Unofficial: Dr Satyapal Singh Meena, IRS

Unofficial: Dr Satyapal Singh Meena, IRS "I AM as SOCIETY Is. I can't be happy when Others are not". Founder of & . "Full of Gratitude" Governor of Madhya Pradesh Smt. sbgbteam.com

IRS 2007, Investigator, Taxman, Innovator, Learner, Staunch Believer of Positive Thinking with Growth-Oriented & Problem-Solving Mindset. A staunch believer and propagator of positive thinking, an IRS officer of the 2007 batch, the man principally responsible for transformation of his native backward village (Dhanora in Rajasthan) into India’s first ‘Smart Village’, and for running a widely apprec

iated youth campaign called “Soch Badalo, Gaon Badalo” (SBGBT) in more than 100 villages driven by the “payback to society” concept. These efforts have been awarded by the Hon’ble Prime Minister Shri Narendra Modi at the Vigyan Bhawan in New Delhi, H.E. Anandi Ben Patel, and the State Government of Rajasthan. An ardent researcher with a passion for humanitarian causes, he also holds a doctorate in International Relations amongst the many credentials to his credit. He is a decorated officer of the Indian Revenue Service office, and has been honoured with many departmental awards for outstanding contributions throughout his career, especially in the field of Investigation. Areas of specialization -Banking sector, International Taxation, Transfer Pricing and Investigation. SBGBT is running various campaigns for public awareness, environment, swacchata, and other rural development works, and has recently constructed (entirely through public participation and voluntary funding) the ‘Utthan Bhawan’ wherein “Utthan Coaching”, “Utthan Library” and skill development centers are being run. The “Utthan Patrika” is a yearly publication which covers the various activities carried out by the SBGBT.

04/03/2026

*"जीवन को केवल पीछे देखकर समझा जा सकता है, लेकिन इसे आगे की ओर देखकर ही जिया जाना चाहिए।" *

मानव जीवन मूलतः अनिश्चितता, जोखिम और समस्याओं से घिरा हुआ है। इस अस्तित्व का सबसे जटिल विरोधाभास समय के साथ हमारे संबंधों में निहित है। उन्नीसवीं शताब्दी के डेनिश दार्शनिक और अस्तित्ववाद के जनक सोरेन कीर्केगार्ड ने इस द्वंद्व को एक कालजयी पंक्ति में पिरोया है। "जीवन को केवल पीछे देखकर समझा जा सकता है, लेकिन इसे आगे की ओर देखकर ही जिया जाना चाहिए।" यह कथन मात्र दार्शनिक अवलोकन नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान, निर्णय-प्रक्रिया और मानसिक स्वास्थ्य को समझने की कुंजी है। कीर्केगार्ड के अनुसार समझ अतीत की ओर देखकर विकसित होती है, जबकि जीवन का वास्तविक प्रवाह भविष्य की ओर बढ़ता है। यही विरोधाभास अनिश्चितता के बीच निर्णय लेने को मानव अस्तित्व की अनिवार्य शर्त बना देता है।

कीर्केगार्ड का यह कथन दो आयामों के तनाव को उजागर करता है। 'जानने' का शास्त्र और 'जीने' का शास्त्र। मनुष्य एक अर्थ-निर्माता प्राणी है। जब हम किसी संकट से गुजर रहे होते हैं, तो वह अराजक और बेतरतीब लगता है। भावनाओं का ज्वार इतना तीव्र होता है कि हम बड़ी तस्वीर नहीं देख पाते। केवल जब समय बीतता है, तब हम बिखरी कड़ियों को जोड़ पाते हैं और कार्य-कारण का संबंध समझ आता है। दूसरी ओर, जीवन रुकता नहीं। हमारे पास पूर्ण जानकारी या भविष्य का नक्शा कभी नहीं होता, फिर भी निर्णय लेने पड़ते हैं। मनुष्य निश्चितता चाहता है, लेकिन जीवन केवल संभावना देता है। यदि कोई यह प्रतीक्षा करता रहे कि पहले जीवन का पूर्ण अर्थ समझ आ जाए, तो वह कभी जीवन जी ही नहीं पाएगा।

कीर्केगार्ड के दर्शन में समय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। मनुष्य वर्तमान में जीता है, परंतु अनुभवों का अर्थ अतीत की ओर लौटकर ही स्पष्ट होता है। जब कोई असफलता, नैतिक द्वंद्व या व्यक्तिगत संकट से गुजरता है, तब उस स्थिति का पूर्ण अर्थ तुरंत समझ नहीं आता। समय बीतने पर वही व्यक्ति समझ पाता है कि वे घटनाएँ उसके व्यक्तित्व और जीवन-दृष्टि को कैसे गढ़ रही थीं। इस प्रकार समस्याएँ केवल बाधाएँ नहीं, बल्कि आत्म समझ निर्मित करने वाली प्रक्रियाएँ भी हैं।

आधुनिक मनुष्य की अधिकांश मानसिक पीड़ा चिंता, तनाव, भय इसी अंतराल से उत्पन्न होती है। हम भविष्य के लिए अतीत जैसे स्पष्ट ज्ञान की मांग करते हैं। हम चाहते हैं कि आज ही पता चल जाए कि निर्णयों का परिणाम क्या होगा। जब यह अग्रिम ज्ञान नहीं मिलता, तो चिंता घेर लेती है। कीर्केगार्ड ने कहा था "चिंता स्वतंत्रता का चक्कर है।" स्वतंत्रता का अर्थ है कि अनेक संभावनाएँ हैं, परंतु चुनाव स्वयं करना है और परिणाम अनिश्चित हैं। यही स्थिति भय को जन्म देती है।

