08/12/2025
आस्था और असलियत के बीच पिसता गौ वंश
धर्म की आड़ में जारी है पाखंड , मर रहा है गौ वंश जिम्मेदार कौन ? जी हां मैं बात कर रहा हूं गौ माता की । चाहे युगों की बात की जाए या कालों की, धर्म की चर्चा हो या संस्कृति की — हर युग, हर परंपरा में गाय को सर्वोच्च और पवित्र स्थान प्राप्त रहा है। हिन्दू धर्म में गाय को न केवल पूजनीय माना गया है, बल्कि ‘माता’ का आदरपूर्ण दर्जा भी दिया गया है।
यह सर्वविदित तथ्य है कि गाय का सर्वप्रथम उल्लेख सतयुग में मिलता है, जब कामधेनु (देवगाय) का प्राकट्य हुआ था। इसके पश्चात त्रेता और द्वापर युगों में गाय धर्म, करुणा और समृद्धि का प्रतीक बनकर प्रतिष्ठित रही।
ऋग्वेद के छठे मंडल के 28वें सूक्त की पहली ही ऋचा में गाय को “अघ्न्या” अर्थात जिसकी हिंसा न की जाए, या जिसे मारना पाप है, के रूप में वर्णित किया गया है।
अथर्ववेद (मंडल 11, सूक्त 1, ऋचा 34) में भी गाय की महिमा का उल्लेख मिलता है।
यदि हम महाभारत का अवलोकन करें तो अनुशासन पर्व (अध्याय 83) में भीमसेन और युधिष्ठिर के संवाद में गौदान को सर्वश्रेष्ठ दान बताया गया है। इसी तरह श्रीमद्भागवत पुराण, पद्म पुराण, गरुड़ पुराण तथा स्कंद पुराण में भी गाय की महिमा का विस्तृत वर्णन है। स्कंद पुराण में तो स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “गावः सर्वदेवमयाः” — *अर्थात गाय में समस्त देवताओं का वास है।*
किन्तु विडंबना देखिए — आज के आधुनिक युग, जिसे कलियुग का प्रतीक कहा जाता है, में गाय की स्थिति अत्यंत दयनीय है।
आधुनिकता की चकाचौंध, अधिक पाने की लालसा और निजी स्वार्थों के वशीभूत होकर मनुष्य ने उस गाय को, जिसे शास्त्रों ने “माता” कहा,जिसका दूध, गोबर और गौ मूत्र भी मानव के लिए औषधि का काम करता है, को भी सड़कों और दर दर भटकने के लिए मजबूर कर दिया है । यहीं कारण है कि गौ माता आज या तो शास्त्रों में पूज्य है या फिर केवल दिखावे का प्रतीकों तक सीमित होती जा रही है। अब गाय का सम्मान केवल गौ-अष्टमी, गोवर्धन जैसे तीज त्यौहारों, यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों तक ही सिमट गया है, जबकि उसके प्रति वास्तविक करुणा, सेवा और संरक्षण की भावना तो मानो कहीं लुप्त होती जा रही है।
वर्तमान समय में गाय की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। गाय को मातृत्व, धर्म और करुणा का प्रतीक माना गया, वही गाय आज सड़कों पर भूख, प्यास और उपेक्षा से तड़पती हुई दिखाई देती है। हजारों गौवंश खुले में भटक रहे हैं — न उनके लिए सुरक्षित आश्रय हैं, न पर्याप्त भोजन और चिकित्सा की व्यवस्था। विडंबना यह भी है कि जिस गौमाता के नाम पर हमारा समाज धर्म और संस्कृति की दुहाई देता है, उसी को आज राजनीति का केंद्रबिंदु बना दिया गया है। संसद से लेकर सड़क तक बड़े बड़े मंचों तक गाय की चर्चा तो सब करते है, पर उसकी वास्तविक स्थिति के सुधार पर मौन पसरा है। कुछ अपवाद छोड़ दिए जाए तो गौ संरक्षण के नाम पर बनने वाली योजनाएँ और घोषणाएँ सिर्फ सरकारी फाइलों और भाषणों तक सीमित हैं। गौ शालाएं भी खुल रही है पर कुछ को छोड़ दिया जाए तो कई केवल गोरख धंधे का खेल का हिस्सा बन कर गई है । तो अधिकांश मानो शासकीय योजनाओं से केवल पोषण प्राप्त करने के लिए ही संचालित है । ऐसा भी नहीं है कि हम , आप हमारा समाज प्रबुद्ध लोग, क्षेत्रीय एवं प्रदेशीय नेता और राज नेता इन तथ्यों से अज्ञात है, पर सब के सब मौन है । ऐसे में एक जवलंत सवाल जो हर किसी को अपने आप से पूछने की जरूरत है कि आखिर माता स्वरूपा गौ माता की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कौन है ? साथ ही प्रश्न यह भी उठता है कि — जिस देश, संस्कृति और समाज में गाय को माता का स्थान दिया गया, जहाँ उसे धर्म, करुणा और समृद्धि का प्रतीक माना गया, वहीं आज सड़कों पर उपेक्षित, भूखी-प्यासी और असहाय क्यों दिखाई देती है?
इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है, क्योंकि इसके पीछे अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और प्रशासनिक कारण जुड़े हुए हैं। तो आइए मेरी समझ अनुसार गाय की वर्तमान दुर्दशा के प्रमुख कारण को समझने का प्रयास करते है ।
1. पहला कारण है पश्चात् सभ्यता और संस्कृति की ओर बढ़ता रुझान –
आधुनिक समाज ने पश्चिमी जीवनशैली की नकल में अपनी संवेदनशील और सांस्कृतिक जड़ों से दूरी बना ली है। जहाँ प्राचीन काल में गाय को परिवार का हिस्सा माना जाता था, गौ वंश को समृद्धि का प्रतीक माना चाहे युगों की बात की जाए या कालों की, धर्म की चर्चा हो या संस्कृति की — हर युग, हर परंपरा में गाय को सर्वोच्च और पवित्र स्थान प्राप्त रहा है। हिन्दू धर्म में गाय को न केवल पूजनीय माना गया है, बल्कि ‘माता’ का आदरपूर्ण दर्जा भी दिया गया है।
यह सर्वविदित तथ्य है कि गाय का सर्वप्रथम उल्लेख सतयुग में मिलता है, जब कामधेनु (देवगाय) का प्राकट्य हुआ था। इसके पश्चात त्रेता और द्वापर युगों में गाय धर्म, करुणा और समृद्धि का प्रतीक बनकर प्रतिष्ठित रही।
ऋग्वेद के छठे मंडल के 28वें सूक्त की पहली ही ऋचा में गाय को “अघ्न्या” अर्थात जिसकी हिंसा न की जाए, या जिसे मारना पाप है, के रूप में वर्णित किया गया है।
अथर्ववेद (मंडल 11, सूक्त 1, ऋचा 34) में भी गाय की महिमा का उल्लेख मिलता है।
यदि हम महाभारत का अवलोकन करें तो अनुशासन पर्व (अध्याय 83) में भीमसेन और युधिष्ठिर के संवाद में गौदान को सर्वश्रेष्ठ दान बताया गया है। इसी तरह श्रीमद्भागवत पुराण, पद्म पुराण, गरुड़ पुराण तथा स्कंद पुराण में भी गाय की महिमा का विस्तृत वर्णन है। स्कंद पुराण में तो स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “गावः सर्वदेवमयाः” — *अर्थात गाय में समस्त देवताओं का वास है।*
किन्तु विडंबना देखिए — आज के आधुनिक युग, जिसे कलियुग का प्रतीक कहा जाता है, में गाय की स्थिति अत्यंत दयनीय है।
आधुनिकता की चकाचौंध, अधिक पाने की लालसा और निजी स्वार्थों के वशीभूत होकर मनुष्य ने उस गाय को, जिसे शास्त्रों ने “माता” कहा,जिसका दूध, गोबर और गौ मूत्र भी मानव के लिए औषधि का काम करता है, वहीं गौ माता आज कागज़ों और शास्त्रों में केवल दिखावे का प्रतीकों तक सीमित होती जा रही है। अब गाय का सम्मान केवल गौ-अष्टमी, गोवर्धन जैसे तीज त्यौहारों, यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों तक ही सिमट गया है, जबकि उसके प्रति वास्तविक करुणा, सेवा और संरक्षण की भावना तो मानो कहीं लुप्त होती जा रही है।
वर्तमान समय में गाय की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है।
कभी जिसे मातृत्व, धर्म और करुणा का प्रतीक माना गया, वही गाय आज सड़कों पर भूख, प्यास और उपेक्षा से तड़पती हुई दिखाई देती है। हजारों गौवंश खुले में भटक रहे हैं — न उनके लिए सुरक्षित आश्रय हैं, न पर्याप्त भोजन और चिकित्सा की व्यवस्था। विडंबना यह भी है कि जिस गौमाता के नाम पर धर्म और संस्कृति की दुहाई दी जाती है, उसी को आज राजनीति का केंद्रबिंदु बना दिया गया है।
