10/12/2016
मशहूर कलाकार मकबूल फिदा हुसैन का आज ही के दिन 2011 में लंदन में निधन हुआ था। एमएफ हुसैन के नाम से मशहूर मकबूल फिदा हुसैन का जन्म 17 सितंबर 1913 को महाराष्ट्र के पंढरपुर, शोलापुर में हुआ। उनका जन्म वर्ष 1915 भी बताया जाता है लेकिन उनके पासपोर्ट के अनुसार उनका जन्म 1913 में हुआ। हुसैन जब डेढ़ साल के थे तभी उनकी मां का देहांत होने के बाद उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली और उनका परिवार इंदौर चला गया। स्कूली शिक्षा के बाद बीस साल की उम्र में हुसैन बम्बई चले गए और वहां जेजे स्कूल ऑव आर्ट्स से अपने पेंटिंग के हुनर को निखारा। शुरू में आर्थिक तंगी के चलते उन्हें काफी बुरे दिन देखने पड़े। काफी समय तक वे सिनेमा के होर्डिन्ग बनाते और खिलोने की फ़ैक्टरी में काम करते थे। फिल्मों के पोस्टर बनाते कब उन्होंने कब ब्रश थाम लिया, खुद उन्हें भी याद नहीं। युवा पेंटर के रूप में एमएफ़ हुसैन बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट्स की राष्ट्रवादी परंपरा को तोड़कर कुछ नया करना चाहते थे। हुसैन के करियर को नई दिशा मिल गई जब वह 1947 में वे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप में शामिल हुए। 1952 में उनकी पहली एकल प्रदर्शनी ज़्युरिक में हुई। इसके बाद उनकी कलाकृतियों की अनेक प्रदर्शनियां यूरोप और अमेरिका में हुईं। उनकी जिंदगी फिल्मों के साथ शुरू हुई थी इसलिए उनके मन में फिल्मों को लेकर अलग जगह बनी रही। 1967 में बनाई पहली फिल्म ‘थ्रू द आइज ऑफ ए पेंटर' को अंतरराष्ट्रीय पर्दे पर ख्याति मिली और बर्लिन फिल्म महोत्सव में गोल्डन बीयर पुरस्कार मिला। 1971 में पाब्लो पिकासो के साथ साओ पाओलो बीएनाले में हुसैन खास अतिथि बने। क्रिस्टीज़ ऑक्शन में उनकी एक पेंटिंग 20 लाख अमरीकी डॉलर में बिकी इसके साथ ही वे भारत के सबसे महंगे पेंटर बन गए। लोकप्रियता के साथ एमएफ हुसैन के चित्र विवादों में भी रहे। खासकर हिन्दू देवियों के चित्रों पर उन पर आठ आपराधिक शिकायतें दर्ज की गई लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें खारिज कर दिया। भारतीय अदालतों में चलते मुकदमे और कुछ संगठनों के विरोध से उन्हें भारत छोड़ना पड़ा और कतर में शरण लेनी पड़ी। आखिरी वक्त तक वे कला सृजन करते रहे और 60,000 से ज्यादा पेंटिंग्स बनाईं। हुसैन को 1955 में पद्मश्री, 1973 में पद्मभूषण और 1991 में पद्मविभूषण सम्मान से नवाजा गया। 9 जून 2011 को लंबी बीमारी के बाद हुसैन का लंदन में निधन हो गया। अन्तिम दिनों में वे एक कॉमेडी फिल्म की योजना बना रहे थे अगर फिल्म बनती, वे शायद दुनिया के सबसे उम्रदराज निर्माता-निर्देशक होते। हुसैन जीवन भर अपनी प्रशंसा और आलोचनाओं से ऊपर उठे हुए इंसान रहे।