गुर्जर संस्कृती, विरासत और इतिहास

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गुर्जर संस्कृती, विरासत और इतिहास गुर्जर शुद्ध संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ 'शत्रु का नाश करने वाला'।

09/11/2022

भोज उपनाम के तीन गुर्जर महाराजा ।।

(1) भोज प्रतिहार ( #मिहिरभोज )⛳
(गुर्जर प्रतिहार राजवंश))

(2) भोज बगड़ावत (सवाई भोज)⛳
(गुर्जर बगड़ावत वंश)

(3) भोज परमार (राजा भोज ) ⛳
(गुर्जर परमार वंश)

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एक परमार तो 🚩 📃
दूजो बगड़ावत ⚔️
और तीजो मिहिरभोज सरदार 🏹🗡 !!
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(1) गुर्जर सम्राट मिहिर भोज गुर्जर प्रतिहार राजवंश के सबसे महानतम शक्तिशाली गुर्जर शासक माने जाते हैं इनका साम्राज्य कश्मीर से लेकर कर्नाटक तक और मुल्तान से लेकर पश्चिम बंगाल तक और पूरे उत्तर भारत पर सम्राट गुर्जर मिहिर भोज का साम्राज्य फैला हुआ था ll

गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज जी के नाम से थर्राते थे अरब मुस्लिम आक्रमणकारी लोग 🙏🙏🔥🚩
और तो और सम्राट मिहिर भोज जी ने अरब मुस्लिम सरदार खलीफा की मूछें तक काट ली थी🚩🙏
ऐसे थे हमारे गुर्जर सम्राट जिन्होंने भारत देश की रक्षा के खातिर अपना सब कुछ नौछावर कर दिया 🙏🚩🙏🙏

(2) बगड़ावत महाराज श्री #सवाईभोज , बगड़ावत गुर्जर वंश के महान और लोकप्रिय गुर्जर राजा थे l अजमेर के चौहान गुर्जर वंश के ही राजकुमार थे जो आगे चलकर बगड़ावत शाखा का निर्माण किया और गढ़ बदनोर पर अपना अधिकार जमा कर वहां पर 24 भाई बगड़ावत सहित अलग-अलग घर गढ़ पर राज करते थे , #बगड़ावत महाभारत कथा के अनुसार कहते हैं कि जिस क्षेत्र से बगड़ावत अपने घोड़ों को लेकर गुजरते थे वहां पर लोगों की भीड़ उमड़ जाती थी क्योंकि बगड़ावत गुर्जर अपने घोड़ों के सिंगार में हीरे मोतियों की मालाएं बनाते थे जोकि कच्ची सूट की मालाएं हुआ करती थी पैरों से लेकर तो पूरे शरीर पर हीरा मोतिया बीछे रहते थे घोड़ियों के ऊपर और वे हीरे जवाहरात एक-एक करके गिरते रहते थे तो लोगों की भीड़ उमड़ जाती थी उन्हें उठाने के लिए इसलिए बगड़ावतों को सबसे धनी राजाओं में से एक मानते हैं l,गौ सेवा और ब्राह्मण सेवा में सदा तत्पर खड़े रहते थे बगड़ावत सवाई भोज ll भोज बगड़ावत को सवाई उपाधि जगह जगह सवाया काम के खातिर उनके गुरु बाबा रूपनाथ ने उनको दी थी ll

(3) राजा भोज गुर्जर परमार राजवंश के सबसे महानतम सम्राट में से एक थे l
इनकी राजधानी भोजपाल यानी धार हुआ करती थी दसवीं शताब्दी में पूरे मालवा पर इनका शासन हुआ करता था #राजाभोज परमार ने बाहरी आक्रमण को लेकर अनेकों युद्ध भी लड़े थे

चारभुजा नाथ का मन्दिरमेवाड़ और मारवाड़ के आराध्य चारभुजा नाथ गढ़बोर मंदिर की अनूठी परंपराएं हैं.चारभुजा नाथ मंदिर का इति...
24/08/2022

चारभुजा नाथ का मन्दिर

मेवाड़ और मारवाड़ के आराध्य चारभुजा नाथ गढ़बोर मंदिर की अनूठी परंपराएं हैं.चारभुजा नाथ मंदिर का इतिहास5 हजार 285 साल पुराना है मंदिर
गोमती नदी किनारे बसा यह मंदिर करीब 5285 साल पुराना माना जाता है. पांडवों के हाथों स्थापित इस मंदिर में कृष्ण का चतुर्भुज स्वरूप विराजित है. यह मंदिर राजसमंद जिला मुख्यालय से करीब 37 किलोमीटर दूरी पर गोमती नदी के तट पर बसा है.

