23/08/2026
प्रश्न- राधे राधे प्रभु जी 🙏🏻शिवलिंग की जो षोडशोपचार पूजा होती है तो यह विभिन्न सामग्री क्यों चढाई जाती है उनका थोड़ा विस्तार करेंगे तो सब सही सही तत्व जान पायेंगे ।
जैसे पहले विभिन्न स्नान, फिर भभूति, चंदनादि और फिर विषयुक्त सामग्री । शिवलिंग के लेख में सामग्री का वर्णन नहीं है।
उत्तर- प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
भगवान मनुष्यों के मन बुद्धि इन्द्रियों इत्यादि से परे है ।
आत्मा का परमात्मा है वह इस हेतु भगवान को हम समस्त तत्वों के सार के रूप में उनके तत्वों का एक मूर्त रूप प्रदान करते हैं ताकि वह हमारी मन बुद्धि इन्द्रियों से ग्राह्य हो सके ।
इसी हेतु हमारे ऋषि मुनियों या जो उनको प्राप्त कर चुके हैं , हमारे कल्याण हेतु उनको हमारे लिए एक सार रूप प्रदान कर दिया है जिससे कि हम उनसे लाभान्वित होकर अपना कल्याण कर सकें ।
इसी तरह भगवान शिव का वह रूप है जो हमें शास्त्रों पुराणों के माध्यम से दिग्दर्शन कराया जाता है ।
चाहे शिव का रूप हो , चाहे शक्ति दुर्गा का , चाहे कालभैरव का , चाहे नंदी इत्यादि सबका , वह सब रूप ऐसा समझिये कि जैसे सबका सार निकालकर हमें उसे छोटे से tablet के रूप में दे दिया गया हो ताकि हम उससे लाभांवित हो सके ।
हम टेबलेट तभी खाते हैं जब हम बीमार होते हैं या हमारा शरीर पोषक तत्त्वों को साधारणतः ग्रहण करने में असक्षम हो रहा हो तब ।
जब हम ठीक हो जाएंगे , हमारा शरीर साधारण या सहज रूप से भोजन हवा पानी इत्यादि ग्रहण करने लगेगा तो हमे tablet , ICU , Oxygen mask , injection इत्यादि की आवश्यकता नहीं पड़ेगी कोई ।
क्योंकि तब हमारी नासिका हवा में मौजूद 21% oxygen को ग्रहण करने में स्वयं ही सक्षम हो जाएगी ।
ऐसे ही जब तक हम मायिक दोषों और व्याधियों से ग्रसित हैं तब तक हमें यह सब षोडशोपचार से लेकर कर्मकांड , भगवान के विभिन्न रूपों का सहारा लेना पड़ता है ।
जब हम एक अवस्था को प्राप्त कर जाएंगे , तत्त्वतः उनका स्वरूप समझ में आ जायेगा , तो फिर -
सीय राम मय सब जग जानी ।
वाली स्थिति में हम समझ जाएंगें कि यह प्रकृति कौन है ?
यह हवा पानी महान अहंकार है क्या और इससे क्या लाभ लेना है ।
आजकल प्रकृति का अर्थ लोग यही लेते हैं कि पेड़ पौधा , जानवर , आकाश भूमि हवा पानी इत्यादि ।
अरे यह तो प्रकृति का कण मांश है ।
प्रकृति बहुत विस्तृत और विराट है ।
वह हमारे मन मस्तिष्क बुद्धि से परे है ।
अस्तु इसी हेतु यह सब कर्मकांड इत्यादि हैं क्योंकि हम उनका मूल स्वरूप अभी हमारे अंदर पुष्ट नहीं है , हम परिपक्व अवस्था में नहीं हैं ।
हम किसी व्यक्ति को देखेंगे तो उसमें हमें प्रकृति या माया नहीं नज़र आएगी ।
उसमें हमें बेटा , पति स्त्री , मामा मामी ताऊ दोस्त ही नज़र आएगा जो हमने मन के द्वारा स्वयमेव बनाया हुआ है ।
उसके तत्त्वतः स्वरूप से हम अनभिज्ञ हैं ।
इसलिए इन सब चीजों की आवश्यकता पड़ती है ।
तब तक हमें टेबलेट या कहिये दूध के बोतल की आवश्यकता होती है जब तक दाँत नहीं आ जाते या जब तक हमारा digestive system उस प्रकार का नहीं हो जाता कि हम सभी तत्वों को पचा सकें ।
अतः इन सब षोडशोपचार की आवश्यकता पड़ती है ।
अब ये हैं क्या ??
