06/08/2025
. साहित्यकारक उत्तराधिकारी *********************
पहिने ई साफ क’ ली जे ‘साहित्यकार’केँ मानैत छी की? पद मानैत छी की पदबी मानैत छी? जँ पद मानैत छी तँ जाहि पदपर एखन अहाँ छी ताहि पदकेँ अहाँसँ पहिने जे खाली कयलनि तनिक उत्तराधिकारी अहाँ भेलहुँ आ अहाँक बाद जे औताह से अहाँक उत्तराधिकारी होयताह। जेना राष्ट्रपतिक रूपमे डा.अब्दुल कलामक उत्तराधिकारी भेलीह प्रतिभा पाटिल। अपने प्रदेशमे मुख्यमंत्रीक पदपर राबड़ी देवीक उत्तराधिकारी भेलाह नीतीश कुमार। तहिना, साहित्य अकादेमीमे मैथिली साहित्यकारक हेतु पदपर के ककर उत्तराधिकारी भेल छथिन, ई के नहि जनैत छी? जँ एकरा पदबी मानैत छी, तखन तँ उत्तराधिकारक प्रश्ने नहि उठैत अछि। ई व्यक्तिस्वायत्त होइछ आ ओही व्यक्तिक संगे चल जाइछ। अहाँ बी.ए. छी तँ ई आजीवन अहाँक संग लागल रहत आ अहाँक संगहि चलो जायत।
साहित्यकारकेँ पद मानबामे एक संशय अछि। पद एक आसन थिकैक जे स्थिर रहैछ। लोक ओहिपर जाइत-अबैत रहैत अछि आ उत्तराधिकारीक शृंखला बनैत चलैत अछि। मुदा, किछु पद एहनो होइत छैक जे घोषित वा अघोषित आजीवन लेल होइत छैक, जेना कोनो नामी ट्रष्टक अध्यक्षपद। जेना स्थानीय स्तरपर कोनो साहित्य-संस्कृति परिषद् वा सेवासंस्थानक महासचिव आ अध्यक्षक पद। ओकर उत्तराधिकार संस्थाक प्रकृति आ ओहिपर आसीन व्यक्तिक बुद्धि-कौशलपर निर्भर करैछ। ई वंशानुगत भैयो सकैछ, नहियोँ भ’ सकैछ। साहित्यकारकेँ पद मानी तँ एही वर्गमे राखि सकैत छी।
मुदा, उत्तराधिकारक प्रश्न उठिते किएक अछि तँ अर्जित सम्पत्तिक मालिकाना हक लेल। सम्पत्तिमे दृश्यमान (धन आ पुस्तकादि) तथा भाव (यश-प्रतिष्ठा) दुनू अबैछ।
जहाँ धरि धनक प्रश्न अछि, एहिमे द्रव्य (टाकापैसा), पुरस्कार वा स्कालरशिपमे प्राप्त एवं सम्मेलन-संगोष्ठीसँ अर्जित राशि, पोथीक रायल्टी आदि अबैत अछि। एकर उत्तराधिकारमे कोनो संशय नहि अछि। जनिकर थिकनि से, आ जनिका भेटतनि सेहो– दुनू पक्ष निश्चिन्त रहैत छथि। तेसर पक्षक गुंजाइश नहि छैक। मैथिली साहित्यकार वर्गमे ई स्थिति, एकाध अति भाग्यशालीकेँ छोड़ि, एखन आयब बाँकी अछि।
आब आउ प्रकाशनपर। ई मिथिलेक माटि थिक जे एहि ठाम बेसी साहित्यकारक उत्तराधिकारी अपन पिता वा अभिभावकक बतहपनीकेँ (जे पोथी छपयबामे धनकेँ बेर-बेर फूकैत छथि) चुपचाप सहैत कूही होइत रहैत अछि, मुदा विरोधमे मुँह नहि खोलैत अछि।
