Kashi Nath Kewat

Kashi Nath Kewat एक ऐसे समाज का निर्माण करना, जहाँ एक साधारण आदमी भी खुशहाल जिंदगी जीने की सहूलियत पा सके

आजादी की कभी शाम नहीं होने देंगे, शहीदों की कुर्बानी बदनाम नहीं होने देंगे।"    "इंकलाब जिंदाबाद!" — भगत सिंह  "सारे जहा...
15/08/2026

आजादी की कभी शाम नहीं होने देंगे, शहीदों की कुर्बानी बदनाम नहीं होने देंगे।" "इंकलाब जिंदाबाद!" — भगत सिंह "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा।" — अल्लामा इकबाल
"स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा।" — बाल गंगाधर तिलक
"तिरंगा हमारी शान है, हम भारतीयों का मान हैं।"
"स्वतंत्रता केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी भी है।"

🌿 विश्व आदिवासी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🌿जल, जंगल और जमीन की रक्षा ही आदिवासी जीवन-दर्शन की पहचान हैजल, जंगल और जमीन ...
09/08/2026

🌿 विश्व आदिवासी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🌿
जल, जंगल और जमीन की रक्षा ही आदिवासी जीवन-दर्शन की पहचान है
जल, जंगल और जमीन के संरक्षण में सदियों से समर्पित, प्रकृति के सच्चे प्रहरी और धरती के प्रथम रक्षक आदिवासी भाई-बहनों को विश्व आदिवासी दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
आदिवासी समाज ने सदियों से प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और अस्तित्व का आधार माना है। जंगलों की हरियाली, नदियों की निर्मल धारा, पहाड़ों की गरिमा और धरती की उर्वरता को बचाने के लिए आदिवासी समाज ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी संघर्ष किया है।
हमारी समृद्ध आदिवासी संस्कृति, परंपराएं, लोकगीत, लोकनृत्य, भाषा और जीवन-मूल्य भारत की बहुरंगी सांस्कृतिक विरासत के अनमोल अंग हैं। यह गौरवशाली विरासत केवल इतिहास के पन्नों में सुरक्षित रखने के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक सम्मानपूर्वक पहुंचाने के लिए है।
आज विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर हमारा संकल्प हो—
जल बचेगा, जंगल बचेंगे, जमीन बचेगी—
तभी आदिवासी समाज और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बचेगा।
आइए, आदिवासी समाज के अधिकार, सम्मान, संस्कृति, स्वाभिमान और प्रकृति संरक्षण के संघर्ष को मजबूत करें और एक ऐसे समाज के निर्माण का संकल्प लें, जहां विकास के नाम पर जल, जंगल और जमीन से उनके पारंपरिक अधिकारों का हनन न हो।
विश्व आदिवासी दिवस की सभी आदिवासी भाई-बहनों को हार्दिक बधाई एवं जोहार!
जल, जंगल, जमीन और आदिवासी अधिकार—जिंदाबाद!
आदिवासी एकता—जिंदाबाद! 🏹

08/08/2026
शहादत दिवस पर विशेष शहीद निर्मल महतो : झारखंड की अस्मिता, विस्थापन विरोधी संघर्ष और युवाशक्ति के अमर सेनानी #काशीनाथ_केव...
08/08/2026

