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DAY-2 ll राम तत्व दर्शन ll प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज || रामायण मंदिर मॉडल टाउन (बरेली,यू पी )सभी भक्तों द्वारा भ...
23/08/2026

DAY-2 ll राम तत्व दर्शन ll प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज || रामायण मंदिर मॉडल टाउन (बरेली,यू पी )
सभी भक्तों द्वारा भावपूर्ण श्रवण हुआ और श्री राम भक्ति मे सभी सरावोर हुए।
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प्रश्न- राधे राधे प्रभु जी 🙏🏻शिवलिंग की जो षोडशोपचार पूजा होती है तो यह विभिन्न सामग्री क्यों चढाई जाती है उनका थोड़ा वि...
23/08/2026

प्रश्न- राधे राधे प्रभु जी 🙏🏻शिवलिंग की जो षोडशोपचार पूजा होती है तो यह विभिन्न सामग्री क्यों चढाई जाती है उनका थोड़ा विस्तार करेंगे तो सब सही सही तत्व जान पायेंगे ।
जैसे पहले विभिन्न स्नान, फिर भभूति, चंदनादि और फिर विषयुक्त सामग्री । शिवलिंग के लेख में सामग्री का वर्णन नहीं है।

उत्तर- प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज

भगवान मनुष्यों के मन बुद्धि इन्द्रियों इत्यादि से परे है ।

आत्मा का परमात्मा है वह इस हेतु भगवान को हम समस्त तत्वों के सार के रूप में उनके तत्वों का एक मूर्त रूप प्रदान करते हैं ताकि वह हमारी मन बुद्धि इन्द्रियों से ग्राह्य हो सके ।

इसी हेतु हमारे ऋषि मुनियों या जो उनको प्राप्त कर चुके हैं , हमारे कल्याण हेतु उनको हमारे लिए एक सार रूप प्रदान कर दिया है जिससे कि हम उनसे लाभान्वित होकर अपना कल्याण कर सकें ।

इसी तरह भगवान शिव का वह रूप है जो हमें शास्त्रों पुराणों के माध्यम से दिग्दर्शन कराया जाता है ।

चाहे शिव का रूप हो , चाहे शक्ति दुर्गा का , चाहे कालभैरव का , चाहे नंदी इत्यादि सबका , वह सब रूप ऐसा समझिये कि जैसे सबका सार निकालकर हमें उसे छोटे से tablet के रूप में दे दिया गया हो ताकि हम उससे लाभांवित हो सके ।

हम टेबलेट तभी खाते हैं जब हम बीमार होते हैं या हमारा शरीर पोषक तत्त्वों को साधारणतः ग्रहण करने में असक्षम हो रहा हो तब ।

जब हम ठीक हो जाएंगे , हमारा शरीर साधारण या सहज रूप से भोजन हवा पानी इत्यादि ग्रहण करने लगेगा तो हमे tablet , ICU , Oxygen mask , injection इत्यादि की आवश्यकता नहीं पड़ेगी कोई ।

क्योंकि तब हमारी नासिका हवा में मौजूद 21% oxygen को ग्रहण करने में स्वयं ही सक्षम हो जाएगी ।

ऐसे ही जब तक हम मायिक दोषों और व्याधियों से ग्रसित हैं तब तक हमें यह सब षोडशोपचार से लेकर कर्मकांड , भगवान के विभिन्न रूपों का सहारा लेना पड़ता है ।

जब हम एक अवस्था को प्राप्त कर जाएंगे , तत्त्वतः उनका स्वरूप समझ में आ जायेगा , तो फिर -

सीय राम मय सब जग जानी ।

वाली स्थिति में हम समझ जाएंगें कि यह प्रकृति कौन है ?

यह हवा पानी महान अहंकार है क्या और इससे क्या लाभ लेना है ।

आजकल प्रकृति का अर्थ लोग यही लेते हैं कि पेड़ पौधा , जानवर , आकाश भूमि हवा पानी इत्यादि ।

अरे यह तो प्रकृति का कण मांश है ।

प्रकृति बहुत विस्तृत और विराट है ।

वह हमारे मन मस्तिष्क बुद्धि से परे है ।

अस्तु इसी हेतु यह सब कर्मकांड इत्यादि हैं क्योंकि हम उनका मूल स्वरूप अभी हमारे अंदर पुष्ट नहीं है , हम परिपक्व अवस्था में नहीं हैं ।

हम किसी व्यक्ति को देखेंगे तो उसमें हमें प्रकृति या माया नहीं नज़र आएगी ।

उसमें हमें बेटा , पति स्त्री , मामा मामी ताऊ दोस्त ही नज़र आएगा जो हमने मन के द्वारा स्वयमेव बनाया हुआ है ।

उसके तत्त्वतः स्वरूप से हम अनभिज्ञ हैं ।

इसलिए इन सब चीजों की आवश्यकता पड़ती है ।

तब तक हमें टेबलेट या कहिये दूध के बोतल की आवश्यकता होती है जब तक दाँत नहीं आ जाते या जब तक हमारा digestive system उस प्रकार का नहीं हो जाता कि हम सभी तत्वों को पचा सकें ।

अतः इन सब षोडशोपचार की आवश्यकता पड़ती है ।

अब ये हैं क्या ??

