14/04/2021
#वो_सीहड़दे_सांखलो, #भिड़_गियो_खिलजी_सूं
"धरा रूण भल दीपियो, दाता सिहड़देव।
जंवना सामे जूझयो, सारण कुळ री सेव।।"
(वीरभूमि "रूण" जिला नागौर तहसील मारवाड़ मुंडवा)
राजस्थान की इस पवित्र धरा पर एक से बढ़कर एक शूरमां व साहसी पुरुष जन्में है इसलिए तो कहा जाता है- पुरस पटाधर नीपजै, अईयो मुरधर देश। इस सिंह उत्पन्न करने वाली धरा के नर- नाहरों की वीर गाथाएं आज भी अजर अमर है जिन्हे सुनकर हमें गौरव की अनुभूति होती है। ऐसी ही एक शोर्य गाथा है रूण के शासक सीहड़देव सांखले की।
गढ़ रूण के शासक चाचक के पुत्र सीहड़देव हुए जिनके शोर्य व पराक्रम की कहानियां हर किसी के जुबां पर है। विक्रम संवत् 1400 के पूर्वार्द्ध में रूण पर सांखलो का राज था। उस समय रूण शासक सीहड़देव वीरता और स्वाभिमान का साक्षात् प्रतिमूर्ति था। राजपूतों के राज में चारणो के योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता, रूण कोट के पोळपात कर्तव्यनिष्ठ कवि मेहाजल दधवाड़िया थे।
उस समय दिल्ली पर अलाउद्दीन खिलजी का शासन था। जब खिलजी की सेना मारवाड़ में कई राजाओं को घात व धोखे से हराकर रूण के पास से गुजर रही थी उसी समय किसी चुगलखोर ने खिलजी के सामने सीहड़देव की बेटी की सुंदरता को प्रशंसा की और कहा, तुम्हारे को उससे कन्या से शादी करनी चाहिए। खिलजी ने तुरंत हामी भर ली और अपने दूत के साथ सीहड़देव के पास संदेश भिजवाया की अपनी बेटी की शादी मेरे साथ करे या मौत से मुकाबला करने के लिए तैयार हो जाओ। खिलजी के खबरी का संदेश सुनकर स्वाभिमानी सीहड़देव के तन में आग को लपटें उठने लगी। लेकिन सीहड़देव को यह भलीभांति ज्ञात था कि मेरे पास मुठ्ठी भर आदमी और खिलजी के पास विशाल सेना। उसी क्षण सीहड़देव ने सलाह मशविरा हेतु पोलपात मेहाजल दधवाड़िया को बुलाया और खिलजी से मुकाबले के लिए राय पूछी। तब स्वामिभक्त मेहाजल दधवाड़िया ने कहा कि आण पर बन आए तो सब लड़ते है, हुक्म आप तो रूण के राजा हो, इसमें पूछने की क्या बात।
"धर जातां धर्म पलटता, त्रिया पड़तां तांव।
तीन दिहाड़ा मरण रां, कहां रंक कहां राव।।"
हम सभी केसरिया करके इस रजपूती आन को कायम रखेंगे। आप युद्ध की तैयारी करो, और में दो दिन तक खिलजी की सेना को रोकने की कोशिश करूंगा।
इम सजजै आसेर,
कर तोपां हर कांगरै।
फेरा हुवै न फेर,
बाई रा बीजी बगत।।
दूजा धर दीजैह,
असुभ रंग सह आंतरै।
केसरिया कीजैह,
सजजै मांडो सांखला।।(सीहड़दे चरित)
मेहाजल सीधा खिलजी के पड़ाव में पहुंचा और कहा कि सीहड़देव का पोतपाल मेहाजल हाजिर है। खिलजी ने उसे अन्दर बुलाया और पूछा क्या संदेश लाए हो, तब मेहाजल ने कहा कि इतने कम समय में व्यस्था हो नहीं सकती है इसलिए चार दिन का वक्त चाहिए तब तक आप मेरे मेहमान हो, कल मेरी बेटी का विवाह कवि हुन्फाजी जी से होगा।
ईधर सीहड़देव अपने भाईयो और सगे संबंधियों को इकट्ठा कर केसरिया करने की तैयारी कर रहा था। जब खिलजी को पता चला सांखले विवाह की नहीं, मरने की तैयारी कर रहे हैं और मेहाजल ने उसे धोखे में रखा। उसी वक्त खिलजी की सेना ने रूण पर आक्रमण कर दिया। प्रभात वेला में राजपूतों ने बिजली सी चमकती तलवारों से ऐसा भीषण प्रहार किया, खिलजी की सेना में कोहराम मच गया, और एक बार तो उनके पैर डगमगा गए लेकिन कहा जाता है कि घण जीते अर जोधार हारे वाली बात सही होई और सीहड़देव के कोट में जौहर कि ज्वाला धधक उठी। सीहड़देव आपनी आन बान हेतु वीरगति प्राप्त की। इसी प्रसंग में गिरधर दान जी रतनू कहते है:-
"सीहड़देव लड़ियो खिलजी सूं, अवनी पर राखण जस झंडी।
प्राणा रै बदलै पणधारी, मरजाद सांखले धर मंडी।"
और वीरगति पाने से पहले सीहड़देव ने सांखलो को भळावण दी कि जे असली हो! तो दधवाड़ियां सूं मत बदल़जो अर जिको सांखलो आंसूं बदल़ेला बो असली सांखलो नीं होवैला-
सीहड़ राणै अक्खियो,
आ धारा री धीज।
जो पलटै दधवाड़ियां,
जो सांखलां न बीज!!
🙏🚩
सुमेर सिंह (शिवदानसिंह नगर, बैंगटी)
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3805180329602226&id=100003308889185