शहादत दिवस पर विशेष
शहीद निर्मल महतो : झारखंड की अस्मिता, विस्थापन विरोधी संघर्ष और युवाशक्ति के अमर सेनानी
#काशीनाथ_केवट
झारखंड के अलग राज्य आंदोलन का इतिहास केवल राजनीतिक घटनाओं का इतिहास नहीं है, बल्कि यह जल, जंगल, जमीन, स्वाभिमान, सामाजिक न्याय और आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए चले लंबे जनसंघर्षों का इतिहास है। इस इतिहास में अनेक महान विभूतियों ने अपने त्याग, संघर्ष और बलिदान से अमिट छाप छोड़ी है। उन्हीं में शहीद निर्मल महतो का नाम अत्यंत सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपने अल्प राजनीतिक जीवन में जिस साहस, प्रतिबद्धता और दूरदर्शिता का परिचय दिया, उसने झारखंड आंदोलन को नई ऊर्जा और नई दिशा प्रदान की।
वर्ष 1984 झारखंड आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। राजनीतिक और वैचारिक मतभेदों के कारण झारखंड मुक्ति मोर्चा में विभाजन की स्थिति उत्पन्न हुई। संगठन के संस्थापक नेताओं बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन और ए.के. रॉय के बीच उभरे मतभेदों ने आंदोलन की दिशा को प्रभावित किया। इसी पृष्ठभूमि में 6 अप्रैल 1984 को बोकारो में झामुमो की केंद्रीय समिति की ऐतिहासिक बैठक आयोजित हुई, जिसमें निर्मल महतो को संगठन का अध्यक्ष चुना गया, जबकि शिबू सोरेन ने पूर्ववत महासचिव का दायित्व संभालना स्वीकार किया। मुझे उस ऐतिहासिक बैठक में उपस्थित रहने और केंद्रीय सदस्य के रूप में चुने जाने का अवसर मिला था। उस दिन मैंने निर्मल महतो के व्यक्तित्व में एक ऐसे नेतृत्व की झलक देखी थी, जो संघर्ष को सत्ता से अधिक महत्व देता था।
निर्मल महतो ने लोकतांत्रिक राजनीति के माध्यम से भी झारखंड की आवाज़ बुलंद करने का प्रयास किया। उन्होंने 1984 में रांची लोकसभा और 1985 में ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा। यद्यपि चुनावी सफलता उन्हें नहीं मिली, लेकिन जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता और लोकप्रियता लगातार बढ़ती रही। वे मानते थे कि चुनाव जनसंघर्षों का विकल्प नहीं, बल्कि उन्हें व्यापक मंच प्रदान करने का माध्यम है।
उनके व्यक्तित्व का सबसे प्रेरणादायी पक्ष विस्थापितों, किसानों, मजदूरों और मेहनतकश समाज के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता थी। सुवर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना के अंतर्गत निर्मित चांडिल डैम से हजारों परिवारों का जीवन उजड़ गया था। रोजगार, पुनर्वास और उचित मुआवजे की मांग को लेकर 21 अक्टूबर 1982 को ईचागढ़ प्रखंड कार्यालय के समक्ष ऐतिहासिक आंदोलन हुआ। पुलिस की गोलीबारी में छात्र अजीत महतो और धनंजय महतो शहीद हो गए। यह घटना केवल दो युवाओं की शहादत नहीं थी, बल्कि विकास के नाम पर हो रहे अन्याय का प्रतीक बन गई। निर्मल महतो ने इस संघर्ष को व्यापक जनआंदोलन का स्वरूप दिया और विस्थापितों के अधिकारों को झारखंड आंदोलन के केंद्रीय मुद्दों में शामिल करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
निर्मल महतो का विश्वास था कि किसी भी परिवर्तनकारी आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति उसके छात्र और युवा होते हैं। इसी सोच के कारण उन्होंने छात्र-युवाओं को संगठित करने की दिशा में विशेष पहल की। छात्र मुक्ति मोर्चा के अनुभवों और उसके संघर्षों से सीख लेते हुए आगे चलकर आजसू के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने युवाओं को केवल आंदोलन का समर्थक नहीं, बल्कि उसका नेतृत्वकर्ता बनाने का प्रयास किया। यही कारण है कि झारखंड आंदोलन के उभार में छात्र-युवा शक्ति निर्णायक रूप से सामने आई।
मुझे बोकारो की बैठक के बाद चांडिल में उनसे विस्तृत चर्चा करने का अवसर मिला था। उन्होंने छात्र मुक्ति मोर्चा की गतिविधियों और कोयलांचल क्षेत्र में चल रहे विस्थापित आंदोलनों के बारे में विस्तार से जानकारी ली। हम लोगों के बीच यह गंभीर विचार-विमर्श हुआ कि कोयला क्षेत्रों में विस्थापितों के संघर्ष को और अधिक संगठित तथा प्रभावी कैसे बनाया जाए। दुर्भाग्यवश, यह संवाद आगे बढ़ पाता, उससे पहले ही इतिहास ने एक दुखद मोड़ ले लिया।
8 अगस्त 1987 को जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित चमरिया गेस्ट हाउस के सामने निर्मल महतो की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह हत्या केवल एक लोकप्रिय नेता की हत्या नहीं थी, बल्कि झारखंड की लोकतांत्रिक और जनपक्षधर राजनीति पर गहरा आघात था। किंतु इतिहास साक्षी है कि विचारों को गोलियों से समाप्त नहीं किया जा सकता। निर्मल महतो आज भी हर उस संघर्ष में जीवित हैं, जहाँ कोई विस्थापित अपने अधिकार की मांग करता है, कोई युवा सामाजिक परिवर्तन का स्वप्न देखता है और कोई मेहनतकश न्याय तथा सम्मान के लिए संघर्ष करता है।
आज झारखंड राज्य बने हुए ढाई दशक से अधिक समय बीत चुका है। इसके बावजूद विस्थापन, पुनर्वास, स्थानीय युवाओं के रोजगार, प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदायों के अधिकार तथा सामाजिक-आर्थिक न्याय के अनेक प्रश्न अब भी अधूरे हैं। ऐसे समय में निर्मल महतो का जीवन और संघर्ष हमें स्मरण कराता है कि राज्य का निर्माण अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण समाज की स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
शहीद निर्मल महतो को सच्ची श्रद्धांजलि केवल प्रतिमाओं पर माल्यार्पण या औपचारिक श्रद्धांजलि सभाओं से नहीं होगी। उनके अधूरे सपनों को पूरा करने, विस्थापितों को न्याय दिलाने, युवाओं को सम्मानजनक अवसर उपलब्ध कराने तथा जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय समाज के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए निरंतर संघर्ष करना ही उनके प्रति वास्तविक श्रद्धांजलि होगी। यही उनके जीवन का संदेश है और यही आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा भी।
शहीद निर्मल महतो अमर रहें।
हूल जोहार!