मान्यता है कि द्वापर युग में पांडवों ने अपने वनवास के दौरान गोमती नदी के तट पर चारभुजा वाली प्रतिमा की पूजा किया करते थे. इसके बाद इस प्रतिमा को पांडवों ने जलमग्न कर दिया और यहां से चले गए. इसके बाद यह प्रतिमा गंगदेव को मिली तो उसने भी इस प्रतिमा की पूजा की और कुछ वर्षों बाद इसे पुन जलमग्न कर दिया.
इसके उपरान्त सूरागुर्जर को स्वप्न में मूर्ति के पानी में होने की बात कही, जिसपर सूरा गुर्जर ने मंदिर को पुनः स्थापित कर इसकी पूजा-अर्चना शुरू की, तभी से मंदिर की पूजा-सेवा गुर्जर समुदाय के पास है.

गुर्जर समुदाय करता है मंदिर की सेवा
बता दें कि मंदिर के पुजारी गुर्जर समाज के 1 हजार परिवार हैं, जिनमें सेवा-पूजा ओसरे के अनुसार बंटी हुई है. ओसरे की परंपरा कुछ ऐसी है कि कुछ परिवारों का ओसरा जीवन में सिर्फ एक बार आता है तो किसी का 48 से 50 साल में तो, किसी का 4 साल के अंतराल में भी आ जाता है. हर अमावस्या को ओसरा बदलता है और अगला परिवार का मुखिया पुजारी बनता है. बताया जाता है कि ओसरे का निर्धारण बरसों पहले गोत्र और परिवारों की संख्या के अनुसार हुआ था जो अभी चला आ रहा है

देश-विदेश में विख्यात है मंदिर, जलझूलनी एकादशी है सबसे बड़ा पर्व।

श्री सांवलिया सेठ मंदिर की सुंदर कथाभगवान श्री सांवलिया सेठ का संबंध मीरा बाई से बताया जाता है। किवदंतियों के अनुसार सां...
23/07/2022

श्री सांवलिया सेठ मंदिर की सुंदर कथा

भगवान श्री सांवलिया सेठ का संबंध मीरा बाई से बताया जाता है। किवदंतियों के अनुसार सांवलिया सेठ मीरा बाई के वही गिरधर गोपाल है जिनकी वह पूजा किया करती थी। मीरा बाई संत महात्माओं की जमात में इन मूर्तियों के साथ भ्रमणशील रहती थी। ऐसी ही एक दयाराम नामक संत की जमात थी जिनके पास ये मूर्तियां थी।

एक बार जब औरंगजेब की मुग़ल सेना मंदिरों को तोड़ रही थी। मेवाड़ राज्य में पंहुचने पर मुग़ल सैनिकों को इन मूर्तियों के बारे में पता लगा। तब संत दयाराम जी ने प्रभु प्रेरणा से इन मूर्तियों को बागुंड-भादसौड़ा की छापर (खुला मैदान) में एक वट-वृक्ष के नीचे गड्ढा खोद कर पधरा दिया और फिर समय बीतने के साथ संत दयाराम जी का देवलोकगमन हो गया।

कालान्तर में सन 1840 में मंडफिया ग्राम निवासी भोलाराम गुर्जर नाम के ग्वाले को एक सपना आया कि भादसोड़ा-बागूंड के छापर में 4 मूर्तियां ज़मीन में दबी हुई है, जब उस जगह पर खुदाई की गई तो भोलाराम का सपना सही निकला और वहां से एक जैसी 4 मूर्तियां प्रकट हुईं। सभी मूर्तियां बहुत ही मनोहारी थी।


देखते ही देखते ये खबर सब तरफ फ़ैल गई और आस-पास के लोग प्राकट्य स्थल पर पंहुचने लगे। फिर सर्वसम्मति से चार में से सबसे बड़ी मूर्ति को भादसोड़ा ग्राम ले जाई गई, भादसोड़ा में प्रसिद्ध गृहस्थ संत पुराजी भगत रहते थे। उनके निर्देशन में उदयपुर मेवाड़ राज-परिवार के भींडर ठिकाने की ओर से सांवलिया जी का मंदिर बनवाया गया। यह मंदिर सबसे पुराना मंदिर है इसलिए यह सांवलिया सेठ प्राचीन मंदिर के नाम से जाना जाता है।

मंझली मूर्ति को वहीं खुदाई की जगह स्थापित किया गया इसे प्राकट्य स्थल मंदिर भी कहा जाता है। सबसे छोटी मूर्ति भोलाराम गुर्जर द्वारा मंडफिया ग्राम ले जाई गई जिसे उन्होंने अपने घर के परिण्डे में स्थापित करके पूजा आरंभ कर दी। चौथी मूर्ति निकालते समय खण्डित हो गई जिसे वापस उसी जगह पधरा दिया गया।


