Doon Library & Research Centre

Doon Library & Research Centre The Doon Library and Research Centre is an autonomous institution registered as a Society under the Societies Registration Act.

फूलों की घाटी : मिथक और यथार्थ पर दून पुस्तकालय में हुआ सार्थक विमर्शदेहरादून, 31 अगस्त 2026। उत्तराखण्ड की प्राकृतिक एव...
01/09/2026

फूलों की घाटी : मिथक और यथार्थ पर दून पुस्तकालय में हुआ सार्थक विमर्श

देहरादून, 31 अगस्त 2026। उत्तराखण्ड की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विरासत को समझने, उसके विविध आयामों पर सार्वजनिक संवाद विकसित करने और पर्यावरण संरक्षण के प्रति सामाजिक संवेदनशीलता बढ़ाने के उद्देश्य से दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से सोमवार को ‘फूलों की घाटी : मिथक और यथार्थ’ विषय पर विशेष सचित्र व्याख्यान, स्लाइड-शो और डॉक्यूमेंट्री प्रस्तुति आयोजित की गई। कार्यक्रम में चर्चित छायाकार एवं घुमक्कड़ चन्द्रशेखर चौहान ने अपने वर्षों के यात्रा-अनुभवों और दुर्लभ छायाचित्रों के माध्यम से चमोली जनपद में स्थित विश्वप्रसिद्ध फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान के प्राकृतिक सौंदर्य, जैव-विविधता, भौगोलिक विशेषताओं, लोकविश्वासों तथा पर्यावरणीय चुनौतियों के अनेक पहलुओं को दर्शकों के सामने रखा।स्लाइड-शो और डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से घाटी के अनदेखे प्राकृतिक रूप दिखाए गये.इस कार्यक्रम का सुरुचि पूर्ण संचालन स्वतंत्र व खोजी पत्रकार संदीप गुसाईं ने किया।

चन्द्रशेखर चौहान ने कहा कि फूलों की घाटी को अक्सर केवल रंग-बिरंगे फूलों से भरी एक सुंदर घाटी के रूप में देखा जाता है, जबकि इसका वास्तविक स्वरूप इससे कहीं अधिक व्यापक और जटिल है। हिमालय की ऊंची पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित यह क्षेत्र एक अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है, जहां मौसम, ऊंचाई, भू-आकृति, जलधाराओं और वनस्पतियों का आपसी संबंध घाटी के प्राकृतिक स्वरूप को लगातार बदलता रहता है। उनके अनुसार, फूलों की घाटी को समझने के लिए उसके एक-दो लोकप्रिय दृश्यों से आगे बढ़कर उसके विभिन्न मौसमों और बदलते प्राकृतिक रूपों को देखना आवश्यक है।

सचित्र प्रस्तुति के माध्यम से उन्होंने घाटी के अलग-अलग समय में लिए गए छायाचित्रों को क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत किया। इन छायाचित्रों में कहीं दूर तक फैली पुष्प पट्टियां दिखाई दीं, तो कहीं वर्षा, धुंध, बादलों और सूर्य के प्रकाश के साथ बदलते हुए पर्वतीय परिदृश्य ने घाटी को अलग-अलग रूप प्रदान किया। विभिन्न वनस्पतियों और पुष्प प्रजातियों के साथ-साथ घाटी की पर्वतीय ढलानों, जलधाराओं, चट्टानी संरचनाओं और आसपास के भूदृश्यों को भी चित्रों के माध्यम से दर्शकों के बीच रखा।

उन्होंने यह भी बताया कि फूलों की घाटी का सौंदर्य केवल उसके फूलों में नहीं, बल्कि उस पूरे प्राकृतिक तंत्र में निहित है जो इन वनस्पतियों को जीवन देता है। ऊंचाई, तापमान, वर्षा और हिमालयी जलवायु यहां की जैव-विविधता को प्रभावित करती है। इस दृष्टि से घाटी एक ऐसा प्राकृतिक क्षेत्र है, जहां छोटे-से-छोटे परिवर्तन भी व्यापक पारिस्थितिक प्रभाव पैदा कर सकते हैं। उन्होंने प्रकृति के इस नाजुक संतुलन को समझने और उसके अनुरूप मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यक्रम के विषय ‘मिथक और यथार्थ’ के संदर्भ में चौहान ने फूलों की घाटी से जुड़े विभिन्न लोकविश्वासों और प्रचलित धारणाओं पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि हिमालयी समाज में प्रकृति सदैव केवल संसाधन नहीं रही, बल्कि वह लोकजीवन, आस्था, परंपराओं, स्मृतियों और लोककथाओं का अभिन्न हिस्सा रही है। इसलिए फूलों की घाटी से जुड़े मिथकों को उसके सांस्कृतिक संदर्भों में समझना जरूरी है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्राकृतिक धरोहरों के बारे में बनी लोकप्रिय छवियों और वास्तविक पर्यावरणीय परिस्थितियों के बीच अंतर को समझना आवश्यक है। आकर्षक तस्वीरें किसी स्थान की सुंदरता को सामने ला सकती हैं, लेकिन उस स्थान की संवेदनशीलता, जैव-विविधता और संरक्षण की जरूरत को समझने के लिए उसके व्यापक प्राकृतिक परिवेश को देखना पड़ता है। स्लाइड-शो इसी व्यापक दृष्टिकोण को विकसित करने का प्रयास था।

इस प्रस्तुति का विशेष पक्ष यह रहा कि दर्शकों को ऐसे अनेक दृश्य देखने को मिले, जिन्हें सामान्य पर्यटक अपनी सीमित यात्रा के दौरान प्रायः देख नहीं पाते।

प्रस्तुति के दौरान भ्यूंडार घाटी तथा वहां किए जा रहे पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों पर भी विशेष चर्चा हुई। बताया गया कि वर्ष 2002 से क्षेत्र में सक्रिय इको-डेवलपमेंट कमेटी के माध्यम से स्थानीय समुदाय की भागीदारी के साथ संरक्षण संबंधी कार्य किए जा रहे हैं। वन विभाग और ग्रामीणों के सहयोग से स्वच्छता, प्लास्टिक एवं जैविक कचरे के निस्तारण और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।

स्लाइड शो के दौरान यह बात भी उभर कर आयी कि हिमालयी पर्यावरण के संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिन लोगों का जीवन इन क्षेत्रों और प्राकृतिक संसाधनों से लंबे समय से जुड़ा है, उनके अनुभव और सहभागिता को संरक्षण की नीतियों एवं गतिविधियों में पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए। केवल बाहर से लागू किए गए संरक्षण उपायों के बजाय स्थानीय ज्ञान और सामुदायिक भागीदारी को साथ लेकर चलना अधिक प्रभावी हो सकता है।

