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28/01/2026

क्या आपने भी ताज महल को देखा है
Taj Mahal ki Tareekh
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28/01/2026

Taj Mahal ki Tareekh
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06/12/2025
खिलाफत आंदोलन: खलीफा की हिफाज़त और मुसलमान-हिंदू इत्तेहाद"खिलाफत तहरीक 1919 में तुर्की के खलीफा की हिमायत में शुरू हुई थ...
06/11/2025

खिलाफत आंदोलन: खलीफा की हिफाज़त और मुसलमान-हिंदू इत्तेहाद"
खिलाफत तहरीक 1919 में तुर्की के खलीफा की हिमायत में शुरू हुई थी, लेकिन 1924 में दो अहम वजहों से खत्म हो गई। पहली वजह ये थी कि तुर्की में मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क ने 1923 में नई जम्हूरी हुकूमत क़ायम की और 3 मार्च 1924 को बाकायदा खिलाफत का निज़ाम खत्म कर दिया, जिससे तहरीक का असल मकसद खत्म हो गया। दूसरी वजह हिंदुस्तान में 5 फरवरी 1922 को पेश आने वाला चौरी-चौरा वाक़िया था, जिसमें कुछ मुज़ाहिरीन ने पुलिस वालों को ज़िंदा जला दिया, जिस पर महात्मा गांधी ने असहयोग तहरीक वापिस ले ली, और क्यूंकि खिलाफत तहरीक उसी से जुड़ी थी, उसका जोश भी ठंडा पड़ गया। तारीख़दान बिपिन चंद्र अपनी किताब India’s Struggle for Independence में लिखते हैं कि खिलाफत तहरीक हिंदू-मुस्लिम इत्तेहाद की सबसे बड़ी कोशिश थी, मगर तुर्की की सियासी तब्दीलियों ने इसे बेअसर कर दिया। वहीं डॉ. इरफ़ान हबीब और रफ़ीक ज़करिया के मुताबिक, खिलाफत का खात्मा मुसलमानों के लिए सख्त सदमा था, जिसने हिंदुस्तान की सियासत का रुख़ बदल दिया। यूँ 1924 में खिलाफत तहरीक हमेशा के लिए खत्म हो गई।

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ताज महल की नींव (foundation)ताज महल की नींव (foundation) काफी मजबूत और जटिल तरीके से बनाई गई थी। इसका निर्माण यमुना नदी ...
04/11/2025

ताज महल की नींव (foundation)

ताज महल की नींव (foundation) काफी मजबूत और जटिल तरीके से बनाई गई थी। इसका निर्माण यमुना नदी के किनारे किया गया था, इसलिए यहाँ की मिट्टी नरम और दलदली (marshy) थी। ऐसे स्थान पर भारी इमारत खड़ी करने के लिए विशेष तकनीक अपनाई गई।

नींव के बारे में मुख्य बातें:

1. ताज महल की नींव लकड़ी के ढांचे और पैदल खूँटे (timber piles) के ऊपर बनाई गई थी। लकड़ी को पानी में सुरक्षित रखने के लिए विशेष तरीके से दबाया गया ताकि वह सड़ न जाए।

2. इसके ऊपर चूने और गारे का मिश्रण (lime mortar) और ईंट का इस्तेमाल हुआ।

3. नींव इतनी मजबूत थी कि यह भारी संगमरमर और लाल बलुआ पत्थर की दीवारों और गुंबद का वजन सह सके।

4. यमुना नदी का जलस्तर नींव को नमी देता रहा, जिससे लकड़ी लंबे समय तक सुरक्षित रही।

कुछ इतिहासकार के नाम और किताबें जिसमें उन्होंने बताया के तक महल के बारे में

1. ए. सी. एल. कार्लाइल (A. C. L. Carlyle) – आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया रिपोर्ट्स (Archaeological Survey of India Reports)

2. ई. डब्ल्यू. स्मिथ (E. W. Smith) – द मुग़ल आर्किटेक्चर ऑफ फतेहपुर सीकरी एंड आगरा (The Moghul Architecture of Fatehpur Sikri and Agra)