कीर्केगार्ड के अनुसार समस्याएँ केवल बाहरी नहीं, आंतरिक स्थिति से भी जुड़ी होती हैं। जब व्यक्ति अपने मूल्यों और पहचान के बारे में स्पष्ट नहीं होता, तब गहरा अस्तित्वगत संकट उत्पन्न होता है। यह संकट दो दिशाओं में ले जा सकता है या तो व्यक्ति निर्णय टालता है, जिम्मेदारी से भागता है और सतही ढंग से जीने लगता है; या फिर वह संकट का सामना करता है और उसे आत्म समझ के अवसर के रूप में स्वीकार करता है। कीर्केगार्ड के अनुसार दूसरा मार्ग ही प्रामाणिक जीवन की ओर ले जाता है। मनुष्य का अस्तित्व स्थिर नहीं, वह निर्णयों के माध्यम से स्वयं को लगातार निर्मित करता है। प्रत्येक कठिन परिस्थिति में लिया गया निर्णय केवल समाधान नहीं, बल्कि व्यक्तित्व को आकार देने वाला कर्म भी है।

इस दर्शन को जीवन में उतारकर मानसिक दृढ़ता बढ़ाई जा सकती है। पहला कदम यह स्वीकार करना है कि वर्तमान में जीवन का धुंधला दिखना स्वाभाविक है।अभी समझ में न आना विफलता नहीं, समय की प्रकृति है। दूसरा, भविष्य को नियंत्रित करने के बजाय विश्वास की आवश्यकता है।चाहे स्वयं की क्षमता पर हो या जीवन की व्यवस्था पर। भले ही नक्शा न हो, दिशा सूचक यंत्र अवश्य है। तीसरा, अतीत को 'लंगर' बनाएँ, 'जंजीर' नहीं। पीछे मुड़कर देखें कि पहले भी असफलता आई, उससे उबरे भी और सीखे भी; यही समझ आगे बढ़ने का ईंधन है। चौथा, चूँकि परिणाम हाथ में नहीं और अर्थ अभी स्पष्ट नहीं, तो केवल वर्तमान कर्म बचता है। भगवद गीता का निष्काम कर्म भी यही सिखाता है। परिणाम की चिंता छोड़कर अगले कदम पर ध्यान दें। पूरे जीवन को एक साथ सुलझाने की कोशिश न करें, बस आज का दिन जीएं।

कीर्केगार्ड का यह विचार हमें याद दिलाता है कि जीवन गणित का सवाल नहीं जिसका उत्तर पहले से मौजूद हो; यह एक चित्र है जो हर पल बनाया जा रहा है। स्पष्टता साहस की पूर्व शर्त नहीं, बल्कि साहस स्पष्टता का जनक है। पहले जीना पड़ता है, चलना पड़ता है, गिरना पड़ता है। तभी रास्ता समझ आता है। जीवन का अर्थ पूर्वनिर्धारित नहीं होता; वह अनुभवों, संघर्षों और चुनावों से धीरे-धीरे निर्मित होता है। जब भी जीवन उलझा लगे, तो धैर्य रखें आप अभी जीवन के बीच के दृश्य में हैं। जब भविष्य में पीछे मुड़कर देखेंगे, तो यह सब एक सुंदर और अर्थपूर्ण यात्रा प्रतीत होगा। तब तक एकमात्र विकल्प और सबसे साहसी कार्य आगे की ओर देखना और कदम बढ़ाना है।
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“पसीने की हर बूंद में बसा है उज्ज्वल कल”“सामूहिक संकल्प से आकार लेता हुआ ज्ञान का मंदिर”गांव  - हुलासपुरा, सरमथुरा, धौलप...
01/03/2026

“पसीने की हर बूंद में बसा है उज्ज्वल कल”
“सामूहिक संकल्प से आकार लेता हुआ ज्ञान का मंदिर”
गांव - हुलासपुरा, सरमथुरा, धौलपुर (राज)
हुलासपुरा गांव आज केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना, समर्पण और शिक्षा के प्रति अटूट विश्वास का जीवंत उदाहरण बन चुका है। यहां की मिट्टी में जैसे सहयोग की सुगंध घुली हुई है और हर दिल में एक ही सपना धड़क रहा है—"अपने गांव को शिक्षा के प्रकाश से आलोकित करना"।
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ग्रामीणों के अद्भुत सहयोग और त्याग ने इस छोटे से गांव को एक बड़े परिवर्तन की राह पर अग्रसर कर दिया है। गांव के कर्मचारियों और युवाओं ने अपने सपनों को केवल व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने अपने गांव के भविष्य को संवारने का संकल्प लिया।
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कोई अपनी कमाई का अंशदान दे रहा है, तो कोई अपने श्रम का पसीना बहा रहा है। ग्रामीणों का सहयोग यह सिद्ध कर रहा है कि जब उद्देश्य पवित्र हो, तो संसाधनों की कमी आड़े नहीं आती।

नींव रखने का कार्य केवल ईंट और पत्थरों का जोड़ नहीं है, यह आने वाली पीढ़ियों के सपनों की उड़ान है। 👏🏻👏🏻👏🏻

जब गांव के बुजुर्ग अपने अनुभवों का आशीर्वाद देते हैं और बच्चे उत्साह से निर्माण कार्य को निहारते हैं—तब यह दृश्य केवल निर्माण का नहीं, बल्कि विश्वास और एकता का प्रतीक बन जाता है।🙏🏻🙏🏻🙏🏻
हर गड्ढा जो नींव के लिए खोदा जा रहा है, उसमें भविष्य की आशाओं के बीज बोए जा रहे हैं। हर दीवार जो खड़ी हो रही है, वह इस विश्वास की गवाही दे रही है कि शिक्षा ही वह दीपक है जो अज्ञानता के अंधकार को दूर कर सकता है।
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हुलासपुरा का यह प्रयास केवल एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा है। यह संदेश देता है कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो और समुदाय एकजुट हो जाए, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रहता। यह कहानी बताती है कि बदलाव बाहर से नहीं आता, वह भीतर से जन्म लेता है—साझा सपनों और सामूहिक प्रयासों से आता है।🙏🏻🙏🏻🙏🏻
आज हुलासपुरा में केवल एक भवन की दीवार खड़ी नहीं की जा रही बल्कि ज्ञान, संस्कार और उज्ज्वल भविष्य का मार्ग प्रशस्त किया जा रहा है। आने वाले वर्षों में जब इसी भूमि से शिक्षित, जागरूक और आत्मनिर्भर युवा निकलेंगे, तब हर ग्रामीण गर्व से कह सकेगा—"हमने मिलकर अपने भविष्य को गढ़ा है।"