यह 16 विधियाँ हैं तत्व का ध्यान या आभास कराने के लिए ।
ताकि हम इस विधि से अपने उद्देश्य की पूर्ति कर सकें या याद कर सकें ।
अब ये उपचार क्या है ??
उपचार का अर्थ होता है साधारण भाषा में जो रोगी को रोग् से मुक्ति प्रदान करे ।
कौन से रोग् से ??
मोच से ??
नाक बहने से ??
Loose Motion से ???
नहीं नहीं ।
यह सब मानसिक रोग जो मायाजनित रोग्य हैं जिनके कारण यह जीव जन्म और मृत्यु के बन्धन में फँसा हुआ है ।
उन सभी रोगों से मुक्ति ।
जिसके कारण इसकी आंखों में अज्ञान का पीलिया हो गया है , वह सभी मानसिक रोगों का उपचार ।
उपचार बना है उपचर्या से ।
उप माने ? उप का अर्थ है ऊपर अथवा भगवान से सम्बंधित , परे से सम्बंधित ।
जैसे उपवास होता है न । ठीक यही वाला उप है यह ।
चर्या का मतलब ??
इसका अर्थ है वह सभी विधियों से चलना जिससे हम ऊपर की ओर आरोहण करें ।
यही उपचार बन गया ।
यही शब्द भौतिक शरीर को स्वस्थ्य करने के लिए प्रयोग होने लगा क्योंकि शरीर ही साधन है ऊपर पहुँचने का ।
ऊपर मतलब वह नहीं मरने वाला !!!
ऊपर मतलब उत्कर्षण , ऊपर उठना , आत्मा का आरोहण करना । क्योंकि अभी जीवात्मा अज्ञान से आच्छादित होकर अवरोहण ही कर रहा है जिसके कारण विभिन्न योनियों में अनंत जन्मों से भटक रहा है ।
तो ये षोडशोपचार है :-
1. आवाहन :- भगवान का किसी भी प्रतिमा , मूर्ति , मन , हृदय , बुद्धि में धारण करना या प्रतिष्ठित करना ही आह्वाहन है । इसमें भावना भावित की जाती है , ध्यान किया जाता है कि हे प्रभु आओ ।
2. आसन :- अभी जैसे मैंने ऊपर महाशिवरात्रि के लेख में भगवान का आसन बनाया था न हृदय कमल पर , बस यही आसन है ।
पातंजलि योगदर्शन में मन को स्थिर करने के लिए और समाधि में जाने के लिए तीसरा सूत्र है यह - आसीन संभावात ।
आसन , एक जगह स्थिर करके अपने मनोमयी भगवान को बिठा दें ताकि मन भी एक जगह स्थिर हो जाये ।
3. अर्घ्य :- भगवान का विभिन्न सामग्रियों से स्नान कराना । या उनको अपने भक्तियुक्त भावनाओं द्वारा उनका पूजन करना ही अर्ध्य देना कहलाता है ।
आप लोग सूर्य को भी अर्घ्य देते होंगे न । यह वही है कि हमारी जितनी भी बुद्धि , मन , इन्द्रिय , चित्त की अहंकार या विवेक रूपी जल है जिसके कारण हमारा देहत्व या मनुष्यत्व है , वह आपके प्रकाश से प्रकाशित रहे ।
4. पाद्य :- पुराने समय में जब कोई आता था घर में तो यह प्रथा थी कि उसके पैरों को थाली में डालकर धोया जाता था । पहले जिनको याद हो तो गुरुओं के आगमन पर उनके चरणों को सभी परिवार जन धोते थे और उसका आचमन कर उसको घर में छिड़कते थे । आजकल तो ऐसा सब समाप्त हो गया ।
तो यह वही है कि जब भगवान को हमने अपने घर में बुलाया है तो उनके चरणों को पखारेंगे ।
आप चाहे दूध दही घृत से लेकर अपने भावों के आंसुओं द्वारा भी पखार सकते हैं ।।
ये दूध दही घृत मधु जल इत्यादि क्या है ? यह हमारे विभिन्न भावनाओं का प्रतीक है ।
5. पद्यांग आचमन :- अब जो भगवान के चरणों को पखारा है , उसको अमृत समझकर उसका पान करना ही आचमन कहलाता है ।
पाद्य अंग का अर्थ है कमल जैसे अंग ।
जैसे चरण कमल , कर कमल इत्यादि ।
6. स्नान :- अब भगवान का स्नान कराना है ।
यह स्नान क्या है ??