3. सर सैयद अहमद ख़ान (Sir Syed Ahmad Khan) – आसार-उस-सनादीद (Āthār-us-Sanādīd / آثار الصنادید)

4. पर्सी ब्राउन (Percy Brown) – इंडियन आर्किटेक्चर (इस्लामिक पीरियड) [Indian Architecture (Islamic Period)]

5. एस. आर. शर्मा (S. R. Sharma) – मुग़ल आर्किटेक्चर (Mughal Architecture)

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बादशाह जहांगीर का शराब और अफ़ीम के बारे में इकरारजहांगीर ने तुज़्क-ए-जहांगीरी में खुद लिखा है कि:> “मैंने जवानी में शराब...
02/11/2025

बादशाह जहांगीर का शराब और अफ़ीम के बारे में इकरार

जहांगीर ने तुज़्क-ए-जहांगीरी में खुद लिखा है कि:

> “मैंने जवानी में शराब पीनी शुरू की। पहले दिन में चार जाम लेता था, फिर यह आदत बढ़ती गई। जब नुकसान महसूस हुआ तो मैंने इसे कम कर दिया।”

वह आगे लिखता है कि एक वक़्त ऐसा आया जब हकीमों ने उसे मना किया, तो उसने शराब छोड़ने की कोशिश की — लेकिन पूरी तरह छोड़ नहीं पाया।

उसने लिखा कि:
> “मैंने शराब छोड़नी चाही मगर जिस्म इस का आदी हो चुका था, इसलिए कम करके पीने लगा। फिर मैं अफ़ीम लेने लगा ताकि शराब की तलब कम हो।”

कई इतिहासकार जैसे सर जदुनाथ सरकार और हावर्ड गाइल्स ने भी इसकी पुष्टि की है कि जहांगीर ने अपनी किताब में खुद अपनी शराबख़ोरी और अफ़ीम के इस्तेमाल का ज़िक्र किया है।































फिरोज़ शाह कोटला की कहानी दिल्ली के बीचों-बीच फिरोज़ शाह कोटला है, 1354 में सुल्तान फिरोज़ शाह तुग़लक ने बनवाया। इतिहासक...
31/10/2025

फिरोज़ शाह कोटला की कहानी

दिल्ली के बीचों-बीच फिरोज़ शाह कोटला है, 1354 में सुल्तान फिरोज़ शाह तुग़लक ने बनवाया। इतिहासकार कहते हैं कि ये महलों, मस्जिदों और बावड़ियों का बड़ा किला था।

लेकिन यहाँ का सबसे खास हिस्सा है “जिन बाबा”। कहते हैं कि किले के खंडहरों में जिन्नात रहते हैं, और जिन बाबा की दरगाह के पास लोग अपनी मनोकामनाएँ मांगने आते हैं। रात में यहाँ भूत और अजीब आवाज़ें भी सुनाई देती हैं। लोग मानते हैं कि जिन बाबा की मौजूदगी से यहाँ की हवाएँ और दीवारें भी जादुई हो जाती हैं।

इतिहास और लोककथाओं का ये संगम, फिरोज़ शाह कोटला को सिर्फ़ पुराना किला नहीं, बल्कि रहस्यमय और रोमांचक जगह बना देता है।
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मुग़लई खाना” एक तरह से बनाया हुआ नाम हैSohail Hashmi के मुताबिक, जो खाना आज हम “मुग़लई खाना” कहते हैं, वो असली मुग़ल बाद...
30/10/2025

मुग़लई खाना” एक तरह से बनाया हुआ नाम है

Sohail Hashmi के मुताबिक, जो खाना आज हम “मुग़लई खाना” कहते हैं, वो असली मुग़ल बादशाहों के ज़माने के खाने से काफी अलग था। उनका कहना है कि “मुग़लई” या “मुग़लिया” जैसे नाम ज़्यादातर लोगों ने अपनी परंपरा और मार्केटिंग के लिए मशहूर कर दिए, जबकि इतिहास के हिसाब से ये पूरी तरह सही नहीं है। Sohail Hashmi बताते हैं कि मुग़ल दरबार में जो खाना खाया जाता था, वो आज की तरह सजा-धजा और बनावट वाला नहीं होता था। उनके मुताबिक, आज की बिरयानी, कबाब, हलवा और बाकी जो चीज़ें हम “मुग़लई” कहते हैं, उनमें वक्त के साथ लोकल स्वाद और रिवाज़ों का असर मिल गया है।