दिशोम गुरू शिबू सोरेन : संघर्ष, स्वाभिमान और झारखंडी अस्मिता के अमर शिल्पीपहली पुण्यतिथि पर विशेष श्रद्धांजलि #काशीनाथ_क...
05/08/2026

दिशोम गुरू शिबू सोरेन : संघर्ष, स्वाभिमान और झारखंडी अस्मिता के अमर शिल्पी
पहली पुण्यतिथि पर विशेष श्रद्धांजलि
#काशीनाथ_केवट
झारखंड के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका जीवन किसी एक व्यक्ति की जीवनी नहीं, बल्कि पूरे समाज के संघर्ष का इतिहास बन जाता है। पद्म भूषण, दिशोम गुरू शिबू सोरेन ऐसे ही युगपुरुष थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन जल, जंगल, जमीन, आदिवासी-मूलवासी अस्मिता, श्रमिकों, किसानों, विस्थापितों और वंचितों के अधिकारों के लिए समर्पित कर दिया। आज उनकी पहली पुण्यतिथि पर पूरा झारखंड उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है।
नेमरा की धरती पर उनकी आदमकद प्रतिमा की स्थापना केवल एक स्मारक का निर्माण नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक जनसंघर्ष का सम्मान है, जिसने शोषण और अन्याय के विरुद्ध लाखों लोगों को संगठित किया। आज यदि लाखों लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने उमड़ रहे हैं, तो यह किसी राजनीतिक परंपरा का नहीं, बल्कि जनविश्वास और जनप्रेम का उत्सव है।
झारखंड आंदोलन का सबसे सशक्त जननायक :
स्वतंत्रता के बाद झारखंड क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद गरीबी, विस्थापन और उपेक्षा का शिकार रहा। बड़े-बड़े उद्योग, बाँध, खदानें और इस्पात संयंत्र बने, लेकिन जिनकी जमीन गई, उन्हें सम्मानजनक पुनर्वास नहीं मिला।
ऐसे समय में दिशोम गुरू शिबू सोरेन ने झारखंड की आवाज़ बनकर संघर्ष का बिगुल फूँका। उन्होंने स्पष्ट कहा कि विकास का अर्थ केवल कारखानों का निर्माण नहीं, बल्कि उस विकास में स्थानीय लोगों की भागीदारी, सम्मान और अधिकार सुनिश्चित करना भी है।
उनके नेतृत्व में झारखंड आंदोलन ने गाँव-गाँव तक चेतना जगाई। यह आंदोलन किसी जाति या समुदाय का नहीं, बल्कि शोषित, वंचित और विस्थापित समाज के आत्मसम्मान का आंदोलन बन गया। यही कारण है कि वे केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि "दिशोम गुरू" कहलाए—पूरे झारखंड के जनगुरु।
मेरे जीवन के प्रेरणास्रोत : सन् 1977 में जब मैं उच्च विद्यालय का छात्र था, तभी पहली बार गुरूजी से मिलने का अवसर मिला। वह मुलाकात मेरे जीवन की दिशा बदल देने वाली सिद्ध हुई।
जैनामोड़ स्थित झारखंड मुक्ति मोर्चा के साधारण-से कार्यालय में मैंने पहली बार देखा कि किस प्रकार एक बड़ा जननेता बिना किसी तामझाम के आम लोगों के बीच बैठकर उनकी समस्याएँ सुनता है। गुरूजी के भाई लालू सोरेन और रामू सोरेन दिन-रात संगठन को मजबूत बनाने में लगे रहते थे। गुरूजी जब भी आते, आंदोलनों की समीक्षा करते, कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाते और आगे की रणनीति तय करते।
उनकी सादगी, निर्भीकता और जनता के प्रति समर्पण ने मुझे विद्यार्थी जीवन से ही जनसंघर्ष के रास्ते पर चलने की प्रेरणा दी।
जब चलकरी ने अन्याय के विरुद्ध इतिहास लिखा
सत्तर के दशक में चलकरी और झुंझको के ग्रामीण अपनी कोयला खदानों का संचालन सहकारी समितियों के माध्यम से करते थे। यह स्थानीय स्वावलंबन का अनूठा उदाहरण था।
लेकिन कोयला माफियाओं ने हथियारों के बल पर इन खदानों पर कब्ज़ा कर लिया। ग्रामीणों के सम्मान और अस्तित्व पर संकट आ गया। भय इतना बढ़ गया कि लोग अपनी ही खदानों में जाने से डरने लगे।
कई प्रभावशाली नेताओं से मदद माँगी गई, पर किसी ने साथ नहीं दिया।
तब दिशोम गुरू शिबू सोरेन चलकरी पहुँचे।