यह समर्पण, यह सहयोग और यह एकता सचमुच उस नए सवेरे का संकेत है, जहां शिक्षा ही सबसे बड़ा उत्सव होगी।🙏🏻🙏🏻🙏🏻
सोच बदलो गाँव बदलो टीम (SBGBT)

**युवाओं में सकारात्मक सोच और समाज की भूमिका**युवाओं को किसी भी देश की रीढ़ कहा जाता है, क्योंकि उस देश का आने वाला कल उ...
27/02/2026

**युवाओं में सकारात्मक सोच और समाज की भूमिका**

युवाओं को किसी भी देश की रीढ़ कहा जाता है, क्योंकि उस देश का आने वाला कल उसके युवाओं पर ही निर्भर करता है। वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर युवाओं की जनसंख्या अपने उच्चतम स्तर पर है। और यदि हम भारत की बात करें, तो आज दुनिया में सबसे अधिक युवा आबादी हमारे देश में है। इसी कारण पूरी दुनिया—चाहे वह मानव संसाधन के दृष्टिकोण से हो या बाजार की दृष्टि से—भारत की ओर आशा और संभावना के साथ देख रही है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, जहाँ वैश्विक युवा आबादी लगभग 16 प्रतिशत है, वहीं भारत में यह लगभग 35 प्रतिशत है। इस प्रकार भारत विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है।

हमारी सामाजिक उन्नति इस बात पर निर्भर करती है कि भारत की युवा शक्ति स्वयं को किस प्रकार सकारात्मक कार्यों से जोड़ती है। किंतु वर्तमान स्थिति यह भी दर्शाती है कि सही मार्गदर्शन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव में अनेक युवा निराशा, हताशा और भटकाव का सामना कर रहे हैं। अपेक्षित सफलता और समृद्धि न मिलने के कारण उनके भीतर असंतोष और चिंता का भाव बढ़ रहा है, और वे अपनी नाराज़गी विभिन्न रूपों में व्यक्त कर रहे हैं।

विडंबना यह है कि जिस वर्ग पर देश की तरक्की का सबसे अधिक दायित्व है, वही वर्ग आज दिशाहीनता की स्थिति से जूझ रहा है। युवाओं की इस नकारात्मकता को सकारात्मकता में बदलना केवल युवाओं की ही जिम्मेदारी नहीं है; समाज को भी इसमें आगे बढ़कर अपनी भूमिका निभानी होगी। युवाओं का उचित मार्गदर्शन करते हुए उनकी क्षमता का सदुपयोग करना देश और समाज दोनों के लिए आवश्यक है। हमें इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि युवाओं में नैतिक बल और सकारात्मक सोच कैसे विकसित हो।

यह सत्य है कि बेरोज़गारी और स्वरोज़गार की अनेक चुनौतियाँ युवाओं के सामने खड़ी हैं। फिर भी हमारे सामने सैकड़ों ऐसे उदाहरण हैं, जहाँ युवाओं ने आगे बढ़कर उद्यम शुरू किए, नए प्रयोग किए और सफलता प्राप्त की। आज अख़बारों और विभिन्न वेबसाइटों के करियर पृष्ठों पर हमें ऐसी अनेक जानकारियाँ मिलती हैं, जो युवाओं को नए अवसरों की दिशा दिखाती हैं। काउंसिलिंग से लेकर सामाजिक मुद्दों पर कार्य करने वाले एनजीओ तक, वर्क फ्रॉम होम से लेकर ट्यूशन-कोचिंग संस्थान तक—ऐसे कई कार्य हैं जिन्हें कम लागत में शुरू किया जा सकता है और जिनकी समाज को आवश्यकता भी है।
अर्थ स्पष्ट है—यदि आपके पास कोई हुनर है, तो उससे आजीविका का मार्ग निकाला जा सकता है। बड़ी-बड़ी देशी-विदेशी डिग्रियाँ लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी करने के बाद भी कुछ युवाओं ने नौकरी छोड़कर ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में शिक्षा, कृषि, तकनीक और सामाजिक नवाचार के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। यह सकारात्मक सोच का सशक्त उदाहरण है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि युवा अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा दें। उनकी शक्ति को रचनात्मक और सार्थक कार्यों में लगाना समय की मांग है। यह केवल माता-पिता या परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है।

हमें स्वामी विवेकानंद के उस आह्वान को स्मरण रखना चाहिए, जिसमें उन्होंने कठोपनिषद् के वाक्य का उल्लेख करते हुए कहा था
**“उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।”**
यदि युवा इस संदेश को आत्मसात कर लें और समाज उनका मार्गदर्शन करने में सक्रिय भूमिका निभाए, तो भारत की युवा शक्ति न केवल स्वयं सशक्त होगी, बल्कि देश को भी नई दिशा और नई ऊँचाइयों तक ले जाएगी।
**डॉ. सत्यपाल सिंह मीना, IRS**
सदस्य **सोच बदलो, गाँव बदलो टीम** (sbgbteam.com | )

“ग्रामीण विकास की कुंजी_ युवाओं की ‘बैक टू द सोसायटी’ की सोच”‘बैक टू द सोसायटी’ की सोच “5% ऑफ टी3” (टाइम, टेलेंट और ट्रे...
16/02/2026

