Babujik Pustakalay : बाबूजीक पुस्तकालय

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Babujik Pustakalay : बाबूजीक पुस्तकालय बाबूजीक पुस्तकालय, मैथिली भाषा आ साहित्य के आजुक नव पीढ़ी तक पहुँचाबय लेल समर्पित अछि।

                                       के संयोजन में   नाम सँ मिथिलाक विभिन्न कला सँ बनल सामग्री सबके उपलब्धता सुनिश्चित...
18/01/2026




के संयोजन में नाम सँ मिथिलाक विभिन्न कला सँ बनल सामग्री सबके उपलब्धता सुनिश्चित करैत अछि अहाँ सबलेल।
MithilaPainting MadhubaniPainting सँ सजल साड़ी, सूट, कुर्ती, दुपट्टा, पाग, दोपटा, जूट बैग, पेंटिंग, आरो अनेकों उपहार उपलब्ध अछि।
विवाह, उपनयन आदि समस्त आयोजन मे उपयोग होबयवला बस्तु संगहि अन्य MakeInMithila MadeInMithila CustomizedProducts उपलब्ध अछि।


सादर धन्यवाद,
मैथिल मंच
8826566136
Maithil Manch :: The Mithila Art Store 082078 20236, 7782850336, 9296326049

एहि प्रकारक निस्सन डेग आवश्यक अहि। हार्दिक धन्यवाद आहाँक प्रति....
25/12/2025

एहि प्रकारक निस्सन डेग आवश्यक अहि। हार्दिक धन्यवाद आहाँक प्रति....

07/10/2025

॰👞जूते की अभिलाषा👞॰
——————————————————————-
चाह नहीं न्यायाधीशों के शीशों पर फेंका जाऊँ ,
चाह रही अतिवाचालों के मुख जड़ूँ भाग्य पर इतराऊँ ,
चाह रही मैं भ्रष्ट व्यवस्था को अपमानित कर आऊँ ,
चाह रही मैं राष्ट्रद्रोहियों को सुजा सुजा कर सहलाऊँ ,
मुझे फेंक देना अधिवक्ता गीला करके कीच समेत ,
जहाँ अधर्मी बुद्धिजीवी जीभ चलायें नीच अनेक,
सुदीप भोला
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चेतना समिति, पटना एवं अछिञ्जल, दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित मिथिरंग नाट्य उत्सव17 से 19 सितम्बर 2025 तक विद्या...
15/09/2025

चेतना समिति, पटना एवं अछिञ्जल, दिल्ली
के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित

मिथिरंग नाट्य उत्सव
17 से 19 सितम्बर 2025 तक विद्यापति भवन, पटना में संध्या 6 बजे

सादर आमंत्रण /हकार

अछिञ्जल दिल्ली एवं चेतना समिति, पटना के संयुक्त तत्वावधान में मिथिरंग नाट्य उत्सव, मैथिली नाटकों का उत्सव, का आयोजन दिनांक 17 से 19 सितम्बर 2025 तक विद्यापति भवन, पटना में संध्या 6 बजे से आयोजित किया जा रहा है | इस आयोजन में तीन मैथिली नाटक, लोक नाट्य संगीत और लोक नृत्यों की प्रस्तुति होनी है | प्रतिदिन कार्यक्रम का शुभारम्भ मैथिली परम्परानुसार मिथिला की अमूर्त संस्कृति तत्व आवाहन संगीत ‘रसनचौकी” के साथ होना तय हुआ है |

कार्यक्रम के पहले दिन उदघाटन सत्र के साथ महेंद्र मलंगिया लिखित और अभिषेक देवनारायण निर्देशित रंग अभ्युदय, दिल्ली की प्रस्तुति “टूटल तागक एकटा ओर” की प्रस्तुति होनी है| यह नाटक जीवन के अच्छे-बुरे, श्वेत-स्याह राग-रंग, अन्हरिया-इजोरिया में रचा-बसा प्रेम और घृणा, व्यक्ति की अस्मिता, निर्णय लेने का सामर्थ्य और अवसर, किसी एक क्षण की पीड़ा को जीवनपर्यंत भोगने के लिए अभिशप्त होना, आदि आदि अनेकों द्वंद और उससे जूझते दो व्यक्तियों का आर्तनाद है यह नाटक। इस नाटक की यह आंठ्वी प्रस्तुति है| इससे पहले इस नाटक की प्रस्तुति सीधी, ग्वालियर, आजमगढ़, दिल्ली आदि स्थानों पर देश के प्रमुख नाट्य समारोहों में किया जा चुका है|