यह 16 विधियाँ हैं तत्व का ध्यान या आभास कराने के लिए ।

ताकि हम इस विधि से अपने उद्देश्य की पूर्ति कर सकें या याद कर सकें ।

अब ये उपचार क्या है ??

उपचार का अर्थ होता है साधारण भाषा में जो रोगी को रोग् से मुक्ति प्रदान करे ।

कौन से रोग् से ??

मोच से ??

नाक बहने से ??

Loose Motion से ???

नहीं नहीं ।

यह सब मानसिक रोग जो मायाजनित रोग्य हैं जिनके कारण यह जीव जन्म और मृत्यु के बन्धन में फँसा हुआ है ।

उन सभी रोगों से मुक्ति ।

जिसके कारण इसकी आंखों में अज्ञान का पीलिया हो गया है , वह सभी मानसिक रोगों का उपचार ।

उपचार बना है उपचर्या से ।

उप माने ? उप का अर्थ है ऊपर अथवा भगवान से सम्बंधित , परे से सम्बंधित ।

जैसे उपवास होता है न । ठीक यही वाला उप है यह ।

चर्या का मतलब ??

इसका अर्थ है वह सभी विधियों से चलना जिससे हम ऊपर की ओर आरोहण करें ।

यही उपचार बन गया ।

यही शब्द भौतिक शरीर को स्वस्थ्य करने के लिए प्रयोग होने लगा क्योंकि शरीर ही साधन है ऊपर पहुँचने का ।

ऊपर मतलब वह नहीं मरने वाला !!!

ऊपर मतलब उत्कर्षण , ऊपर उठना , आत्मा का आरोहण करना । क्योंकि अभी जीवात्मा अज्ञान से आच्छादित होकर अवरोहण ही कर रहा है जिसके कारण विभिन्न योनियों में अनंत जन्मों से भटक रहा है ।

तो ये षोडशोपचार है :-

1. आवाहन :- भगवान का किसी भी प्रतिमा , मूर्ति , मन , हृदय , बुद्धि में धारण करना या प्रतिष्ठित करना ही आह्वाहन है । इसमें भावना भावित की जाती है , ध्यान किया जाता है कि हे प्रभु आओ ।

2. आसन :- अभी जैसे मैंने ऊपर महाशिवरात्रि के लेख में भगवान का आसन बनाया था न हृदय कमल पर , बस यही आसन है ।

पातंजलि योगदर्शन में मन को स्थिर करने के लिए और समाधि में जाने के लिए तीसरा सूत्र है यह - आसीन संभावात ।

आसन , एक जगह स्थिर करके अपने मनोमयी भगवान को बिठा दें ताकि मन भी एक जगह स्थिर हो जाये ।

3. अर्घ्य :- भगवान का विभिन्न सामग्रियों से स्नान कराना । या उनको अपने भक्तियुक्त भावनाओं द्वारा उनका पूजन करना ही अर्ध्य देना कहलाता है ।

आप लोग सूर्य को भी अर्घ्य देते होंगे न । यह वही है कि हमारी जितनी भी बुद्धि , मन , इन्द्रिय , चित्त की अहंकार या विवेक रूपी जल है जिसके कारण हमारा देहत्व या मनुष्यत्व है , वह आपके प्रकाश से प्रकाशित रहे ।

4. पाद्य :- पुराने समय में जब कोई आता था घर में तो यह प्रथा थी कि उसके पैरों को थाली में डालकर धोया जाता था । पहले जिनको याद हो तो गुरुओं के आगमन पर उनके चरणों को सभी परिवार जन धोते थे और उसका आचमन कर उसको घर में छिड़कते थे । आजकल तो ऐसा सब समाप्त हो गया ।

तो यह वही है कि जब भगवान को हमने अपने घर में बुलाया है तो उनके चरणों को पखारेंगे ।

आप चाहे दूध दही घृत से लेकर अपने भावों के आंसुओं द्वारा भी पखार सकते हैं ।।

ये दूध दही घृत मधु जल इत्यादि क्या है ? यह हमारे विभिन्न भावनाओं का प्रतीक है ।

5. पद्यांग आचमन :- अब जो भगवान के चरणों को पखारा है , उसको अमृत समझकर उसका पान करना ही आचमन कहलाता है ।

पाद्य अंग का अर्थ है कमल जैसे अंग ।

जैसे चरण कमल , कर कमल इत्यादि ।

6. स्नान :- अब भगवान का स्नान कराना है ।

यह स्नान क्या है ??

