09/02/2021
आकाश तत्व की शुद्धि :
आकाश तत्व पिछले चार तत्वों की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म होने से अधिक शक्तिशाली है |विश्वव्यापी पोल मे , शून्याकाश मे एक शक्ति तत्व भरा हुआ है जिसे अंग्रेजी मे ईथर कहते हैं | पोले स्थान को खाली नहीं समझना चाहिए | वह वायु से सूक्ष्म होने के कारण प्रत्यक्ष रूप से अनुभव नहीं होता तो भी उसका अस्तित्व पूर्णतया प्रामाणित है | रेडियो द्वारा गायन , समाचार , भाषण आदि जो हम सुनते हैं वे ईथर मे , प्रकाश तत्व मे तरंगों के रूप मे आते हैं | जैसे पानी मे ढेला फेंक देने पर उसकी लहर बनती है और वह लहर जलाशय के अंतिम श्रोत तक चली जाती है उसी प्रकार ईथर ( आकाश ) मे शब्दों की तरंगे पैदा होती है और पलक मारते विश्व भर मे फ़ैल जाती है | इसी विज्ञान के आधार पर रेडियो यंत्र का आविष्कार हुआ | एक स्थान पर शब्द तरंगों के साथ बिजली की शक्ति मिलकर उसे अधिक बलवती करके प्रवाहित कर दिया जाता है | अन्य स्थानों पर जहाँ रेडियो यंत्र लगे है इन् आकाश मे बहने वाली तरंगों को पकड़ लिया जाता है और प्रेषित सन्देश सुने देने लगते हैं |
वाणी चार प्रकार की होती है .. १. बैखरी- जो मुह से बोली और कान से सुनी जाती है जिसे 'शब्द' कहते हैं |२. मध्यमा -जो संकेतों से , मुखाकृति से , भाव-भंगी नेत्रों से कही जाती है , इसे भाव कहते हैं |३. पश्यन्ती- जो मन से निकलती है और मन ही उसे सुन सकता है , इसे विचार कहते हैं | ४. परा - यह आकांक्षा , इच्छा , निश्चय , प्रेरणा , शाप , वरदान आदि के रूप मे अन्तःकरण से निकलती है , इसे संकल्प कहते हैं | यह चारों ही वाणियां आकाश मे तरंग रूप मे प्रवाहित होती है | जो व्यक्ति जितना ही प्रभावशाली है , उसके शब्द , भाव, विचार और संकल्प आकाश मे उतने ही प्रबल होकर प्रवाहित होते रहते हैं |
आकाश मे असंख्य प्रकृति के असंख्य व्यक्तियों द्वारा असंख्य प्रकार की स्थूल एवँ सूक्ष्म शब्दावली प्रेरित होती रहती है | हमारा अपना मन जिस केंद्र पर स्थिर होता है उसी जाति के असंख्य प्रकार के विचार हमारे मस्तिष्क मे धंस जाते हैं और अदृश्य रूप से उन अपने पूर्व निर्धारित विचारों कि पुष्टि करना आरम्भ कर देते हैं | यदि हमारा अपना विचार व्यभिचार करने का हो तो असंख्य व्यभिचारियों द्वारा आकाश मे प्रेरित किये गए वैसे ही शब्द ,भाव ,विचार और संकल्प हमारे ऊपर बरस पड़ते हैं और वैसे ही उपाय सुझाव मार्ग बताकर उसी ओर उत्साहित कर देते हैं |
हमारे अपने स्व-निर्मित विचारों मे एक मौलिक-चुम्बकत्व होता है उसी के अनुरूप आकाशगामी विचार हमारी ओर खीचते हैं | रेडियो मे जिस स्टेशन के मीटर पर सुई कर दी जाए उसी के सन्देश सुनाई पड़ते हैं और उसी समय मे जो अन्य स्टेशन बोल रहे हैं , उनकी वाणी हमारे रेडियो से टकराकर लौट जाति वह सुने नहीं देती | उसी प्रकार हमारे अपने स्व-निर्मित मौलिक विचार ही अपने सजातियों को आमंत्रित करते हैं |
मारी लाश को देखकर कौवा चिल्लाता है तो सैकड़ों कौवे उसकी आवाज सुनकर जमा हो जाते हैं | ऐसे ही अपने विचार भी सजातियों को बुलाकर एक अच्छी खासी सेना जमा कर लेते हैं | फिर उस विचार , सैन्य की प्रबलता के आधार पर उसी दिशा मे कार्य भी आरम्भ हो जाता है |
आकाश तत्व की इस विलक्षणता को ध्यान मे रखते हुए हमें कुविचारों से विषधर सर्प की भांति सावधान रहना चाहिए | अन्यथा वे अनेक स्वजातियों को बुलाकर हमारे लिए संकट उत्पन्न कर देंगे | जब कोई कुविचार मन मे आवे तो तत्क्षण उसे मार भगाना चाहिए