विद्यालय मैदान में हजारों ग्रामीणों के बीच उन्होंने जो सिंहगर्जना की, वह आज भी स्मृतियों में जीवित है। उन्होंने घोषणा की कि अन्याय अब नहीं चलेगा।
अगले दिन लालू सोरेन और रामू सोरेन के नेतृत्व में विशाल जनसमूह खदानों की ओर बढ़ा। जनता की एकजुट शक्ति के सामने माफियाई गिरोह टिक नहीं सके। उन्हें वहाँ से खदेड़ दिया गया।
उस रात पूरे क्षेत्र में दीप जलाए गए। लोगों ने पहली बार महसूस किया कि संगठित जनता किसी भी अत्याचार को पराजित कर सकती है।
वह केवल एक संघर्ष नहीं था; वह झारखंडी स्वाभिमान की ऐतिहासिक विजय थी।
विस्थापितों के सबसे बड़े संरक्षक
बेरमो, कथारा, ढोरी, बोकारो, तेनुघाट और डीआरएंडआरडी परियोजनाओं से प्रभावित हजारों विस्थापितों के लिए गुरूजी सदैव ढाल बनकर खड़े रहे।
वे जानते थे कि विकास की कीमत सबसे अधिक गरीब और आदिवासी समाज चुका रहा है। इसलिए वे बार-बार कहते थे कि बिना न्यायपूर्ण पुनर्वास के कोई भी विकास स्वीकार्य नहीं हो सकता।
डीआरएंडआरडी परियोजना के आंदोलनों में उनका बार-बार आना केवल राजनीतिक समर्थन नहीं था, बल्कि विस्थापितों के संघर्ष के प्रति उनकी नैतिक प्रतिबद्धता थी।
माफिया और शोषण के विरुद्ध निर्भीक आवाज़ :
सन् 1983 में कथारा क्षेत्र में बिहार कोलियरी कामगार यूनियन के छह नेताओं को सीसीएल प्रबंधन ने नौकरी से बर्खास्त कर दिया।
उस समय कोयला माफियाओं का प्रभाव चरम पर था।
ऐसे कठिन दौर में गुरूजी करगली पहुँचे और महिला मंडल में आयोजित विशाल सभा में सीसीएल प्रबंधन और माफिया गठजोड़ के विरुद्ध ऐतिहासिक भाषण दिया।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि श्रमिकों और विस्थापितों के अधिकारों का हनन होगा, तो जनता चुप नहीं बैठेगी।
उनके भाषण ने पूरे बेरमो कोयलांचल में नई चेतना और संघर्ष की ऊर्जा का संचार किया।
राजनीति नहीं, जनसेवा उनका धर्म था :
आज राजनीति अक्सर सत्ता प्राप्ति का माध्यम बन चुकी है, लेकिन गुरूजी ने राजनीति को जनसेवा का माध्यम बनाया।
वे सत्ता में रहे, विपक्ष में रहे, संघर्ष में रहे—परंतु जनता से कभी दूर नहीं हुए।
उनका विश्वास था कि लोकतंत्र की असली शक्ति संसद में नहीं, बल्कि जनता की संगठित चेतना में निहित है।
गुरूजी की सबसे बड़ी विरासत : आज झारखंड के सामने अनेक चुनौतियाँ हैं—विस्थापन, बेरोज़गारी, पलायन, जल-जंगल-जमीन पर बढ़ते संकट, आदिवासी अधिकारों का क्षरण और सामाजिक असमानता।
ऐसे समय में गुरूजी के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं।
उनकी विरासत हमें सिखाती है कि संघर्ष कभी समाप्त नहीं होता। न्याय, समानता और स्वाभिमान के लिए निरंतर लड़ना ही सच्ची श्रद्धांजलि है।
अंतिम प्रणाम : आज जब दिशोम गुरू हमारे बीच नहीं हैं, तब झारखंड स्वयं को एक अभिभावक से वंचित महसूस करता है। किंतु इतिहास ऐसे महापुरुषों को कभी मरने नहीं देता।
वे हर उस किसान में जीवित हैं जो अपनी जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
वे हर उस विस्थापित में जीवित हैं जो न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है।
वे हर उस युवा में जीवित हैं जो अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने का साहस रखता है।
वे झारखंड की हर नदी, हर पहाड़, हर जंगल और हर संघर्षशील इंसान की स्मृतियों में सदैव अमर रहेंगे।
दिशोम गुरू शिबू सोरेन अमर रहें।
उनका संघर्ष अमर रहे।
झारखंडी अस्मिता अमर रहे।
श्रद्धासुमन
नोट : (80 के दशक के कई अखबारी कतरन इसलिए पोस्ट कर रहा हूँ कि किसी के परिवार में इसमें नाम हों तो वे झारखंड आंदोलनकारी की सूची में शामिल होने के लिए आधार बना सकते हैं। बाद में भी हमारे पास उपलब्ध प्रमाणों को पोस्ट किया जाएगा। )