स्नात ज्ञानं इति स्नानं ।

ज्ञान के जल से युक्त हो जाना ही स्नान कहलाता है ।

इसी से स्नातक बना है ।

जो स्नातक की degree आप लोग लेते हैं न ।

यह वही ज्ञान का स्नान है । जब ज्ञान के स्नान से व्यक्ति शुद्ध हो जाता है तो उसे स्नातक की पदवी मिलती थी ।

पहले के समय में गुरु जब सब ज्ञान दे देते थे तब कहते थे कि आज से तुम लोग ज्ञान के स्नान से शुद्ध और पवित्र हो चुके हो ।

फिर इसके बाद यह प्रथा जलीय स्नान में बदल गयी कि विद्या पूर्ण होने के उपरांत स्नान करवाकर भेजना ।

मूल बात खो गयी और आज स्नातकों तक को नहीं पता कि वह स्नातक किसलिये हैं ।

अंग्रेजो की टोपी पहनकर , gown पहनकर और degree को गोल सा लेकर फ़ोटो खिंचवाने को ही स्नातक बोल दिया जाता है ।

अस्तु यह स्नान भगवान को इसलिए करवाया जाता है ताकि हमें जो भगवान का मायिक रूप दिख रहा है , वह ज्ञान स्नान से बिल्कुल ज्ञानमयी स्वरूप के दिखने लगे ।

आप लोग भक्तिमय जल से भी भगवान को स्नान करवा सकते हैं ताकि उनका प्रेम मय या भक्तिमय स्वरूप का हम अवलोकन कर सकें ।

7. वस्त्र :- स्नान के बाद भगवान को वस्त्र सेवा अर्पण करना ही वस्त्र उपचार है । अब हमने उन्हें अपने भावानुसार वस्त्र अर्पण किये ताकि हमें वह अपनी भावनानुसार स्वरूप सुंदर लग सके ।

8. गन्ध :- सुगंधित इत्र या द्रव्य अर्पण करने को ही गन्ध अर्पण करना कहते हैं ।

सुगंधित क्या होगा ??

हमारे भक्तिमय भाव ।

9. पुष्प :- पुष्प अर्पित करना , यह सब अपने मन के भावों को अर्पित करना , या सुंदर आचरण , सुंदर सदाचार आदि पुष्पित पुष्पों को अर्पण करना ।

10. धूप :- सुगंधित समीर या वायु या सुगंधित वातावरण अर्पित करना । दूषित विचारों या सांसारिक विषयी विचारों का पूर्ण त्याग करना और अध्य्यात्मिक सुवास से महकाना ही धूप अर्पण करना है ।

11. दीप :- अपनी आत्मा रूपी दीपक जिससे ज्ञान का प्रकाश हो , उसे अर्पण करना । क्योंकि आत्मा ज्ञानस्वरूप है और इसी के प्रकाश में हम भगवान का तत्त्वतः दर्शन कर सकते हैं ।

12. यग्योपवीत :- अपने समस्त वैदिक, लौकिक स्मार्त कर्मों को भगवान को अर्पण करना ही यज्ञोपवीत अर्पित करना कहलाता है ।

13. नैवेद्य अर्पण :- अलग अलग मिष्ठान या पदार्थ अर्पण करना नैवेद्य कहलाता है । नैवैद्य का अर्थ होता है पका हुआ भोजन ।

अब यह भोजन क्या है ?

नैवैद्य का अर्थ पहले समझिये वह जिससे उसका विद्य हो सके , जाना जा सके ।

वह परिपक्व ज्ञान , वह परिपक्व भक्ति , वह परिपक्व तत्त्वज्ञान जिससे उस परम शक्तिमान स्वरूप का ज्ञान हो सके , पका हुआ , पुष्ट ज्ञान, उसको अर्पण करना ही नैवेद्य अर्पण करना कहलाता है ।

14. ताम्बूल , जल , दक्षिणा और आरती समर्पण :- ताम्बूल का अर्थ होता है पान ।

यह प्रकृति का स्वरूप होता है । ब्रह्मांड का स्वरूप होता है ।

इसी हेतु पान और सुपारी लक्ष्मी जी गणेश जी को चढ़ाने का प्रावधान है । पूजा के अवसर पर देखा होगा आपने कि सुपारी पर कलावा बाँध कर गणेश जी बना दिये जाते हैं पण्डित जी द्वारा ।

यह गण के अधिपति हैं , समस्त ब्रह्मांड के प्रतीक , इस हेतु सुपारी का प्रयोग होता है ।

तो पान से जैसे मुख की शुद्धि होती है ठीक उसी प्रकार शक्ति के कारण ही सृष्टि संचलन के समय होने वाले अवरोध से शुद्धि होती है या मुक्त होता है ।

ऐसे ही जल अर्पित किया जाता है ।

फिर उन्हें अपनी ओर से यथायोग्य दक्षिणा दिया जाता है ।

ये दक्षिणा क्या है ??