कार्यक्रम के दुसरे दिन मैथिली के कालजयी रचनाकार स्व० हरिमोहन झा का जन्म दिवस है | कार्यक्रम के पहले सत्र में, इस अवसर पर स्व० हरिमोहन झा पर केन्द्रित एक विचार गोष्ठी के बाद उन्हीं द्वारा लिखा गया एक कथा “पांच पत्र” पर केन्द्रित नाटक ‘सुनिते करय हरान’ नाटक का मंचन किया जाना है| जिसका नाट्य रूपांतरण किया अहै महेंद्र मलंगिया ने और निर्देशन अभिषेक देवनारायण ने| इस नाटक को प्रस्तुत करेंगे अछिञ्जल, दिल्ली के कलाकार | इससे पहले इस नाटक की पांच प्रस्तुतियां हो चुकी है, यह इसकी छठी प्रस्तुति है |

कार्यक्रम के तीसरे दिन के पहले सत्र में संध्या 5.30 से मैथिली लोक नाट्य संगीत का आयोजन किया जाना है, जिसे श्री यदुवीर यादव के संयोजन में कल्यानपथ दायिनी, खुटौना के लोक कलाकार | लोक नाट्यों में संगीत पक्ष सबसे प्रमुख होता है| इसकी अलग से प्रस्तुति की एक नयी परम्परा का आवाहन करेंगे कल्यानपथ दायिनी, खुटौना के कलाकार | तीसरे दिन के दूसरे सत्र में मिथिला की पारंपरिक छकरबाजी नाच की प्रस्तुति बजरंग मंडल के संयोजन में प्रस्तुत करेंगे नारी उदगार संस्थान, मधुबनी के कलाकार| छाकराबाजी नाच अपने अस्तित्व के संरक्षण हेतु संघर्षरत है इस परिस्थिति में इसकी प्रस्तुति पटना जैसे सांस्कृतिक उर्वरक भूमि पर होना आशान्वित करता है| तीसरे दिन के अंतिम सत्र में मैथिली नाटक “अराति द डार्क साइड ” की प्रस्तुति होनी है | यह नाटक, हिन्दी नाटक तमाचा का मैथिली भावांतरण है जिसे लिखा है काश्यप कमल ने और निर्देशन किया है प्रियंका शर्मा ने | इसे प्रस्तुत करेंगे अछिञ्जल, दिल्ली के कलाकार |

प्रतिदिन कार्यक्रम का शुभारम्भ मैथिली परम्परानुसार मिथिला की अमूर्त संस्कृति, गुरु महेंद्र राम के नेतृत्व में आवाहन संगीत ‘रसनचौकी” के साथ होना तय हुआ है | रसनचौकी वादन के वगैर किसी भी अनुष्ठानिक कार्य को संपन्न नहीं माना जाता है | इसी परम्परानुसार इस नाट्य अनुष्ठान भी रसनचौकी वादन के वगैर सम्पूर्ण नहीं माना जा सकता है |

आपसबसे यह अनुरोध है कि इस नाट्य अनुष्ठान में तीनों दिन उपस्थित होकर इसका साक्षी बनें और अपने ईष्ट-मित्रों को भी इसका साक्षी बनाने का अनुरोध करें |

12/09/2025

हम अखन धरि बुझैत छलौं जे.......

चंदा मांगल जाइत छैक।
दान देल जाइत छैक।
खैरात बांटल जाइत छैक।

मुदा आब लगैत अछि जे....

चंदा वसूलल जाइत छैक।
दान लेल जाइत छैक।
खैरात लूटल जाइत छैक।
............अरुण कुमार मिश्र "अरुणोदय"

🌸 संघ शताब्दी गीत 🌸भारत माँ के लाल सभी,संगठित होकर चलें।शताब्दी की इस वेला में,नव युग का दीप जलें।।संघध्वज की गाथा गाएँ,...
09/09/2025

🌸 संघ शताब्दी गीत 🌸

भारत माँ के लाल सभी,
संगठित होकर चलें।
शताब्दी की इस वेला में,
नव युग का दीप जलें।।

संघध्वज की गाथा गाएँ,
वीर पराक्रमी बन जाएँ।
हिंदुत्व का परचम लहराएँ,
राष्ट्र रक्षा में तन पाएँ।।

एकत्व का संदेश सुनाएँ,
भारत गौरव फिर से लाएँ।
शताब्दी वर्ष है पावन,
संकल्प नया हम अपनाएँ।।

भारत भू का मान बढ़ाएँ,
राष्ट्रधर्म की शान जगाएँ।
संघ मार्ग पर बढ़ते जाएँ,
सत्य विजय का युग लाएँ।।
©®
अविनाश कुमार कुलदीप