फूलों की घाटी की बढ़ती लोकप्रियता के संदर्भ में यह बात आयी कि पर्यटन और पर्यावरण के बीच संतुलन की बहुत आवश्यकता है । पर्यटन लोगों को प्रकृति के करीब लाने और प्राकृतिक विरासत के प्रति रुचि पैदा करने का महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में पर्यटन गतिविधियां पर्यावरणीय अनुशासन के अनुरूप होना जरूरी है। बातचीत में अनियंत्रित मानवीय गतिविधियों, कचरे और प्राकृतिक क्षेत्रों पर बढ़ते दबाव को गंभीरता से लेने की आवश्यकता भी बताई गई। फूलों की घाटी जैसे क्षेत्रों में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि वह केवल किसी पर्यटन स्थल की यात्रा नहीं कर रहा, बल्कि एक अत्यंत संवेदनशील प्राकृतिक विरासत क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है। जिम्मेदार पर्यटन का अर्थ है प्रकृति को देखने के साथ उसे सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी स्वीकार करना।

स्लाइड-शो के साथ लगभग 12 मिनट की विशेष डॉक्यूमेंट्री भी प्रदर्शित की गई। इसमें फूलों की घाटी की यात्रा, प्राकृतिक परिवेश, पर्वतीय भू-दृश्य और जैव-विविधता को दृश्य माध्यम से प्रस्तुत किया गया। डॉक्यूमेंट्री ने दर्शकों को उन अनुभवों से जोड़ा, जिन्हें केवल शब्दों और स्थिर छायाचित्रों के माध्यम से पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं होता। दृश्य और ध्वनि के संयोजन ने घाटी के प्राकृतिक परिवेश को अधिक जीवंत बना दिया।

कार्यक्रम के अंतिम चरण में खुला संवाद एवं प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किया गया। दर्शकों ने फूलों की घाटी की जैव-विविधता, पुष्प प्रजातियों, पर्यावरणीय बदलाव, पर्यटन के प्रभाव, स्थानीय समुदाय की भूमिका, फोटोग्राफी के अनुभव और संरक्षण से संबंधित प्रश्न किए। चन्द्रशेखर चौहान ने अपने मैदानी अनुभवों के आधार पर प्रश्नों के उत्तर दिए। प्रश्नोत्तर के दौरान कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई और कार्यक्रम एकतरफा व्याख्यान के बजाय सहभागी संवाद का रूप ले सका।

दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम को उत्तराखण्ड की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत पर सार्वजनिक बौद्धिक विमर्श को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा गया। पुस्तकालय का उद्देश्य केवल पुस्तकों और पठन-पाठन तक सीमित न रहकर समाज के समक्ष ऐसे विषयों को लाना भी है, जो वर्तमान और भविष्य से सीधे जुड़े हैं। प्रकृति, पर्यावरण, संस्कृति, इतिहास, कला और समाज जैसे विषयों पर विशेषज्ञों के अनुभव तथा आम लोगों की जिज्ञासाओं को एक मंच पर लाने से संवाद की नई संभावनाएं बनती हैं।

विशेष रूप से उत्तराखण्ड जैसे हिमालयी राज्य में प्राकृतिक संसाधनों और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। हिमालय केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि जल, जैव-विविधता, लोकसंस्कृति और जीवन-परंपराओं का आधार है। ऐसे में फूलों की घाटी जैसे स्थलों पर विमर्श केवल पर्यटन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि संरक्षण, स्थानीय समुदाय, पर्यावरणीय संतुलन और भविष्य की पीढ़ियों की जिम्मेदारी से भी जुड़ना चाहिए। वक्ताओं ने आशा जताई कि दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र इस तरह के कार्यक्रम युवाओं और आम नागरिकों को इन प्रश्नों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बनने की दिशा में इसी तरह पहल करते रहेगा।

दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने वक्ता अतिथियों और दर्शकों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के उद्देश्य और विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड की प्राकृतिक विरासत को देखने के साथ-साथ उसके पीछे मौजूद प्रकृति, समाज और संस्कृति के संबंधों को समझना जरूरी है। उन्होंने वक्ता के अनुभवों और छायाचित्रों के माध्यम से इस महत्वपूर्ण विषय को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाने के प्रयास को उपयोगी बताया।

आज के इस कार्यक्रम में पुस्तकालयाध्यक्ष डी.के. पाण्डे, डॉ. कल्याण सिंह रावत मैती, लोकेश ओहरी,अशोक सिंह महर, जय राज, हिमांशु आहूजा, द्विजेन्द्र बहुगुणा, विजेन्द्र रावत, प्रतीक पंवार सुंदर सिंह बिष्ट, डॉ. लालता प्रसाद, विजय भट्ट, बीना बेंजवाल, सुरेन्द्र सजवाण, सुधीर बिष्ट, जादीश बाबला, के. बी. नैथानीबद्रीश छाबड़ छाबडा, डॉ. अरुण कुकसाल, भारती आंनद, जगदम्बा प्रसाद मैठाणी, आलोक सरीन, हरि ओम पाली, योगेन्द्र नेगी सहित बड़ी संख्या में पाठक गण, युवा पाठक, पत्रकार, लेखक, साहित्यकार, शोधार्थी, छायाकार, प्रकृति एवं पर्यावरण प्रेमी तथा यात्रा में रुचि रखने वाले लोग उपस्थित रहे।

प्रतिभागियों ने कार्यक्रम को फूलों की घाटी को एक नए दृष्टिकोण से समझने वाला ज्ञानवर्धक और प्रेरक अनुभव बताया। कार्यक्रम ने यह संदेश भी दिया कि प्राकृतिक विरासत का वास्तविक सम्मान केवल उसके सौंदर्य को देखने में नहीं, बल्कि उसकी संवेदनशीलता को समझने और उसके संरक्षण की जिम्मेदारी निभाने में है।

सोमवार, 31 अगस्त, 2026 दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्रआपको सादर आमंत्रित करता हैफूलों की घाटी : मिथक और यथार्थ एक सचित्र व...
28/08/2026

सोमवार, 31 अगस्त, 2026

दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र
आपको सादर आमंत्रित करता है
फूलों की घाटी : मिथक और यथार्थ
एक सचित्र व्याख्यान

श्री चंद्रशेखर चौहान
चर्चित छायाकार और घुमक्कड़

संचालन : श्री संदीप गुसाईं

सोमवार, 31 अगस्त, 2026
सायं 4:00 बजे से
दून पुस्तकालय का सभागार

दून पुस्तकालय ने आयोजित की पहाड़ में पलायन व उद्यमिता पर युवाओं के साथ संवाद कार्यशालादेहरादून, 24 अगस्त 2026। पहाड़ के ...
24/08/2026

दून पुस्तकालय ने आयोजित की पहाड़ में पलायन व उद्यमिता पर युवाओं के साथ संवाद कार्यशाला