किसी चीज में दक्ष होने की स्थिति को दक्षिणा कहते हैं चाहे वह धन , सामग्री , पदार्थ या किसी भी योग्यता का ही हो । जिसमें निपुणता है या जो सबसे योग्य वस्तु है उसे दक्षिणा कहते हैं ।।

यह दक्ष प्रजापति जब यज्ञ कर रहे थे तो यथायोग्य जिस वस्तु व्यक्ति पदार्थ में वह दक्ष थे , उसको उन्होंने दान दिया । इस हेतु इसका नाम दक्षिणा पड़ा ।

परन्तु आज दक्षिणा के नाम पर 10 , 50 रुपये दान में दिया जाता है ।

खैर कलियुग है ।

चलिए आगे बढ़ते हैं ।

आरती । इसके बाद आरती ली जाती है ।

अपनी आत्मा के ज्योति को ज्ञानस्वरूप स्थिति में प्रज्वलित करके उन्हें भगवान के प्रत्येक अंग को दर्शाया जाता है और भावना की जाती है कि भगवान की समस्त शक्तियों का आरोहण इस आत्मा रूपी दीपक में हो जाये , भगवान की समस्त शक्ति ज्ञान वैराग्य श्री इत्यादि सब इसमें आ जाये ।

इसी हेतु आपने देखा होगा कि लोग आरती के बाद दीपक की लौ को हाथ से लगाकर सिर पर या शरीर पर लगाते हैं ।

इसका यह भावना है कि उस आरती के समय जो भगवान की शक्तियां और गुण उसमें आये हैं , वह मेरे अंदर प्रवेश हो ।

लेकिन लोगों को पता ही नहीं है इसका अर्थ बस उन्हें आरती लेने से मतलब है , कोई ध्यान धारणा या भावना नहीं बनानी है ।

15. नमस्कार :- इसके बाद उनका पूजन किया जाता है । नमः मतलब स्वयं का समर्पण । नमन करना , स्वयं को तिरोहित करना कि हे प्रभु ! मैं आपकी शरण में हूँ और मुझे अपना लो ।

16. स्तुति और क्षमापराध :- इस में भगवान से क्षमा याचना की जाती है कि मैं विचित्र पापी हूँ , और आप विराट व्यक्तित्व हैं , मुझे तो आप के अनुसार पूजन करना नहीं आता है । अगर मुझसे कोई त्रुटि हो गयी हो तो हे दीनानाथ , दीनबंधु , मुझे अल्पज्ञ अज्ञानी जानकर , मुझे पापी मानकर मेरे अपराधों को क्षमा कर देना और अपने चरणों से कभी विलग मत करना ।🙏🙏

तो यही षोडशोपचार ।।

अगर आप लोग समझ गए होंगे तो साधना कार्यक्रम में रूप ध्यान के अवसर पर जब आप लोगों को मैं कैलास या युगल सरकार के पास ले जाता था तो यह सारे कार्य आप लोगों से करवाता था उनके चरणों में ।

यह सब करवाता था आपको ।

वह भी बिना सामग्री के ।

तो आप लोगों को जो दे रहा हूँ वह समस्त शास्त्र वेदों पुराणों को मथ कर बस सार निकाल कर दे रहा हूँ ।

तो यही है षोडशोपचार ।

आप चाहे तो सहस्त्रोपचार कर सकते हैं ।

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि 16 ही करने हैं ।

ये तो उनके लिए है जो अभी साधना मार्ग में नए नए हैं और उनको आलम्बन की आवश्यकता है ।

फिर भी जितने लोग करते हैं भौतिक और पार्थिव रूप से करते हैं ।

उनके पीछे के प्रतीकों से बिल्कुल ही अनभिज्ञ रहते हैं ।

लेकिन आप लोगों को इसलिए यह सब ज्ञान दिया जा रहा है कि आप लोग तत्त्वतः सार समझकर उसका लाभ लें ।

बाकी का तो फिर :-

भज गोविंदं भज गोविंदं गोविंदं भज मूढ़मते ।

ये है ही ।।

Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक

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✨अगर आप श्वेत प्रेम रस संस्था से जुड़ना चाहते हैं और प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज जी के सानिध्य में प्रैक्टिकल साधना का लाभ लेते हैं तो नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

✨ अक्टूबर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर साधना समागम का आयोजन किया जा रहा है,जो कि 24 से 28 अक्टूबर 2026 तक प्रस्तावित है, इस 5 दिवसीय वृन्दावन महोत्सव में भी जो आना चाहते हैं, वह इस नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

8950072203, 9305529349


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DAY-3 ll राम तत्व दर्शन ll प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज || रामायण मंदिर मॉडल टाउन (बरेली,यू पी )सभी भक्तों द्वारा भ...
23/08/2026

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22/08/2026
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21/08/2026

DAY-1 ll राम तत्व दर्शन ll प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज || रामायण मंदिर मॉडल टाउन (बरेली)
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प्रश्न- प्रभु जी, मैं यह पूछना चाहता हूं कि भांग खाने के बाद ध्यान सही और अच्छा लगता है क्या ? या ऐसा कुछ है तो इस पर कु...
21/08/2026

प्रश्न- प्रभु जी, मैं यह पूछना चाहता हूं कि भांग खाने के बाद ध्यान सही और अच्छा लगता है क्या ? या ऐसा कुछ है तो इस पर कुछ बतलाइए कहाँ तक सत्य और स्पष्ट है ?
मैने देखा है कुछ संतो को और उन्होंने मुझसे खुद भांग की पुड़िया मंगवाई है ओर बोलते भी है कि यह गलत है पर ध्यान अच्छा लगता है इससे तो कृपया मार्गदर्शन करिए।

उत्तर:- प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज

तो क्या प्रमाण है कि वह संत हों, हो सकता है असंत भी हों !!