स्नात ज्ञानं इति स्नानं ।
ज्ञान के जल से युक्त हो जाना ही स्नान कहलाता है ।
इसी से स्नातक बना है ।
जो स्नातक की degree आप लोग लेते हैं न ।
यह वही ज्ञान का स्नान है । जब ज्ञान के स्नान से व्यक्ति शुद्ध हो जाता है तो उसे स्नातक की पदवी मिलती थी ।
पहले के समय में गुरु जब सब ज्ञान दे देते थे तब कहते थे कि आज से तुम लोग ज्ञान के स्नान से शुद्ध और पवित्र हो चुके हो ।
फिर इसके बाद यह प्रथा जलीय स्नान में बदल गयी कि विद्या पूर्ण होने के उपरांत स्नान करवाकर भेजना ।
मूल बात खो गयी और आज स्नातकों तक को नहीं पता कि वह स्नातक किसलिये हैं ।
अंग्रेजो की टोपी पहनकर , gown पहनकर और degree को गोल सा लेकर फ़ोटो खिंचवाने को ही स्नातक बोल दिया जाता है ।
अस्तु यह स्नान भगवान को इसलिए करवाया जाता है ताकि हमें जो भगवान का मायिक रूप दिख रहा है , वह ज्ञान स्नान से बिल्कुल ज्ञानमयी स्वरूप के दिखने लगे ।
आप लोग भक्तिमय जल से भी भगवान को स्नान करवा सकते हैं ताकि उनका प्रेम मय या भक्तिमय स्वरूप का हम अवलोकन कर सकें ।
7. वस्त्र :- स्नान के बाद भगवान को वस्त्र सेवा अर्पण करना ही वस्त्र उपचार है । अब हमने उन्हें अपने भावानुसार वस्त्र अर्पण किये ताकि हमें वह अपनी भावनानुसार स्वरूप सुंदर लग सके ।
8. गन्ध :- सुगंधित इत्र या द्रव्य अर्पण करने को ही गन्ध अर्पण करना कहते हैं ।
सुगंधित क्या होगा ??
हमारे भक्तिमय भाव ।
9. पुष्प :- पुष्प अर्पित करना , यह सब अपने मन के भावों को अर्पित करना , या सुंदर आचरण , सुंदर सदाचार आदि पुष्पित पुष्पों को अर्पण करना ।
10. धूप :- सुगंधित समीर या वायु या सुगंधित वातावरण अर्पित करना । दूषित विचारों या सांसारिक विषयी विचारों का पूर्ण त्याग करना और अध्य्यात्मिक सुवास से महकाना ही धूप अर्पण करना है ।
11. दीप :- अपनी आत्मा रूपी दीपक जिससे ज्ञान का प्रकाश हो , उसे अर्पण करना । क्योंकि आत्मा ज्ञानस्वरूप है और इसी के प्रकाश में हम भगवान का तत्त्वतः दर्शन कर सकते हैं ।
12. यग्योपवीत :- अपने समस्त वैदिक, लौकिक स्मार्त कर्मों को भगवान को अर्पण करना ही यज्ञोपवीत अर्पित करना कहलाता है ।
13. नैवेद्य अर्पण :- अलग अलग मिष्ठान या पदार्थ अर्पण करना नैवेद्य कहलाता है । नैवैद्य का अर्थ होता है पका हुआ भोजन ।
अब यह भोजन क्या है ?
नैवैद्य का अर्थ पहले समझिये वह जिससे उसका विद्य हो सके , जाना जा सके ।
वह परिपक्व ज्ञान , वह परिपक्व भक्ति , वह परिपक्व तत्त्वज्ञान जिससे उस परम शक्तिमान स्वरूप का ज्ञान हो सके , पका हुआ , पुष्ट ज्ञान, उसको अर्पण करना ही नैवेद्य अर्पण करना कहलाता है ।
14. ताम्बूल , जल , दक्षिणा और आरती समर्पण :- ताम्बूल का अर्थ होता है पान ।
यह प्रकृति का स्वरूप होता है । ब्रह्मांड का स्वरूप होता है ।
इसी हेतु पान और सुपारी लक्ष्मी जी गणेश जी को चढ़ाने का प्रावधान है । पूजा के अवसर पर देखा होगा आपने कि सुपारी पर कलावा बाँध कर गणेश जी बना दिये जाते हैं पण्डित जी द्वारा ।
यह गण के अधिपति हैं , समस्त ब्रह्मांड के प्रतीक , इस हेतु सुपारी का प्रयोग होता है ।
तो पान से जैसे मुख की शुद्धि होती है ठीक उसी प्रकार शक्ति के कारण ही सृष्टि संचलन के समय होने वाले अवरोध से शुद्धि होती है या मुक्त होता है ।
ऐसे ही जल अर्पित किया जाता है ।
फिर उन्हें अपनी ओर से यथायोग्य दक्षिणा दिया जाता है ।
ये दक्षिणा क्या है ??
