06/03/2026
**शीर्षक: 90 के दशक की पीढ़ी — बदलते समय के बीच खोती हुई संवेदनाएँ**
जिन लोगों का जन्म 90 के दशक में हुआ है, वे वास्तव में दो युगों के साक्षी हैं। हमने वह दौर भी देखा है जब जीवन सरल, सहज और आत्मीयता से भरा हुआ था, और आज का यह अत्याधुनिक युग भी देख रहे हैं जहाँ तकनीक, भागदौड़ और प्रतिस्पर्धा ने जीवन को एक नई दिशा दे दी है। हम उस पीढ़ी के लोग हैं जिन्होंने रेडियो और टेलीविजन से लेकर स्मार्टफोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक का सफर अपनी आँखों से देखा है।
समय के साथ चलना मनुष्य की आवश्यकता भी है और नियति भी। इसी क्रम में हम भी आधुनिकता के इस दौर में कदम से कदम मिलाकर चलने लगे। हमने नई तकनीकों को अपनाया, नए साधनों को स्वीकार किया और जीवन के अनेक नए अध्यायों का हिस्सा बने। परंतु इस दौड़ में कहीं न कहीं हमने जीवन के वे सुकून भरे क्षण, वे मासूम रिश्ते और वह आत्मीयता भी पीछे छोड़ दी, जो कभी हमारे जीवन का सबसे बड़ा धन हुआ करती थी।
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो लगता है कि बचपन किसी सुनहरे स्वप्न की तरह था। वह समय जब न मोबाइल था, न इंटरनेट, न सोशल मीडिया—फिर भी जीवन में एक अद्भुत आनंद और संतोष था। मोहल्ले के गलियारों में हमारी आवाज़ें गूंजती थीं, दोस्तों के साथ हंसी-ठिठोली और शरारतों से दिन कब बीत जाता था, पता ही नहीं चलता था।
उस समय छुट्टियों का मतलब केवल आराम नहीं होता था, बल्कि पूरे उत्साह के साथ खेलों का “टाइम टेबल” बनाना होता था। सुबह क्रिकेट, दोपहर में कबड्डी, शाम को गिल्ली-डंडा या पिट्ठू। कभी छुपन-छुपाई, कभी कंचों की बाज़ी, तो कभी पतंगबाज़ी की प्रतियोगिता। हर खेल में प्रतिस्पर्धा थी, परंतु उसमें अहंकार नहीं था; हर जीत में खुशी थी, पर हार में भी दोस्ती बनी रहती थी।
आज वही खेल धीरे-धीरे “आउटडोर” और “इनडोर गेम्स” के आधुनिक नामों में सिमट गए हैं। बच्चों के हाथों में कंचों और गिल्ली की जगह मोबाइल और वीडियो गेम आ गए हैं। खेल के मैदान खाली होते जा रहे हैं और डिजिटल स्क्रीन बच्चों की दुनिया बनती जा रही है।
90 के दशक की पीढ़ी के लिए सबसे भावुक स्मृतियों में से एक होती है — **नानी का घर**। गर्मियों की छुट्टियाँ आते ही मन में एक अलग ही उत्साह उमड़ पड़ता था। नानी के घर जाना किसी त्योहार से कम नहीं होता था। वहाँ का खुला आँगन, पेड़ों की छाँव, मिट्टी की सोंधी खुशबू और नानी के हाथों का प्यार भरा खाना—ये सब हमारे बचपन के सबसे अमूल्य खजाने थे।
आज वही नानी का घर केवल यादों का हिस्सा बन गया है। जीवन की व्यस्तताओं में वह स्थान जहाँ कभी हमारा पूरा संसार बसता था, वहाँ जाना अब एक सपना बनकर रह गया है।
समय के साथ रिश्तों का स्वरूप भी बदल गया है। पहले परिवार केवल माता-पिता और बच्चों तक सीमित नहीं होता था, बल्कि एक बड़ा **कुटुंब** हुआ करता था। चाचा-चाची, ताऊ-ताई, मामा-मामी, दादा-दादी—सब मिलकर एक परिवार की तरह रहते थे। त्योहारों का असली आनंद तब आता था जब पूरा परिवार एक साथ होता था।
आज त्योहार आते तो हैं, पर उस उत्साह और सामूहिकता की झलक बहुत कम दिखाई देती है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ ने हमें इतना व्यस्त कर दिया है कि हम रिश्तों के लिए समय ही नहीं निकाल पा रहे हैं।