क्योंकि कलियुग का यही लक्षण है कि अधर्म धर्म का चोला पहन कर घूमेगा ।

आज यक हम संत की परिभाषा जान ही नहीं पाए ।

हम सन्त की परिभाषा उनके बाह्य रूप और कपड़ों के रंग से करते हैं जो अत्यंत ही विनाशकारी है ।

देखिये हर नशीली वस्तु का प्रभाव अलग अलग होता है ।

जो भी नशीली वस्तु ferment होकर बनती है , उस मादक पदार्थ का प्रभाव तामसिक माना जाता है ।

जो मादक पदार्थ धूम्र से ली जाती है , उसका प्रभाव राजसिक माना जाता है ।

जो भी मादक वस्तु अर्क के रूप में ली जाती है या सीधे वनस्पति से प्राप्त होती है उसका प्रभाव सात्विक माना जाता है ।

इनके भी प्रकार होते हैं , कुछ मादक द्रव्य संवेदना को कम करते हैं , कुछ hallucination या भ्रम उतपन्न करते हैं , कुछ उत्तेजना पैदा करते हैं , कुछ चंचलता खत्म करते हैं , कुछ ऐसे hormones का secretion करवाते हैं कि मनुष्य कुछ नहीं बस केवल उड़ता है और ऐसी बातें सोचवाता है कि मानो वह इस दुनियाँ का है ही नहीं ।

तो यह भाँग धतूरा इत्यादि इसी के अंतर्गत आते हैं जब मन को एक ही स्थिति में पहुंचाने का कार्य करते हैं ।

इनके सेवन से वह स्थिति भ्रम द्वारा उत्पन्न होती है मानो मनुष्य आकाश में विचरण कर रहा हो ।

तो इसीलिए इसका प्रयोग नए नए साधु जो इस मार्ग पर नया नया कदम रखते हैं , उनको सहारा देने के लिए प्रयोग होता था ।

लेकिन अब यह व्यसन के रूप में और आवश्यकता के रूप में विकसित हो गया है जो कि पूर्णतः गलत है।

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प्रश्न- क्या भाँग को प्रसाद के रूप में मानना चाहिए.

उत्तर-

भाँग का प्रयोग उन साधुओं के लिए बनाया गया था जो पहाड़ों पर रहते थे । क्योंकि पहाड़ों पर जो पानी होता है वह बहुत भारी होता है जिससे liver और अन्य अंगों पर असर पड़ता है , इसी के लिए इसका प्रयोग होता था । लेकिन कालांतर में आते आते यह एक प्रसाद के रूप में भगवान शंकर से जोड़ दिया गया।

Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक

Shwetabh Pathak
Shwet Prem Ras


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Note

✨यदि आप अपने शहर , नगर , ग्राम आदि में भी समागम करवाना हो तो वह सम्पर्क कर सकते हैं । college , Institutions , Management संस्थान , सरकारी संस्थान , company आदि में Motivational सत्र या व्याख्यान के लिए भी आप नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सूचना प्राप्त कर सकते हैं ।

✨अगर आप श्वेत प्रेम रस संस्था से जुड़ना चाहते हैं और प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज जी के सानिध्य में प्रैक्टिकल साधना का लाभ लेते हैं तो नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

✨ अक्टूबर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर साधना समागम का आयोजन किया जा रहा है,जो कि 24 से 28 अक्टूबर 2026 तक प्रस्तावित है, इस 5 दिवसीय वृन्दावन महोत्सव में भी जो आना चाहते हैं, वह इस नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

8950072203, 9305529349



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20/08/2026

प्रश्न- प्रभु जी, भोले बाबा के पूरे शरीर पर भस्म का क्या रहस्य है??? वो भस्म है क्या??प्रश्न- नवरात्रि में आहुति का अग्य...
20/08/2026

प्रश्न- प्रभु जी, भोले बाबा के पूरे शरीर पर भस्म का क्या रहस्य है??? वो भस्म है क्या??

प्रश्न- नवरात्रि में आहुति का अग्यारी का विशेष महत्व क्यों है ? भस्म क्यों लगाते हैं??

उत्तर:- प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज

यह सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म है, ब्रह्ममय है । इसी ब्रह्म से पुरुष और प्रकृति, जिसे आप शिव और शिवा भी कह सकते हैं , उन्होंने मिलकर इस सृष्टि की उत्पत्ति की और इसकी उत्पत्ति के कारण बने ।

इसीलिए भगवान को अर्धनारीश्वर के रूप में दिखाया जाता है ।

वही राम और सीता हैं । वही राधा और कृष्ण हैं । वही शिव और पार्वती हैं ।

एक वेद्यात्मक है तो दूसरा विद्यात्मा है ।

एक वेद्य है तो दूसरी उन वेद्य को जानने वाली विद्या हैं ।

एक शिव हैं तो दूसरी शक्ति हैं ।

ये शिव का मतलब आप लोग थोड़ा समझ लीजिए ।।

शिव का अर्थ है वह कल्याणमयी सत्ता ब्रह्म की जो जीवों के कल्याण हेतु इस सृष्टि के उत्पत्ति के कारक बने ।