देहरादून, 24 अगस्त 2026। पहाड़ के गाँवों से युवाओं का पलायन आज एक गंभीर चुनौती है, लेकिन पहाड़ की तस्वीर केवल पलायन और बेरोजगारी की नहीं है। अनेक युवा ऐसे भी हैं, जो नई सोच, तकनीक और उद्यमिता के सहारे अपने गाँवों में लौटकर न केवल स्वयं के लिए रोजगार के अवसर पैदा कर रहे हैं, बल्कि दूसरे लोगों को भी रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं। यदि पहाड़ के युवाओं को स्थानीय संसाधनों, आधुनिक तकनीक और बाजार से जोड़ दिया जाए तो रोजगार के लिए होने वाले पलायन की दिशा को काफी हद तक बदला जा सकता है।

यह बात वरिष्ठ सामाजिक चिंतक और लेखक श्री विजेन्द्र रावत ने सोमवार को दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में युवा पाठकों के साथ आयोजित ‘युवा संवाद कार्यशाला : पहाड़ होगा, आने वाला कल’ में कही।

दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से आयोजित इस सार्थक संवाद का विषय ‘पर्वतीय कृषि, बागवानी, पर्यटन और पर्यावरण के क्षेत्र में सम्भावित उद्यमिता के अवसर’ था। कार्यशाला में युवाओं के साथ सीधे संवाद करते हुए श्री रावत ने कहा कि रोजगार का अर्थ केवल सरकारी नौकरी प्राप्त करना नहीं है। पहाड़ में उपलब्ध जमीन, जल, जंगल, कृषि, बागवानी, पशुपालन, पर्यटन और स्थानीय ज्ञान को आधुनिक तकनीक तथा बाजार से जोड़कर रोजगार के अनेक अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

विजेन्द्र रावत ने अपने विचार में मत व्यक्त किया और कहा कि आज भले ही पहाड़ के अनेक गाँव पलायन की गिरफ्त में हैं और रोजगार तथा बेहतर अवसरों की तलाश में युवा शहरों की ओर जा रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर कुछ युवा नई उम्मीदों और नए विचारों के साथ अपने गाँवों की ओर लौट भी रहे हैं। वे ईमानदारी, मेहनत और तकनीक के सहारे अपने लिए रोजगार खड़ा कर रहे हैं और अपने साथ-साथ गाँव के अन्य लोगों के लिए भी आजीविका के अवसर पैदा कर रहे हैं। यही प्रयास इस विश्वास को मजबूत करता है कि ‘आने वाला कल पहाड़ का हो सकता है।’

श्री रावत ने उदाहरण देकर युवाओं से कहा कि देश के विभिन्न हिस्सों में काम करने और अलग-अलग क्षेत्रों का अनुभव प्राप्त करने के बाद अनेक लोग पहाड़ की ओर लौटकर स्वरोजगार और उद्यमिता के नए रास्ते तलाश रहे हैं। ऐसे लोगों के अनुभव युवाओं के लिए प्रेरणा के साथ-साथ व्यावहारिक मार्गदर्शन भी हैं। उन्होंने चकराता के विक्रम पंवार जैसे युवाओं का उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह युवा बाहर रोजगार के अवसर मिलने के बावजूद अपने गाँव में लौटकर पर्यटन, खानपान और अन्य व्यवसायों के माध्यम से अपने लिए तथा दूसरे लोगों के लिए रोजगार पैदा कर सकते हैं।

उन्होंने जोर देकर कहा कि पहाड़ में कृषि और बागवानी को केवल परंपरागत खेती के रूप में देखने के बजाय इसे बाजार आधारित उद्यम के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है। फल-सब्जी उत्पादन, जैविक खेती, प्रसंस्करण, डेयरी, पशुपालन, स्थानीय खाद्य उत्पाद, कुटीर एवं लघु उद्योग, होम-स्टे, ग्रामीण पर्यटन और प्रकृति आधारित पर्यटन में व्यापक संभावनाएँ हैं। पर्यावरण संरक्षण को भी रोजगार और उद्यमिता से जोड़ा जा सकता है। युवाओं को अपने स्थानीय संसाधनों की पहचान कर उन्हें मूल्यवर्धित उत्पाद और सेवाओं में बदलने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

अहमदाबाद भारतीय प्रबन्ध संस्थान से प्रबंधन की उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुके कनासर के सेब की बागवानी को सफलता के शिखर पर ले जाने वाले युवा उद्यमी विक्रम पंवार ने युवाओं से कहा कि छोटे स्तर से शुरू किया गया कोई भी काम यदि सही योजना, मेहनत, तकनीक और बाजार की समझ के साथ किया जाए तो वह आगे चलकर अच्छी आय का माध्यम बन सकता है। उन्होंने कहा कि कई स्वरोजगार ऐसे हैं जिन्हें सीमित पूँजी से शुरू किया जा सकता है और धीरे-धीरे उनका विस्तार किया जा सकता है। इसलिए सरकारी नौकरी न मिलने को जीवन की असफलता मानकर निराश होने के बजाय युवाओं को उपलब्ध विकल्पों पर विचार करना चाहिए।

बागवानी के सफल उद्यमी लांघा रोड के इन्द्रसिंह नेगी ने कहा कि पहाड़ के गाँवों को केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि रोजगार, उद्यम और संभावनाओं के केन्द्र के रूप में विकसित करने की जरूरत है। इसके लिए युवाओं को स्थानीय संसाधनों, आधुनिक तकनीक, डिजिटल माध्यमों और बाजार की नई आवश्यकताओं के साथ जोड़ना होगा। उन्होंने युवाओं से अपने गाँवों में उपलब्ध अवसरों को पहचानने, नए प्रयोग करने और सामूहिक रूप से आगे बढ़ने का आह्वान किया।

कार्यक्रम का संचालन युवा पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता प्रेम पंचोली ने किया। उन्होंने कहा कि युवाओं की आकांक्षाओं, रोजगार की चुनौतियों तथा पहाड़ में उपलब्ध अवसरों से जुड़े सवाल और विचार सामने आने चाहिए। युवा प्रतिनिधियों साक्षी पोखरियाल और राघव उनियाल ने भी संवाद में भाग लिया और अपने विचार प्रकट करते हुए युवाओं के संदर्भ में इस तरह के संवाद की उपयोगिता बतायी ।संवाद के दौरान कुछ अन्य वक्ताओं तथा युवाओं ने भी कृषि, पर्यटन, स्वरोजगार, स्थानीय उत्पादों के विपणन तथा पहाड़ में रहकर आजीविका के अवसर विकसित करने से जुड़े विषयों पर अपनी बात भी रखी।