कालांतर में सभी जगह भव्य मंदिर बनते गए। तीनों मंदिरों की ख्याति भी दूर-दूर तक फै ली। आज भी दूर-दूर से लाखों यात्री प्रति वर्ष श्री सांवलिया सेठ दर्शन करने आते हैं। सांवलिया सेठ के बारे में यह मान्यता है कि नानी बाई का मायरा करने के लिए स्वयं श्री कृष्ण ने वह रूप धारण किया था। व्यापार जगत मे लोग उनको अपने व्यापार मे पार्टनर बनाते है

सम्राट मिहिरभोज:भोज प्रथम अथवा 'मिहिरभोज' गुर्जर प्रतिहार वंश का सर्वाधिक प्रतापी एवं महान् शासक था। उसने पचास वर्ष (850...
13/07/2022

सम्राट मिहिरभोज:

भोज प्रथम अथवा 'मिहिरभोज' गुर्जर प्रतिहार वंश का सर्वाधिक प्रतापी एवं महान् शासक था। उसने पचास वर्ष (850 से 900 ई.) पर्यन्त शासन किया। उसका मूल नाम 'मिहिर' था और 'भोज' कुल नाम अथवा उपनाम था। उसका राज्य उत्तर में हिमालय, दक्षिण में नर्मदा, पूर्व में बंगाल और पश्चिम में सतलुज तक विस्तृत था, जिसे सही अर्थों में साम्राज्य कहा जा सकता है। भोज प्रथम विशेष रूप से भगवान विष्णु के वराह अवतार का उपासक था, अत: उसने अपने सिक्कों पर आदि-वराह को उत्कीर्ण कराया था।

मिहिरभोज प्रतिहार राजवंश के सबसे महान राजा माने जाते है। इन्होने लगभग ५० साल तक राज्य किया था। इनका साम्राज्य अत्यन्त विशाल था और इसके अन्तर्गत वे थेत्र आते थे जो आधुनिक भारत के राज्यस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियांणा, उडीशा, गुजरात, हिमाचल आदि राज्यों हैं।

मिहिर भोज विष्णु भगवान के भक्त थे तथा कुछ सिक्कों मे इन्हे 'आदिवराह' भी माना गया है। मेहरोली नामक जगह इनके नाम पर रखी गयी थी। राष्टरीय राजमार्ग २४ का कुछ भाग गुर्जर सम्राट मिहिरभोज मार्ग नाम से जाना जाता है।

सम्राट मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक 49 साल तक राज किया। मिहिर भोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक और कश्मीर से कर्नाटक तक फेला हुआ था। ये धर्म रक्षक सम्राट शिव के परम भक्त थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिर भोज के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। 50 वर्ष तक राज्य करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्र पाल को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे।अरब यात्री सुलेमान ने भारत भ्रमण के दौरान लिखी पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं में सम्राट मिहिर भोज को इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु बताया है , साथ ही मिहिर भोज की महान सेना की तारीफ भी की है साथ ही मिहिर भोज के राज्य की सीमाएं दक्षिण में राजकूटों के राज्य, पूर्व में बंगाल के पाल शासक और पश्चिम में मुलतान के शासकों की सीमाओं को छूती हुई बतायी है

मिहिर भोज के सिक्के

गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णू के अवतार के तौर पर

जाना जाता है। वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस को मारकर पृथ्वी को पाताल से निकालकर उसकी रक्षा की थी। गुर्जर सम्राट मिहिर भोज का नाम आदि वाराह भी है। ऐसा होने के पीछे दो कारण हैं

1. जिस प्रकार वाराह भगवान ने पृथ्वी की रक्षा की थी और हिरण्याक्ष का वध किया था ठीक उसी प्रकार मिहिर भोज ने मलेच्छों को मारकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की।

2. दूसरा कारण, गुर्जर सम्राट का जन्म वाराह जयंती को हुआ था जोकि भादों महीने की शुक्ल पक्ष के द्वितीय दोज को होती है। सनातन धर्म के अनुसार इस दिन चंद्रमा का दर्शन करना बहुत शुभ फलदायक माना जाता है। इस दिन के 2 दिन बाद महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी का उत्सव प्रारंभ हो जाता है। जिन स्थानों पर सम्राट मिहिर भोज के जन्मदिवस का पता है वे इस वाराह जयंती को बड़े धूमधाम से मनाते हैं।