और यह जो प्रेरणा है जीव कल्याणार्थ हेतु , यही शक्ति है ।

तो शिव शक्ति की प्रेरणा से शक्तिमान बनते हैं ।

यही महाविष्णु हैं और महालक्ष्मी हैं ।

यही शिव और शक्ति हैं ।

यही राम और सीता हैं ।

यही कृष्ण और राधा हैं ।

तो इन दोनों को सूर्य और चन्द्र कहा जाता है ।

इसी को अग्नि और सोम कहा जाता है ।

इसी को तेज और सोम कहा जाता है ।



इन्हीं दोनों के संयोग से सृष्टि की उत्पत्ति होती है ।

इसी कारण हमारे शरीर की उत्पत्ति होती है ।

इसी कारण एक सूर्य नाड़ी है जो तेज स्वरूप है और दूसरी चन्द्र नाड़ी है जो शक्ति का स्वरूप है ।

इसी हेतु आपने कई फ़ोटो देखी होगी जिसमें शिव शक्ति को अर्धनारीश्वर रूप में जब दिखाया जाता है तो पुरुष वाला भाग तपते स्वर्ण के मानिंद तेज रूप में दिखाया जाता है और स्त्री का भाग शांत चन्द्रमा के वर्ण का या गौर वर्ण का दिखाया जाता है ।।

तो सूर्य रूपी अग्नि से और चन्द्र रूपी सोम से इस जगत की सृष्टि हुई है ।

प्रत्येक चर अचर में यही दोनों विभिन्न रूपों से व्याप्त हैं ।

इसी हेतु इस जगत को *अग्निषोमात्मक* विश्व कहते हैं ।

अर्थात अग्नि और सोम से मिलकर यह बना है ।

कई बहुत पहले के लेखों में भी बताता रहा हूँ कि यह सम्पूर्ण विश्व तीन कारकों से बना है । यही बात Quantum mechanics करता है ।।

कर्ता , कारण और कार्य ।

ब्रह्म जीव माया ।

अरे आप स्वयं साधारण रूप से समझिये कि एक बालक को जन्म देने के लिए , पिता और माता दोनों चाहिए होते हैं ।

मतलब वीर्य रूपी तेज और रज रूपी सोम ।

अब इनके बीच प्रेरक शक्ति जब दोनों को एक करती है , तब इस भौतिक शरीर का जन्म होता है ।

अब समझिये कि जो पुरुष है , अब मैं जहाँ जहाँ पुरुष की बात करूं , वह परमपुरुष भगवान हैं और जहाँ प्रकृति की बात करूं , वह आदिशक्ति महामाया हैं ।।

तो पुरुष का शरीर है या शिव का जो घोर तेजोमय शरीर है , उसे अग्नि कहते हैं और अमृतरूपा सोम शक्ति का स्वरूप है ।

रुद्र या शिव या महाविष्णु का शरीर तेजोमय है और शक्ति या माया या प्रकृति का शरीर शांतिकारक है ।

अब ज्यादा हो रहा है लेकिन बीच में कुछ उठा दूँगा तो आप लोग कहेंगे कि ये बात कहाँ से आ गयी ।

लेकिन फिर भी बहुत छोटे में समझ लीजिए ।

दो तरह की शक्ति होती है ।

एक व्यापिका और दूसरी अव्यापिका ।

इनके पर्व होते हैं ।

वह 5 कलाओं से सम्पादित होते हैं ।

1. निवृत्तिकला

2. प्रतिष्ठा कला

3. मध्यवर्तिनी कला

4. शांति कला

5. शांतयातीता कला

इन्हीं कलाओं से प्रकृति का शोधन होता है ।

अब जो अमृत है , जो चन्द्र से या सोम से निकलता है या उसकी शक्ति है , वह प्रतिष्ठा नामक कला है ।

और जो तेज है , वह विद्या नामक कला है ।जो शांतिपद से प्राप्त होता है ।

ऐसे समझिये :-

शक्ति से ---- शांतयातीता पद ------ शान्ति पद ------- विद्यापद --------- प्रतिष्ठा पद -------- निवृत्तिपद

तो समस्त भूतों में ( यह आप और हमारे वाले भूत नहीं है , भूत का अर्थ होता है "*जो होता है*" वह समस्त भूतों में यह अग्नि और सोम है ।

अग्नि से तेज प्रकट होता है और सोम से रस प्रकट होता है ।

इसी के कारण चन्द्रमा या सोम से वनस्पतियों और औषधियों में रस प्रकट होता है ।

इसी कारण अनंत पूर्णिमा की रात्रियों को एकीकृत करके शरद पूर्णिमा पर भगवान ने सबको *महारास* जो परम रस है उसे जीवों को प्रदान किया था ।

बहुत ध्यान से समझियेगा । विषय गूढ़ होता चला जा रहा है लेकिन मैं पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि आप लोगों के स्तर से आकर समझा पाऊँ ।