झारखंड के जननायक संघर्ष के अमर शिल्पी पद्म भूषण दिशोम गुरू शिबू सोरेन : एक युगपुरुष को भावभीनी श्रद्धांजलि #काशीनाथ_केवट...
05/08/2026

झारखंड के जननायक संघर्ष के अमर शिल्पी पद्म भूषण दिशोम गुरू शिबू सोरेन : एक युगपुरुष को भावभीनी श्रद्धांजलि
#काशीनाथ_केवट
आज झारखंड की धरती शोक, गर्व और कृतज्ञता—तीनों भावों से एक साथ भरी हुई है। जनआंदोलनों के महानायक, झारखंडी अस्मिता के प्रतीक, पद्म भूषण दिशोम गुरू शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि पर पूरा राज्य उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। उनके पैतृक गाँव नेमरा में उनकी भव्य आदमकद प्रतिमा का अनावरण केवल एक प्रतिमा की स्थापना नहीं, बल्कि झारखंड के संघर्ष, स्वाभिमान और जनचेतना के इतिहास को स्मारक रूप देने का क्षण है। लाखों लोगों का वहाँ जुटना इस बात का प्रमाण है कि गुरूजी शरीर से भले हमारे बीच नहीं हैं, पर वे आज भी झारखंड के जनमानस की धड़कनों में जीवित हैं।
दिशोम गुरू शिबू सोरेन केवल एक राजनेता नहीं थे। वे उन करोड़ों लोगों की आवाज़ थे, जिन्हें वर्षों तक शोषण, विस्थापन और अन्याय का सामना करना पड़ा। उन्होंने जंगल, जमीन, जल और झारखंडी अस्मिता की रक्षा के लिए अपना संपूर्ण जीवन संघर्ष को समर्पित कर दिया। उनके नेतृत्व में चला आंदोलन केवल अलग राज्य की माँग नहीं था, बल्कि सम्मान, अधिकार और स्वाभिमान की लड़ाई था। झारखंड राज्य का निर्माण उनके दशकों लंबे संघर्ष, त्याग और बलिदान का ऐतिहासिक परिणाम है।
मेरे लिए गुरूजी केवल एक सार्वजनिक नेता नहीं थे, बल्कि जीवन के पथप्रदर्शक थे। सन् 1977 में, जब मैं उच्च विद्यालय का छात्र था, तभी पहली बार उनका सान्निध्य मिला। वही मेरे सार्वजनिक जीवन का निर्णायक मोड़ था। जैनामोड़ के एक साधारण खपरैल मकान में झारखंड मुक्ति मोर्चा का कार्यालय हुआ करता था। वहाँ गुरूजी के भाई लालू सोरेन और रामू सोरेन निरंतर जनसमस्याओं के समाधान में लगे रहते थे। गुरूजी सप्ताह या पखवाड़े में आते, आंदोलनों की समीक्षा करते, कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाते और संघर्ष की अगली दिशा निर्धारित करते। उनकी सादगी, आत्मीयता और अदम्य साहस ने मुझे विद्यार्थी जीवन में ही जनसंघर्ष के मार्ग पर अग्रसर कर दिया।
जब गुरूजी ने चलकरी की अस्मिता की रक्षा की : सत्तर का दशक बेरमो क्षेत्र के लिए संघर्ष का दौर था। चलकरी और झुंझको के ग्रामीण अपनी निजी कोयला खदानों का संचालन सहकारी समितियों और छोटे समूहों के माध्यम से करते थे। यह आत्मनिर्भरता और सामुदायिक श्रम का अद्भुत उदाहरण था। लेकिन धनबाद और बेरमो के कुख्यात कोयला माफियाओं की नजर इन खदानों पर पड़ी। हथियारबंद गुंडों और तथाकथित पहलवानों के बल पर ग्रामीणों से उनकी खदानें छीन ली गईं। भय का ऐसा वातावरण बना कि लोग अपनी ही जमीन पर जाने से डरने लगे। गाँव की अस्मिता और सम्मान पर संकट मंडराने लगा।
ग्रामीणों ने अनेक प्रभावशाली नेताओं से सहायता की गुहार लगाई, पर सबने मौन साध लिया। तब हमारी अंतिम आशा बने दिशोम गुरू शिबू सोरेन।
गुरूजी अगले ही दिन चलकरी पहुँचे। विद्यालय मैदान में विशाल जनसभा हुई। उनके शब्द आज भी मेरे कानों में गूंजते हैं—"जो अन्याय करता है, उसे जनता की ताकत के आगे झुकना ही पड़ेगा।"