अन्यथा यह सम्पूर्ण मानस क्षेत्र को वैसे ही खराब कर देगा जैसे विष की बूँद सारे भोजन को बिगाड़ देती है |
मन मे सदा उत्तम उच्च सात्विक उदार विचारो को ही स्थान देना चाहिए जिससे उसी जाति के विचार अखिल आकाश से खीचकर हमारी ओर चले आवें और सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें उत्तम बात सोचते रहने स्वाध्याय मनन आत्म-चिंतन परमार्थ और उपासनमयी मनोभूमि हमारा बहुत कुछ कल्याण कर सकती है | यदि प्रतिकूल कार्य न हो रहे हों उच्च विधारधारा से ही सद्गति प्राप्त हो सकती है भले ही उन विचारों के अनुरूप कार्य न हो रहे हों |
संकल्प कभी नष्ट नहीं होते | पूर्वकाल मे ऋषि मुनियों के , महापुरुषों के जो विचार प्रवचन एवँ संकल्प थे वे अब भी आकाश मे गूँज रहे हैं यदि हमारी मनोभूमि अनुकूल हो तो उन दिव्य आत्माओं का पथ -प्रदर्शन एवँ सहारा भी हमें अवश्य प्राप्त होता रहेगा |
परब्रम्ह की ब्राह्मी प्रेरणाएँ शक्तियां किरणे तथा तरंगे भी आकाश द्वारा ही मानव अन्तःकरण को प्राप्त होती है | दैवी शक्तियां ईश्वर की विविध गुणों वाली किरणे ही तो हैं , आकाश द्वारा मन के माध्यम से उनका अवतरण होता है | शिव जी ने आकाशवाहिनी गंगा को अपने शिर पर उतारा था तब वह पृथ्वी पर बही थी | ब्रम्ह की सर्व प्रधान शक्ति आकाश वाहिनी गायत्री गंगा को साधक सबसे पहले अपने मनः क्षेत्र मे उतारता है | यह अवतरण होने पर ही जीवन के अन्य क्षेत्रों को यह पतित-पावनी पुन्यधारा पावन करती है |
तपश्चर्या :
आलसी और आरामतलब शरीर मे अन्नमय कोश की स्वस्थता स्थिर नहीं रह सकती | इसलिए १.उपवास २. आसन ३. तत्वशुद्धि के साथ ४. तपश्चर्या को प्रथम कोश अन्नमय कोश की सुव्यवस्था का आवश्यक अंग बताया गया है |
तप का अर्थ है --उष्णता , गति , क्रियाशीलता , घर्षण , संघर्ष , तितिक्षा कष्ट सहना |
किसी वस्तु को निर्दोष , पवित्र एवँ लाभदायक बनाना होता है तो तपाया जाता है | सोना तपने से खरा हो जाता है | डाक्टर पहले अपने औजारों को गर्म कर लेते हैं तब उनसे आपरेसन करते हैं | चाकू को सान पर न घिसा जाए तो काटने की शक्ति खो बैठेगा | हीरा खराद पर न चढ़ाया जाए तो उसमे चमक और सुंदरता पैदा न होगी | व्यायाम कष्ट साध्य श्रम किये बिना कोई मनुष्य पहलवान नहीं बन सकता | अध्ययन का कठोर श्रम किये बिना कोई विद्वान नहीं बन सकता | माता बच्चे को गर्भ मे रखे बिना , पालन पोषण का कष्ट सहे बिना मातृत्व का सुख लाभ नहीं प्राप्त कर सकती | लप्दों को धुप मे ना सुखाया जाए तो उनमे से बदबू आने लग जायेगी | ईटें यदि भट्टी मे ना पकें तो उनमे मजबूती नहीं आ सकती | माँ पार्वती ने तप करके मनचाहा वरदान पाया था |
भागीरथ ने तप करके गंगा को भूलोक मे बुलाया था | ध्रुव के तप से भगवान को द्रवित कर दिया था | तपस्वी लोग कठोर तपश्चर्या करके सिद्धियाँ प्राप्त करते थे | रावण , कुम्भकरण , मेघनाथ , हिरण्यकश्यप , भष्मासुर आदि आदि ने भी तप के प्रभाव से विलक्षण वरदान पाए थे | आज तक जिस किसी को जो कुछ भी प्राप्त हुआ है वह तप के ही बल से प्राप्त हुआ है | ईश्वर तापस्वी पर प्रसन्न होते हैं और उन्हें मनचाहा वरदान देते हैं | जो भी धनी , संपन्न , सुन्दर , स्वस्थ , विद्वान , प्रतिभाशाली , नेता , अधिकारी आदि के रूप मे चमक रहे हैं , उनकी चमक अभी के या पूर्व जन्मों के तप पर ही अवलंबित है | यदि वे नया तप नहीं करते हैं और पुराने तप को ही खा जाते हैं तो उनको चमक धुंधली होती जायेगी | जो लोग भी आज गिरे हैं उनके उठने का एक ही मार्ग है -तप | बिना तप के कोई भी सिद्धि , कोई भी सफलता नहीं मिल सकती -न ही सांसारिक न ही आत्मिक |