“ग्रामीण विकास की कुंजी_ युवाओं की ‘बैक टू द सोसायटी’ की सोच”
‘बैक टू द सोसायटी’ की सोच “5% ऑफ टी3” (टाइम, टेलेंट और ट्रेजर) के सिद्धांत पर युवाओं का मार्गदर्शन करती है। इस समावेसी और संतुलित विकास के सिद्धांतद्वारा समाज के सफल लोगों से अपील की जाती है कि आपको अपने समय, ज्ञान, और आमदनी का कम से कम 5 प्रतिशत हिस्सा अपने समाज को वापस लौटाना है।
हम लोगों में से ज्यादातर सभी ग्रामीण परिवेश से निकलकर यहां तक पहुंचे हैं परंतु इसके बावजूद भी ग्रामीण परिवेश से निकले अधिकांश युवा एक बार नौकरी लगने के बाद गाँवों को लगभग भूल जाते हैं, जिससे गाँवों में लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए पढ़े-लिखे जागरूक लोगों की बहुत बड़ी कमी हो जाती है। युवाओं के पलायन में एक हद तक भूमिका उन लोगों की भी होती है जो हमेशा नकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं और गाँवों में लीक से हटकर अच्छे कार्य करने वाले लोगों को आगे नहीं बढ़ने देते। हालांकि आज के दौर में आलीशान दफ्तर, भारी सैलरी और मल्‍टीनेशनल कंपनियों के आकर्षण को छोड़ कर कई युवा गाँवों की तरफ भी देख रहे हैं। युवाओं की यह सोच सराहनीय है।
आप देखें तो हम सबकी पृष्‍ठभूमि कम या अधिक ग्रामीण परिवेश से जुड़ी हुई है और जिस गाँव विशेष से हमारा रिश्‍ता रहा है, अगर हम उसके लिए थोड़ा-थोड़ा भी योगदान करते हैं तो हम भारत के ग्रामीण समाज में बहुत बड़े एवं सार्थक परिवर्तन ला सकते हैं। अगर भविष्‍य में युवाओं को पर्याप्‍त सहयोग मिले तो अधिक युवा गाँव में विकास कार्यों के लिए आगे आ सकते हैं। आखिर जो पगडंडियां गाँव से बाहर जाती हैं; वे वापस लौटा भी तो सकती हैं।

राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में सोच बदलो गाँव बदलो टीम (SBGBT) के कार्यकर्ताओं द्वारा विभिन्न अभियानों का संचालन किया जा रहा है, जिसका ग्रामीण समाज और संस्‍कृति, ग्रामीणों कि सोच और गांवों के विकास पर काफी सकारात्‍मक असर हो रहा है। उदाहरण के लिए, युवाओं द्वारा उत्थान लाइब्रेरी, उत्थान कोचिंग, उत्थान केंद्रों का संचालन कर शिक्षा के क्षेत्र उल्लेखनीय योगदान किया जा रहा है। गांव के विद्यालयों के लिए फर्नीचर, पंखे लाइट की व्यवस्था सीसीटीवी कैमरे की व्यवस्था शौचालयों की व्यवस्था करने में युवा आगे आ रहे हैं। इसके अतिरिक्त गांव में वृक्षारोपण करने, जल संरक्षण के लिए काम करने, लोगों को सरकारी सहायता उपलब्ध कराने में सहयोग करने, लोगों में जन जागरूकता पैदा करने इत्यादि कार्य सफलतापूर्वक किए जा रहे हैं। युवाओं के इन प्रयासों से ना केवल गांवों को आगे बढ़ने में और लोगों को विकास की मुख्यधारा में जुड़ने का अवसर मिल रहा है बल्कि युवाओं की ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग समाज और गांव के SBGBT-सोच बदलो - गाँव बदलोसोच बदलो गांव बदलो टीम
SBGBT-सोच बदलो - गाँव बदलो

💐“भारत माता (मदर इंडिया) द्वारा गणतंत्र भारत को जन्म”💐यह ऐतिहासिक कार्टून 24 जनवरी 1950 को The Hindustan Times में प्रका...
26/01/2026

💐“भारत माता (मदर इंडिया) द्वारा गणतंत्र भारत को जन्म”💐

यह ऐतिहासिक कार्टून 24 जनवरी 1950 को The Hindustan Times में प्रकाशित हुआ था; यानी भारत के पहले गणतंत्र दिवस से ठीक दो दिन पहले।
यह चित्र स्वतंत्र भारत के जन्म और उसके भविष्य को गहरे प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करता है।

• इस कार्टून में मदर इंडिया को गणतंत्र भारत को जन्म देते हुए दिखाया गया है।

• नवजात गणतंत्र को डॉ. भीमराव अंबेडकर बड़े स्नेह और सावधानी से थामे हुए हैं, जो संविधान-निर्माण में उनकी केंद्रीय भूमिका का संकेत है।

• पास ही जवाहरलाल नेहरू, बाबू राजेंद्र प्रसाद और वल्लभभाई पटेल शिशु की ओर चिंतित और आशान्वित दृष्टि से देख रहे हैं; यह नवजात राष्ट्र की जिम्मेदारियों और अपेक्षाओं को दर्शाता है।

• पृष्ठभूमि में संविधान सभा को एक नर्स के रूप में दिखाया गया है, जो राष्ट्र के पालन-पोषण और देखभाल का प्रतीक है।

• बाबू राजेंद्र प्रसाद की टोपी पर लिखा “The Guardian” यह दर्शाता है कि वे गणतंत्र के संरक्षक और मार्गदर्शक की भूमिका निभाने वाले हैं।

यह कार्टून न केवल भारत के गणतंत्र बनने के ऐतिहासिक क्षण को रेखांकित करता है, बल्कि उस सामूहिक जिम्मेदारी, आशा और संवैधानिक मूल्यों को भी उजागर करता है जिन पर आधुनिक भारत की नींव रखी गई।

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। SBGBT-सोच बदलो - गाँव बदलो

राष्ट्रीय युवा दिवस (12 जनवरी) : स्वामी विवेकानन्द जयंतीराष्ट्रीय युवा दिवस स्वामी विवेकानन्द की जयंती के रूप में मनाया ...
12/01/2026