साम्राज्य

गुजरात के सोलंकी एवं त्रिपुरा के कलचुरी के संघ ने मिलकर भोज प्रथम की राजधानी धार पर दो ओर से आक्रमण कर राजधानी को नष्ट कर दिया था। भोज प्रथम के बाद शासक जयसिंह ने शत्रुओं के समक्ष आत्मसमर्पण कर मालवा से अपने अधिकार को खो दिया। भोज प्रथम के साम्राज्य के अन्तर्गत मालवा, कोंकण, ख़ानदेश, भिलसा, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़ एवं गोदावरी घाटी का कुछ भाग शामिल था। उसने उज्जैन की जगह अपने नई राजधानी धार को बनाया।

विद्या तथा कला का संरक्षक

भोज प्रथम एक पराक्रमी शासक होने के साथ ही विद्वान् एवं विद्या तथा कला का उदार संरक्षक था। अपनी विद्वता के कारण ही उसने 'कविराज' की उपाधि धारण की थी। उसने कुछ महत्त्वपूर्ण ग्रंथ, जैसे- 'समरांगण सूत्रधार', 'सरस्वती कंठाभरण', 'सिद्वान्त संग्रह', 'राजकार्तड', 'योग्यसूत्रवृत्ति', 'विद्या विनोद', 'युक्ति कल्पतरु', 'चारु चर्चा', 'आदित्य प्रताप सिद्धान्त', 'आयुर्वेद सर्वस्व श्रृंगार प्रकाश', 'प्राकृत व्याकरण', 'कूर्मशतक', 'श्रृंगार मंजरी', 'भोजचम्पू', 'कृत्यकल्पतरु', 'तत्वप्रकाश', 'शब्दानुशासन', 'राज्मृडाड' आदि की रचना की। 'आइना-ए-अकबरी' के वर्णन के आधार पर माना जाता है कि, उसके राजदरबार में लगभग 500 विद्धान थे।

भोज प्रथम के दरबारी कवियों में 'भास्करभट्ट', 'दामोदर मिश्र', 'धनपाल' आदि प्रमुख थे। उसके बार में अनुश्रति थी कि वह हर एक कवि को प्रत्येक श्लोक पर एक लाख मुद्रायें प्रदान करता था। उसकी मृत्यु पर पण्डितों को हार्दिक दुखः हुआ था, तभी एक प्रसिद्ध लोकोक्ति के अनुसार- उसकी मृत्यु से विद्या एवं विद्वान, दोनों निराश्रित हो गये।

निर्माण कार्य –

भोज प्रथम ने अपनी राजधानी धार को विद्या एवं कला के महत्त्वपूर्ण केन्द्र के रूप में स्थापित किया था। यहां पर भोज ने अनेक महल एवं मन्दिरों का निर्माण करवाया, जिनमें ‘सरस्वती मंदिर’ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। उसके अन्य निर्माण कार्य ‘केदारेश्वर’, ‘रामेश्वर’, ‘सोमनाथ सुडार’ आदि मंदिर हैं। इसके अतिरिक्त भोज प्रथम ने भोजपुर नगर एवं भोजसेन नामक तालाब का भी निर्माण करवाया था। उसने ‘त्रिभुवन नारायण’, ‘सार्वभौम’, ‘मालवा चक्रवर्ती’ जैसे विरुद्ध धारण किए थे।

नाम –

भोज प्रथम ने ‘आदिवराह’ एवं ‘प्रभास’ की उपाधियाँ धारण की थीं। उसने कई नामों से, जैसे- ‘मिहिरभोज’ (ग्वालियर अभिलेख में), ‘प्रभास’ (दौलतपुर अभिलेख में), ‘आदिवराह’ (ग्वालियर चतुर्भुज अभिलेखों), चांदी के ‘द्रम्म’ सिक्के चलवाए थे। सिक्कों पर निर्मित सूर्यचन्द्र उसके चक्रवर्तिन का प्रमाण है।

सम्मान –

राष्ट्रीय राजमार्ग 24 जो दिल्ली से लखनऊ को जोड़ता है का नाम भी दिल्ली सरकार ने गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के नाम पर रखा है और दिल्ली में निजामुद्दिन पुल है जहां से यह राजमार्ग शुरू होता है। वहां पर दिल्ली सरकार ने एक बड़ा सा पत्थर लगाया है जिस पर लिखा है गुर्जर सम्राट मिहिर भोज राष्ट्रीय राजमार्ग। इसी राजमार्ग पर स्थित स्वामी नारायण संप्रदाय का अक्षरधाम मंदिर है। अक्षरधाम मंदिर में स्थित भारत उपवन में गुर्जर सम्राट मिहिर भोज महान की धातू की प्रतिमा लगी है और उस पर लिखा है महाराजा गुर्जर मिहिर भोज महान।
गुर्जर सम्राट मिहीरभोज जी की मुर्ति का अनावरण भुतपुर्व प्रधानमत्री अटल बिहारी बाजपेयी, नरेन्द्र मोदी जी, दिल्ली उप मु.त्री मनीष सिसोदिया जी, उतराखड मु.त्री त्रिवेन्द्र रावत जी, जनरल वी के सिह जी, हर्षवर्धन जी, दिल्ली भु. मु.त्री वर्मा जी, योगीजी, अखिलेश यादव जी, मायावती जी, प्रणव चैम्पियन सिंह जी, विरेन्द्र सिंह जी, शिक्षा मंत्री कंवर पाल जी, विवेक नारायण जी आदी कर चुके है।