संसद से लेकर सड़क मंचों तक गाय की चर्चा तो बहुत होती है, पर उसकी वास्तविक स्थिति पर मौन पसरा है। कुछ अपवाद छोड़ दिए जाए तो गौ संरक्षण के नाम पर बनने वाली योजनाएँ और घोषणाएँ सिर्फ सरकारी फाइलों और भाषणों तक सीमित हैं। गौ शालाएं तो खुल रही है पर कुछ को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश केवल गोरख धंधे का खेल बन कर गई है । अधिकांश तो मानो शासकीय योजनाओं से केवल पोषण प्राप्त करने के लिए ही संचालित है । ऐसा भी नहीं है कि हम , आप हमारा समाज प्रबुद्ध लोग, क्षेत्रीय एवं प्रदेशीय नेता और राज नेता इन तथ्यों से परिचित नहीं है, पर सब के सब मौन है । ऐसे में एक जवलंत सवाल जो हर किसी को अपने आप से पूछने की जरूरत है कि आखिर माता स्वरूपा गौ माता की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कौन है ? साथ ही प्रश्न यह भी उठता है कि — जिस देश, संस्कृति और समाज ने गाय को माता का स्थान दिया गया, वहीं आज सड़कों पर उपेक्षित, भूखी-प्यासी और असहाय घूम रही है आखिर क्यों ?
जितना संवेदन शील प्रश्न उत्तर है, इसके पीछे के कारण अनेकों अनेक है जिनके साथ सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और प्रशासनिक उपेक्षा सबसे प्रमुख कारक हैं। तो आइए मेरी समझ अनुसार गाय की वर्तमान दुर्दशा के प्रमुख कारण ओर कारक को समझने का प्रयास करते है -
पहला कारण है पश्चात् सभ्यता और संस्कृति की ओर बढ़ता रुझान –
आधुनिक समाज ने पश्चिमी जीवनशैली की नकल में अपनी संवेदनशील सांस्कृतिक जड़ों से दूरी बना ली है। जहाँ प्राचीन काल में गाय को परिवार का हिस्सा माना गया, गौ वंश को समृद्धि का प्रतीक माना । प्राचीन समय में वैवाहिक रिश्ते जोड़ते समय भी गौ वंश की संख्या को सम्पन्नता का पर्याय समझा जाता था वहीं गाय आज धार्मिक ग्रंथों में पूज्य और वास्तविकता में केवल पशु समझी जाने लगी है।
दूसरा बढ़ा कारण है धार्मिक और आध्यात्मिक मार्ग से विचलित समाज – पहले गौसेवा धर्म और करुणा का मार्ग था, अब धर्म एवं कर्मकांड दिखावा और प्रदर्शन तक सीमित हो गया है। भावना कही खो गई, केवल परंपरा रूपी झूठा एवं खोखला खोल रह गया।
तीसरा कारण जंगल और चराई भूमि पर मानवीय अतिक्रमण –
बढ़ते शहरीकरण और भूमि कब्जों ने प्राकृतिक चरागाहों को निगल लिया है। नतीजन गौवंश सड़कों पर भटकने को विवश है और कचरा व प्लास्टिक खाने को मजबूर है। दुर्घटना का शिकार एवं कारण बन रहा है।
चौथा कारण आधुनिकता की अंधी दौड़ –विज्ञान और विकास के नाम पर मनुष्य ने पारंपरिक कृषि और पशुपालन तंत्र को त्याग दिया। प्राचीन काल में जहां गाय के साथ साथ उसका बछड़ा की भी अपनी उपयोगिता थी क्यों कि खेतों में हल और परिवहन के गाड़ी के इसका उपयोग होता था परन्तु वर्तमान में गाय केवल दूध देने तक उपयोगी और उसके बछड़े को भार समझा जाने लगा है।
पांचवां कारण है पैकेज उत्पादों का बढ़ता केंद्रीकरण –
