04/07/2024
संतों, धर्माचार्यो, धर्मप्रचारकों की सोशल मीडिया में हो रही कटु आलोचना के बीच में भी मेरी श्रद्धा बागेश्वर धाम सरकार धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी पर बनी हुई है। और मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि मेरी यह श्रद्धा सदैव बनी रहे।
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के दो रूप हैं। एक रूप है बागेश्वर बालाजी की कृपा से भक्तों की पीड़ा हरने वाले चमत्कारी संत का, जिनपर अब करोड़ों लोगों का भरोसा है। और दूसरा रूप है एक धर्म प्रचारक का जो बड़े शहरों के वातानुकूलित हॉल की गद्दी से लेकर सुदूर वन के संसाधन हीन गांवों तक समान भाव से घूम कर लोगों को धर्म से जोड़े रखने का प्रयास करते हैं। मुझे उनका यह दूसरा स्वरूप अधिक प्रिय है, मुझे इस दूसरे स्वरूप पर अधिक भरोसा है।
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। वे सनातन के अंदर के किसी अन्य सम्प्रदाय का विरोध नहीं करते बल्कि हर सम्प्रदाय का समान आदर करते हैं। वे संतों के चरणों मे बालक भाव से झुक जाते हैं, और स्वयं को सदैव छोटा मानते हैं। यह अद्भुत गुण है। भारतीय संतों में यह गुण अब दुर्लभ होता जा रहा है।
दुनिया उनके पास चमत्कारों की आशा में जाती है, पर वे हमेशा कहते हैं कि मेरे पास कोई चमत्कार नहीं। कृपा जो है वह बागेश्वर बालाजी की है, उस पवित्र पीठ की है। यह सचमुच बहुत बड़ी बात है, वरना इसी देश में स्वयं को परमात्मा बताने वालों की संख्या भी कम नहीं।
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने कभी महाज्ञानी होने का दावा नहीं किया। उनमें बालकों सी चंचलता है, भोलापन है। उनका भोलापन भी लोगों को मोहित करता है।
पिछले साल दो साल में उनका जैसा मीडिया ट्रायल हुआ वैसा संसार के किसी धर्मगुरु या धर्मप्रचारक का नहीं हुआ। सनातन से बाहर के किसी धर्मप्रचारक तक तो मीडिया पहुँच भी नहीं पाती, पर धीरेंद्र बाबा से हजार तरह के प्रश्न पूछे गए। उन प्रश्नों की खनखनाती तलवारों के बीच से वे जिस सौम्यता के साथ बार बार बाहर निकलते रहे, वह उनकी अद्भुत मेधा का प्रमाण है।
तमाम घटनाओं दुर्घटनाओं के बाद भी धर्मगुरु हर संस्कृति की आवश्यकता होते हैं। उनके बिना काम नहीं चल सकता। भारत जैसे विविधताओं से भरे देश और सनातन व्यवस्था में तो उनकी आवश्यकता और अधिक है, क्योंकि वे ही सामान्य जन को एक साथ बांध सकते हैं। हाँ सभ्य समाज उनसे धर्म और नैतिकता की उम्मीद अवश्य रखता है। वर्तमान समय में हम उनसे यह भी उम्मीद रखते हैं कि वे अपने समय की ज्वलंत समस्याओं पर भी मुखर हों। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री इन उम्मीदों पर खरे उतरते दिखते हैं।
मैं स्वयं यात्राओं से बचता हूँ। यह मेरा आलसी स्वभाव है। मुझे भीड़ से भी परेशानी होती है, जिसके कारण मैं किसी मेला उत्सव आदि में भी नहीं जाता। यह भी सम्भव है कि अपने आलसी स्वभाव के कारण मैं कभी भी धीरेंद्र शास्त्री जी की सभा में न जा सकूं, पर वे मुझे प्रिय रहेंगे। मेरी श्रद्धा बनी रहेगी।
आज शास्त्री जी का जन्मदिवस है। वे जैसे हैं, ईश्वर उन्हें वैसे ही बनाये रखें। उनपर देवकृपा बनी रहे। जय हो
सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।