उन्होंने माफियाओं को चेतावनी दी कि यदि सम्मानपूर्वक जाना चाहते हैं तो आज ही चले जाएँ, अन्यथा जनता उन्हें खदेड़ देगी। माफियाओं ने इसे हल्के में लिया, किंतु अगले ही दिन लालू सोरेन और रामू सोरेन के नेतृत्व में हजारों ग्रामीणों का जनसैलाब खदानों तक पहुँचा। जनता के आक्रोश के सामने माफियाई ताकतें टिक नहीं सकीं। उन्हें वहाँ से खदेड़ दिया गया। उस रात चलकरी और आसपास के गाँवों में दीप जलाए गए। लोगों ने पहली बार महसूस किया कि संगठित जनता किसी भी अत्याचार को पराजित कर सकती है।
वह केवल माफियाओं की हार नहीं थी, बल्कि भय पर साहस, अन्याय पर न्याय और शोषण पर जनशक्ति की ऐतिहासिक विजय थी।
संघर्ष की हर पंक्ति में गुरूजी का साथ : बेरमो क्षेत्र में विस्थापन, शोषण और अन्याय के विरुद्ध जितने भी बड़े आंदोलन हुए, उनमें गुरूजी का मार्गदर्शन और समर्थन सदैव मिला। डीआरएंडआरडी परियोजना के विस्थापितों के संघर्ष से लेकर कोयला मजदूरों के अधिकारों तक, वे हर मोर्चे पर हमारे साथ खड़े रहे।
सन् 1983 में कथारा क्षेत्र में बिहार कोलियरी कामगार यूनियन के छह नेताओं को सीसीएल प्रबंधन ने नौकरी से बर्खास्त कर दिया था। उस समय कोयला माफियाओं का आतंक चरम पर था। ऐसे कठिन दौर में गुरूजी करगली पहुँचे और महिला मंडल में आयोजित विशाल जनसभा में सीसीएल प्रबंधन और माफियाओं के गठजोड़ के विरुद्ध सिंहगर्जना की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि श्रमिकों और विस्थापितों के अधिकारों से कोई समझौता नहीं होगा। उनके शब्दों ने पूरे बेरमो कोयलांचल में संघर्ष की नई ऊर्जा भर दी।
दिशोम गुरू की सबसे बड़ी विरासत : गुरूजी ने हमें केवल आंदोलन करना नहीं सिखाया; उन्होंने सिखाया कि राजनीति सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के सम्मान की रक्षा का संकल्प है। वे कहते थे कि यदि जंगल, जमीन और इंसान सुरक्षित नहीं हैं, तो विकास का कोई भी मॉडल अधूरा है।
उनका जीवन हमें यह भी सिखाता है कि सच्चा नेता वही है, जो जनता के सुख-दुख में उनके बीच खड़ा रहे, सत्ता के गलियारों से अधिक गाँवों की पगडंडियों पर दिखाई दे और अपने लोगों के लिए हर जोखिम उठाने को तैयार रहे।
आज जब गुरूजी हमारे बीच नहीं हैं, तब झारखंड स्वयं को अनाथ-सा महसूस करता है। परंतु महापुरुष कभी मरते नहीं। वे अपने विचारों, संघर्षों और प्रेरणाओं के रूप में पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं। दिशोम गुरू शिबू सोरेन भी झारखंड की हर नदी, हर पहाड़, हर जंगल और हर संघर्षशील इंसान की स्मृतियों में सदैव जीवित रहेंगे।
उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि केवल पुष्प अर्पित करना नहीं, बल्कि उनके अधूरे सपनों को पूरा करना है—विस्थापितों को न्याय दिलाना, आदिवासियों और मूलवासियों के अधिकारों की रक्षा करना, सामाजिक समानता स्थापित करना और झारखंड की अस्मिता को अक्षुण्ण रखना।
काशीनाथ केवट की भावभीनी श्रद्धांजलि : "गुरूजी, आपने हमें अन्याय के सामने झुकना नहीं, बल्कि उसके विरुद्ध संगठित होकर लड़ना सिखाया। आपने हमें स्वाभिमान का अर्थ समझाया, जनसेवा का धर्म बताया और संघर्ष की राह दिखाई। आप आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन आपका साहस, आपका संघर्ष और आपका स्नेह हमारे हृदयों में सदैव जीवित रहेगा। झारखंड की मिट्टी आपको बार-बार नमन करती रहेगी।"
दिशोम गुरू शिबू सोरेन अमर रहें।
उनका संघर्ष अमर रहे।
उनके आदर्श आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करते रहें।
— #काशीनाथ_केवट