जय जय भारत भूमि हमारी,पावन पुण्य धरा।संघ-साधना से जग में फैला,एकत्व मंत्र धरा।।शताब्दी के इस उत्सव में,नव प्रकाश फैलाएँ।...
08/09/2025

जय जय भारत भूमि हमारी,
पावन पुण्य धरा।
संघ-साधना से जग में फैला,
एकत्व मंत्र धरा।।

शताब्दी के इस उत्सव में,
नव प्रकाश फैलाएँ।
हिंदुत्व की जीवन-ज्योति से,
विश्व मार्ग दिखलाएँ।।

संघ-ध्वज की शान अनोखी,
शक्ति-श्रद्धा का रूप।
उसके नीचे खड़े स्वयंसेवक,
धरें विजय का स्वरूप।।

सेवा, त्याग, तपस्या मिलकर,
गाथा गढ़ते जाएँ।
राष्ट्रधर्म की पावन धारा,
हर जन-मन तक जाए।।

विजय पताका लहराए भारत,
विश्व गुरु बन जाए।
शताब्दी वर्ष का यह उत्सव,
नव सृजन संदेश सुनाए।।
©®
अविनाश कुमार कुलदीप

🌸 सस्नेह आमंत्रण 🌸!! हकार!! हकार!! हकार!!-----अपार हर्षक संग सूचित करी जे "मैथिली साहित्य महासभा" केर अर्धवार्षिक साहित्...
08/09/2025

🌸 सस्नेह आमंत्रण 🌸
!! हकार!! हकार!! हकार!!-----
अपार हर्षक संग सूचित करी जे "मैथिली साहित्य महासभा" केर अर्धवार्षिक साहित्यिक पत्रिका "अपूर्वा" केर सातम अंकक लोकार्पण, " दसम विद्यापति स्मृति एकल व्याख्यान" एवं ' मैसाम युवा सम्मान 2025 ' कार्यक्रम केर आयोजन दिनांक 21 सितम्बर 2025 तदनुसार रवि दिन होयब सुनिश्चित भेल अछि।
कार्यक्रमक विवरण संलग्न आमंत्रण पत्रमे द्रष्टव्य अछि !
एहि आयोजनमे अपने समस्त मैथिली भाषानुरागी सादर आमंत्रित छी🙏

( प्रवेश नि:शुल्क )

दिनांक: 21 सितम्बर 2025 (रवि दिन )
समय : बेरूपहर 03:00 बजे सँ 07:00 बजे धरि !
स्थान : डिप्टी स्पीकर हाॅल, कॉन्स्टीट्यूशन क्लब, रफी मार्ग, नई दिल्ली-110001
(नजदीकी मेट्रो स्टेशन: पटेल चौक व केन्द्रीय सचिवालय)

एकल व्याख्यानक विषय : मैथिली कविताक आलोचनात्मक विकास आ परिदृश्य
व्याख्यानकर्ता : श्री अशोक अविचल (पूर्व संयोजक, मैथिली परामर्श मंडल, साहित्य अकादेमी)
अध्यक्षता : श्री संजय कुमार झा (सेवानिवृत्त डीजीपी, पूर्व आईपीएस)
धन्यवाद ज्ञापन : श्रीमती सोनी चौधरी ( महासचिव मैसाम )
मंच संचालन : श्री अखिलेश कुमार मिश्र (सदस्य मैसाम)
मैसाम युवा सम्मान 2025 : दीपिका चंद्रा ( चौकठिसँ चान दिस)

राहुल झा
अध्यक्ष,मैथिली साहित्य महासभा,दिल्ली।
#मैसाम

मैं 'मिथिला' हूँ------------अज्ञात पड़ी, सहमी-सहमी; क़ोशी-कमला के महा प्रलय'को देख रही ठहरी..ठिठकी।मेरे मन को घायल करती,...
12/08/2025

मैं 'मिथिला' हूँ
------------
अज्ञात पड़ी, सहमी-सहमी;
क़ोशी-कमला के महा प्रलय'
को देख रही ठहरी..ठिठकी।
मेरे मन को घायल करती,
मेरे अपनों की ये सिसकी;
मैं खरी राह बिच सोच रही'
क्या...? सचमुच...!
मैं ही 'मिथिला' हूँ।

मैं व्यथित..चेतना हीन हुई,
विद्वान-विदुषी मेरे संतन;
मेरे चरणों की कसी फंद,
है तन से भी सोनित बहती।
अज्ञात पथिक बन राहों पर,
'संस्कृति' की बाट मैं जोह रही;
इस 'विद्यापति' के घर बैठी,
उस 'उगना' को मैं ढूँढ रही।
आ कहती नयन नीर ले मैं..
हाँ मैं ही 'जनक' की 'मिथिला' हूँ।।