किसी चीज में दक्ष होने की स्थिति को दक्षिणा कहते हैं चाहे वह धन , सामग्री , पदार्थ या किसी भी योग्यता का ही हो । जिसमें निपुणता है या जो सबसे योग्य वस्तु है उसे दक्षिणा कहते हैं ।।
यह दक्ष प्रजापति जब यज्ञ कर रहे थे तो यथायोग्य जिस वस्तु व्यक्ति पदार्थ में वह दक्ष थे , उसको उन्होंने दान दिया । इस हेतु इसका नाम दक्षिणा पड़ा ।
परन्तु आज दक्षिणा के नाम पर 10 , 50 रुपये दान में दिया जाता है ।
खैर कलियुग है ।
चलिए आगे बढ़ते हैं ।
आरती । इसके बाद आरती ली जाती है ।
अपनी आत्मा के ज्योति को ज्ञानस्वरूप स्थिति में प्रज्वलित करके उन्हें भगवान के प्रत्येक अंग को दर्शाया जाता है और भावना की जाती है कि भगवान की समस्त शक्तियों का आरोहण इस आत्मा रूपी दीपक में हो जाये , भगवान की समस्त शक्ति ज्ञान वैराग्य श्री इत्यादि सब इसमें आ जाये ।
इसी हेतु आपने देखा होगा कि लोग आरती के बाद दीपक की लौ को हाथ से लगाकर सिर पर या शरीर पर लगाते हैं ।
इसका यह भावना है कि उस आरती के समय जो भगवान की शक्तियां और गुण उसमें आये हैं , वह मेरे अंदर प्रवेश हो ।
लेकिन लोगों को पता ही नहीं है इसका अर्थ बस उन्हें आरती लेने से मतलब है , कोई ध्यान धारणा या भावना नहीं बनानी है ।
15. नमस्कार :- इसके बाद उनका पूजन किया जाता है । नमः मतलब स्वयं का समर्पण । नमन करना , स्वयं को तिरोहित करना कि हे प्रभु ! मैं आपकी शरण में हूँ और मुझे अपना लो ।
16. स्तुति और क्षमापराध :- इस में भगवान से क्षमा याचना की जाती है कि मैं विचित्र पापी हूँ , और आप विराट व्यक्तित्व हैं , मुझे तो आप के अनुसार पूजन करना नहीं आता है । अगर मुझसे कोई त्रुटि हो गयी हो तो हे दीनानाथ , दीनबंधु , मुझे अल्पज्ञ अज्ञानी जानकर , मुझे पापी मानकर मेरे अपराधों को क्षमा कर देना और अपने चरणों से कभी विलग मत करना ।🙏🙏
तो यही षोडशोपचार ।।
अगर आप लोग समझ गए होंगे तो साधना कार्यक्रम में रूप ध्यान के अवसर पर जब आप लोगों को मैं कैलास या युगल सरकार के पास ले जाता था तो यह सारे कार्य आप लोगों से करवाता था उनके चरणों में ।
यह सब करवाता था आपको ।
वह भी बिना सामग्री के ।
तो आप लोगों को जो दे रहा हूँ वह समस्त शास्त्र वेदों पुराणों को मथ कर बस सार निकाल कर दे रहा हूँ ।
तो यही है षोडशोपचार ।
आप चाहे तो सहस्त्रोपचार कर सकते हैं ।
ऐसा बिल्कुल नहीं है कि 16 ही करने हैं ।
ये तो उनके लिए है जो अभी साधना मार्ग में नए नए हैं और उनको आलम्बन की आवश्यकता है ।
फिर भी जितने लोग करते हैं भौतिक और पार्थिव रूप से करते हैं ।
उनके पीछे के प्रतीकों से बिल्कुल ही अनभिज्ञ रहते हैं ।
लेकिन आप लोगों को इसलिए यह सब ज्ञान दिया जा रहा है कि आप लोग तत्त्वतः सार समझकर उसका लाभ लें ।
बाकी का तो फिर :-
भज गोविंदं भज गोविंदं गोविंदं भज मूढ़मते ।
ये है ही ।।
Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
Shwetabh Pathak
Shwet Prem Ras
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✨ अक्टूबर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर साधना समागम का आयोजन किया जा रहा है,जो कि 24 से 28 अक्टूबर 2026 तक प्रस्तावित है, इस 5 दिवसीय वृन्दावन महोत्सव में भी जो आना चाहते हैं, वह इस नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।
8950072203, 9305529349
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