03/09/2026
आज के वातानुकूलित कमरों में बैठकर, स्वतंत्रता की आधुनिक परिभाषाओं का सहारा लेकर सदियों पुराने इतिहास पर उँगली उठाना बेहद आसान और सुविधाजनक शगल बन चुका है। लेकिन जो लोग #जौहर जैसी रोंगटे खड़े कर देने वाली ऐतिहासिक घटना को कायरता का नाम देते हैं, वे दरअसल उस युग की क्रूर वास्तविकताओं और #स्वाभिमान एवं #सतीत्व शब्द की गहराई से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। इतिहास को समझने के लिए केवल डिग्रियां नहीं बल्कि उस कालखंड की विवशताओं की आग में खुद को वैचारिक रूप से तपाने का कलेजा चाहिए।
जरा सोचिए, दहकते हुए अंगारों के सामने खड़े होकर निडरता के साथ काल की आँखों में आँख डालना मृत्यु को साक्षात अपनी आँखों में देखना और फिर भी विचलित न होना क्या यह किसी कायर का कृत्य हो सकता है? जलती हुई आग में कूदने के लिए केवल शरीर की नहीं आत्मा की उस सर्वोच्च शक्ति की आवश्यकता होती है जिसे आज का उपभोक्तावादी समाज कभी नहीं समझ सकता। यदि यह केवल जीवन समाप्त करने का भय होता, तो इतिहास में विष या किसी शांत मृत्यु के विकल्प चुने जाते। परंतु अग्नि को चुनना इस बात का प्रमाण था कि वे वीरांगनाएँ मृत्यु से डरी नहीं थीं, बल्कि उन्होंने अपनी पवित्रता और अस्मिता को अमरत्व देने का मार्ग चुना था।
उस दौर के युद्ध केवल जमीनों को जीतने के लिए नहीं लड़े जाते थे बल्कि वे सामने वाले की संस्कृति, मर्यादा और स्त्रियों की अस्मिता को मटियामेट करने के क्रूर इरादे से लड़े जाते थे। पराजय के बाद जो अंधकारमयी भविष्य इंतजार कर रहा था गुलामी, लांछन और पल-पल मरती हुई गरिमा वह शारीरिक मृत्यु से हजार गुना अधिक भयावह था। ऐसे में किसी आतातायी के सामने घुटने टेकने के बजाय खुद को पंचतत्व में विलीन कर देना कोई आत्मसमर्पण नहीं बल्कि उस दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ वीरांगना नारियों का सबसे प्रचंड और अंतिम प्रतिशोध था।
भारतीय इतिहास, केवल पुरुषों के बाहुबल और तलवारों की खनक तक सीमित नहीं है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब संकट की घड़ियाँ आईं, वीरांगनाओं ने महलों के कोमल अंतःपुर से निकलकर नियति को बदलने वाली शक्ति बनीं। रानी दुर्गावती का रणक्षेत्र में अंतिम सांस तक लड़ना,पन्ना धाय का अपने कलेजे के टुकड़े का बलिदान देना,हाड़ी रानी का स्वाभिमान के लिए हंसते-हंसते अपना शीश काट देना , वीरांगना झलकारी बाई अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुवे और मौत के घाट उतारते हुवे वीरगति को प्राप्त हो जाना, वीरांगना उदा देव पासी का अंग्रेजी हुकूमत की जड़ों को उखाड़ते हुवे शहीद हो जाना और वीरांगना कुईली का अंग्रेजी हुकूमत के सामने चट्टान की तरह अडिग होकर लड़ते हुवे शहादत को प्राप्त होना—ये सब इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि उनका साहस किसी भी युग के पुरुषों से कमतर नहीं था।
जौहर तो हमारी अस्मिता,सतीत्व और पतिव्रता का प्रतीक
है, चितौड़गढ़ का जौहर ही तो है जो आज भी नारीयों को अपने सतीत्व अपनी अस्मिता और पतिव्रता को जीवित रखने का संदेश देता है।