अपनी 'भाषा'...अपना 'आँगन',
'सीता'-'गार्गी' का वो जीवन;
वो विदुषी 'भारती', 'अहिल्या' थी,
वो 'गौतम', 'अष्टावक्र' महान।
वीरों की भी मैं गाथा हूँ,
है वीर 'सलहेश' मेरा संतान।
मैं 'लिच्छवी' वंश की 'मिथिला' हूँ।।।

कभी आत्मश्लाघा किया नहीं,
रहे 'हरि-विप्र' भाई-भाई;
क़्रंदन करती, फिरती मारी,
चौबटियों पर यूँ पड़ी हुई,
हुई लहु-लुहान अब सोच रही;
मेरे पुत्रों को क्या बोलूँ,
हाँ-हाँ..मैं ही वो 'मिथिला' हूँ-२॥॥

शरत झा "शशांक" 🙏🚩🙏

.           साहित्यकारक उत्तराधिकारी             *********************                   पहिने ई साफ क’ ली जे ‘साहित्यका...
06/08/2025

. साहित्यकारक उत्तराधिकारी *********************
पहिने ई साफ क’ ली जे ‘साहित्यकार’केँ मानैत छी की? पद मानैत छी की पदबी मानैत छी? जँ पद मानैत छी तँ जाहि पदपर एखन अहाँ छी ताहि पदकेँ अहाँसँ पहिने जे खाली कयलनि तनिक उत्तराधिकारी अहाँ भेलहुँ आ अहाँक बाद जे औताह से अहाँक उत्तराधिकारी होयताह। जेना राष्ट्रपतिक रूपमे डा.अब्दुल कलामक उत्तराधिकारी भेलीह प्रतिभा पाटिल। अपने प्रदेशमे मुख्यमंत्रीक पदपर राबड़ी देवीक उत्तराधिकारी भेलाह नीतीश कुमार। तहिना, साहित्य अकादेमीमे मैथिली साहित्यकारक हेतु पदपर के ककर उत्तराधिकारी भेल छथिन, ई के नहि जनैत छी? जँ एकरा पदबी मानैत छी, तखन तँ उत्तराधिकारक प्रश्ने नहि उठैत अछि। ई व्यक्तिस्वायत्त होइछ आ ओही व्यक्तिक संगे चल जाइछ। अहाँ बी.ए. छी तँ ई आजीवन अहाँक संग लागल रहत आ अहाँक संगहि चलो जायत।
साहित्यकारकेँ पद मानबामे एक संशय अछि। पद एक आसन थिकैक जे स्थिर रहैछ। लोक ओहिपर जाइत-अबैत रहैत अछि आ उत्तराधिकारीक शृंखला बनैत चलैत अछि। मुदा, किछु पद एहनो होइत छैक जे घोषित वा अघोषित आजीवन लेल होइत छैक, जेना कोनो नामी ट्रष्टक अध्यक्षपद। जेना स्थानीय स्तरपर कोनो साहित्य-संस्कृति परिषद् वा सेवासंस्थानक महासचिव आ अध्यक्षक पद। ओकर उत्तराधिकार संस्थाक प्रकृति आ ओहिपर आसीन व्यक्तिक बुद्धि-कौशलपर निर्भर करैछ। ई वंशानुगत भैयो सकैछ, नहियोँ भ’ सकैछ। साहित्यकारकेँ पद मानी तँ एही वर्गमे राखि सकैत छी।
मुदा, उत्तराधिकारक प्रश्न उठिते किएक अछि तँ अर्जित सम्पत्तिक मालिकाना हक लेल। सम्पत्तिमे दृश्यमान (धन आ पुस्तकादि) तथा भाव (यश-प्रतिष्ठा) दुनू अबैछ।
जहाँ धरि धनक प्रश्न अछि, एहिमे द्रव्य (टाकापैसा), पुरस्कार वा स्कालरशिपमे प्राप्त एवं सम्मेलन-संगोष्ठीसँ अर्जित राशि, पोथीक रायल्टी आदि अबैत अछि। एकर उत्तराधिकारमे कोनो संशय नहि अछि। जनिकर थिकनि से, आ जनिका भेटतनि सेहो– दुनू पक्ष निश्चिन्त रहैत छथि। तेसर पक्षक गुंजाइश नहि छैक। मैथिली साहित्यकार वर्गमे ई स्थिति, एकाध अति भाग्यशालीकेँ छोड़ि, एखन आयब बाँकी अछि।
