27/10/2025
۔शाह देहलवी की राय अकबर के “दीन-ए-इलाही” के बारे मे
अकबर ने “दीन-ए-इलाही” की स्थापना उस दौर में की थी, जो एक अनोखा मज़हबी प्रयोग था। इसमें इस्लाम, हिंदू, जैन, ईसाई और पारसी धर्मों को मिलाने की कोशिश की गई थी। हालांकि, इस नज़रिए को उस समय के बड़े इस्लामी उलेमा ने सतस्लीम नहीं किया। विशेष रूप से शाह वलीउल्लाह देहलवी।رح
और उनके बेटे शाह अब्दुल अज़ीज़ देहलवी رح
दोनों ने इसे सख़्त तौर पर नापसंद किया और इसे शरीअत से दूर, गुमराही फैलाने वाला अमल बताया।
शाह वलीउल्लाह देहलवी ने अपनी प्रमुख कृति “हुज्जतुल्लाह अल-बालिग़ा” (حجة الله البالغة) में स्पष्ट किया कि जब कोई शासक या व्यक्ति शरीअत-ए-मुहम्मदी से हटकर अपनी राय या तजुर्बे को “दीन” के रूप में पेश करता है, तो यह फ़ितना और गुमराही का कारण बनता है। हालांकि उन्होंने अकबर या “दीन-ए-इलाही” का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया, उनके विचार स्पष्ट रूप से ऐसे प्रयासों की निंदा करते हैं, जिसमें हुक़मरान अपने नफ़्स और अक़्ल को नबवी शरीअत से ऊपर रखे।
दूसरी ओर, शाह अब्दुल अज़ीज़ देहलवी ने अपनी कृतियों “फ़तावा-ए-अज़ीज़ी” और “तफ़सीर-ए-अज़ीज़ी” में अकबर के “दीन-ए-इलाही” का स्पष्ट उल्लेख करते हुए इसे क़ुफ़्र और इस्लाम-विरोधी ईजाद बताया। उनके अनुसार, अकबर ने शरीअत के मूल सिद्धांतों से हटकर ऐसा मज़हब बनाया जो किसी नबी या रसूल का नहीं था, बल्कि यह एक दुनियावी और सियासी चाल थी, जिसका उद्देश्य मज़हबी एकता नहीं बल्कि सत्ता की मज़बूती था।
इस प्रकार, शाह वलीउल्लाह और शाह अब्दुल अज़ीज़ देहलवी — दोनों ने अकबर के “दीन-ए-इलाही” को गुमराही, शरीअत से दूरी और असल-ए-दीन से कटाव का प्रतीक बताया। उनके दृष्टिकोण में, यह न तो सच्चा दीन था और न ही अल्लाह या उसके रसूल ﷺ की तालीमात से इसका कोई संबंध था।
संदर्भ:
1. Shah Waliullah Dehlvi, Hujjatullah al-Baligha, Delhi: 1747.
2. Shah Abdul Aziz Dehlvi, Fatawa-e-Azizi, Delhi: 1800.
3. Shah Abdul Aziz Dehlvi, Tafsir-e-Azizi, Delhi: 1810.