राष्ट्रीय युवा दिवस (12 जनवरी) : स्वामी विवेकानन्द जयंती
राष्ट्रीय युवा दिवस स्वामी विवेकानन्द की जयंती के रूप में मनाया जाता है। यह दिन केवल एक स्मृति-दिवस नहीं, बल्कि युवाओं को आत्मचिंतन, आत्मविश्वास और समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझने का अवसर देता है। स्वामी विवेकानन्द ने युवा शक्ति को राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी ऊर्जा माना और यह स्पष्ट किया कि जागरूक, चरित्रवान और सेवा-भाव से युक्त युवा ही समाज का वास्तविक भविष्य गढ़ते हैं।
ग्रामीण विकास की कुंजी — युवाओं की ‘पेबैक टू द सोसायटी’ की सोच - राष्ट्रीय युवा दिवस के संदर्भ में ‘पेबैक टू द सोसायटी’ का विचार अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। यह विचार हमें याद दिलाता है कि समाज से प्राप्त अवसरों और संसाधनों का कुछ अंश समाज को लौटाना हमारा दायित्व है। इस दिशा में भारत रत्न डॉ. भीमराव अम्बेडकर की सलाह आज भी युवाओं के लिए मार्गदर्शक है। उन्होंने समाज के सफल लोगों से कहा था कि वे अपने समय, ज्ञान और संसाधनों (Time, Talent और Treasure) का कम-से-कम 5 प्रतिशत समाज को वापस दें। यही सोच सामाजिक संतुलन और समावेशी विकास की मजबूत नींव रखती है।
हम में से अधिकांश लोग किसी न किसी रूप में ग्रामीण परिवेश से निकलकर शिक्षा, रोजगार और सम्मानजनक स्थान तक पहुँचे हैं। किंतु यह भी एक कटु सत्य है कि नौकरी या आर्थिक स्थिरता मिलने के बाद अनेक युवा अपने गाँवों से लगभग नाता तोड़ लेते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि गाँवों में पढ़े-लिखे, जागरूक और मार्गदर्शन देने वाले लोगों की भारी कमी रह जाती है। इस स्थिति को और जटिल बनाता है; वह नकारात्मक दृष्टिकोण, जो कई बार गाँवों में नए और सकारात्मक प्रयासों को हतोत्साहित करता है।
इसके बावजूद, आज एक सुखद परिवर्तन भी दिखाई दे रहा है। भारी वेतन, आलीशान दफ्तरों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आकर्षण के बीच कुछ युवा गाँवों की ओर लौटकर विकास कार्यों से जुड़ने का साहस कर रहे हैं। यह सोच न केवल सराहनीय है, बल्कि अत्यंत आवश्यक भी है। यदि प्रत्येक युवा अपने गाँव के लिए थोड़ा-सा समय, थोड़ी-सी ऊर्जा और थोड़ी-सी समझ समर्पित करे, तो ग्रामीण भारत में बड़े और सार्थक परिवर्तन संभव है। आखिर जो पगडंडियाँ गाँव से बाहर जाती हैं, वे वापस लौटने का रास्ता भी जानती हैं।
इस दिशा में राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में ‘सोच बदलो, गाँव बदलो टीम (SBGBT)’ द्वारा किए जा रहे प्रयास उल्लेखनीय हैं। टीम के युवाओं द्वारा शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक विकास को केंद्र में रखकर अनेक अभियानों का संचालन किया जा रहा है, जिनका ग्रामीण समाज और संस्कृति पर सकारात्मक प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
उदाहरण के तौर पर, उत्थान लाइब्रेरी, उत्थान कोचिंग और उत्थान केंद्रों के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा रहा है। गाँवों के विद्यालयों में फर्नीचर, पंखे, लाइट, सीसीटीवी कैमरे और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था में युवा सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
इसके अतिरिक्त, वृक्षारोपण, जल संरक्षण, सरकारी योजनाओं तक लोगों की पहुँच सुनिश्चित करने, जन-जागरूकता फैलाने और सामाजिक सहयोग जैसे कार्य भी सफलतापूर्वक किए जा रहे हैं। इन प्रयासों से न केवल गाँवों का समग्र विकास हो रहा है, बल्कि युवाओं की ऊर्जा का सकारात्मक और रचनात्मक उपयोग भी सुनिश्चित हो रहा है।
सोच बदलो, गाँव बदलो टीम का मानना है कि राष्ट्रीय युवा दिवस को नए दृष्टिकोण के साथ मनाने की आवश्यकता है। यह दिन केवल भाषणों और औपचारिक आयोजनों तक सीमित न रहे, बल्कि युवाओं को यह सोचने और करने के लिए प्रेरित करें कि वे अपने गाँवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक भाईचारे को केंद्र में रखकर युवा विकास समितियों का गठन करें। साथ ही, सफल युवाओं को ‘पेबैक टू द सोसायटी’ की भावना के साथ गाँवों के विकास कार्यों से जोड़ने का सार्थक प्रयास किया जाए।
टीम युवाओं से अपील करती है कि स्वामी विवेकानन्द के विचारों और डॉ. अम्बेडकर की सामाजिक चेतना को आत्मसात करते हुए युवा अपनी जड़ों से जुड़कर समाज के लिए कार्य करें और राष्ट्रीय युवा दिवस को राष्ट्र के भविष्य को दिशा देने वाला दिवस बनाये।
राष्ट्रीय युवा दिवस की शुभकामनाएं💐💐💐

🙏जीवन में सफलता के पाँच सूत्र: अनुभव, धैर्य और निरंतरता से उपजे विचार🙏सफलता कोई त्वरित उपलब्धि नहीं होती। यह किसी एक दिन...
11/01/2026

🙏जीवन में सफलता के पाँच सूत्र: अनुभव, धैर्य और निरंतरता से उपजे विचार🙏

सफलता कोई त्वरित उपलब्धि नहीं होती। यह किसी एक दिन, एक प्रयास या एक निर्णय का परिणाम नहीं है। सफलता धीरे-धीरे बनती है। अक्सर तब, जब बाहर से कुछ भी होता हुआ दिखाई नहीं देता। जीवन में आगे बढ़ते हुए मैंने यही कुछ सीखा है कि जो दिखाई नहीं देता, वही भीतर सबसे मज़बूती से आकार ले रहा होता है।

1. धैर्य और दृढ़ता: समय को अपना काम करने दें

आज की दुनिया तुरंत परिणाम चाहती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि स्थायी सफलता समय मांगती है। कई बार वर्षों तक परिणाम दिखाई नहीं देते। उस दौर में ऐसा लगता है मानो हम ठहरे हुए हों, जबकि सच यह है कि हम तैयारी के चरण में होते हैं। यदि इसी समय धैर्य टूट जाए, तो यात्रा अधूरी रह जाती है।
लेकिन जो टिके रहते हैं, वे अनुभव करते हैं कि एक समय ऐसा आता है जब चीज़ें पहले धीरे-धीरे और फिर अचानक स्पष्ट रूप से आगे बढ़ने लगती हैं। धैर्य कोई निष्क्रियता नहीं, बल्कि भविष्य पर भरोसे की सबसे मजबूत अभिव्यक्ति है।