कार्यक्रम की शुरुआत में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने अतिथि वक्ताओं, पहाड़ में आजीविका के साधन विकसित करने वाले रोल मॉडल्स तथा प्रतिभागी युवा पाठकों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि दून पुस्तकालय केवल पुस्तकों और पठन-पाठन तक सीमित न रहकर यहां अध्ययनरत युवाओं को समकालीन सामाजिक, आर्थिक और रोजगार संबंधी मुद्दों से जोड़ने का भी प्रयास कर रहा है। उन्होंने बताया कि पुस्तकालय की ओर से इस तरह के संवादों के माध्यम से पहाड़ के युवाओं को उद्यमिता और स्थानीय स्तर पर रोजगार के विकल्पों की दिशा में प्रेरित करने का प्रयास आगे भी जारी रहेगा।

कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागी छात्रों को श्री विजेन्द्र रावत की पुस्तक ‘हमारे नायक’ की प्रतियाँ निःशुल्क भेंट की गईं। इस पुस्तक में युवाओं को समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के प्रयासों से परिचित कराने का प्रयास किया गया है।

कार्यशाला में हुई बातचीत और सवाल -जबाब का निष्‍कर्ष यही रहा कि पहाड़ का भविष्य केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि स्थानीय समाज, युवाओं की रचनात्मक ऊर्जा और स्थानीय संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग से बन सकता है। युवा यदि जागरूक होकर अपने गाँवों की तरफ देखे और वहां उपलब्ध संभावनाओं को पहचानकर उन्हें आधुनिक तकनीक और बाजार से जोड़ें तो रोजगार की तलाश में होने वाला पलायन को कुछ हद तक रोका जा सकता है ।इस तरह के प्रयासों से गाँवों में नई आर्थिक गतिविधियों को जन्म दिया जा सकता है। निश्चित तौर पर ‘पहाड़ होगा, आने वाला कल’ का यह विश्वास तभी साकार होगा, जब पहाड़ का युवा अपने भविष्य को अपने गाँव और अपनी धरती से जोड़ने की ओर उन्मुख होने का प्रयास करेगा।

इस अवसर पर दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के पुस्तकालयाध्यक्ष डी.के. पाण्डे ने धन्यवाद दिया और इस तरह के कार्यक्रमों से युवाओं को उद्यमिता की दिशा में जुड़ने का आह्वान किया ।

कार्यक्रम में रविंद्र जुगरान, जगदम्बा मैठाणी, बी.एस. नेगी, आलोक सरीन पंडित राजेन्द्र सेमवाल, उत्तरांचल प्रेस क्लब के अजय राणा, डॉ. लालता प्रसाद, सुंदर सिंह बिष्ट सहित दून पुस्तकालय में अध्ययनरत कई युवा पाठक उपस्थित रहे।

दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्रआपको सादर आमंत्रित करता है युवा संवाद कार्यशाला : पहाड़ होगा,आने वाला कलपर्वतीय कृषि, बागवा...
23/08/2026

दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र
आपको सादर आमंत्रित करता है

युवा संवाद कार्यशाला : पहाड़ होगा,आने वाला कल

पर्वतीय कृषि, बागवानी,
पर्यटन और पर्यावरण के क्षेत्र में सम्भावित उद्यमिता के अवसर विषय पर युवाओं के साथ एक बातचीत

मुख्य वक्ता :
श्री विजेन्द्र रावत
वरिष्ठ सामाजिक चितंक और लेखक
संचालक :
प्रेम पंचोली, युवा पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता

युवा प्रतिनिधि :
साक्षी पोखरियाल और राघव उनियाल

(प्रतिभागी छात्रों को विजेंद्र रावत की पुस्तक 'हमारे नायक' की प्रति निःशुल्क भेंट की जाएगी)

सोमवार, 24 अगस्त, 2026
प्रातः 11:30 बजे
दून पुस्तकालय का सभागार

दून पुस्तकालय में ‘रेशियोज़ इन द रिपब्लिक’ पुस्तक का लोकार्पण और चर्चा देहरादून, 21 अगस्त 2026। दून पुस्तकालय एवं शोध के...
21/08/2026

दून पुस्तकालय में ‘रेशियोज़ इन द रिपब्लिक’
पुस्तक का लोकार्पण और चर्चा

देहरादून, 21 अगस्त 2026। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के सभागार में शुक्रवार को भारतीय राजस्व सेवा से सेवानिवृत्त अधिकारी डॉ. देवी प्रसाद सेमवाल की पुस्तक ‘रेशियोज़ इन द रिपब्लिक : वोटर्स चॉइस पैटर्न्स इन द वर्ल्ड्स लार्जेस्ट डेमोक्रेसी’ का लोकार्पण किया गया। पुस्तक लोकार्पण के बाद आयोजित चर्चा में भारत के चुनावी लोकतंत्र, मतदाता व्यवहार, सामाजिक परिस्थितियों और सात दशकों में उभरते चुनावी पैटर्न पर गंभीर और रोचक बातचीत हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री एन. रवि शंकर, आईएएस, मानद निदेशक,दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र तथा पूर्व मुख्य सचिव, उत्तराखण्ड शासन ने की। बातचीत में श्री अनिल रतूड़ी, पूर्व पुलिस महानिदेशक, उत्तराखण्ड ने पुस्तक पर महत्वपूर्ण विचार रखे।

पुस्तक में भारत में हुए 1951-52 से 2024 तक के सभी 18 लोकसभा चुनावों को आधार बनाकर मतदाताओं के निर्णय और चुनावी परिणामों में दिखाई देने वाले पैटर्न को समझने का प्रयास किया गया है। लेखक ने केवल राजनीतिक दलों, नेताओं, चुनाव प्रचार अथवा तत्कालीन राजनीतिक घटनाओं को ही विश्लेषण का आधार नहीं बनाया है, बल्कि यह सवाल उठाया है कि क्या करोड़ों मतदाताओं के सामूहिक निर्णयों में मानव व्यवहार के कुछ ऐसे गहरे और बार-बार दिखाई देने वाले पैटर्न मौजूद हैं, जिन्हें व्यापक स्तर पर समझा जा सकता है।

चर्चा के दौरान डॉ. सेमवाल ने बताया कि पुस्तक का मूल विचार यह नहीं है कि किसी व्यक्ति का चुनावी निर्णय केवल उसके ‘जीन’ या आनुवंशिक प्रवृत्तियों से निर्धारित होता है। इसके बजाय पुस्तक जीन और वातावरण की परस्पर क्रिया को समझने का प्रयास करती है। परिवार, शिक्षा, संस्कृति, आर्थिक स्थिति, सामाजिक परिवेश, राजनीतिक घटनाएं, नेतृत्व और समय-समय पर बदलती परिस्थितियां मानव व्यवहार को प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि समान प्रवृत्तियां अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक वातावरण में अलग रूप ले सकती हैं।

कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने पुस्तक के विषय और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर लेखक से अनेक सवाल किए। सवाल-जवाब के दौरान यह जानने की उत्सुकता दिखाई गई कि क्या चुनावी परिणामों के आधार पर मतदाता व्यवहार में कोई दीर्घकालिक प्रवृत्ति पहचानी जा सकती है, राजनीतिक परिस्थितियां और सामाजिक वातावरण मतदाताओं के निर्णय को किस तरह प्रभावित करते हैं तथा क्या अतीत के चुनावी आंकड़ों के अध्ययन से भविष्य के लोकतांत्रिक व्यवहार को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिल सकती है। लेखक ने स्पष्ट किया कि पुस्तक किसी चुनाव के परिणाम की निश्चित भविष्यवाणी करने का दावा नहीं करती, बल्कि उपलब्ध चुनावी अनुभवों और सामाजिक संदर्भों के आधार पर मानव व्यवहार के व्यापक पैटर्न को समझने की कोशिश करती है।

अध्यक्षता करते हुए श्री एन. रवि शंकर ने लोकतंत्र में मतदाता के निर्णय की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में चुनाव केवल राजनीतिक सत्ता के निर्धारण की प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि वे समाज की सोच, आकांक्षाओं और बदलती प्राथमिकताओं को भी सामने लाते हैं।

श्री अनिल रतूड़ी ने पुस्तक के विषय को समकालीन सामाजिक और प्रशासनिक संदर्भों से जोड़ते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को समझने के लिए केवल राजनीतिक घटनाओं को देखना पर्याप्त नहीं है। सामाजिक व्यवहार, नेतृत्व, परिस्थितियां और जनमानस की भूमिका को भी समझना आवश्यक है।

कार्यक्रम में यह बात भी उभरकर सामने आई कि चुनावों का अध्ययन केवल राजनीतिक विश्लेषण तक सीमित नहीं रहना चाहिए। मतदाता व्यवहार और सामाजिक परिस्थितियों के बीच संबंधों की बेहतर समझ सार्वजनिक नीति, प्रशासन और व्यापक मानव कल्याण के लिए भी उपयोगी हो सकती है।

यह पुस्तक एक शांत लेकिन गहन प्रश्नों की पड़ताल करती है: गोपनीयता और स्वतंत्रता के साथ मतदान करने वाले लाखों लोग बार-बार पहचाने जा सकने वाले चुनावी प्रतिरूप क्यों उत्पन्न करते हैं? व्यवहार आनुवंशिकी, जनसंख्या पारिस्थितिकी, सामाजिक-राजनीतिक अध्ययन तथा भारतीय आम चुनावों के साढ़े सात दशकों (1951-52 से 2024 तक) के आँकड़ों के आधार पर यह पुस्तक संकेत देती है कि लोकतांत्रिक परिणामों में ऐसे नियमित प्रतिरूप दिखाई दे सकते हैं, जो आनुवंशिक रूप से प्रभावित मतदाता-प्रवृत्तियों में निहित विरासत-सदृश नियमों से जुड़े हो सकते हैं और जो बदलते सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक परिवेश में सक्रिय रहते हैं।

जैविक नियतिवाद का कोई दावा किए बिना, यह अध्ययन इस बात की पड़ताल करता है कि बड़े पैमाने पर होने वाला चुनावी व्यवहार किस प्रकार संभाव्य संरचनाओं को प्रदर्शित कर सकता है, जो प्राकृतिक जनसंख्याओं में लंबे समय से देखे जाने वाले प्रतिरूपों से मिलती-जुलती हैं। भारत का विशाल, विविधतापूर्ण और निरंतर विकसित होता मतदाता वर्ग इस प्रकार के अध्ययन के लिए विशेष रूप से उपयुक्त आधार प्रदान करता है।

जनसंख्या-केंद्रित और अंतर्विषयक दृष्टिकोण से चुनावी इतिहास को देखने वाली यह पुस्तक विचारधारा और तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों से आगे बढ़कर लोकतांत्रिक चुनावों के भीतर मौजूद गहरे संरचनात्मक चक्रों और प्रतिरूपों को सामने लाती है। अंततः यह पाठकों को चुनावों को केवल सत्ता के लिए होने वाले संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि मानव व्यवहार की उन स्थायी अभिव्यक्तियों के रूप में देखने के लिए प्रेरित करती है, जो जीवविज्ञान और पर्यावरण के परस्पर संबंध से निर्मित होती हैं।

लेखक डॉ. देवी प्रसाद सेमवाल ने कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल से प्राणीशास्त्र (कीटविज्ञान) में मास्टर डिग्री तथा जनसंख्या पारिस्थितिकी में पीएच.डी. प्राप्त की। उन्होंने 1980 में अपने विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया, जहाँ उन्होंने आनुवंशिकी, पारिस्थितिकी और कीटविज्ञान पढ़ाया। सार्वजनिक सेवा में आने से पहले, वर्ष 1982 में उन्हें CSIR की सीनियर रिसर्च फेलोशिप (SRF) प्रदान की गई।

बाद में, 1985 में उनका चयन भारतीय राजस्व सेवा (IRS) के लिए हुआ और उन्होंने LBSNAA, मसूरी तथा नेशनल एकेडमी ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज (NADT), नागपुर में प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके पश्चात उन्होंने LL.B. और LL.M. की डिग्रियाँ हासिल कीं, जिससे प्राकृतिक विज्ञान और विधि—दोनों क्षेत्रों में उनकी विद्वतापूर्ण पृष्ठभूमि और समृद्ध हुई।

भारतीय राजस्व सेवा में उन्होंने भारत सरकार के लिए कर प्रशासन, जाँच, सतर्कता, अपीलीय कार्यों तथा एक दशक से अधिक समय तक केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT), वित्त मंत्रालय के कर नीति एवं विधान (TPL) प्रभाग में विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण कार्यों के साथ-साथ बारह वार्षिक वित्त विधेयकों (Annual Finance Bills) के प्रारूप तैयार करने में भी योगदान दिया।

डाॅ. सेमवाल स्पष्टवादिता के लिए जाने जाते हैं और भारतीय निर्वाचन आयोग के संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों से संबंधित कार्यों के पर्यवेक्षक के रूप में उन्होंने भारत की चुनावी प्रक्रिया की जमीनी वास्तविकताओं को समझने का महत्त्वपूर्ण अनुभव प्राप्त किया। यह कार्य उनके जैविक विज्ञान, संवैधानिक शासन, मतदाता व्यवहार और सार्वजनिक नीति से जुड़े विविध बौद्धिक हितों के संगम को दर्शाता है।

कार्यक्रम में उपस्थित बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों, अधिकारियों और युवा पाठकों ने दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की इस पहल को सार्थक बताते हुए कहा कि पुस्तक केन्द्रित ऐसे संवाद सार्वजनिक बौद्धिक जीवन को समृद्ध करते हैं और पुस्तकालय को अध्ययन के साथ-साथ विचार-विमर्श के सक्रिय केन्द्र के रूप में स्थापित करते हैं।

