शर्म के मारे दिल्ली से भाग गया । और मुगलों के खोए गौरव को फिर से प्राप्त करने की कोशिशों में लगा रहा ।

अब आज की स्थिति को देखिए । आज का शाह आलम जवानों की लाश पर भी बैठकर शासन करेगा, लेकिन गद्दी नहीं छोड़ेगा । उसे बस गद्दी चाहिए । अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता ।
जब देश में समानान्तर सरकारें चल रही हों तो कोई शासक कैसे चैन से बैठ सकता है । समझ से परे है ।
अब कुछ बयान दे दिए जाएंगे । कुछ कड़ी से कड़ी निन्दा होगी और कुछ कड़ी से कड़ी कार्यवाही । बाकी और जो मैडम का हुक्म !

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Jodhpur
342001

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