आब आउ प्रकाशनपर। ई मिथिलेक माटि थिक जे एहि ठाम बेसी साहित्यकारक उत्तराधिकारी अपन पिता वा अभिभावकक बतहपनीकेँ (जे पोथी छपयबामे धनकेँ बेर-बेर फूकैत छथि) चुपचाप सहैत कूही होइत रहैत अछि, मुदा विरोधमे मुँह नहि खोलैत अछि।
रहल पुस्तक-पत्रिकादि। साहित्यकारक लगमे पोथी दू कोटिक रहैत छनि– एक अपन, जे खुजल हाथेँ बिलहलाक बादो गेँटक गेँट पड़ल घरकेँ छेकने रहैत छनि। दोसर– आनक देल, सादर-सस्नेह उपहृत। कीनिक’ अपन घर पोथीसँ छेक’वला एकाध सनकी सेहो छथि, जनिक भगवाने मालिक! जँ साहित्यकार कने नामी रहलाह, चलाचलतीवला भ’ गेलाह, रेफरी-तेफरी, जूरी-तूरी, केन्द्रीय संस्थाक सदस्य-तदस्य, तखन तँ हुनका ओत’ पोथीक वर्षा तँ नहि कहब, (मैथिलीमे पोथीक वर्षा हो, ई दिन नहि आयल अछि) तखन अबाहि लगले रहैत छनि। अपन पोथी आ एहन पोथी मिलाक’ तथा किछु पत्र-पत्रिका सेहो लगाक’ तीन-चारि आलमारी जोगर बहुत गोटेक ओहि ठाम पोथी होयतनि।
बेसी साहित्यकार भाड़ाक घरमे रहनिहार, मध्यवित्त परिवारक, शहरमे दू-तीन छोट-छोट कोठलीमे सपरिवार निर्वाह करबाक वाध्यता। गामोवलाकेँ जगहक सिकस्तिए। परिवारक आन-आन सदस्यकेँ अपन-अपन रुचि, अपन-अपन बेगरता। ताहिमे ओकरा लोकनिक दृष्टिमे अवांछित एतेक रासे पोथीक टाल। बाजत की? एम्हर साहित्यकार महाशयकेँ भिन्ने व्यथा। हुनक बाद की होयत ओकर? धीयापूताकेँ साहित्यसँ मतलब नहि। मतलबो तँ कत’ रहत कत’ ने! कत’-कत’ उघने फिरत एहि जंजालकेँ! आ किएक उघत? एखने, जखन अपनो अबूह लगैत छनि, की करता एकर? कत’ रखता? ककरा देथिन? तखन हिनक धीयापूता एकर कोन गति करतैक, से सोचि-सोचि काँपि जाइत छथि।
साहित्यकार सोचैत छथि– समाजमे हुनक जे दू पाइ मोजर छनि से एही ल’क’, दू गोटे पुछैत छनि से एही गुनपर, सालमे दस-बीस ठाम, लगो-दूरो, जे घुमैत-फिरैत छथि, आदरपूर्वक जे हिनका बजाओल जाइत छनि से एही कारणे। ताहि सम्पत्तिक उत्तराधिकार ककरा देथिन, तेहन क्यो नजरिपर अबैत नहि छनि। पुरस्कार आ विदाइक उत्तराधिकारी तँ घरेमे छनि, मुदा ओ पोथीक जंजालक उत्तराधिकार स्वीकार करबा लेल, हिनका लगैत छनि, तैयार नहि छनि।