उन्होंने ये भी कहा कि ये ग़लतफ़हमी इसलिए हुई क्योंकि लोग इतिहास को आज के स्वाद और खाने के नज़रिए से देखते हैं। Sohail Hashmi का कहना है कि “मुग़लई खाना” एक तरह से बनाया हुआ नाम है, जो बिज़नेस और परंपरा से जुड़ा है, न कि पूरी तरह सच्चा इतिहास। इसलिए जब हम मुग़लों के खाने की बात करते हैं, तो हमें समझना चाहिए कि असली मुग़ल खाना क्या था और आज जो “मुग़लई खाना” कहा जाता है, वो क्या है। उनका कहना है कि इतिहास को नामों और परंपराओं से नहीं, बल्कि सबूतों और असली बातों के आधार पर समझना चाहिए।

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शेख़ अहमद सरहंदी رح और दीन-ए-इलाहीमुजद्दिद अल्फ़ सानी رح (शेख़ अहमद सरहंदी, 1564–1624) ने अकबर बादशाह के "दीन-ए-इलाही" क...
28/10/2025

शेख़ अहमद सरहंदी رح और दीन-ए-इलाही
मुजद्दिद अल्फ़ सानी رح (शेख़ अहमद सरहंदी, 1564–1624) ने अकबर बादशाह के "दीन-ए-इलाही" को इस्लाम के ख़िलाफ़ एक गुमराह करने वाला और कुफ़्र पर आधारित मज़हब कहा था।

उनका कहना था कि —

> “अकबर का बनाया हुआ ‘दीन-ए-इलाही’ दरअसल इस्लाम की जड़ों को काटने और मुसलमानों को शरीअत से दूर करने की चाल है।”

उन्होंने अपनी मशहूर किताब “मक़तूबात-ए-इमाम-ए-रब्बानी” में इस पर बहुत सख़्त इलज़ाम लगाए।
उन्होंने लिखा कि —

> “जिस मज़हब में नबी की इताअत (फ़ॉलो करना) छोड़ दी जाए, और अपनी अक़्ल को हुक्मरान बना लिया जाए, वो मज़हब कभी हक़ नहीं हो सकता। ‘दीन-ए-इलाही’ दरअस्ल कुफ़्र और ज़िंदगी की गुमराही का नाम है।”

मक़तूबात के एक ख़त में उन्होंने यह भी कहा कि —

> “अकबर ने जो दीन ईजाद किया, वो न तो इस्लाम है, न कुफ़्र की कोई जात; बल्कि दोनों के दरमियान एक नापाक मिलावट है।”

यानीइशेख़ अहमद सरहंदी رح ने "दीन-ए-इलाही" को पूरी तरह से रद्द (Reject) किया और कहा कि यह इस्लाम के असूलों के खिलाफ़ और ईमान को नुक़सान पहुंचाने वाला है।

۔शाह देहलवी की राय अकबर के “दीन-ए-इलाही” के बारे मेअकबर ने “दीन-ए-इलाही” की स्थापना उस दौर में की थी, जो एक अनोखा मज़हबी...
27/10/2025

۔शाह देहलवी की राय अकबर के “दीन-ए-इलाही” के बारे मे

अकबर ने “दीन-ए-इलाही” की स्थापना उस दौर में की थी, जो एक अनोखा मज़हबी प्रयोग था। इसमें इस्लाम, हिंदू, जैन, ईसाई और पारसी धर्मों को मिलाने की कोशिश की गई थी। हालांकि, इस नज़रिए को उस समय के बड़े इस्लामी उलेमा ने सतस्लीम नहीं किया। विशेष रूप से शाह वलीउल्लाह देहलवी।رح
और उनके बेटे शाह अब्दुल अज़ीज़ देहलवी رح
दोनों ने इसे सख़्त तौर पर नापसंद किया और इसे शरीअत से दूर, गुमराही फैलाने वाला अमल बताया।

