07/06/2026
घरेलू LPG सिलेंडर पर चुपके से ₹29 की एक और नई 'चपत' लगा दी गई। पिछले 90 दिनों में यह दूसरी बार है जब जनता की रसोई में सीधे आग लगाई गई है, जिससे कुल मिलाकर ₹89 का सीधा चूना लग चुका है।
इससे पहले ठीक 7 मार्च 2026 को भी बड़े प्यार से ₹60 का तगड़ा झटका दिया गया था। अब इस ताज़ा बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में 14.2 किलोग्राम वाले सिलेंडर का भाव ₹942 के पार पहुंच गया है।
यह आंकड़ा इस बात का जीता-जागता सबूत है कि सरकार के लिए 'जनता' का मतलब सिर्फ एक चलती-फिरती टैक्स देने वाली मशीन है, जिसका तेल तब तक निकालना है जब तक वह पूरी तरह खाली न हो जाए।
साल 1953 में जब देश के पास संसाधनों की भारी कमी थी, तब पूर्ववर्ती दूरदर्शी सोच के तहत 'HMT लिमिटेड' जैसी बुनियादी संस्था की नींव रखी गई, ताकि देश तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बन सके। इसके तुरंत बाद, साल 1954 में 'भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड' (BEL) और साल 1964 में 'भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड' (BHEL) जैसे विशाल सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) की स्थापना की गई।
इन संस्थाओं को बनाने का एकमात्र ठोस मकसद यह था कि देश में भारी उद्योगों का विकास हो, युवाओं को सुरक्षित सरकारी रोजगार मिले और बाजार में वस्तुओं की कीमतें नियंत्रित रहें। ये वो संस्थाएं थीं जिन्होंने बिना आम जनता की जेब पर अतिरिक्त टैक्स का बोझ डाले देश को अपने पैरों पर खड़ा किया।
इसके विपरीत पिछले 12 सालों (यानी पूरे 4,380 दिनों) के इस तथाकथित 'अमृत काल' का हकीकतनामा देखिए। इस सरकार ने देश को आगे बढ़ाने के लिए एक भी नया भिलाई स्टील प्लांट, भाखड़ा नांगल जैसा कोई बड़ा बांध या बुनियादी ढांचे को मजबूती देने वाली कोई नई महारत्न संस्था खड़ी नहीं की।
इसके विपरीत, इनके 24 घंटे के काम का असली वित्तीय नतीजा यह रहा कि साल 2014 में जो पूरे देश पर कुल कर्ज महज ₹55,00,000 करोड़ था, वह इस शासनकाल की अदूरदर्शी नीतियों के कारण 300% से ज्यादा की भयावह छलांग लगाकर साल 2026 तक करीब ₹1,75,00,000 करोड़ के पार पहुंच गया है।
यानी विकास के नाम पर देश के हर एक नागरिक के सिर पर लाखों रुपये का कर्ज थमा दिया गया है, जबकि पूर्ववर्ती दौर में बनाई गई राष्ट्रीय संपत्तियों और प्रमुख हवाई अड्डों को निजी हाथों में सौंपने का काम धड़ल्ले से चल रहा है।
साल 2014 से पहले जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें $140 प्रति बैरल की ऐतिहासिक ऊंचाई पर थीं, तब पूर्ववर्ती सरकार अपनी जेब से सालाना ₹40,000 करोड़ से अधिक की भारी-भरकम सब्सिडी खुद वहन करती थी, ताकि देश के आम नागरिकों को महज ₹410 में रसोई गैस सिलेंडर उपलब्ध कराया जा सके।
जनता को राहत देना उनकी नीति का मुख्य हिस्सा था। लेकिन आज की सरकार का हाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल और गैस की कीमतें घटकर $75 प्रति बैरल के आसपास आ चुकी हैं, फिर भी बजट में रसोई गैस सब्सिडी को घटाकर लगभग शून्य के बराबर (मात्र ₹11,925 करोड़) कर दिया गया है।
तेल कंपनियां हर सिलेंडर पर भारी मुनाफा कूट रही हैं और जनता से ₹942 वसूले जा रहे हैं। चालाकी से टैक्स वसूलने की इस नई रणनीति ने देश के मध्यमवर्ग का दिवाला निकाल दिया है।
आम आदमी को डिजिटल इंडिया का सपना दिखाकर साल 2026 की शुरुआत से ही बैंकों ने न्यूनतम बैलेंस (Minimum Balance Penalty) न रख पाने के एवज में देश के सबसे गरीब खाताधारकों की जेबों से पिछले कुछ सालों में ₹21,000 करोड़ से अधिक की राशि जुर्माने के रूप में वसूल ली है।
इसके साथ ही, नेशनल हाइवे पर फास्टैग (FASTag) टोल टैक्स की दरों में चुपके से 5% से 8% की बढ़ोतरी कर दी गई है। दूध, दही और आटे जैसी सबसे बुनियादी चीजों पर भी 5% से 18% तक का GST ठोक दिया गया है, जिससे गरीब की थाली से निवाला गायब हो रहा है।
इसके उलट, बड़े औद्योगिक घरानों के कॉर्पोरेट टैक्स को 30% से घटाकर 22% कर दिया गया, जिससे सरकारी खजाने को सीधे सालाना ₹1,45,000 करोड़ का भारी नुकसान हुआ।
पूर्ववर्ती दौर में जहां 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम' (RTE) और 'खाद्य सुरक्षा कानून' के जरिए देश के 82% नागरिकों को कानूनी रूप से अधिकार संपन्न और सुरक्षित बनाया गया था,
आज 'उज्ज्वला योजना' के तहत बांटे गए 10.3 करोड़ गैस कनेक्शनों में से करीब 4.13 करोड़ परिवार ऐसे हैं जिन्होंने बढ़े हुए दामों के कारण साल में एक बार भी अपना सिलेंडर दोबारा रीफिल नहीं करवाया है।
बुजुर्गों को रेल टिकटों में मिलने वाली 40% से 50% की जो रियायत दशकों से मिल रही थी, उसे साल 2020 में एक झटके में बंद करके सरकार ने बुजुर्गों की जेब से ₹5,000 करोड़ से ज्यादा अतिरिक्त वसूल लिए, जबकि बच्चों के 'मिड-डे मील' (PM पोषण) के बजट में साल-दर-साल लगातार कटौती की जा रही है।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों में मई से अब तक कुल ₹7.50 प्रति लीटर और सीएनजी (CNG) में करीब ₹6 प्रति किलोग्राम की भारी बढ़ोतरी करके हर तरफ से आम आदमी को घेर लिया गया है।
एक तरफ देश की आम जनता की वास्तविक आय और क्रय शक्ति लगातार घट रही है, और दूसरी तरफ देश के शीर्ष 1% अति-अमीर लोगों के पास देश की कुल राष्ट्रीय संपत्ति का 40% से अधिक हिस्सा केंद्रित हो चुका है।
₹942 का यह घरेलू सिलेंडर और ₹1,75,00,000 करोड़ का यह राष्ट्रीय कर्ज इस बात का अकाट्य प्रमाण हैं कि मौजूदा नीतियां जनहित के लिए नहीं, बल्कि केवल चुनिंदा पूंजीपतियों के वित्तीय हितों को साधने के लिए बनाई गई हैं।
जनता अब इस आर्थिक दमन को बर्दाश्त नहीं करेगी और इसका पुरजोर विरोध करती है!