कुछ बातें अभी नहीं समझ आएंगी , अभी बस ऐसे ही समझ लीजिए ।

तो यह अग्नि से तेज और सोम से रस यह चर अचर में व्याप्त है ।

इस तेज की वृत्ति दो प्रकार से होती है ।

1. सूर्यरूपा

2. अग्निरूपा

इसी तरह रस की वृत्ति दो प्रकार की है ।

1. सोमरूपिणी

2. जल रूपिणी

तेज या अग्नि विद्युत , अग्नि , ऊष्मा आदि के रूप में प्रकट होती है और रस जो है वह मधुर , तिक्त कषाय से लेकर विरह रस माधुर्य रस आदि के रूपों में प्रकट होती है ।।

तेज और रस के विभिन्न स्वरूपों ने ही इस सम्पूर्ण सृष्टि को धारण किया हुआ है ।

इसी से ब्रह्मा , विष्णु महेश से लेकर ब्रह्मांड का चर और अचर कार्य करता है ।

अगर यह तेज और रस न हो तो सब सुप्तावस्था में चले जाएं या अपनी सत्ता की स्थिति ही न रख पायें ।

तो अग्नि से अमृत की उत्पत्ति होती है ।

कैसे ??

अग्नि से ही रस प्राप्त होता है ।

पहले सृष्टि की उत्पत्ति या सांख्य योग दर्शन के लेखों में आपको बता चुका हूँ कि आकाश में विकार से वायु और वायु में विकार से तेज या अग्नि की उत्पत्ति और *अग्नि से जल की उत्पत्ति* , जल से पृथ्वी की उत्पत्ति ।।

अब दूसरी तरह से समझिये ।।

सूर्य से चन्द्रमा प्रकाशित होता है और चन्द्रमा से वनस्पतियों में रस या nutrients की उत्पत्ति होती है । रस की उत्पत्ति होती है ।

आ गया समझ ??

अब आगे बढ़ते हैं ।

तो अग्नि से अमृत या रस की उत्पत्ति ।

अमृतस्वरूप घी से अग्नि की वृद्धि होती है ।

इसलिए अग्नि और सोम को दी हुई आहुति विश्व या जगत के लिए हितकारी होती है ।

पृथ्वी की शस्य श्यामला भूमि से जो भी उत्पन्न होता है , उसे हविष्य बोलते हैं ।

आप लोग जिसे हवन सामग्री बोलते हैं ।।

जिसमें तरह तरह के अन्न से लेकर पृथ्वी से उत्पन्न और जो पुष्टिकारक होता है , वह सब कुछ होता है ।

आज बाज़ार वाले हवन सामग्री की बात नहीं कर रहा हूँ ।

यह तो न्यूनांश भी नहीं है मुख्य हविष्य का ।

तो पृथ्वी या भूमि हविष्य का उत्पादन करती है ।

वर्षा अर्थात रस , इस शस्य को बढ़ाती है , मतलब हरियाली को ।

वर्षा से ही हविष्य का उत्पादन होता है ।

वर्षा किससे उत्पन्न होती है ??

तेज से , अग्नि से , सूर्य की गर्मी से जो रस है , वह बादल बनता है ।

मतलब फिर यहाँ अग्नि से रस उत्पन्न हुआ ।

अब यह रस हविष्य का उत्पादन करेगी , पृथ्वी की हरियाली बढ़ाएगी ।

जिससे यह अग्निषोमात्मक विश्व या सृष्टि या जगत टिका हुआ है ।

इसी हेतु इसका ज्ञान कराने के लिए अग्नि में हविष्य डाला जाता है जो स्वाहा और स्वधा के माध्यम से प्रकृति ग्रहण करती है ।

अब जो अग्नि है ऊपर की ओर प्रज्ज्वलित होता है , जहाँ सोम सम्बन्धी अमृत या रस है ।

और जहाँ तक अग्नि का स्थान है , वहाँ से सोम सम्बन्धी अमृत या रस नीचे की ओर झरता है ।

अब फिर आ जाईये शिवलिंग पर ।।

शिवलिंग की ज्योति ऊपर की ओर जाती हुई प्रतीत होती है ।

शिवलिंग ज्योति का स्वरूप है ।

और जो शिवलिंग के ऊपर घड़े से जल टपकता हुआ दिखता है न मंदिरों में या जो आप लोग दुग्धाभिषेक ( अमृत का रूप ) या जलाभिषेक ( रस का रूप ) करते हैं , यह उसी का स्वरूप है , प्रतीक है ।

इसलिए अग्नि ऊपर की ओर और जल नीचे की ओर ।

कालाग्नि स्वरूप शिव नीचे हैं और शक्ति ऊपर हैं ।

इसी हेतु सभी शक्तिपीठ आपने देखा होगा पहाड़ों पर होते हैं ।

कोई भी देवी देख लीजिए , वह दूरस्थ पहाड़ों पर होंगी । अरे राधा जी तक बरसाने में ब्रह्म पर्वत पर हैं ।

माँ पहाड़ा वाली , सुना ही होगा आप लोगों ने ।

तो जहाँ तक अग्नि है , उसकी गति ऊपर की ओर है और जो जल का आप्लावन है , गति है , नीचे की ओर है ।

आधार शक्ति ने ही इस उर्ध्वगामी कालाग्नि को धारण कर रखा है और नीचे की ओर गति करने वाला सोम या रस या अमृत या जल शिव शक्ति के आधार पर प्रतिष्ठित है ।

अब थोड़ा और बता देता हूँ , mood बना है ।

जब प्रलय आता है सावर्णतक अग्नि ( यह हमारी वाली अग्नि नहीं है ) द्वारा सम्पूर्ण सृष्टि जला दी जाती है तो यह सम्पूर्ण जगत भस्मसात हो जाता है ।

यही अग्नि का वीर्य है , तेज है । इसे ही भस्म कहते हैं ।

भस्म मतलब ??