शाह वलीउल्लाह देहलवी ने अपनी प्रमुख कृति “हुज्जतुल्लाह अल-बालिग़ा” (حجة الله البالغة) में स्पष्ट किया कि जब कोई शासक या व्यक्ति शरीअत-ए-मुहम्मदी से हटकर अपनी राय या तजुर्बे को “दीन” के रूप में पेश करता है, तो यह फ़ितना और गुमराही का कारण बनता है। हालांकि उन्होंने अकबर या “दीन-ए-इलाही” का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया, उनके विचार स्पष्ट रूप से ऐसे प्रयासों की निंदा करते हैं, जिसमें हुक़मरान अपने नफ़्स और अक़्ल को नबवी शरीअत से ऊपर रखे।

दूसरी ओर, शाह अब्दुल अज़ीज़ देहलवी ने अपनी कृतियों “फ़तावा-ए-अज़ीज़ी” और “तफ़सीर-ए-अज़ीज़ी” में अकबर के “दीन-ए-इलाही” का स्पष्ट उल्लेख करते हुए इसे क़ुफ़्र और इस्लाम-विरोधी ईजाद बताया। उनके अनुसार, अकबर ने शरीअत के मूल सिद्धांतों से हटकर ऐसा मज़हब बनाया जो किसी नबी या रसूल का नहीं था, बल्कि यह एक दुनियावी और सियासी चाल थी, जिसका उद्देश्य मज़हबी एकता नहीं बल्कि सत्ता की मज़बूती था।

इस प्रकार, शाह वलीउल्लाह और शाह अब्दुल अज़ीज़ देहलवी — दोनों ने अकबर के “दीन-ए-इलाही” को गुमराही, शरीअत से दूरी और असल-ए-दीन से कटाव का प्रतीक बताया। उनके दृष्टिकोण में, यह न तो सच्चा दीन था और न ही अल्लाह या उसके रसूल ﷺ की तालीमात से इसका कोई संबंध था।

संदर्भ:

1. Shah Waliullah Dehlvi, Hujjatullah al-Baligha, Delhi: 1747.

2. Shah Abdul Aziz Dehlvi, Fatawa-e-Azizi, Delhi: 1800.

3. Shah Abdul Aziz Dehlvi, Tafsir-e-Azizi, Delhi: 1810.

अकबर का "दीन-ए-इलाही धर्म " अकबर का "दीन-ए-इलाही" कोई आसमानी दीन नहीं था, बल्कि ये उसकी ज़ाती सोच और सियासी मक़ासिद से प...
26/10/2025

अकबर का "दीन-ए-इलाही धर्म "

अकबर का "दीन-ए-इलाही" कोई आसमानी दीन नहीं था, बल्कि ये उसकी ज़ाती सोच और सियासी मक़ासिद से पैदा किया गया एक तजुर्बाती निज़ाम था, जिसमें मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब की कुछ तालीमात को मिलाने की कोशिश की गई थी। इस में इस्लामी शरीअत की पैरवी ना के बराबर थी और रसूलुल्लाह ﷺ की रिसालत को उस दर्जे में तस्लीम नहीं किया गया जो ईमान का बुनियादी हिस्सा है।
मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी رح ने अपनी किताब "ताजदीद-ओ-अह्या-ए-दीन" में वाज़ेह किया है कि ताजदीद का मतलब कोई नया मज़हब ईजाद करना नहीं, बल्कि दीन-ए-इस्लाम को उसकी अस्ल सूरत में दोबारा ज़िंदा करना है। उनके नज़दीक, अकबर का ये अमल शरीअत से इनहिराफ़ था और इस्लामी उसूलों की रूह के ख़िलाफ़ था। उन्होंने ऐसे हर तहरीक को "रूहानी फितना" करार दिया जो नबी ﷺ की सीरत और इल्हामी शरीअत से हट कर दीन में इंसानी दख़ल अंदाज़ी करती है।

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