गुर्जर समाज के इष्ट देव भगवान देवनारायण दरबार की जयभगवान देवनारायण की स्तुति करते हुए उनका जीवन परिचय दिया हैप्रसिद्ध गा...
21/01/2022

गुर्जर समाज के इष्ट देव भगवान देवनारायण दरबार की जय
भगवान देवनारायण की स्तुति करते हुए उनका जीवन परिचय दिया है
प्रसिद्ध गायक कमलजीत सिंह गुर्जर की सुरीली आवाज में करतार सिंह गुर्जर द्वारा रचित गीत को सभी गुर्जर भाई सुने मन गदगद हो जाएगा मैं गायक और गीतकार दोनों को बधाई देता हूं और अभिनंदन करता हूं ऐसा ऐतिहासिक गीत लिखा है और गाया है नीचे में लिंक डाल रहा हूं सभी खोल करके रोजाना सुबह-सुबह जरूर सुना करें

https://youtu.be/GHX4JiadsHw

*प्लीज भाई इस देवनारायण भगवान के गाने को पूरा सुनकर लाइक करे और अपने सभी परिचित लोगों को फोर्वर्ड करें और सबस्क्राइब करे लाइक और शेयर करे धन्यवाद 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏*

श्री देव जैसा देव नही तीनो लोक में - देवनारायण भगवान का सबसे प्यारा Song |Kamaljeet Gurjar |New Song।। श्री देवनारायण मंदिर है एक राजस्....

भोलेनाथ और गुर्जर
09/01/2022

भोलेनाथ और गुर्जर

इस Song मे किसी प्रकार की कोई ग़लत संकेत नही दिए गए है।अपने गुर्जर समाज के लिए भगवान से प्रार्थना की गयी है।सभी भाई सु.....

दादा मिहीर भोज सोंग
25/12/2021

दादा मिहीर भोज सोंग

Title - Gurjar Pratihar History Of Mihir Bhoj | New Gurjar Song | Sonu Majri | New Gujjar Song 2021Singer - Shubham KaushikMusic - Beat RescalWriter - Sonu M...

राधा जी: राधे राधे।  जय श्री कृष्णाजब भी संसार में प्रेम की बात होगी भगवान श्री कृष्ण औरा देवी राधा का प्रेम हमेशा सर्वो...
22/12/2021

राधा जी: राधे राधे। जय श्री कृष्णा

जब भी संसार में प्रेम की बात होगी भगवान श्री कृष्ण औरा देवी राधा का प्रेम हमेशा सर्वोपरि होगा। देवी राधा के इस प्रेम ने संसार को यह ज्ञान दिया है कि प्रेम किसी सामाजिक बंधन का मोहताज नहीं होता। देवी राधा का विवाह भगवान कृष्ण से भले न हुआ हो पर आज भी उनका नाम एक साथ लिया जाता है। मंदिरों में उनकी मूर्तियां एक साथ रखी जाती हैं उनकी पूजा एक साथ की जाती है।

राधा और कृष्‍ण का गंधर्व विवाह:
गर्ग संहिता में बताया गया है कि स्‍वयं ब्रह्माजी ने धरती पर आकर राधा और कृष्‍णजी का गंधर्व विवाह करवाया था। कृष्‍णजी के पिता उन्‍हें अक्‍सर पास में स्थित भंडिर गांव में घुमाने ले जाते थे। वहीं उनकी मुलाकात राधाजी से हुई और दोनों के बीच मित्रता हो गई। एक बार की बात है कि अचानक से आसमान में बिजली चमकी और चारों ओर अंधेरा हो गया तब रौशनी की एक किरण के राधारानी प्रकट हुई और ब्रह्माजी भी धरती पर आ गए। भगवान कृष्‍ण भी अपने बालरूप से किशोर रूप में आ गए। तब स्‍वयं ब्रह्माजी ने सखियों की मौजूदगी में राधा और कृष्‍ण का गंधर्व विवाह करवाया।