एक समय था जब घर में गौ वंशज थे इसलिए दूध दही और घी की उपलब्धता घर घर में सहज थी परंतु आज बाजार में सहज मिलने वाले पैक दूध, घी और पैकेज कृत्रिम और सिंथेटिक उत्पादों ने घरेलू गौपालन की परंपरा को लगभग समाप्त कर दिया है।इससे गाय का आर्थिक और सामाजिक महत्व कम होता गया। नतीजन शहरी क्षेत्रों में गौ वंश पालने की परंपरा लगभग खत्म हो चला है साथ ही साथ ग्रामीण क्षेत्रों में गौ पालन से परहेज किया जाने लगा है ।
छठा कारण देश में लचीली कानून व्यवस्था, और उसके पालन में ढिलाई –
हमारे देश में गौसंरक्षण के लिए कई कानून बने, लेकिन उनका वास्तविक पालन न के बराबर है। परिणाम स्वरूप अवैध बूचड़खाने और अवैध गौ तस्करी आज भी जारी हैं,प्रशासनिक ढिलाई इस समस्या को ओर भी गंभीर बना देती है। कई बार तो प्रतीत होता है मानो शासन-प्रशासन में बैठे जिम्मेदार आँख मूँदे बैठे हुए है या राजनैतिक दबाव के चलते आंख मूँदेने को मजबूर है कारण कुछ भी है गौ वंश लचीले कानून व्यवस्था के भेंट चढ़ रहा है ।
सातवां कारण गौपालन का आर्थिक अवमूल्यन –
केवल दूध देने वाली गाय को “लाभकारी” और बाँझ या बूढ़ी गाय को “बेकार” मान लिया गया है। यह सोच हमारी करुणा और जिम्मेदारी की गिरावट का प्रमाण है।
आठवां गोशालाओं की दुर्दशा और प्रबंधन की कमी –
देश की अनेक गोशालाएँ केवल कागज़ों में चल रही हैं। जहाँ चल भी रही हैं,उनमें से अधिकांश में न पर्याप्त चारा है, न देखभाल की व्यवस्था। कई जगह गौ शालाएं केवल चंदा, दिखावा और कमाई का साधन बना ली गई हैं।
नौवां कारण कृषि से पशुपालन का टूटता रिश्ता –प्राचीन काल में जहां गाय के साथ साथ उसका बछड़ा की भी अपनी उपयोगिता होती था लेकिन यंत्रीकरण और रासायनिक खेती गौ वंश का खेती और किसान से संबंध तोड़ दिया है। किसान के लिए गाय अब उत्पादन का साधन नहीं, खर्च का कारण बन गई है।
दसवां कारण संवेदना का अभाव और सामाजिक उदासीनता –
लोग घायल या भूखी गाय को देखकर भी चुप रहते हैं । यह मानवता का मौन अपराध है, जो समाज की संवेदनहीनता को उजागर करता है।
ग्यारहवां कारण तेजी से बढ़ता शहरीकरण और यातायात –
ओर अधिक पाने की लालसा और निजी स्वार्थ की प्रवृत्ति के कारण चरागाह लगभग समाप्त हो गए हैं, बढ़ती जनसंख्या के कारक सड़को और भवनों की मांग बढ़ रही हैं। नतीजन चाहगाह भूमि के साथ साथ वन भूमि पर मानवीय अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है परिणाम स्वरूप गौ वंश खाने की तलाश में दर बदर भटकते हुए दुर्घटनाओं की शिकार हो रही हैं।निसंदेह हाल ही के वर्षों में सड़क दुर्घटनाओं में वृद्धि हुई है लेकिन अधिकांश सड़क दुर्घटनाओं में दुर्घटना का कारण गौ वंश या कहे आवारा मवेशियों को ही दुर्घटना और मानवीय मृत्यु का कारण माना जाता है लेकिन एक प्रश्न यह भी है कि यदि मानवीय मृत्यु और दुर्घटनाओं का कारण यदि ये मूक गौ वंश है तो फिर हर दिन तेज रफ्तार और आधुनिक आविष्कारों के चलते जान गवां रहे निर्दोष मूक की मृत्यु का जिम्मेदार भी मानव समाज ही है लेकिन दुर्भाग्य की बात ये है मानव अधिकार आयोग की तरह गौ अधिकार आयोग का भारतीय संविधान में कोई प्रावधान नहीं है और इसकी कोई चर्चा भी नहीं करना चाहता ।
बारहवां कारण गौ उत्पादों के वैज्ञानिक पुनर्मूल्यांकन की कमी –