कोनो तेहन सार्वजनिक पुस्तकालयो नहि छैक, जत’ ई अपन एहि सम्पत्तिकेँ दान क’ देथिन। पटनामे एक ‘समिति’ अछि, सचेतन, जगजियार, जे पोथी दानस्वरूप ग्रहण करैछ। पुस्तकालयमे सजाक’ रखने अछि। मुदा पोथी तँ सजाक’ राख’वला वस्तु थिक नहि। ओकर सार्थकता तँ ओकर उपयोगमे छैक। पोथीक उपयोग तँ देखला मात्रसँ नहि भ’ सकैछ, छूबि-छाबि लेलासँ नहि भ’ सकैछ। अध्ययन कयलासँ होइछ। ताहि लेल व्यवस्था चाही। संध्याकाल गोटेक घंटा खुजलासँ पोथीक उपयोग लोक कोना क’ सकत? एखन तँ कम पोथी छैक, तेँ एक छोट सन कोठलीमे सजाक’ राखल छैक, बेसी भ’ गेने गेँटिक’ कोनो दोसर कोठलीमे जाकि देल जयतैक। बाहरी लोकक आस्था तखने जमतैक जखन ओकरा लगतैक जे एहि प्रभागक विकास लेल संस्थाक सामूहिक नेतृत्व गतिशील अछि। तकर अभावमे लोककेँ ताहि दिस उत्साह नहि होइत छैक। एखनो जे छैक, तकर कतेक उपयोग होइत छैक, ओकर विवरण आइ धरि पत्रिकाक माध्यमे लोकक सोझाँ नहि आनल गेल अछि। कोनो संस्था हो, जे अपन पत्रिकामे घर-बाहरक लोकसँ पोथीक माङ तँ सभ अंकमे करैत अछि, किन्तु समाजकेँ ई सूचना देब आवश्यक नहि बुझैत अछि जे कोनो खास त्रैमासमे अथवा कोनो एक वर्षमे कतेक गोटे ओहि पुस्तकालयसँ लाभ उठौलनि अछि। की चाही नहि से? विश्वविद्यालयक पुस्तकालय सभक सेहो यैह हाल अछि। दू-एक घंटा खूजल रहत। ताहि बीच ओकर अहाँ जतेक-जेहन उपयोग क’ सकी। पोथीक सुरक्षाक जवाबदेहीसँ सभ अपनाकेँ बचबैत रहत।
प्रत्येक व्यक्तिक ई आकांक्षा रहैत छैक जे ओकर देलहा वस्तुक नीक जकाँ संरक्षण हो, बेसीसँ बेसी लोकक उपयोगमे आबय, सुरक्षित रहय। से आश्वस्त नहि रहलासँ ओ ओहि दिससँ उदासीन भ’ जाइत अछि। तखन यैह सोचि सन्तोष करैछ जे– ‘होइहें सोइ जो राम रचि राखा’। जे भावी! तैयो साहित्यकार पोथी छपायब छोड़ैछ नहि, पोथी जमा करब जारिए रखैछ, घरकेँ भरनहि चलैछ। ओ अपन मनकेँ कहैछ– जे विधाता हुनका साहित्यिक रुचि देलथिन अछि, साहित्य लिखबा-पढ़बा दिस प्रवृत्त कयलथिन अछि, पुस्तक-सम्पदासँ घरकेँ समृद्ध कयलथिन अछि, वैह एकरा गतियो लगौथिन, एकर उत्तराधिकारियो तकथिन।
साहित्यकारक भाव-सम्पत्ति (यश-प्रतिष्ठा)क उत्तराधिकार सेहो परिवारक रुचि-परिष्कारपर निर्भर करैछ। जकर परिवार साहित्यसँ कटि जाइत छैक, धीयापूता की तँ बुड़िया जाइत छैक की आन क्षेत्रमे बढि जाइत छैक, ताहि समाजमे मैथिली साहित्यकारपूर्वजक यश-प्रतिष्ठा सामान्यत: कोनो माने नहि रखैत छैक। किन्तु, सौभाग्यवश जनिक दोसरो पीढी साहित्यिक उत्तराधिकार लेल प्रस्तुत भ’ जाइत छनि, से भने ई सोचि अपन सौभाग्यपर गर्व करथु जे हुनक यश-प्रतिष्ठाकेँ आर उज्ज्वल कयनिहार उत्तराधिकारी तैयार भ’ गेलथिन अछि, मुदा प्रकृतिक गति के जनलक अछि? के जनलक अछि जे हुनक अपन सन्तान हुनक सारस्वत सम्मानकेँ बढौनिहारे होयथिन, खोँच लगौनिहार नहि? देखैत तँ यैह छी जे कविकोकिल विद्यापति आ कवीश्वर चन्दा झाक उत्तराधिकारी परवर्ती समस्त सारस्वत समाज भेलनि, क्यो अपन नहि, क्यो आन नहि।
–भीमनाथ झा
(2011)