जीवन के इस सफर में हमने बहुत कुछ पाया भी है, लेकिन बहुत कुछ खोया भी है। बचपन के कई दोस्त समय की धूल में कहीं खो गए, और कई ऐसे भी हैं जिन्हें प्रकृति ने हमसे हमेशा के लिए छीन लिया। जब अपने किसी प्रियजन का अचानक साथ छूटता था, तो वह दर्द पूरे परिवार के हृदय में एक गहरे घाव की तरह बस जाता था।
जब तीज-त्योहार आते थे, तो वह घाव फिर से हरा हो जाता था और आँखों से आँसू बनकर बह निकलता था। उस समय रिश्तों की गहराई इतनी सच्ची होती थी कि किसी एक के जाने का दर्द पूरे परिवार को लंबे समय तक महसूस होता था।
लेकिन आज का समय कुछ अलग है। आज जब कोई अपना हमें छोड़कर चला जाता है, तो कुछ ही दिनों में जीवन की व्यस्तताएँ हमें आगे बढ़ने के लिए मजबूर कर देती हैं। धीरे-धीरे वह व्यक्ति हमारी स्मृतियों के धुंधले कोनों में सिमट जाता है। तभी तो वह कहावत कभी-कभी सच प्रतीत होती है—
**“ जिस अंगुली में लगती है, उसी में दर्द होता है।”**
सबसे अद्भुत रिश्ता माँ का होता है। 90 के दशक की माँएँ किसी आधुनिक तकनीक से कम नहीं थीं। वे बिना कहे ही हमारी हर बात समझ जाती थीं। हमारे चेहरे की मुस्कान और उदासी दोनों को पढ़ लेती थीं।
आज का समय इतना बदल गया है कि माँ भी “डिजिटल मम्मी” बनती जा रही है। संवाद की जगह मोबाइल ने ले ली है, और दिल की बातों की जगह चैट और मैसेज ने।
पहले हम कभी “वेकेशन प्लान” नहीं बनाते थे, क्योंकि परिवार के साथ बिताया गया हर दिन ही एक उत्सव होता था। हमें कहीं बाहर घूमने जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी, क्योंकि परिवार ही हमारा सबसे बड़ा संसार था।
लेकिन आज हम छुट्टियों में भी कहीं घूमने जाने की योजना बनाते हैं, फिर भी परिवार के साथ वह आत्मीयता और अपनापन महसूस नहीं कर पाते। क्योंकि शायद हमने “समय” को ही परिवार से अलग कर दिया है, जबकि पहले **समय ही परिवार हुआ करता था।**
आज हम टेक्नोलॉजी, सफलता और धन-दौलत के पीछे लगातार दौड़ रहे हैं। इस दौड़ में हम आगे तो बढ़ रहे हैं, पर यह भूलते जा रहे हैं कि जीवन का असली आनंद कहाँ है।
कभी-कभी लगता है कि हम आधुनिकता के इस विशाल सागर में तैरते-तैरते अपनी ही जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। हम अपने बचपन की उन गलियों, उन खेलों, उन रिश्तों और उन भावनाओं को ढूँढ रहे हैं, जो कभी हमारे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हुआ करती थीं।
90 के दशक की पीढ़ी शायद इसलिए विशेष है, क्योंकि हमने दोनों संसार देखे हैं—एक वह जहाँ रिश्तों की गर्माहट थी, और दूसरा यह जहाँ तकनीक की चमक है।
अब हमारे सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही है कि हम आधुनिकता को अपनाते हुए भी अपनी जड़ों को न भूलें। अपने बच्चों को केवल तकनीक ही नहीं, बल्कि रिश्तों की अहमियत, परिवार की एकता और जीवन की सादगी का महत्व भी सिखाएँ।
क्योंकि अंततः जीवन की असली खुशी न तो मोबाइल में मिलती है, न धन-दौलत में, बल्कि उन रिश्तों में मिलती है जो हमारे दिलों को जोड़ते हैं, उन यादों में मिलती है जो हमें मुस्कुराने का कारण देती हैं, और उन पलों में मिलती है जिन्हें हम अपने अपनों के साथ सच्चे मन से जीते हैं।
और शायद इसी में 90 के दशक की पीढ़ी की सबसे बड़ी सीख छिपी है—
**समय चाहे कितना भी बदल जाए, पर जीवन की असली समृद्धि हमेशा रिश्तों, स्मृतियों और अपनापन में ही बसती है।**