29/05/2026
दर्द मुर्गी-मुर्गा का नहीं, मरते जंगलों का है...
विकास आधुनिकता ने पूरी धरती को मौत का कुआं बना दिया जिसे अंधभक्त नहीं समझ सकते जिनको ज्ञान नहीं इस प्रकृति का...
आदिवासी जीवन-दर्शन, प्रकृति और तथाकथित विकास पर एक गंभीर चिंतन
आज दुनिया जिस “विकास” पर गर्व कर रही है, उसी विकास की चकाचौंध में पृथ्वी धीरे-धीरे अपनी साँसें खोती जा रही है। जंगल समाप्त हो रहे हैं, नदियाँ सूख रही हैं, पहाड़ खोदे जा रहे हैं, मिट्टी ज़हर बनती जा रही है और हवा जीवन देने के बजाय बीमारी बाँटने लगी है। लेकिन विडंबना यह है कि इस विनाश पर समाज का एक बड़ा वर्ग मौन दिखाई देता है।
उन्हें लाखों पेड़ों का कटना दिखाई नहीं देता, नदियों में बहता जहर दिखाई नहीं देता, जंगलों से विस्थापित होते पशु-पक्षी दिखाई नहीं देते, लेकिन आदिवासी समाज की किसी परंपरा में “मुर्गी या मुर्गा” दिख जाए, तो अचानक संवेदनाएँ जाग उठती हैं।
यही इस समय का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि आदिवासी जीवन-दर्शन को केवल बाहरी रीति-रिवाजों से नहीं, बल्कि उसके मूल दर्शन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझा जाए। क्योंकि जिस समाज को सदियों तक “पिछड़ा” और “असभ्य” कहा गया, आज पूरी दुनिया उसी समाज की जीवन-पद्धति की ओर लौटने को मजबूर हो रही है।
मूलबीजों का दर्शन : प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व
यहाँ के मूलबीजों और आदिवासी समाज ने कभी प्रकृति को केवल संसाधन नहीं माना। उन्होंने जंगल को बाजार नहीं समझा, नदी को केवल पानी का स्रोत नहीं माना और पहाड़ों को सिर्फ खनिज का भंडार नहीं समझा। उन्होंने इन सबको अपने इष्ट, अपने पूर्वज, अपने अस्तित्व का हिस्सा माना।
नदी उनके लिए जीवन थी।
माटी अन्न की जननी थी।
जंगल उनका घर था।
पेड़-पौधे उनके साथी थे।
पहाड़ उनकी रक्षा करने वाले प्रहरी थे।
यही कारण है कि आदिवासी समाज में टोटम व्यवस्था विकसित हुई। किसी ने पेड़ को अपना गोत्र माना, किसी ने पक्षी को, किसी ने पशु को, तो किसी ने नदी-पहाड़ को। इसका उद्देश्य केवल पहचान बनाना नहीं था, बल्कि संरक्षण की सामाजिक व्यवस्था तैयार करना था। जिस जीव या वृक्ष को अपना टोटम माना जाता था, उसकी रक्षा करना सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी बन जाती थी।
यह आधुनिक पर्यावरण विज्ञान से कहीं अधिक गहरी सोच थी।
आज दुनिया जैव-विविधता संरक्षण, पर्यावरण संतुलन, कार्बन नियंत्रण और जलवायु परिवर्तन की बात कर रही है, जबकि आदिवासी समाज हजारों वर्षों से इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाकर जीता आया है।
विकास की अंधी दौड़ और प्रकृति का विनाश
आज का तथाकथित आधुनिक समाज स्वयं को सबसे अधिक विकसित मानता है। बड़ी-बड़ी मशीनें, चमचमाती सड़कें, ऊँची इमारतें और उद्योगों को विकास का प्रतीक बताया जा रहा है। लेकिन इस विकास की कीमत कौन चुका रहा है?