कार्यक्रम का संचालन श्री डी. के. पाण्डे, पुस्तकालयाध्यक्ष एवं प्रशासनिक अधिकारी, दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र ने किया।

इस अवसर पर पूर्व प्रमुख सचिव विभापुरी दास, मुख्य सूचना आयुक्त, श्रीमती राधा रतूड़ी, दून पुस्तकालय के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी,डॉ.पंकज नैथानी, डॉ. कृपा राम नौटियाल, डॉ. लालता प्रसाद, सुंदर बिष्ट, योगिता थपलियाल, गीतांजलि भट्ट, कल्याण बुटोला, सुरेन्द्र सजवाण, अरुण कुमार असफल,. प्रेम पंचोली, डॉ. कुसुम नौटियाल, डॉ. गैरोला, जे.सी. नैथानी, हरिओम पाली, सहित प्रशासन एवं विभिन्न विभागों से जुड़े अधिकारी, शिक्षाविद, बुद्धिजीवी, पत्रकार, साहित्यकार, लेखक, शोधार्थी और बड़ी संख्या में युवा पाठक उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के अंत में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से सभी अतिथियों और उपस्थित प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया गया।

शनिवार, 22 अगस्त, 2026दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्रसोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटीज के सहयोग से आयोजित कार्यक्रम मेंआपको सा...
21/08/2026

शनिवार, 22 अगस्त, 2026

दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र
सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटीज के सहयोग से आयोजित कार्यक्रम में
आपको सादर आमंत्रित करता है

‘मेकिंग मोलेहिल्स ऑफ माउंटेन्स’ के
तीसरे संस्करण का लोकार्पण

समुदाय और संवैधानिक अधिकार :
जलवायु संकट के दौर में

शनिवार, 22 अगस्त, 2026
10:30 बजे से
दून पुस्तकालय का सभागार

प्रवेश निःशुल्क एवं सबका स्वागत

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्रआपको सादर आमंत्रित करता हैपुस्तक लोकार्पण व तत्‍पश्चात चर्चा'रेशियोज...
18/08/2026

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र
आपको सादर आमंत्रित करता है
पुस्तक लोकार्पण व तत्‍पश्चात चर्चा

'रेशियोज़ इन द रिपब्लिक'
वोटर्स चॉइस पैटर्न्स इन द वर्ल्ड्स लार्जेस्ट डेमोक्रेसी

लेखक : डॉ. देवी प्रसाद सेमवाल, भारतीय राजस्व सेवा (सेवानिवृत्त)

अध्यक्षता
श्री एन. रवि शंकर, IAS
पूर्व मुख्य सचिव, उत्तराखण्ड शासन
चर्चाकार
श्री अनिल रतूड़ी
पूर्व पुलिस महानिदेशक, उत्तराखण्ड
संचालन
श्री डी. के. पाण्डे
पुस्तकालयाध्यक्ष एवं प्रशासनिक अधिकारी

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026
सायं 4:30 बजे से

दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र का सभागार

समकालीन कहानी की पठनीयता और चुनौतियां पर गोष्ठीदेहरादून, 17 अगस्त, 2026 I साहित्य कला और संस्कृति के लिए समर्पित संस्था ...
18/08/2026

समकालीन कहानी की पठनीयता और चुनौतियां पर गोष्ठी

देहरादून, 17 अगस्त, 2026 I साहित्य कला और संस्कृति के लिए समर्पित संस्था "संवेदना" द्वारा दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के सहयोग से दून पुस्तकालय के सभागार में आज कहानी विधा से संबंधित विषय "समकालीन कहानी की पठनीयता और चुनौतियां" विषय पर एक गोष्ठी संपन्न हुई ।

गोष्ठी की अतिथि वक्ता डॉक्टर रजनी गुप्त, जो कि 'कथाक्रम' पत्रिका लखनऊ की उप संपादक भी हैं, ने कहा कि समकालीनता एक विशेष कालखंड का द्योतक है, जिसमें आज के जीवन का यथार्थ हो अर्थात सीधे-सीधे वास्तविक जीवन से सहजता से जुड़ाव महसूस हो । आज की इस कहानी में इस तरह से विषयों की विविधता शामिल हो,जिसे पढ़ते हुए आम पाठक को अपना समूचा जीवन नजर आए, कहानी में ऐसे नए विषयों को लिया जाए जिसमें दिन-ब-दिन जटिल होते जा रहे रिश्तों और जीवन के बहुआयामी संबंधों से मुठभेड़,पढ़कर जीने का हौसला जगे । विषय बेशक नए हों मगर थीम को रचने गढ़ने में इतनी दुरूहता न हो, जिसे आम पाठक समझ ही ना सके । जैसे गीतांजलि श्री का बुकर पुरस्कार प्राप्त उपन्यास 'रेत समाधि' . क्योंकि इस तेज रफ्तार दौर में आज समय की कमी है । रचनारत कई पीढियां के लेखक मौजूदा दौर के बहुरूपिया प्रहारों और बाजार से उपजी समस्याओं का सामना कर रहे हैं । बेशक कहानियों का खूब प्रकाशन हो रहा है किंतु पाठकों की संख्या में इसने इजाफा किया हो ऐसा कहना मुश्किल है । इसके बरबक्श सामान्य पाठक कई बार एक जैसे होते जा रहे उसके पाठ से ऊबने की शिकायत भी करते हुए देखे जा सकते हैं

अपने-अपने हिसाब से तय लगभग दो दशक के जीवन को रचनाओं में समेटना मुश्किल है । क्योंकि आज कहानीकारों की कई पीढियां एक साथ सक्रिय हैं । समकालीन कहानी में तीन पीढियां के लेखक सृजनरत हैं । आम पाठक किसे पढ़े किसे ना पड़े , पढ़ने का हासिल क्या रहा, ऐसे सवाल जरूरी हैं । आज के दौर में पठनीयता के दबाव का सामना करने और नए शिल्प को पाने की जद्दोजहाफ़ से हर लेखक जूझ रहा है । इतना ही नहीं जिन लोगों का रचनाकाल कुछ दशकों तक फैला है, उन्होंने भी अपनी सीमाओं का अतिक्रमण किया है । कई बार नव्यता के अति उत्साह में कुछ युवा लेखक अपनी ही शैली के दोहराव के शिकार होकर अल्प अवधि में ही पुराने पड़ते गए यानी मोनोटोनस हो गए । हिंदी कहानी के समकालीन परिदृश्य में दोनों ही तरह के उदाहरण आसानी से देखे जा सकते हैं ।

डॉ रजनी गुप्त के उपन्यास/ कहानी पुस्तक 'आलापचारी' के लोकार्पण से इस गोष्ठी की शुरुआत हुई ।