02/08/2026
आज क्रांतिकारी अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद की जयंती पर जंतर-मंतर सहित देश भर में अपने हकों के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष कर रहे ...
23/07/2026

आज क्रांतिकारी अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद की जयंती पर जंतर-मंतर सहित देश भर में अपने हकों के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष कर रहे छात्रों पर हो रहे सरकारी दमन के खिलाफ एक नई और लोकतांत्रिक क्रांति का सूत्रपात करने का संकल्प लेना चाहिए।
जिस प्रकार आज़ाद ने अंग्रेजों के दमनकारी कानूनों का डटकर मुकाबला किया था, उसी तरह छात्रों की आवाज़ को दबाने वाली सत्ता के सामने झुकने के बजाय मजबूती से डटे रहने का समय है। देश के युवाओं को शिक्षा के बाज़ारीकरण, पेपर लीक जैसे तंत्रों से मुक्ति दिलाने और रोजगार के लिए संघर्ष को अपनी मुहिम का मुख्य आधार बनाना चाहिए। प्रदर्शनकारी युवाओं के साथ हो रहे कथित बर्ताव और लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन के विरोध में शांतिपूर्ण एवं वैचारिक क्रांति को आगे बढ़ाने के लिए पूरे देश के छात्रों नौजवानों को आगे आने की जरूरत है।

Address

Bokaro

Telephone

+917979858156

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Kashi Nath Kewat posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share