रहल पुस्तक-पत्रिकादि। साहित्यकारक लगमे पोथी दू कोटिक रहैत छनि– एक अपन, जे खुजल हाथेँ बिलहलाक बादो गेँटक गेँट पड़ल घरकेँ छेकने रहैत छनि। दोसर– आनक देल, सादर-सस्नेह उपहृत। कीनिक’ अपन घर पोथीसँ छेक’वला एकाध सनकी सेहो छथि, जनिक भगवाने मालिक! जँ साहित्यकार कने नामी रहलाह, चलाचलतीवला भ’ गेलाह, रेफरी-तेफरी, जूरी-तूरी, केन्द्रीय संस्थाक सदस्य-तदस्य, तखन तँ हुनका ओत’ पोथीक वर्षा तँ नहि कहब, (मैथिलीमे पोथीक वर्षा हो, ई दिन नहि आयल अछि) तखन अबाहि लगले रहैत छनि। अपन पोथी आ एहन पोथी मिलाक’ तथा किछु पत्र-पत्रिका सेहो लगाक’ तीन-चारि आलमारी जोगर बहुत गोटेक ओहि ठाम पोथी होयतनि।
बेसी साहित्यकार भाड़ाक घरमे रहनिहार, मध्यवित्त परिवारक, शहरमे दू-तीन छोट-छोट कोठलीमे सपरिवार निर्वाह करबाक वाध्यता। गामोवलाकेँ जगहक सिकस्तिए। परिवारक आन-आन सदस्यकेँ अपन-अपन रुचि, अपन-अपन बेगरता। ताहिमे ओकरा लोकनिक दृष्टिमे अवांछित एतेक रासे पोथीक टाल। बाजत की? एम्हर साहित्यकार महाशयकेँ भिन्ने व्यथा। हुनक बाद की होयत ओकर? धीयापूताकेँ साहित्यसँ मतलब नहि। मतलबो तँ कत’ रहत कत’ ने! कत’-कत’ उघने फिरत एहि जंजालकेँ! आ किएक उघत? एखने, जखन अपनो अबूह लगैत छनि, की करता एकर? कत’ रखता? ककरा देथिन? तखन हिनक धीयापूता एकर कोन गति करतैक, से सोचि-सोचि काँपि जाइत छथि।
साहित्यकार सोचैत छथि– समाजमे हुनक जे दू पाइ मोजर छनि से एही ल’क’, दू गोटे पुछैत छनि से एही गुनपर, सालमे दस-बीस ठाम, लगो-दूरो, जे घुमैत-फिरैत छथि, आदरपूर्वक जे हिनका बजाओल जाइत छनि से एही कारणे। ताहि सम्पत्तिक उत्तराधिकार ककरा देथिन, तेहन क्यो नजरिपर अबैत नहि छनि। पुरस्कार आ विदाइक उत्तराधिकारी तँ घरेमे छनि, मुदा ओ पोथीक जंजालक उत्तराधिकार स्वीकार करबा लेल, हिनका लगैत छनि, तैयार नहि छनि।
कोनो तेहन सार्वजनिक पुस्तकालयो नहि छैक, जत’ ई अपन एहि सम्पत्तिकेँ दान क’ देथिन। पटनामे एक ‘समिति’ अछि, सचेतन, जगजियार, जे पोथी दानस्वरूप ग्रहण करैछ। पुस्तकालयमे सजाक’ रखने अछि। मुदा पोथी तँ सजाक’ राख’वला वस्तु थिक नहि। ओकर सार्थकता तँ ओकर उपयोगमे छैक। पोथीक उपयोग तँ देखला मात्रसँ नहि भ’ सकैछ, छूबि-छाबि लेलासँ नहि भ’ सकैछ। अध्ययन कयलासँ होइछ। ताहि लेल व्यवस्था चाही। संध्याकाल गोटेक घंटा खुजलासँ पोथीक उपयोग लोक कोना क’ सकत? एखन तँ कम पोथी छैक, तेँ एक छोट सन कोठलीमे सजाक’ राखल छैक, बेसी भ’ गेने गेँटिक’ कोनो दोसर कोठलीमे जाकि देल जयतैक। बाहरी लोकक आस्था तखने जमतैक जखन ओकरा लगतैक जे एहि प्रभागक विकास लेल संस्थाक सामूहिक नेतृत्व गतिशील अछि। तकर अभावमे लोककेँ ताहि दिस उत्साह नहि होइत छैक। एखनो जे छैक, तकर कतेक उपयोग होइत छैक, ओकर विवरण आइ धरि पत्रिकाक माध्यमे लोकक सोझाँ नहि आनल गेल अछि। कोनो संस्था हो, जे अपन पत्रिकामे घर-बाहरक लोकसँ पोथीक माङ तँ सभ अंकमे करैत अछि, किन्तु समाजकेँ ई सूचना देब आवश्यक नहि बुझैत अछि जे कोनो खास त्रैमासमे अथवा कोनो एक वर्षमे कतेक गोटे ओहि पुस्तकालयसँ लाभ उठौलनि अछि। की चाही नहि से? विश्वविद्यालयक पुस्तकालय सभक सेहो यैह हाल अछि। दू-एक घंटा खूजल रहत। ताहि बीच ओकर अहाँ जतेक-जेहन उपयोग क’ सकी। पोथीक सुरक्षाक जवाबदेहीसँ सभ अपनाकेँ बचबैत रहत।
प्रत्येक व्यक्तिक ई आकांक्षा रहैत छैक जे ओकर देलहा वस्तुक नीक जकाँ संरक्षण हो, बेसीसँ बेसी लोकक उपयोगमे आबय, सुरक्षित रहय। से आश्वस्त नहि रहलासँ ओ ओहि दिससँ उदासीन भ’ जाइत अछि। तखन यैह सोचि सन्तोष करैछ जे– ‘होइहें सोइ जो राम रचि राखा’। जे भावी! तैयो साहित्यकार पोथी छपायब छोड़ैछ नहि, पोथी जमा करब जारिए रखैछ, घरकेँ भरनहि चलैछ। ओ अपन मनकेँ कहैछ– जे विधाता हुनका साहित्यिक रुचि देलथिन अछि, साहित्य लिखबा-पढ़बा दिस प्रवृत्त कयलथिन अछि, पुस्तक-सम्पदासँ घरकेँ समृद्ध कयलथिन अछि, वैह एकरा गतियो लगौथिन, एकर उत्तराधिकारियो तकथिन।
साहित्यकारक भाव-सम्पत्ति (यश-प्रतिष्ठा)क उत्तराधिकार सेहो परिवारक रुचि-परिष्कारपर निर्भर करैछ। जकर परिवार साहित्यसँ कटि जाइत छैक, धीयापूता की तँ बुड़िया जाइत छैक की आन क्षेत्रमे बढि जाइत छैक, ताहि समाजमे मैथिली साहित्यकारपूर्वजक यश-प्रतिष्ठा सामान्यत: कोनो माने नहि रखैत छैक। किन्तु, सौभाग्यवश जनिक दोसरो पीढी साहित्यिक उत्तराधिकार लेल प्रस्तुत भ’ जाइत छनि, से भने ई सोचि अपन सौभाग्यपर गर्व करथु जे हुनक यश-प्रतिष्ठाकेँ आर उज्ज्वल कयनिहार उत्तराधिकारी तैयार भ’ गेलथिन अछि, मुदा प्रकृतिक गति के जनलक अछि? के जनलक अछि जे हुनक अपन सन्तान हुनक सारस्वत सम्मानकेँ बढौनिहारे होयथिन, खोँच लगौनिहार नहि? देखैत तँ यैह छी जे कविकोकिल विद्यापति आ कवीश्वर चन्दा झाक उत्तराधिकारी परवर्ती समस्त सारस्वत समाज भेलनि, क्यो अपन नहि, क्यो आन नहि।
–भीमनाथ झा
(2011)