गोष्ठी के अध्यक्ष श्री जितेन ठाकुर, जिन्हें उत्तराखंड राज्य सरकार के द्वारा हाल ही में राज्य के साहित्य भूषण सम्मान से भी नवाजा गया है, ने इस विषय पर अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि पठनीयता किसी भी रचना की रीढ़ होती है जिसके सहारे रचना एक पाठक से दूसरे पाठक तक और फिर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती है। यह सच है कि हमने पाठकों का एक बड़ा प्रतिशत खोया है पर फिर भी आज हमारे पास पाठक है और इसे बचाए रखना एक बड़ी चुनौती है । प्रायोजित चर्चाओं ने साहित्य का अहित किया है। इन सब चुनौतियों के बीच ही समाज में कहानी विधा को समाज के लिए उपयोगी बनाते हुए इन चुनौतियों से निरंतर जूझना और पार पाना हर कहानीकार के लिए ब्यक्तिगत स्तर पर और साहित्यिक संस्थाओं को सामूहिक स्तर पर लेखन से भी पहले की पहली जरूरी शर्त है ।

गोष्ठी का प्रारंभ दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के चंद्रशेखर तिवारी के द्वारा सभी उपस्थित सदस्यों के स्वागत के साथ किया गया । संवेदना संस्था के संयोजक समदर्शी बड़थ्वाल ने संवेदना संस्था के कार्यों पर बात रखी । यह संस्था पिछले पांच दशक से भी अधिक समय से देहरादून में साहित्य कला और संस्कृति के क्षेत्र में अपना निरंतर योगदान दे रही है । हर माह के प्रथम रविवार को संवेदना की पहली गोष्टी संपन्न होती है जिसमें रचनाकारों द्वारा अपनी अब अप्रकाशित रचनाओं को संवेदना के साथियों के समक्ष रखा जाता है और उस पर उनकी राय ली जाती है, जिससे उसका परिमार्जन किया जा सके । कला संस्कृति और समसामयिक सामाजिक मुद्दों पर भी संवेदना द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों और जन आंदोलनों सामाजिक कार्यों में निरंतर सहभागिता की जाती रही है ।

गोष्ठी का संचालन डॉक्टर विद्या सिंह ने किया और गोष्टी के विषय पर प्रारंभिक आधार वक्तव्य भी रखा । आज के दौर में जबकि हर कार्य हर गतिविधि में तेजी और तकनीक का विशेष सम्मिश्रण हो चुका है, ऐसे में कहानी लेखन और उसका पाठकों तक उसके मूल तत्व के साथ पहुंचना और उन्हें प्रभावित करना एक दुष्कर या कठिन कार्य हो गया है । इस बारे में इसे चुनौती के रूप में लिया जाना आवश्यक भी है, जबकि चुनौती के रूप में तकनीक, सोशल मीडिया, समय की कमी और युवा वर्ग में नए दौर की विस्तृत पठन-पाठन की प्रक्रिया, रोजगार के लिए जद्दोजहद के कारण एक नए तरह का परिवेश बनता जा रहा है । ऐसे में पुस्तक के रूप में या सोशल मीडिया में भी कहानी को पाठक तक एक अलग समय निश्चित करते हुए पहुंचाना काफी मुश्किल जान पड़ता है । इन कठिनाइयों को पार करते हुए मनुष्य जीवन में उसके बहुमुखी विकास के लिए कहानी की उपयोगिता और उसके प्रभावों को कैसे अक्षुण्ण रखा जाए, इस बारे में ही आज की गोष्टी आज आप सबके सामने अपनी बात रखती है ।

गोष्ठी में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के श्री डी. के. पाण्डे, श्री सुंदर सिंह बिष्ट, संवेदना के साथी डॉक्टर जितेंद्र भारती, डॉ राजेश पाल, डॉ आशुतोष सिंह, शशि भूषण बडोनी, डाॅ. लालता प्रसाद, डॉली डबराल, सुधा थपलियाल, डॉ इंदु पांडे, सुधा जुगरान, सरोजनी नौटियाल,यामा शर्मा, नीलम्प्रभा वर्मा, निशा अतुल्य, रजनीश त्रिवेदी, शिवमोहन सिंह, संजीव घिल्डियाल, कुसुम भट्ट, डॉ घनश्याम सिंह, तन्मय ममगाईं कल्पना बहुगुणा, मंजू कला, दिनेश चंद्र जोशी सहित अन्य साहित्यकार उपस्थित रहे ।

दून पुस्तकालय में राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस पर रंगनाथन की 134वीं जयंती मनाई गईरंगनाथन से जनरेटिव एआई तक’ विषय पर ह...
12/08/2026

दून पुस्तकालय में राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस पर रंगनाथन की 134वीं जयंती मनाई गई

रंगनाथन से जनरेटिव एआई तक’ विषय पर हुआ व्याख्यान, पुस्तकालयों की बदलती भूमिका और पठन संस्कृति पर हुई चर्चा

देहरादून, 12 अगस्त 2026। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में बुधवार को राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस के अवसर पर पद्मश्री डॉ. एस. आर. रंगनाथन की 134वीं जयंती श्रद्धापूर्वक मनाई गई। इस अवसर पर ‘रंगनाथन से जनरेटिव एआई तक : एआई के युग में पुस्तकालय विज्ञान के पाँच नियमों की पुनर्कल्पना’ विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम में पुस्तकालय विज्ञान, डिजिटल तकनीक, पठन संस्कृति तथा बदलते समय में पुस्तकालयों की भूमिका पर गंभीर चर्चा हुई।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. प्रवीण कपूर, वरिष्ठ एसोसिएट लाइब्रेरियन, यूपीईएस तथा डॉ. राजीव कुमार अत्री, लाइब्रेरियन, यूपीईएस रहे। वक्ताओं ने डॉ. एस. आर. रंगनाथन के पुस्तकालय विज्ञान के क्षेत्र में योगदान को रेखांकित करते हुए बताया कि उनके द्वारा प्रतिपादित पाँच नियम आज भी पुस्तकालय व्यवस्था के मूल आधार हैं। उन्होंने कहा कि जनरेटिव एआई और डिजिटल तकनीक के दौर में इन नियमों को नए संदर्भों में समझने की आवश्यकता है। पुस्तकालय अब केवल पुस्तकों के संग्रह और निर्गमन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ज्ञान, सूचना, तकनीक और समाज के बीच सेतु की भूमिका निभा रहे हैं।

वक्ताओं ने कहा कि एआईआधुनिक पुस्तकालय कार्यों जैसे अधिग्रहण, सूचीकरण, वर्गीकरण, मेटाडेटा निर्माण, संग्रह विकास, ई-संसाधनों की खोज एवं अभिगम, संदर्भ एवं उपयोगकर्ता सेवाओं, व्यक्तिगत अनुशंसाओं तथा शोध सहयोग को किस प्रकार प्रभावी बना सकता है। नैतिक एवं उत्तरदायी उपयोग, अकादमिक ईमानदारी, गोपनीयता, कॉपीराइट तथा सूचना के आलोचनात्मक मूल्यांकन में पुस्तकालयाध्यक्षों की उभरती भूमिका पर भी जोर दिया । यह भी कहा गया कि रंगनाथन का उपयोगकर्ता-केंद्रित दर्शन आज भी प्रासंगिक है और एआई पुस्तकालयों को अधिक सुलभ, समावेशी, बुद्धिमान एवं भविष्य के लिए तैयार बनाने के नए अवसर प्रदान करता है।

