30/06/2026
प्रभु ने जीवन दिया... इसलिए यह जीवन अब समाज और सनातन की सेवा के नाम
– नरेन्द्र उपाध्याय
हर व्यक्ति के जीवन में एक ऐसा मोड़ आता है, जहाँ उसे तय करना होता है कि वह केवल अपने लिए जिएगा या दूसरों के लिए भी।
मेरे जीवन में भी ऐसा ही एक मोड़ आया।
एक समय मैं भी अपने परिवार, काम और भविष्य की योजनाओं में व्यस्त था। समाज सेवा की इच्छा तो थी, लेकिन उसे जीवन का उद्देश्य बनाने का साहस नहीं था। फिर प्रभु ने ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कीं कि मुझे यह समझ में आ गया—जो कुछ भी हमारे पास है, वह उनका दिया हुआ है और एक दिन सब कुछ यहीं रह जाएगा।
उसी दिन मैंने मन ही मन संकल्प लिया—
"अब मेरा जीवन केवल मेरे लिए नहीं, बल्कि प्रभु, समाज और मानवता की सेवा के लिए होगा।"
मैंने छोटे-छोटे कार्यों से शुरुआत की। लोगों की समस्याएँ सुनीं, ज़रूरतमंदों की सहायता की, युवाओं को जोड़ने का प्रयास किया, धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हुआ। हर सेवा के बाद ऐसा लगा कि देने वाला मैं नहीं, बल्कि प्रभु हैं; मैं तो केवल एक माध्यम हूँ।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि प्रभु ने मेरी कल्पना से कहीं अधिक दिया। सैकड़ों नहीं, हजारों लोग प्रेम और विश्वास के साथ जुड़े। अनेक सामाजिक और धार्मिक कार्यों में साथ मिला। हर नया परिवार मेरे लिए एक रिश्ते जैसा बन गया।
मैं कोई संत, महात्मा या बड़ा समाजसेवी नहीं हूँ। मैं भी आपकी तरह एक साधारण व्यक्ति हूँ, जिसने बस इतना निर्णय लिया कि शिकायत कम और सेवा अधिक करनी है।
मेरा विश्वास है—
किसी भूखे को भोजन देना, किसी निराश व्यक्ति को हिम्मत देना, किसी बुजुर्ग का सम्मान करना, किसी युवा को सही दिशा देना और सनातन संस्कृति की सेवा करना—यही सच्ची पूजा है।
यदि मेरे किसी कार्य, किसी विचार या किसी प्रयास से आपके मन में सेवा का भाव जागता है, तो यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
आइए, हम सब मिलकर ऐसा समाज बनाएँ जहाँ धर्म केवल मंदिरों तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे व्यवहार, सेवा और संस्कारों में दिखाई दे।
नर सेवा ही नारायण सेवा है।
आपका अपना,
नरेन्द्र उपाध्याय