2. प्रतिबद्धता और निरंतरता: रोज़ का छोटा काम ही बड़ा परिणाम देता है

सफलता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह शुरुआत में लगभग अदृश्य होती है। रोज़ का छोटा प्रयास उस समय महत्वहीन लगता है, लेकिन समय के साथ वही प्रयास बड़ा रूप ले लेता है। जो व्यक्ति बिना दिखावे, बिना शोर, अपने काम में लगातार लगा रहता है, वही अंततः स्थायी सफलता पाता है। कमिटमेंट का अर्थ है कि आपने रास्ता चुन लिया है, और निरंतरता का अर्थ है कि आप हर परिस्थिति में उसी रास्ते पर चलते रहेंगे। बाँस की वृद्धि इसका जीवंत उदाहरण है; वह वर्षों तक ज़मीन के नीचे मज़बूत होता रहता है और फिर अचानक ऊँचाई छू लेता है।

3. छोटी शुरुआत और सीखने की भूख

हर बड़ा काम एक छोटी शुरुआत से ही जन्म लेता है। शुरुआत में बड़ा काम या बड़ी सफलता ज़रूरी नहीं होती; ज़रूरी होता है सीखने का मन और बने रहने का साहस। जो व्यक्ति सीखने के लिए खुला रहता है, वही आगे बढ़ता है। दिग्गजों से सीखिए, अनुभवों को आत्मसात कीजिए और धीरे-धीरे अपना रास्ता बनाइए।सफलता अपने आप नहीं आती; वह मेहनत का परिणाम होती है। असली पूंजी पैसा नहीं, बल्कि आपका श्रम, आपकी समझ और आपकी निरंतरता है।

4. असफलताओं को शिक्षक बनाइए

असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि उसका सबसे ईमानदार संदेश होती है।
जो व्यक्ति असफलता से डर जाता है, वह वहीं रुक जाता हैऔर जो उसे समझकर आगे बढ़ता है, वही अंततः मजबूत बनता है। हर गिरावट यह सिखाती है कि अगला कदम कैसे बेहतर रखा जा सकता है। हार मान लेना ही असली असफलता है; बाकी सब अनुभव हैं।

5. लोगों को साथ लेकर चलना: सफलता अकेले नहीं बनती

कोई भी व्यक्ति अकेले बड़ा नहीं बनता। परिवार, टीम या संगठन, हर जगह सहयोग, भरोसा और सम्मान से ही मजबूत नींव बनती है। जब हम अपने साथ काम करने वालों को आगे बढ़ने का अवसर देते हैं, उन्हें सम्मान देते हैं, तभी असली शक्ति जन्म लेती है। नेतृत्व का अर्थ आगे चलना नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलना है। जब लोग सशक्त होते हैं, तो सफलता केवल व्यक्तिगत नहीं रहती, वह साझा बन जाती है।

सफलता किसी चमत्कार का नाम नहीं है। यह धैर्य, निरंतरता, सीखने की इच्छा, असफलताओं से संवाद और लोगों के साथ विश्वास से बनी हुई एक लंबी यात्रा है।

जो इस यात्रा में टिके रहते हैं; वही एक दिन मंज़िल तक पहुँचते हैं,
और कई बार दूसरों के लिए रास्ता भी बना देते हैं।

डॉ. सत्यपाल सिंह मीना आईआरएस

🙏🏻🙏🏻"बदलती_सोच_संवरते_गाँव" 🙏🏻🙏🏻सोच बदलो, गाँव बदलो टीम ने यह साबित कर दिया है कि यदि युवा शक्ति और सामुदायिक सहयोग एक स...
25/12/2025

🙏🏻🙏🏻"बदलती_सोच_संवरते_गाँव" 🙏🏻🙏🏻
सोच बदलो, गाँव बदलो टीम ने यह साबित कर दिया है कि यदि युवा शक्ति और सामुदायिक सहयोग एक साथ मिल जाए, तो गाँव की तस्वीर बदली जा सकती है। इस मुहिम का समाज पर गहरा और सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे रहा है:
* शिक्षा के प्रति जागरूकता: टीम के प्रयासों से ग्रामीणों में शिक्षा के प्रति रुचि बढ़ी है, जिससे ड्रॉपआउट दर में कमी आई है।
* स्वच्छता और स्वास्थ्य: सामूहिक श्रमदान और जागरूकता अभियानों ने गाँवों को स्वच्छ और बीमारियों से मुक्त बनाने में मदद की है।
* आत्मनिर्भरता: युवाओं को कौशल विकास और स्वरोजगार के लिए प्रेरित कर पलायन रोकने की एक नई दिशा मिली है।
* सामाजिक कुरीतियों का अंत: नशा मुक्ति, दहेज प्रथा और रूढ़िवादी सोच के खिलाफ टीम ने समाज को एकजुट किया है।
निष्कर्ष:
यह केवल एक अभियान नहीं, बल्कि एक जनांदोलन है। जब सोच बदलती है, तभी समाज और देश बदलता है। इस बदलाव का हिस्सा बनें!

दुनिया के 5 सबसे मशहूर नियम1. मर्फी का नियम (Murphy’s Law):जिस चीज़ से आप सबसे ज़्यादा डरते हैं,उसी के होने की संभावना स...
23/12/2025

दुनिया के 5 सबसे मशहूर नियम

1. मर्फी का नियम (Murphy’s Law):
जिस चीज़ से आप सबसे ज़्यादा डरते हैं,
उसी के होने की संभावना सबसे अधिक होती है।

2. किडलिन का नियम (Kidlin’s Law):
अगर आप किसी समस्या को साफ़ और सही तरीके से लिख लेते हैं,
तो समझिए उसका आधा समाधान निकल चुका है।

3. गिल्बर्ट का नियम (Gilbert’s Law):
कोई भी काम शुरू करना आसान होता है,
लेकिन उसे सही तरीके से पूरा करना आपकी ज़िम्मेदारी होती है।