  जी - भंगिमा रत्न के  लेल  खूब  रास  बधाई आ  शुभकामना  | आऊ  हिनकर विस्तृत  रचना  संसार  के  देखी , पढ़ी और गौरव  बोध  क...
05/08/2025

जी - भंगिमा रत्न के लेल खूब रास बधाई आ शुभकामना |
आऊ हिनकर विस्तृत रचना संसार के देखी , पढ़ी और गौरव बोध करी |
#मैथिली #नाटक

#मौलिक ;

1खिस्साक खिस्सा अर्थात गोनू झा उर्फ
ज्ञान झाक खिस्सा
2 कुसमा सलहेस
3 बिदापत चारि टा सुखांत ;
4 श्रुवावती
5 स्वेता
6 सुप्रभा
7 सुकन्या
( प्रकाशनाधीन*)
प्रदर्शन- आलेख ;
1 रुक्मिणी हरण ( पंडित गोविंद झा )
2 सीतायन ( सोमदेव )
3 पारिजात हरण ( उमापति )
4 धूर्त समागम ( ज्योतिरीश्वर )
5 भग्न स्तुपक एकटा अक्षत स्तंभ ( राजकमल चौधरी )
6 लोरिकायन ( कुमार शैलेंद्र )

रूपांतरण ;
1 डर ( सुभाष चंद्र यादव क कथा आ महाप्रकाश क कविता आधारित )
2 फुलबा क्टोरबा ( अपने कथा आधारित )
3 पांच प्रश्न ( कुमार पवन क कथा आधारित, कुमार गगन के संग )

बाल नाटक :
4 घोघो रानी ( समद बहरंगी क कथा आधारित )
5 नित्य लीला ( फणीश्वरनाथ रेणु क कथा आधारित)
(दूनू बाल नाटक हिंदी मे सेहो अइ )

अनुवाद :
1भगवान जी अओता ( सैमुएल बैकेट, अंग्रेजी स )
2बाकी इतिहास ( बादल सरकार, बांग्ला स )
3खजन चिड़इया एहिना आबए ( विजय तेंदुलकर, हिंदी स )
4 स्वयंप्रभा ( बर्नाड शॉ ,अंग्रेजी स )

★ चैम्बर शिल्प के एक दर्जन लघु नाटक
★ केराक खोंइचा , मृत्युपूर्व आ चेतना क स्वर समेत किछु आर लघु नाटक
( किछु बिसराएल- छूटल हो से असंभव नइ )

खेल
1 जट जटिन
2 झिझिया
3 सामा

HINDI - में

1बर्बरीक उवाच (पुरस्कृत, प्रदर्शित, प्रकाशित )
2वैशाली ( प्रदर्शित )
3 चलो एकबार फिर से ( अल्बर्टो मोरविया क दू टा कथाक रूपांतरण )
4 घोघो रानी (समद बहरंगी क कथा क रूपांतरण ।प्रदर्शित ।)
5 नित्य लीला ( फणीश्वरनाथ रेणु क कथा क रूपांतरण।प्रदर्शित ।)
6 बलचनमा ( नागार्जुन क उपन्यास क रूपांतरण।प्रदर्शन क प्रक्रिया मे।)

FILMI Geet -

1.Film - Lalka Paag
https://youtu.be/ZC4cQtconUM
अहाँ बिना नै आस ...

.पाठकक पन्ना                                                      लहास अबिते रहत                       (पलायनक एक टा मार...
10/07/2025

.पाठकक पन्ना

लहास अबिते रहत
(पलायनक एक टा मार्मिक कथा)

