26/03/2026
जब कोई देख नहीं रहा होता, तब बदलाव कैसा दिखता है?
और जब कोई तालियाँ नहीं बजा रहा होता, तब उसे आगे कौन बढ़ाता है?
इन सवालों के जवाब हमें अपने दूसरे फील्ड विज़िट में मिले, लहार (Lahaar) के साथ, जो मध्य प्रदेश के झिरी में काम कर रहा है।
झिरी, भोपाल से लगभग 170 किमी दूर, फेज़-पारधी समुदाय की एक छोटी सी बस्ती है। लहार, शेषराज सिसोदिया और उनके साथियों द्वारा चलाया जा रहा है, जो खुद इसी समुदाय से आते हैं। वे शिक्षा की कमी, लैंगिक असमानता, बाल विवाह और पलायन जैसे मुद्दों पर काम कर रहे हैं।
लहार टीम का एक सामान्य दिन सुबह जल्दी बच्चों के साथ लाइब्रेरी सत्र से शुरू होता है, जब वे स्कूल जाने से पहले आते हैं। दिन का अंत अक्सर फ्रिस्बी क्लास, संविधान से जुड़े सत्र, या एक और लाइब्रेरी सत्र के साथ होता है। दिनभर टीम आगे की योजनाएँ बनाती है और समुदाय की चुनौतियों पर काम करती रहती है।
इस विज़िट के दौरान हमें लहार का वार्षिक कार्यक्रम देखने का मौका मिला। बिजली कटने के कारण अंधेरे में जंगीत से कार्यक्रम की शुरुआत हुई, लेकिन कार्यक्रम रुका नहीं।
छोटे बच्चों ने पारंपरिक और आदिवासी गीत प्रस्तुत किए।
लहार टीम के सदस्यों ने अपने काम और अनुभव साझा किए।
बड़े बच्चों ने एक माइम के जरिए घरेलू हिंसा, नशा और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दे दिखाए , और फिर अपने ही समुदाय से सवाल पूछा: क्या यह सही है?
लाइब्रेरी, “अपणी लायब्रेरी”, एक फोटो वॉल में बदल गई, जहाँ समुदाय ने अपनी ही कहानियाँ देखीं। अपने बच्चों की तस्वीरें, उनके काम और उपलब्धियाँ , सब कुछ सामने था।
लहार की कहानी शांत लेकिन लगातार प्रयास की कहानी है। यह उन युवाओं की कहानी है जो उसी सिस्टम को बदलने की कोशिश कर रहे हैं जिसका वे खुद हिस्सा रहे हैं। वे बिना किसी इंतज़ार के, अपने तरीके से, बेहतर भविष्य बनाने में लगे हैं।
यहाँ आकर महसूस होता है कि असली बदलाव कोई प्रस्तुति नहीं होता, वह लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दिखता है।