कृष्‍ण की मामी लगती थीं राधा:
विद्वानों के अनुसार महाभारत में राधाजी के बारे में कुछ भी नहीं बताया गया है। वहीं भागवत पुराण भी उनके बारे में कुछ नहीं कहती। राधारानी के बारे में पद्मपुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में बताया गया है। इसके अनुसार राधा का जन्‍म बरसाने में वृषभानु नामक गोप के घर में हुआ था। वहीं कुछ का मानना है कि राधा का जन्‍म यमुना के निकट स्थित रावल ग्राम में हुआ था। रिश्‍ते में राधाजी कृष्‍ण की मामी हो गई थीं। दरअसल उनका विवाह कृष्‍ण की यशोदा माता के भाई रायाण से हुआ था।

राधा और रुक्मणी दो नहीं एक:
कुछ विद्वानों का मानना है कि राधा नाम की कोई महिला थी ही नहीं। राधा ही रुक्मिणी थीं और रुक्मिणी ही राधा थीं। माना जाता है कि राधाजी का अलग से कोई अस्तित्‍व ही नहीं था। दोनों एक ही थीं। दोनों को ही देवी लक्ष्‍मी का रूप माना जाता है। कहने को तो राधाजी का जन्‍म शुक्‍ल पक्ष में हुआ था और रुक्मिणीजी का जन्‍म कृष्ण पक्ष में हुआ था, लेकिन दोनों ही माता लक्ष्‍मी के अंश हैं। इस कारण दोनों को एक ही माना जाता है।

राधा कृष्ण की अंतिम भेंट:
राधा और कृष्‍ण एक-दूसरे से प्रेम करने लगे थे, जब यह बात राधाजी के घर वालों को पता चली तो उन्‍होंने राधाजी को कैद कर लिया। यह जानकर कृष्‍णजी तुरंत उन्‍हें कैद से छुड़ाकर यशोदा मैय्या के पास ले गए। यशोदा मैय्या ने उन्‍हें बहुत समझाया और बताया कि ऐसा करना सही नहीं है। उन्‍होंने कहा, लल्‍ला मैं तेरा विवाह किसी और से करा दूंगी। कृष्‍णजी जिद पर अड़े रहे तो राधाजी उन्‍हें ऋषि गर्ग के पास ले गईं। तब उन्‍होंने कान्‍हा को समझाया कि तुम राजा के राजकुमार हो और राजा का विवाह राजपरिवार और स्वजात मे ही होता है कृष्ण ठहरे यदुवंशी और राधा ठहरी गुर्जरवंशी। तभी उन्‍हें मथुरा से बुलावा आ गया तो वह राधाजी से वापस लौटने का वादा करके मथुरा चले गए। फिर वह कभी न लौटे। यह इन दोनों की आखिरी भेंट थी।

देवी राधा का देह त्याग:
राधा के पृथ्वी लोक छोड़ने से पहले श्रीकृष्ण उनसे मिलने आए हुए थे। राधारानी ने कान्हा से कहा कि वह उनकी मुरली की धुन सुनते हुए धरती से विदा होना चाहती हैं। तब कान्हा ने मुरली बजाई और राधा गोलोक वापस चली गईं। कहते हैं कि श्रीकृष्ण अपनी प्रेमिका की मृत्यु बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्होंने बांसुरी तोड़कर झाड़ी में फेंक दी। उसके बाद से श्रीकृष्ण ने जीवन में कभी बांसुरी नहीं बजाई। और कुछ विद्वान कहते है की राधाजी मृत्यु के समय श्री कृष्ण की मुर्ति मे समा गई।

राधाजी के गुर्जर होने के प्रमाण:
सुर्य वंश
गौप कुल
क्षत्रिय वर्ण
गुर्जर जाति

राधाजी के गुर्जर होने के प्रमाण इन कवियो ने दिये है
12 महापुरूषो के नाम जिनकी पदरचना मे उन्होने राधाजी को गुर्जरी कहा है
1. सुरदास जी
2. कुभंन दास जी
3. रसखान जी
4. ब्यास जी
5. चतुर्भुज जी महाराज
6. मेघश्याम जी
7. घासीराम जी
8. पडिंत तरगीं लाल जी
9. दैवकी नन्दन कुमेरीया जी
10. लच्छीराम जी कृत
11. रमेश बाबा जी
12. ललित किशोरी जी

सुरदासजी की पदरचना
मोहन कैसे हो तुम दानी
सुध रहो कहो अपनी पति
तुम्हरे जिय की जानि
हम गुर्जरी गंवार नार है
तुम हो सारगं पाणि
राधाजी ने इस प्रसंग मे श्री कृष्णा जी को स्वयं को गुर्जरी बताया है।