4. विल्सन का नियम (Wilson’s Law):
अगर आप ज्ञान और समझदारी को प्राथमिकता देंगे,
तो पैसा खुद-ब-खुद आपके पीछे आएगा।

5. फॉकलैंड का नियम (Falkland’s Law):
अगर किसी फैसले की तुरंत ज़रूरत नहीं है,
तो बिना सोचे-समझे निर्णय लेना समझदारी नहीSBGBT-सोच बदलो - गाँव बदलोव बदलो

भाई!हाल ही में 7 दिसंबर 2025 को *SBGBT (सोच बदलो गांव बदलो टीम)* के प्रेरणादायी प्रयासों से राजस्थान के तीन जिलों के लगभ...
23/12/2025

भाई!
हाल ही में 7 दिसंबर 2025 को *SBGBT (सोच बदलो गांव बदलो टीम)* के प्रेरणादायी प्रयासों से राजस्थान के तीन जिलों के लगभग 170 गांवों के 30 सर्किलों में *“शिक्षा पाओ - ज्ञान बढ़ाओ प्रतियोगिता 2025–26”* का सफल आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता की विशेषता यह रही कि आवेदन से लेकर परिणाम तक पूरी प्रक्रिया आधुनिक तकनीक से—ऑनलाइन आवेदन, ई-एडमिट कार्ड, OMR शीट पर परीक्षा, उत्तर कुंजी जारी करना एवं OMR स्कैन के माध्यम से परिणाम—संपन्न की गई।
इस प्रतियोगिता का उद्देश्य ग्रामीण प्रतिभाओं को पहचान देना, उन्हें निखारना और एक सशक्त मंच उपलब्ध कराना रहा। कार्यक्रम में लगभग 4000 बच्चों ने अत्यंत उत्साह, आत्मविश्वास और उमंग के साथ सहभागिता कर यह सिद्ध कर दिया कि ग्रामीण क्षेत्र की प्रतिभाएँ किसी से कम नहीं हैं।
🙏🏻🙏🏻🙏🏻
इस वीडियो के माध्यम से आप तक कुछ चुनिंदा छायाचित्र एवं चलचित्र प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
🙏🏻🙏🏻
टीम का अपडेट जानने, अपने सकारात्मक कार्यों को लोगों तक पहुँचाने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्लीज़ अपने चैनल को सब्सक्राइब करें और शेयर करें
धन्यवाद 🙏🏻

🙏🏻🙏🏻“चम्बल के बेहड़ों में शिक्षा की बयार” 🙏🏻🙏🏻ग्रामीण परिवेश के बच्चों और परिजनों को शिक्षा के प्रति जागरूक क....

🙏“चम्बल के बेहड़ों से निकल रही विकास की नई सोच” 🙏“गांव के संकरे रास्ते आपकी संकीर्ण सोच के परिचायक हैं, साथियों।जब तक गा...
19/12/2025

🙏“चम्बल के बेहड़ों से निकल रही विकास की नई सोच” 🙏
“गांव के संकरे रास्ते आपकी संकीर्ण सोच के परिचायक हैं, साथियों।
जब तक गांव के रास्ते चौड़े नहीं होंगे, तब तक सोच के रास्ते भी चौड़े नहीं होंगे।
सोच का दायरा बढ़ाओ, तभी गांव में उन्नति होगी।” — देवेंद्र सिंह

सुरारीकलां सरमथुरा (धौलपुर) के ग्रामीणों और युवाओं ने अतिक्रमण-मुक्त सफाई अभियान चलाकर यह साबित कर दिया कि गाँव, परिवार समाज की सोच से शुरू होता है।
यह है की असली ताकत 💪
#सोच_बदलो_गांव_बदलो

#ग्रामीण_विकास
#स्वच्छ_गांव
#जनभागीदारी SBGBT_“सोच बदलो - गाँव बदलो” [Transform Thinking-Transform Village] SBGBT-सोच बदलो - गाँव बदलो CMO Rajasthan Mannu Meena Dps Meena Durgusi

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मेरे सपनों की मातृभूमि_“स्मार्ट गाँव' धनौरा”

मेरा देश गांवों का देश है। जहां आज भी 70% से अधिक आबादी गांवों में बसती है । मेरा सौभाग्य है कि मेरा जन्म एक छोटे से गांव में हुआ, जहां मुझे गांव के जीवन को नजदीक से जानने का सुअवसर प्राप्त हुआ । बरसात के दिनों में कीचड़ भरे रास्ते, भरी दोपहरी में खेतों में काम करते लोग, सर्द रातों में अलाव के सहारे जगह-जगह खुले आसमान के नीचे झुण्डों में बतियाते लोग, अभावों से त्रस्त व दिनभर रोजी रोटी के लिए इधर-उधर मशक्कत करते गाँव के भोले-भाले लोग, खेतों से अथवा मजदूरी करके लौटते थके हारे ग्रामीणों का शाम को चारपाई पर लेटते ही ऊंघ जाना, यह सब नजर आता है। जब हम एक गांव के जीवन की ओर नजर डालते हैं । आज भी अधिकांश गांव आधारभूत सुविधाओं जैसे बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा व स्वास्थ्य के पूर्ण लाभ से वंचित हैं । हालांकि, आज कई गांवों तक बिजली पहुंची है । लेकिन, वास्तविकता यही है कि आज भी गांवों में विद्युत आपूर्ति नियमित व पर्याप्त नहीं है । किसी भी समय बिजली का आना-जाना गांव के भोले-भाले लोगों व किसानों की दिनचर्या को अनियमित व ईश्वर के भरोसे जीने पर मजबूर करता है । आश्चर्य तो तब होता है जब आज़ादी के सात दशक गुजर जाने के बावजूद, आज भी कई गांव, पक्की सड़क बनने की बाट जोह रहे हैं । आज हमारे देश के कई गांवों में पीने के पानी का संकट गहराया हुआ है। गांव के लोग रोजगार की तलाश में और बेहतर शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए आज भी अपने आसपास के शहर जाने को मजबूर हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि गांव के लोगों का अभावों से भरा जीवन किसी से छुपा नहीं है या संक्षिप्त में कहा जाए तो आज भी सरकारी प्रयासों के समुचित लाभ से ग्रामीण इलाके वंचित हैं। आज भी गांव के ज्यादातर परिवार इतने समर्थ नहीं है कि वह शहर जाकर अपना इलाज करा सकें, अपने बच्चों को अच्छे स्कूल-कॉलेज में दाखिला दिला सकें। मंहगाई के दौर में, कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण कई गरीब बच्चों के सपने, अभावों के बोझ तले समय पूर्व ही दफन हो जाते हैं और कई गरीब, बीमारियों का समय पर इलाज कराने में असमर्थता के चलते, अकाल मृत्यु का शिकार हो जाते हैं। आज भी गांव में हर घर शौचालय नहीं होने से, अल सुबह गांव की बहन-बेटियाँ, महिलाएं और अन्य लोग खुले में शौच जाने के लिए मजबूर हैं और अकारण बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। हूबहू, ऐसी ही कुछ तस्वीर, आज से कुछ वर्ष पहले तक मेरे गांव की भी थी।