कटते जंगल।
सूखती नदियाँ।
उजड़ते गाँव।
विस्थापित होते समुदाय।
मरती जैव-विविधता।
हसदेव अरण्य से लेकर देश के अनेक क्षेत्रों तक लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं। पहाड़ों का सीना चीरकर खनिज निकाले जा रहे हैं। नदियाँ उद्योगों के प्रदूषण से दम तोड़ रही हैं। जंगलों के समाप्त होने से पक्षी, वन्यजीव और असंख्य सूक्ष्म जीव बिना किसी अपराध के मर रहे हैं।
लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस विनाश पर संवेदनशीलता बहुत कम दिखाई देती है।
जो लोग एक मुर्गे के “जीवा-भाव” पर लंबी बहस करते हैं, वे शायद ही कभी जंगल कटने के खिलाफ सड़कों पर दिखाई देते हैं। वे शायद ही कभी अवैध खनन, जलस्रोतों के विनाश और पर्यावरणीय लूट के विरुद्ध आवाज उठाते हैं।
यह चयनात्मक संवेदना वास्तव में उस मानसिकता का परिणाम है, जिसने प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु बना दिया है।
आदिवासी संस्कृति को असभ्य सिद्ध करने का षड्यंत्र
इतिहास गवाह है कि जब भी किसी समाज की जमीन, जंगल और संसाधनों पर कब्जा करना होता है, तो सबसे पहले उसकी संस्कृति को कमजोर किया जाता है। उसके विश्वासों को अंधविश्वास कहा जाता है, उसकी परंपराओं को असभ्यता कहा जाता है और उसकी भाषा-बोली को पिछड़ापन बताया जाता है।
आदिवासी समाज के साथ भी यही हुआ।
पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क, ऊँच-नीच और दान जैसी अवधारणाओं के माध्यम से धीरे-धीरे सामुदायिक व्यवस्था को तोड़ा गया। ग्रामसभा, बुमकाल, सामूहिक निर्णय और प्रकृति आधारित जीवन-पद्धति कमजोर होती चली गई। जल-जंगल-जमीन, जो कभी सामूहिक अधिकार और जिम्मेदारी थे, वे धीरे-धीरे बाजार और कंपनियों के कब्जे में जाने लगे।
दरअसल आदिवासी संस्कृति सबसे बड़ी बाधा है उस व्यवस्था के लिए, जो प्रकृति को केवल मुनाफे के साधन के रूप में देखती है। क्योंकि आदिवासी दर्शन कहता है कि जंगल बेचा नहीं जाता, नदी खरीदी नहीं जाती और धरती केवल मनुष्य की संपत्ति नहीं है।
मोटे अनाज से लेकर जीवन-शैली तक : दुनिया फिर लौट रही है
एक समय था जब कोदो, कुटकी, मड़िया, जौहर और पारंपरिक खाद्य पदार्थों को “गरीबों का भोजन” कहकर उपहास किया गया। आदिवासी जीवन-शैली को पिछड़ापन बताया गया। लेकिन आज वही दुनिया मोटे अनाजों को “सुपर फूड” कह रही है। प्राकृतिक खेती, ऑर्गेनिक भोजन, जंगल आधारित जीवन, सामुदायिक संस्कृति और स्थानीय ज्ञान को आधुनिक समाधान बताया जा रहा है।
यह इस बात का प्रमाण है कि आदिवासी जीवन-दर्शन कभी पिछड़ा नहीं था। बल्कि आधुनिक सभ्यता की अंधी दौड़ ने स्वयं को प्रकृति से इतना दूर कर लिया कि अब उसे वापस उन्हीं जड़ों की ओर लौटना पड़ रहा है।
दर्द केवल एक जीव का नहीं, पूरी पृथ्वी का है
दर्द का अर्थ केवल किसी एक जीव की मृत्यु पर आँसू बहाना नहीं है। वास्तविक संवेदना वह है, जो समस्त जीवन के प्रति हो।
यदि सचमुच दर्द है, तो सूखती नदियों के लिए भी होना चाहिए।
कटते जंगलों के लिए भी होना चाहिए।
मरते पक्षियों और वन्यजीवों के लिए भी होना चाहिए।
जलते पहाड़ों और उजड़ते गाँवों के लिए भी होना चाहिए।
उन गरीबों के लिए भी होना चाहिए, जिनकी झोपड़ियाँ विकास परियोजनाओं के नाम पर तोड़ी जा रही हैं।
आदिवासी समाज ने केवल भक्षण नहीं सीखा, बल्कि संरक्षण भी सीखा। उसने जंगल के कुछ जीवों को अपने घरों में स्थान दिया, लेकिन पूरे जंगल और उसकी जैव-विविधता की रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित भी रखा।
यही कारण है कि आदिवासी दर्शन में “सह-अस्तित्व” सबसे बड़ा मूल्य है।
आज आवश्यकता क्या है?
आज आवश्यकता किसी समुदाय को असभ्य सिद्ध करने की नहीं, बल्कि उससे सीखने की है। मानवता जिस पर्यावरणीय संकट की ओर बढ़ रही है, उसका समाधान केवल तकनीक से नहीं निकलेगा। समाधान प्रकृति के साथ संतुलन में है, और यह संतुलन आदिवासी जीवन-दर्शन सदियों से सिखाता आया है।
यदि सचमुच पृथ्वी को बचाना है, तो —
जंगल बचाने होंगे।
नदियाँ बचानी होंगी।
पहाड़ बचाने होंगे।
स्थानीय समुदायों के अधिकार बचाने होंगे।
प्रकृति आधारित ज्ञान और संस्कृति को सम्मान देना होगा।
क्योंकि जब जंगल बचेंगे, तभी पशु-पक्षी बचेंगे।
जब नदियाँ बचेंगी, तभी जीवन बचेगा।
और जब आदिवासी संस्कृति बचेगी, तभी प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की वह चेतना बचेगी, जो इस पृथ्वी को जीवित रख सकती है।
आदिवासी समाज का संघर्ष केवल अपनी संस्कृति बचाने का संघर्ष नहीं है। यह जल-जंगल-जमीन, जैव-विविधता और मानवता के भविष्य को बचाने का संघर्ष है।
इसलिए दर्द मुर्गी-मुर्गा का नहीं,
मरते जंगलों का है।
सूखती नदियों का है।
विस्थापित होते जीवों का है।
और उस धरती का है, जिसे विकास के नाम पर प्रतिदिन घायल किया जा रहा है।
हमारे पूर्वजों ने हमें केवल भक्षण नहीं,
रक्षण और संरक्षण भी सिखाया है।
और शायद आने वाले समय में पूरी दुनिया को
यही सीख सबसे अधिक आवश्यक होगी।
डॉ विश्राम धुर्वे
आदिवासी गोंड समाज
#गोंडसमाज