स्रौत: https://youtu.be/FbYDdKJ1IGk

और भी आपने हजारो भजन सुने होगें जिनमे राधाजी को गुर्जर कहकर सम्बौधिंत किया है।

गुर्जरगुर्जर समाज, प्राचीन एवं प्रतिष्ठित समाज में से एक है। यह समुदाय गुज्जर, गूजर, गोजर, गुर्जर, गूर्जर और वीर गुर्जर ...
17/12/2021

गुर्जर

गुर्जर समाज, प्राचीन एवं प्रतिष्ठित समाज में से एक है। यह समुदाय गुज्जर, गूजर, गोजर, गुर्जर, गूर्जर और वीर गुर्जर नाम से भी जाना जाता है। गुर्जर मुख्यत: उत्तर भारत, पाकिस्तान और अफ़्ग़ानिस्तान में बसे हैं। इस जाति का नाम अफ़्ग़ानिस्तान के राष्ट्रगान में भी आता है। गुर्जरों के ऐतिहासिक प्रभाव के कारण उत्तर भारत और पाकिस्तान के बहुत से स्थान गुर्जर जाति के नाम पर रखे गए हैं, जैसे कि भारत का गुजरात राज्य, पाकिस्तानी पंजाब का गुजरात ज़िला और गुजराँवाला ज़िला और रावलपिंडी ज़िले का गूजर खान शहर।

गुर्जर दुसरी जातियो मे: गुर्जर गौत्र और नाम राजपूत, जाट, अहीर, ब्राहृण, जैन, गायरी, रेबारी, माली, लौहार, सोनी, मुस्लमान आदी जातियो मे पाये जाते है। जैसे गुर्जरगौड ब्राहृण, गुर्जर गौत्र (धनगर, देवासी, जाट, यादव), बड गुर्जर राजपूत, गुज्जर मुस्लिम, वन गुर्जर, जैन गुर्जर आदी मे पाये जाते है

आधुनिक स्थिति
प्राचीन काल में युद्ध कला में निपुण रहे गुर्जर मुख्य रूप से खेती और पशुपालन के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। गुर्जर अच्छे योद्धा माने जाते थे और इसीलिए भारतीय सेना में अभी भी इनकी अच्छी ख़ासी संख्या है| गुर्जर महाराष्ट्र (जलगाँव जिला), दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों में फैले हुए हैं। राजस्थान में सारे गुर्जर हिंदू हैं। सामान्यत: गुर्जर हिन्दू, सिख, मुस्लिम, जैन, बौद्द आदि सभी धर्मो में देखे जा सकते हैं।[3]मुस्लिम तथा सिख गुर्जर, हिन्दू गुर्जरो से ही परिवर्तित हुए थे। पाकिस्तान में गुजरावालां, फैसलाबाद और लाहौर के आसपास इनकी अच्छी ख़ासी संख्या है।

उत्पत्ति
गुर्जर अभिलेखो के हिसाब से ये सूर्यवंशी या रघुवंशी हैं। प्राचीन महाकवि राजशेखर ने गुर्जरों को 'रघुकुल-तिलक' तथा 'रघुग्रामिणी' कहा है।[5] ७ वी से १० वी शतब्दी के गुर्जर शिलालेखो पर सुर्यदेव की कलाकृतियाँ भी इनके सुर्यवंशी होने की पुष्टि करती हैं।[6] राजस्थान में आज भी गुर्जरों को सम्मान से 'मिहिर' बोलते हैं, जिसका अर्थ 'सूर्य' होता है[7][8] कुछ इतिहासकारों के अनुसार गुर्जर मध्य एशिया के कॉकस क्षेत्र (अभी के आर्मेनिया और जॉर्जिया) से आए आर्य योद्धा थे। कुछ विद्वान इन्हे विदेशी भी बताते हैं क्योंकि गुर्जरों का नाम एक अभिलेख में हूणों के साथ मिलता है, परन्तु इसका कोई एतिहासिक प्रमाण नहीं है।

संस्कृत के विद्वानों के अनुसार, गुर्जर शुद्ध संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ 'शत्रु का नाश करने वाला' अर्थात 'शत्रु विनाशक' होता है।[9][10] प्राचीन महाकवि राजशेखर ने गुर्जर नरेश महिपाल को अपने महाकाव्य में दहाड़ता गुर्जर कह कर सम्बोधित किया है।[11]

कुछ इतिहासकार कुषाणों को गुर्जर बताते हैं तथा कनिष्क के रबातक शिलालेख पर अंकित 'गुसुर' को गुर्जर का ही एक रूप बताते हैं। उनका मानना है कि गुशुर या गुर्जर लोग विजेता के रूप में भारत में आये क्योंकि गुशुर का अर्थ 'उच्च कुलीन' होता है।