मेरा गांव “धनौरा” राजस्थान के धौलपुर जिले की बाड़ी तहसील का एक छोटा सा गांव है। मेरा बचपन गांव की गलियों में खेलते कूदते गुजरा। गांव की कच्ची संकरी पगडंडियों पर दिन भर बच्चों की हंसी ठिठोली व विभिन्न प्रकार के खेल खेलती टोलियां, पीठ पर भारी बस्ता (स्कूल बैग) लटकाए हुए स्कूल जाते बच्चों की टोलियां, गांव के लोगों का सुबह उठते ही खेत की ओर अथवा अपने काम पर निकल पड़ना, चैराहों पर गांव के बड़े बूढ़ों/पटेलों की हुक्का, तंबाकू व बीड़ी के साथ इधर उधर की चर्चाएं करती मंडलियां, भोर होते ही गांव की महिलाओं द्वारा पशुओं को चारा डालना, दूध दुहना, खेत के किसी कोने में गोबर के ढेर डालने जाना, गांव के चरवाहों द्वारा पशुओं को चराने हेतु हरे घास के मैदानों की ओर निकल पड़ना। यह सब नजर आता है एक गांव की दिनचर्या में ।

मैं भी अपनी साइकिल लेकर स्कूल की तरफ निकल पड़ता। स्कूल से लौट कर गांव के बच्चों के साथ खेल में घुल मिल जाता। शाम को बिजली न रहने से दीया/लालटेन के सहारे मां अपने घरेलू कामों को निपटाती रहती और वहीं एक कोने में इसी रोशनी के सहारे मैं भी अपने स्कूल में दिए गए होमवर्क को पूरा करने में जुट जाता था। बाबूजी भी खेत से लौट कर, पशुओं को चारा डालने व उन्हें पानी पिलाने जैसे कार्यों में मां का हाथ बंटाते। अपने संध्या बाती (इष्टदेव का दीपक जलाकर स्मरण करना) से निवृत्त होकर, थकान के चलते बाबूजी चारपाई पर लेट जाते और बीच-बीच में कई बार ऊंघते रहते, चारपाई पर पड़े-पड़े ही भोजन बनने का इंतजार करते रहते और जब मां भोजन तैयार होने पर चूल्हे पर से ही रोटी सेंकती हुई आवाज लगाती, तब कहीं जाकर बाबूजी की तंद्रा टूटती और माँ की आवाज सुनकर मैं भी झटपट अपना स्कूली बस्ता समेट कर बाबूजी के साथ मां के पास भोजन के लिए दौड़ा चला आता।

उच्च माध्यमिक तक की पढ़ाई मैंने गांव में रहते हुए ही पूरी की। इस दौरान, गांव में लोगों की तकलीफों को देखकर, कई बार मेरा मन बहुत दुखी हो जाता था। मन में कई तरह के विचार आते, बाल मन कई सपने बुनने लगता “काश! हमारे गांव में भी यह सुविधा होती, तो हमारे गांव की लोगों की तकलीफें कितनी कम हो जातीं” लेकिन, परिस्थितियों के आगे मैं भी मजबूर था। एक आम इंसान की तरह, न कुछ बड़ा सोच पाता और न ही कुछ कर पाने की स्थिति में था। यह सब सोचकर कई बार बड़ा मायूस हो जाया करता था। मुझे आज भी याद है कि मेरे इन्हीं विचारों के चलते, स्कूली दिनों में, मैंने गांव के कुछ साथियों की मदद से गांव की गलियों को रोशन करने के उद्देश्य से हर खंबे पर बल्ब लगाकर, लोगों के चेहरों पर एक छोटी सी मुस्कान व उनके मन में हल्का सा संतोष भाव पैदा करने की एक छोटी सी कोशिश की थी। इस तरह की कोशिशें मन को बड़ी तसल्ली देतीं थीं। इसी बीच कॉलेज की पढ़ाई के लिए मेरे पिताजी ने मेरा एडमिशन राजस्थान यूनिवर्सिटी, जयपुर में करा दिया। जयपुर रहते हुए कॉलेज के दिनों में मुझे बहुत कुछ नया सीखने को मिला। मैं अपने परिवार व गांव की मशक्कत भरी दिनचर्या को हमेशा याद रखता और दिन-रात मेहनत करता। यहां कॉलेज की पढ़ाई के दौरान कई अच्छे मित्रों और एक अच्छे मार्गदर्शक (प्रो. रूप सिंह बारेठ सर) से भेंट हुई। ग्रेजुएशन में अपने कॉलेज में प्रथम स्थान प्राप्त करने के पश्चात, सर व मित्रों की हौसला-अफजाई से यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी। ईश्वरीय कृपा, माता पिता के आशीर्वाद, सभी की दुआओं, व सर के मार्गदर्शन से मात्र 26 वर्ष की आयु में ही सिविल सेवा परीक्षा में सफलता हासिल हो गई। परिणाम आते ही गांव पहुंचा, जहां मेरे माता पिता सहित, मेरा पूरा गांव मेरे लिए पलक पांवड़े बिछाए बैठा था। गांव की माताओं, बहनों व बुजुर्गों ने मुझे उस दिन वह अपार स्नेह दिया जिसे मैं जीवन भर नहीं भूल पाऊंगा।