प्राचीन काल मे तपश्चर्या को बड़ा महत्व दिया जाता था जो व्यक्ति जितना परिश्रमी , कष्ट सहिष्णु , साहसी पुरुषार्थी और कार्यशील होता था उसकी उतनी ही प्रतिष्ठा होती थी | धनी- गरीब , राजा-महाराजा सभी के बालक गुरूल भेजे जाते थे ताकि वे कठोर जीवन की शिक्षा प्राप्त करके अपने को इतना सुदृढ़ बना लें की आपत्तियों से लड़ना और संपत्ति को प्राप्त करना सुगम हो सके | आज तप के, कष्ट -सहिष्णुता के महत्व को लोग भूल गए हैं और आराम तलबी , आलस्य , नजाकत को अमीरी का चिन्ह मानने लगे हैं फलस्वरूप पुरुषार्थ घटता जाता है योग्यता द्वारा उपार्जन करने की अपेक्षा लोग छल धूर्तता और अन्याय द्वारा बड़े बनने का प्रयत्न कर रहे हैं | गायत्री साधकों को तपस्वी होना चाहिए , अस्वाद व्रत , उपवास , ऋतू प्रभावों का सहना , तितिक्षा , घर्षण आत्म्कल्प , प्रदातव्य , निकासन , साधन , ब्रम्हचर्य , चंद्रायन , मौन अर्चन , समय के महत्व को पहचानना अनिवार्य है |
परोपकार , लोकसेवा , सत्कार्य के लिए दान , यज्ञ भावना से किये जाने वाले पारमार्थिक जीवन प्रत्यक्ष तप हैं | दूसरों के लाभ के लिए अपने स्वार्थों का बलिदान करना तपस्वी जीवन का प्रधान चिन्ह है | आज की स्थिति मे प्राचीन काल की भांति तप नहीं किये जा सकते अब शारीरिक स्थिति ऐसी नहीं रह गयी कि भागीरथ पार्वती या रावण के जैसे उग्र तप किएय जा सकें दीर्घ काल तक निराहार रहना या बिना विश्राम किये लंबे समय तक साधना रत रहना आज संभव नहीं है वैसा करने से शरीर तुरंत पीड़ाग्रस्त हो जाएगा | सतयुग मे लंबे समय तक दान तप होते थे क्योकि उस समय शरीर मे वायु तत्व प्रधान था | त्रेता मे शरीर मे अग्नि तत्व की प्रधानता थी | द्वापर मे जल तत्व अधिक था | उन युगों मे जो साधनाएं हो सकती थी वह आज नहीं हो सकती क्योकि आज कलयुग मे मानव देहों मे पृथ्वी तत्व प्रधान है | पृथ्वी तत्व अन्य सभी तत्वों से स्थूल है इस लिए आधुनिक काल के शरीर उन तपस्याओं को नहीं कर सकते जो त्रेता मे आसानी से होती थी |
दूसरी बात यह है कि वर्तमान समय मे सामाजिक आर्थिक बौधिक व्यवस्थाओं मे परिवर्तन हो जाने से मनुष्य के रहन सहन मे बहुत अंतर् पड़ गया है बड़े नगरों के निवासियों मे यांत्रिक सभ्यता के बीच रहने के फलस्वरूप शारीरिक श्रम बहुत कम करना पड़ता है और अधिकाँश मे कृतिम वातावरम के कारण शुद्ध जलवायु से भी वंचित रहना पड़ता है | ऐसी अवस्था मे शरीर को पूर्वकालीन तपयोग्य रखना कहाँ संभव हो सकता है ? कुछ समय पूर्व तक नेति धोती वस्ती नियोली बज्रोली कपल-भाति आदि क्रियाएँ आसानी से हो जाती थीं उनके करने वाले अनेक योगी देखे जाते थे पर अब युग प्रभाव से उनकी साधना कठिन हो गयी है जो किसी प्रकार इन् क्रियाओं को करने भी लगते हैं वह उनसे वह लाभ नहीं उठा पाते जो इनसे होनी चाहिए | अधिकाँश हठ योगी तो इन् कठिन साधनाओं के कारण किन्ही कष्ट साध्य रोगों से ग्रसित हो जाते हैं | रक्त -पित्त, अन्त्रदाह ,मूलाधार , कफ , अनिद्रा जैसे रोगों से ग्रसित होते हुए अनेक हठयोगी देखे हैं | इसलिए वर्तमान काल की शारीरिक स्थितियों का ध्यान रखते हुए तपश्चर्या मे बहुत सावधानी बरतने की आवश्यकता है |