गुर्जर साम्राज्य
इतिहास के अनुसार ५वी सदी में भीनमाल गुर्जर सम्राज्य की राजधानी थी तथा इसकी स्थापना गुर्जरो ने की थी। भरुच का सम्राज्य भी गुर्जरो के अधीन था। चीनी यात्री ह्वेन्सान्ग अपने लेखो में गुर्जर सम्राज्य का उल्लेख करता है तथा इसे 'kiu-che-lo' बोलता है।[13] छठी से 12वीं सदी में गुर्जर कई जगह सत्ता में थे। गुर्जर प्रतिहार राजवंश की सत्ता कन्नौज से लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात तक फैली थी। मिहिरभोज को गुर्जर-प्रतिहार वंश का बड़ा शासक माना जाता है और इनकी लड़ाई बंगाल के पाल वंश और दक्षिण-भारत के राष्ट्रकूट शासकों से होती रहती थी। 12वीं सदी के पहले ही प्रतिहार वंश का पतन होना शुरू हुआ और ये कई राजवंशों में बँट गए जैसे कि (चौहान वंश, सोलंकी वंश, चंदीला और परमार वंश)|[14][15] अरब आक्रान्तो ने गुर्जरों की शक्ति तथा प्रशासन की अपने अभिलेखों में पूरी-पूरी प्रशंसा की है।[16][17] इतिहासकार बताते हैं कि मुगल काल से पहले तक लगभग पूरा राजस्थान तथा गुजरात, 'गुर्जरत्रा' (गुर्जरो से रक्षित देश) या गुर्जर-भूमि के नाम से जाना जाता था।[18]अरब लेखकों के अनुसार गुर्जर उनके सबसे भयंकर शत्रु थे। उन्होंने ये भी कहा है कि अगर गुर्जर नहीं होते तो वो भारत पर 12वीं सदी से पहले ही अधिकार कर लेते।[16] १८वी सदी में भी गुर्जरो के कुछ छोटे छोटे राज्य थे। दादरी के गुर्जर राजा, दरगाही सिंह के अधीन १३३ ग्राम थे। मेरठ का राजा गुर्जर नैन सिंह था तथा उन्होंने परिक्शित गढ का पुन्रनिर्माण करवाया था। भारत गजीटेयर के अनुसार १८५७ का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मे गुर्जर ब्रिटिश के बहुत बुरे दुश्मन साबित हुए। गुर्जरो का 1857 की क्रान्ति में भी अहम योगदान रहा है। कोतवाल धन सिंह गुर्जर 1857 की क्रान्ति के शहीद थे।[19][18]पन्ना धाय जैसी वीरांगना पैदा हुई, जिसने अपने बेटे चन्दन का बलिदान देकर उदय सिंह के प्राण बचाए| बिशलदेव गुर्जर बैसला (अजमेर शहर के संस्थापक) जैसे राजा हुए जिन्होने संभवत: 8 वीं शताब्दी में अजमेर पर शासन किया था और साथ ही अरब घुसपैठ का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया और तोमर वंश के गुर्जरों को दिल्ली पर नियंत्रण पाने में मदद की।,[20] देवनारायण चौहान राजवंश के नाग वंशीय क्षत्रिय गुर्जर जैसे राजा हुए जिनका मूल स्थान वर्तमान में अजमेर के निकट नाग पहाड़ था।[21], विजय सिंह पथिक जैसे क्रांतिकारी नेता हुए जो राजा-महाराजा किसानो को लूटा करते थे, उनके खिलाफ आँदोलन चलाकर उन्होंने किसानो को मजबूत किया। मोतीराम बैसला जैसे पराक्रमि हुए जिन्होने मुगलो को आगरा में ही रोक दिया। धन सिंह जी कोतवाल हुए, जिन्होंने सबसे पहले मेरठ में अंग्रेजों से लड़ने का विगुल बजाया, सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसा महापुरुष पैदा हुआ, जिन्होंने पूरे देश के राजा-महाराजो की विरासत को एक करके नवभारत का निर्माण किया। इस देश की रक्षा के लिए इस वीर गुर्जर जाति ने लाखो बच्चो की कुर्बानियाँ दी थी, अंग्रेजों की नाक में नकेल कसने वाले गुर्जरों को अंग्रेजों ने क्रिमिनल ट्राइब (यानी बदमाश समुदाय) कह कर पुकारा था। इसलिए उस वक़्त अंग्रेज़ों की सरकार ने गुर्जरों को बागी घोषित कर दिया था, इसी वजह से गुर्जर जंगलों और पहाड़ों में रहने लगे और इसी वजह गुर्जर पढाई-लिखाई से वंचित रह गये।

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