भ: माने प्रकाश या तेज म माने मिल जाना ।

जो तेज में समा गया हो , वह भस्म बन जाता है ।।

इसी भस्म को अग्नि का वीर्य कहते हैं ।

इसे ही विभूति कहा जाता है ।

समस्त भूतों को स्वयं में लीन करके जो तत्त्व बचता है वही विभूति कहलाती है ।

यही भस्म और विभूति भगवान शिव को धारण किये हुए बताया गया है ।

लेकिन आजकल के लोग ये सब कहाँ जानते हैं । अगर बता दो तो फिर वही कबीरपंथी , हिन्दू के वेश में छुपा मुल्ला आदि लोग कहने लगेंगे ।

अस्तु इसी भस्म अर्थात तेजोमय स्वरूप में मिल जाना , इसी तत्त्व के कारण सनातन धर्म में इस पंचभौतिक रस से व्याप्त शरीर को मुँह में घी भरकर जो रस का प्रतीक है , आहूत किया जाता है , अर्थात मृत्यु उपरांत जला दिया जाता है ।

इसी भस्म और विभूति को जो तत्त्वतः जान लेता है , वह जीव माया के पाश से मुक्त हो जाता है ।

इसीलिए अग्नि दाह संस्कार का प्रचलन हमारे सनातन धर्म में है कि इससे जीव मुक्त हो जाएगा ।

हालांकि वह बिचारे नहीं समझ पाते कि कैसे मुक्त हो जाएगा ।

उन्हें तो भस्म के नाम पर शमशान में भस्म से होली खेलनी है , मनोरंजन का साधन बना देना है इसे ।

तो जो इस अग्नि के परम गूढ़ स्वरूप को जैसा मैंने बताया है उसे सही सही जानकर अमृत का दोहन कर लेता है साधना द्वारा , वह अग्निषोमात्मक जगत या मायामय संसार के बन्धन से निवृत्त होकर दुबारा जन्म नहीं लेता , अर्थात मुक्त हो जाता है ।

बहुत ही तोड़ तोड़ कर निचले पायदान पर आकर समझाया है , फिर भी मुझे ऐसा लगता है कि बहुत से लोगों को नहीं समझ आएगा ।

हाँ , जिसने Physics और chemistry में Phd किया होगा , वह कुछ कुछ relate कर लेगा ।

बाकी के लोग बस इसे संग्रहित कर लीजिये , कभी तो वह समय आएगा साधना करते करते , तत्त्वज्ञान पुष्ट होते होते कि यह सब बातें धीरे धीरे हृदय में उतरती जाएंगी , समझ में आती जाएंगी और अनुभूत कर पाएंगे आप ।।

★ इसमें जैसे लग रहा है कुछ छूट गया है ।

यह शिव नीचे और शक्ति ऊपर ।

यह आप लोगों ने कई अश्लील फोटो देखी होंगी , जिसमें इनको अश्लीलता से दिखाते हैं ।

तो वह बिचारे अपनी निकृष्ट बुद्धि के स्तर पर उस तत्त्व को ढाल देते हैं ।

तो हम लोगों को उन मूर्खों पर नहीं जाना है , न ही उन अश्लील photos से कोई मतलब रखना है ।

इन्हीं photos को ले लेकर जय भीम प्रजाति , और अन्य धर्म के लोग हमारा मजाक उड़ाते हैं कि तुम्हारे शिव और शक्ति क्या कर रहे हैं ।

तो ये बिचारे तत्त्व नहीं जानते तो अपनी बुद्धि से उसे आकार दे देते हैं ।

तो हमें इन सबसे बचना होगा ।।

और सही सही ज्ञान प्राप्त कर इन अंध माया से निकल जाना है ।

अन्यथा प्रतीक ढोते ढोते कर्मकांड करते करते अनंत जन्म बीत जाएंगे ।

जो यह तत्त्वज्ञान या सिद्धांत मैं बताता हूँ यही शिवतत्त्व है , यही विष्णु तत्त्व है , यही कृष्ण तत्त्व है ।

भगवान शंकर माता पार्वती से बोलते हैं कि हे उमा ! यह मूढ़ पुरुष माया से मोहित होकर संसारी प्रतीकों के बन्धन में बंधा हुआ *पशु* कहलाता है ।

इस शिव तत्त्व या राम तत्त्व के ज्ञान से शून्य होने के कारण उसकी बुद्धि नाना प्रकार के कर्मकांडों में उलझ कर , आसक्त होकर मूढ़ता को प्राप्त हो जाती है ।

देखिये ये मैं नहीं कह रहा हूँ , साक्षात मक्केश्वर महादेव कह रहे हैं ।

श्वेताभ पाठक
Shwetabh Pathak
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