28/05/2026
राजा सिंगरामऊ इस्टेट
कुंवर श्रीपाल सिंह का जन्म 29 जुलाई 1918 को सिंगरामऊ रियासत (बैस क्षत्रिय) के राजा हरपाल सिंह के सुपुत्र के रूप में हुआ। बचपन से ही उनमें साहस, शौर्य और नेतृत्व के गुण स्पष्ट दिखाई देने लगे थे। 1939 में राज्यारोहण के बाद उन्होंने रियासत की बागडोर संभाली और एक कुशल शासक के रूप में अपनी पहचान बनाई।
1940 में मसूरी में आयोजित ऐतिहासिक दंगल में उन्होंने रोमानिया के प्रसिद्ध पहलवान जॉर्ज कनस्टाइन को पराजित कर पूरे देश में ख्याति अर्जित की। इस ऐतिहासिक विजय के लिए उन्हें जगदेव मल्ल की उपाधि से सम्मानित किया गया, जो उनके अदम्य साहस, आत्मविश्वास और शारीरिक सामर्थ्य का प्रतीक बनी।
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में कुंवर श्रीपाल सिंह ने सक्रिय और साहसिक भूमिका निभाई। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों की खुलकर सहायता की, जिसके कारण अंग्रेजी सरकार उनके विरुद्ध हो गई। उनकी रियासत पर हमला किया गया और खादी उद्योग को जला दिया गया, किंतु उन्होंने राष्ट्रहित में अपने विचारों से कभी समझौता नहीं किया। उनकी यह क्रांतिकारी चेतना आज भी क्षेत्र के लोगों की स्मृतियों में जीवित है।
1957 में उन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। गोहत्या बंदी आंदोलन का नेतृत्व करते हुए उन्होंने संतों पर हुए लाठीचार्ज के विरोध में विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र देकर अपने सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों की मिसाल प्रस्तुत की। वे तीन बार विधायक रहे और विधानसभा के डिप्टी स्पीकर जैसे गरिमामय पद को सुशोभित किया। उनके नेतृत्व में अनेक सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों को नई दिशा मिली और वे जनभावनाओं के सच्चे प्रतिनिधि के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
1957 में खुटहन विधानसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उन्होंने कांग्रेस के लक्ष्मीशंकर यादव को पराजित किया। 1962 में रारी विधानसभा सीट से जनसंघ के टिकट पर कांग्रेस प्रत्याशी रामलखन सिंह को हराकर विजय प्राप्त की। 1974 में प्रतापगढ़ की चांदा विधानसभा सीट से जनसंघ प्रत्याशी के रूप में पुनः ऐतिहासिक जीत दर्ज की।
राजनीति से निवृत्त होने के बाद कुंवर श्रीपाल सिंह ने अपने जीवन को दर्शन, अध्यात्म और समाजसेवा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने क्षेत्र में उच्च शिक्षा के विस्तार हेतु पीजी कॉलेज तथा अन्य शैक्षिक और व्यावसायिक संस्थानों की स्थापना की। उनके प्रयासों से शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक चेतना को नई दिशा मिली।
कुंवर श्रीपाल सिंह को भारतीय साहित्य शिरोमणि, संगीताचार्य और विद्या वाचस्पति जैसी प्रतिष्ठित उपाधियों से अलंकृत किया गया। उनका संपूर्ण जीवन समाज सुधार, प्रशासनिक दक्षता, राष्ट्रभक्ति और आध्यात्मिक चिंतन का अद्भुत समन्वय था। जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने संयम, साधना और लोककल्याण को ही अपना मार्ग बनाया।
महान प्रेरणा स्रोत व्यक्तित्व को शत-शत नमन।🙏
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