“पंचगव्य”, “गोबर गैस”, “ऑर्गेनिक खाद” जैसी अवधारणाएँ वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत उपयोगी हैं, परंतु इन्हें नीति और बाजार समर्थन नहीं मिल पा रहा। यदि सही दिशा में और उचित प्रोत्साहन अभियान के साथ साथ जैविक कृषि को बढ़ावा संबंधी योजनाएं एवं उनका सही ढंग से क्रियान्वन तथा जैविक खेती अपनाने वाले कृषकों को अपनी जैविक उपज पर उचित मूल्य की गारंटी या MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) आधारित सहयोग मिले तो न केवल कृषि भूमि के स्वास्थ्य में सुधार होगा बल्कि गाय फिर से आर्थिक और पारिस्थितिक समृद्धि का केंद्र बन जाएगी। इसका अभूतपूर्व असर मानव समाज के स्वास्थ्य सुधार पर भी पड़ेगा ।
जरूरत है निम्न व्यावहारिक सुधारों को लागू करके गौ वंश की दुर्दशा और स्थिति में सुधार लाया जा सकता हैं - सर्वप्रथम समय आ गया हैं कि हर ग्राम पंचायत में चरागाह भूमि कागज़ की वजह , जमीनी स्तर चिन्हित कर अतिक्रमण मुक्त करने की जरूरत है। चरागाह भूमि पर किसी भी प्रकार का निर्माण अपराध हो। हर जिलों में गोचर भूमि संरक्षण समिति बने।
इसके अलावा गोशाला मॉडल में परिवर्तन की भी आवश्यकता है गौशालाओं के दान और सब्सिडी पर निर्भर होने रहने की वजह आत्मनिर्भर बनाने की जरूरत है। गोबर से खाद उत्पादन,
गोबर से बनी ईंटें, गमले, प्लाइवुड, बायोगैस संयंत्र,ऑर्गेनिक कम्पोस्ट बना कर गाय को “आर्थिक रूप से उपयोगी” बना कर, कभी हद तक गौ वंश की दुर्दशा को सुधारा जा सकता हैं । साथ ही साथ यदि सरकारें जैविक उत्पादों और खेती को MSP आधारित प्रोत्साहन या सब्सिडी घोषित कर दे तो निश्चित ही हर किसान गौ पालन प्रारंभ करेगा और गोशाला “आर्थिक उद्योग” बनेगी
साथ ही साथ सरकारों को चाहिए कि गौ-तस्करी पर शून्य सहिष्णुता की नीति को दृढ़ता ने लागू किया जाए।इसके लिए अंतरराज्यीय स्टॉपिंग पॉइंट, तेज़ अदालत (Fast-track court) की स्थापना चर्चा की वजह जमीनी स्तर पर की जाए ।
इसके अलावा जरूरत है स्कूल और कॉलेज में गौ-शिक्षा अध्याय को जोड़ा जाए इससे बच्चों में करुणा पैदा होगी। और गौ वंश का भविष्य बदलेगा।
उक्त सभी सुधारों के साथ आवश्यक है कि पॉलिथीन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा कर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए । यदि हम गौ वंश की मृत्यु के आंकड़ों और रिसर्च पर ध्यान दे तो हर 10 में से 7 गाय की मृत्यु पेट में प्लास्टिक के कारण हो रही है।
इसलिए आज भावना और व्यवस्था दोनों की आवश्यकता है। भावना करुणा की, और व्यवस्था कार्रवाई की। गाय की रक्षा कोई व्यक्ति, संस्था या सरकार अकेले नहीं कर सकती। यह “समाज की संयुक्त जिम्मेदारी” है। जब हम स्वयं आगे बढ़ेंगे, तभी परिवर्तन की शुरुआत होगी। तो आइए संकल्प लें —
गाय को धर्म का विषय नहीं, दायित्व का हिस्सा बनाएँ।
उसे राजनीति का मुद्दा नहीं, मानवता का मिशाल बनाएँ।
और यह सुनिश्चित करें कि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ गाय को केवल शास्त्रों में पूज्य न पढ़ें, बल्कि सड़कों पर सुरक्षित, स्वस्थ और सम्मानित देख सकें।
लेखक
आकाश जैन
सहायक टेक्नीशियन, भारतीय रेल एवं
सदस्य श्रमदान दल गंजबासौदा।