हितनाथ झा

एक दिस प्रतिभा आ दोसर दिस पलायन मिथिलाक टिप्पनिमे लिखल छैक प्रायः। प्रायः टिप्पनिमे इहो लिखल छैक -
'मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना' कुंडे कुंडे नवं पयः।
जातौ-जातौ नवाचारा नवा वाणी मुखे मुखे।।'
' प्रत्येक व्यक्तिक मतमे भिन्नता स्वाभाविक, प्रत्येक इनारक जलक स्वाद अलग-अलग हैब स्वाभाविक, प्रत्येक जातिमे अलग-अलग संस्कार आ जीवनशैली हैब स्वाभाविक,तहिना प्रत्येक मुखक वाणीमे ओहि मनुखक निजता झलकब स्वाभाविक। '
मुदा विभिन्न स्वरूपक बादो विकसित होयबाक लेल आपसमे सामंजस्य परमावश्यक। एक-दोसरक सहमति-असहमतिक एक विन्दुपर पहुँचब आ सभ तन-मन-धनसँ ओकर क्रियान्वयन लेल लागि जैब, तखने विकसित समाजक कल्पना साकार भ' सकत। मिथिलाक समृद्ध धरोहर रहितो, प्रतिभासम्पन्न मैथिल होइतो, आर्थिक दृष्टिएँ विकसित मिथिला कहियो नहि भ' सकल, एकर अनेको कारण भ' सकैछ, मुदा सभसँ जे प्रमुख कारण हमरा लगैत अछि, ओ थिक राजनीतिक दृष्टिएँ कमजोर नेतृत्व।
ओ एक -दोसरक निकट आबय नहि दैत छैक। ऊँच-नींच, जाति-पाति, छूत-अछूत, धर्म-सम्प्रदाय, आरक्षण-संरक्षणमे तेना ने बाँटि क' राखि देने अछि, आ ओकर राजनीतिक महत्वाकांक्षा तेना ने चरमपर पहुँचि गेल अछि जे मिथिलाकेँ ओहीमे ओझरौने रहैत अछि। तेँ जेना कहलहुँ, प्रतिभा तँ मिथिलाक लोकमे छैके आ प्रतिभावान लोक मिथिलाक बाहर देश-विदेशमे पलायन करैत अछि ,नौकरी करैत अछि, व्यापार करैत अछि,सुभ्यस्त भ' जाइत अछि आ ओहिमे अधिकांश अपन मातृभूमि छोड़बाक लेल विवश भ' जाइत अछि आ परिवार सहित ओतहि बसि जाइत अछि। आ दोसर तरहक लोक अछि, जकरा अपन प्रतिभा चमकयबाक अवसर नहि भेटि सकलैक, गरीबी ओकर काल भ' सम्मुख ठाढ़ भ' गेलैक, अपन भूमिपर कोनो काज नहि भेटि सकलैक, जीवन-यापन कठिन भ' गेलैक, पारिवारिक दायित्व निभयबामे विफल भ' गेलैक तँ ओकर सामने दोसर कोनो चारा नहि दिखाइ पड़लैक,तँ पलायन करै लेल बाध्य भ' जाइत अछि आ पंजाब,हरियाणा,दिल्ली, राजस्थान,गुजरात,मुम्बइ,दुबइ आदि जगह मजबूरीमे मजदूरी करबाक लेल प्रस्थान क' जाइत अछि आ रहरहाँ शोषणक शिकार बनि जाइत अछि, बीमार भ' जाइत अछि आ ओहिमे कतेकोकेँ वापस अबैत अछि लहास ।
एहने एक दलित समुदायक प्रतिभावान नेना जे अपन स्कूलहि अवस्थामे इलाकाक उच्चकोटिक क्रिकेटक खिलाड़ी बनि चुकल छल, अनेक मेडल सरकारी अधिकारी द्वारा आ मुखिया आदि नेता द्वारा सेहो संगहि प्रशंसापत्र पाबि चुकल छल, मुदा परिवारक दुःस्थिति कोनो ने कोनो कारण अबैत गेलैक आ दयनीयसँ अति दयनीय होइत गेलैक आ जे प्रतिभावान क्रिकेटर टुन्नू छल,मैट्रिक धरि अबैत-अबैत जखन परिवारक स्थितिक ज्ञान भेलैक, सरकार सँ जखन कोनो टा सहायता नहि भेटिलैक,तखन निर्णय कयलक परदेश जा क' कमयबाक आ माँ-पिताक मनो कयलापर नहि मानलकैक आ निकलि गेल परिवारक भरण-पोषण हेतु मजदूरी करबाक लेल आ वापस अयलैक ओकर लहास।
एही कथावस्तुपर आधारित युवा रचनाकार, नवहस्ताक्षर पुरस्कार(मैथिली साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समिति,मधुबनी, 2021)आ यात्री पुरस्कार(मैथिल समाज,रहिका-2023 पुरस्कार प्राप्त रामकृष्ण परार्थीक टटका उपन्यास अयलनि अछि ' लहास अबिते रहत'( पलायनक एक टा मार्मिक कथा)।
एहि उपन्यासमे कचोट तँ पलायनक छनिहें, नोरसँ दहाइत परिवार आ समाजक विवशता तँ छनिहें, मुदा चोट सेहो कम जबर्दस्त नहि छनि अपन समाजक नेताक प्रति, जे आरक्षणसँ अपनहि संरक्षण करैत छथि।
एहि उपन्यासमे किछु आर ज्वलन्त विन्दुसभ छूबाक प्रयास कयलनि अछि, ओहिमे हमरा जनैत सफल भेल छथि, किन्तु कतौ-कतौ भावावेशमे कनेमने व्यतिक्रम सेहो बुझना जाइत छथि,जँ ओहिसँ बचल रहितथि आ सोझे चोट करितथि तँ आर धरगर उपन्यास होइतनि, ओना ई तँ निश्चिते जँ पढ़य बैसब तँ बीचमे नहि छोड़ि पायब , कतौ भाषाक प्रवाहमे कमी नहि बुझना जायत,लागत आँखिक देखल ,यथार्थक भोगल कथा कहि रहल छथि।
परार्थीजीक रचनाशील होयब हमरा आर खुशी प्रदान करैत अछि जे झारखण्डक भूमिक ई ऊर्जावान युवा साहसिक रचनासभसँ मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ भरबाक लेल समर्पित छथि आ कमे समयमे यशस्विता प्राप्त कयलनि अछि।
नवारम्भ प्रकाशन,पटना/मधुबनीसँ 2025मे प्रकाशित ई उपन्यास पठनीय एहू लेल अछि जे पढलाक बाद विकसित मिथिला कोना हो , पलायन कोना रुकय,ओहिपर चिन्तन कयनाइ आवश्यक अछि।
पोथी -लहास अबिते रहत
विधा - उपन्यास
लेखक- रामकृष्ण परार्थी
प्रकाशन वर्ष- 2025
प्रकाशक-नवारम्भ,पटना/मधुबनी।

हितनाथ झा
09.07.2025

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