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुई। इसके बाद कु. वैदेही भट्ट ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। कार्यक्रम में वरिष्ठ पुस्तकालयाध्यक्ष जय भगवान गोयल ने अतिथि वक्ताओं का स्वागत किया। उन्होंने पुस्तकालय सेवा की बदलती आवश्यकताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि पुस्तकालयकर्मियों की भूमिका आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

पुस्तकालयाध्यक्ष एवं प्रशासनिक अधिकारी डॉ. डी. के. पाण्डे ने कार्यक्रम की रूपरेखा और आयोजन की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की विभिन्न गतिविधियों और समाज में उसके योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पुस्तकालय को केवल पुस्तकों के संग्रह के रूप में नहीं, बल्कि अध्ययन, संवाद, शोध और सांस्कृतिक गतिविधियों के जीवंत केन्द्र के रूप में विकसित करना आवश्यक है।

कार्यक्रम में दून पुस्तकालय की लाइब्रेरी प्रोफेशनल मीनाक्षी कुकरेती ने डिजिटल युग में पठन संस्कृति की चुनौतियों पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने मोबाइल और डिजिटल माध्यमों पर उपलब्ध सामग्री के बढ़ते प्रभाव के संदर्भ में यह सवाल उठाया कि पुस्तकों और पुस्तकालयों की आवश्यकता आज भी क्यों बनी हुई है। उन्होंने कहा कि मोबाइल पर उपलब्ध त्वरित सामग्री के बावजूद पुस्तक का गहन अध्ययन व्यक्ति में एकाग्रता, चिंतन और विषय की गहराई को समझने की क्षमता विकसित करता है।

मधु डंगवाल ने पुस्तकालय सेवा के मूल उद्देश्य पर विचार रखते हुए कहा कि चुनौतियां अनेक हैं, लेकिन पुस्तकालय समुदाय के पास “सम्मान, सुधार और सेवा” का संकल्प होना चाहिए। उन्होंने कहा, “किताबें रीडर्स के लिए हैं और लाइब्रेरी समाज के लिए।” पुस्तकालयों की सार्थकता तभी है जब वे समाज और पाठकों की बदलती जरूरतों के अनुरूप स्वयं को निरंतर विकसित करें।

शकुंतला मरछ्याल ने “किताबों से बदलती सोच, सोच से बदलता समाज” विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि एक अच्छी किताब व्यक्ति की सोच को बदलने और उसे जीवन में सही दिशा देने की क्षमता रखती है। बदली हुई सोच केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह परिवार, समाज और व्यापक स्तर पर सकारात्मक परिवर्तन का आधार बन सकती है।

प्रियंका चौहान ने पुस्तकालय प्रोफेशनल्स की समाज में भूमिका पर विचार प्रकट किये.और कहा कि पुस्तकालय संचालन में वहां के कर्मियों की रुचि व .समुचित सहयोग ही पुस्तकालय को सक्रिय बनाता है।

मीनू चौधरी ने भी पुस्तकालय की समाज में भूमिका पर शोध पत्र प्रस्तुत किया. उन्होंने एमकेपी (पीजी ) कॉलेज की पूर्व पुस्तकालयाध्यक्ष श्रीमती शोभा शर्मा जो अभी बनारस में रह रही है, उनके वक्तव्य का वाचन किया.

कार्यक्रम में दून पुस्तकालय के वरिष्ठ पाठक सदस्य शशि भूषण गर्ग, युवा पाठक मोहित रतूड़ी तथा राघव उनियाल और ऋषिता भट्ट ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने पुस्तकालय के साथ अपने अनुभवों और पठन के महत्व पर महत्वपूर्ण तरीके से प्रकाश डाला। इस अवसर पर शुभम बिष्ट और राधा पुंडीर ने कबीर गायन प्रस्तुत कर कार्यक्रम में साहित्य और संगीत का सुंदर समावेश किया और दर्शकों से वाहवाही लूटी।

राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस के अवसर पर दून पुस्तकालय के वरिष्ठ सहायक मधन सिंह बिष्ट को उत्कृष्ट पुस्तकालय सेवा के लिए सम्मानित किया गया। उनके पुस्तकालय के प्रति समर्पण और सेवाभाव की सराहना की गई।

कार्यक्रम का संचालन श्री जगदीश सिंह महर ने किया। जबकि धन्यवाद ज्ञापन सुमन भारद्वाज ने किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में दून पुस्तकालय से योगिता थपलियाल, सुंदर बिष्ट और गीतांजलि का विशेष सहयोग रहा।

इस अवसर पर अर्थशास्त्री व समाज विज्ञानी डॉ. पंकज नैथानी, कार्यक्रम अधिकारी चंद्रशेखर तिवारी, डॉ. लालता प्रसाद,आलोक सरीन,हरि चंद निमेष, पीताम्बर दत्त जोशी, सुर्कीति आर्या, दून पुस्तकालय की स्वीटी जुयाल, पंकज शर्मा, रेणुका वेदपाठी, गामा चंद, राकेश कुमार, अवतार सिंह, विजय बहादुर, सुनील, हिमांशु सहित दून पुस्तकालय के पुस्तकालय सदस्य, युवा पाठक, पुस्तकालयकर्मी, पुस्तक प्रेमी एवं अन्य लोग उपस्थित रहे।

कार्यक्रम में यह भावना प्रमुखता से उभरकर सामने आई कि डिजिटल तकनीक पुस्तकालयों का विकल्प नहीं, बल्कि उनके विकास का नया माध्यम बन सकती है। रंगनाथन के विचारों को जनरेटिव एआई के वर्तमान संदर्भ से जोड़ते हुए पुस्तकालयों को अधिक पाठक-केंद्रित, तकनीक-सक्षम और समाजोन्मुख बनाने की आवश्यकता पर बल दिया गया। राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस का यह आयोजन इसी संकल्प के साथ सम्पन्न हुआ कि पुस्तकालय ज्ञान और समाज के बीच जीवंत सेतु की अपनी भूमिका को भविष्य में और अधिक मजबूत करेंगे।

Address

Lansdowne Chowk
Chowk
248001

Opening Hours

Monday 10am - 5am
Tuesday 10am - 5am
Wednesday 10am - 5am
Thursday 10am - 5am
Friday 10am - 5am
Saturday 10am - 5am

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Doon Library & Research Centre posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Organization

Send a message to Doon Library & Research Centre:

Shortcuts

Share

Category