05/08/2026
दिशोम गुरू शिबू सोरेन : संघर्ष, स्वाभिमान और झारखंडी अस्मिता के अमर शिल्पी
पहली पुण्यतिथि पर विशेष श्रद्धांजलि
#काशीनाथ_केवट
झारखंड के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका जीवन किसी एक व्यक्ति की जीवनी नहीं, बल्कि पूरे समाज के संघर्ष का इतिहास बन जाता है। पद्म भूषण, दिशोम गुरू शिबू सोरेन ऐसे ही युगपुरुष थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन जल, जंगल, जमीन, आदिवासी-मूलवासी अस्मिता, श्रमिकों, किसानों, विस्थापितों और वंचितों के अधिकारों के लिए समर्पित कर दिया। आज उनकी पहली पुण्यतिथि पर पूरा झारखंड उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है।
नेमरा की धरती पर उनकी आदमकद प्रतिमा की स्थापना केवल एक स्मारक का निर्माण नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक जनसंघर्ष का सम्मान है, जिसने शोषण और अन्याय के विरुद्ध लाखों लोगों को संगठित किया। आज यदि लाखों लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने उमड़ रहे हैं, तो यह किसी राजनीतिक परंपरा का नहीं, बल्कि जनविश्वास और जनप्रेम का उत्सव है।
झारखंड आंदोलन का सबसे सशक्त जननायक :
स्वतंत्रता के बाद झारखंड क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद गरीबी, विस्थापन और उपेक्षा का शिकार रहा। बड़े-बड़े उद्योग, बाँध, खदानें और इस्पात संयंत्र बने, लेकिन जिनकी जमीन गई, उन्हें सम्मानजनक पुनर्वास नहीं मिला।
ऐसे समय में दिशोम गुरू शिबू सोरेन ने झारखंड की आवाज़ बनकर संघर्ष का बिगुल फूँका। उन्होंने स्पष्ट कहा कि विकास का अर्थ केवल कारखानों का निर्माण नहीं, बल्कि उस विकास में स्थानीय लोगों की भागीदारी, सम्मान और अधिकार सुनिश्चित करना भी है।
उनके नेतृत्व में झारखंड आंदोलन ने गाँव-गाँव तक चेतना जगाई। यह आंदोलन किसी जाति या समुदाय का नहीं, बल्कि शोषित, वंचित और विस्थापित समाज के आत्मसम्मान का आंदोलन बन गया। यही कारण है कि वे केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि "दिशोम गुरू" कहलाए—पूरे झारखंड के जनगुरु।
मेरे जीवन के प्रेरणास्रोत : सन् 1977 में जब मैं उच्च विद्यालय का छात्र था, तभी पहली बार गुरूजी से मिलने का अवसर मिला। वह मुलाकात मेरे जीवन की दिशा बदल देने वाली सिद्ध हुई।
जैनामोड़ स्थित झारखंड मुक्ति मोर्चा के साधारण-से कार्यालय में मैंने पहली बार देखा कि किस प्रकार एक बड़ा जननेता बिना किसी तामझाम के आम लोगों के बीच बैठकर उनकी समस्याएँ सुनता है। गुरूजी के भाई लालू सोरेन और रामू सोरेन दिन-रात संगठन को मजबूत बनाने में लगे रहते थे। गुरूजी जब भी आते, आंदोलनों की समीक्षा करते, कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाते और आगे की रणनीति तय करते।
उनकी सादगी, निर्भीकता और जनता के प्रति समर्पण ने मुझे विद्यार्थी जीवन से ही जनसंघर्ष के रास्ते पर चलने की प्रेरणा दी।
जब चलकरी ने अन्याय के विरुद्ध इतिहास लिखा
सत्तर के दशक में चलकरी और झुंझको के ग्रामीण अपनी कोयला खदानों का संचालन सहकारी समितियों के माध्यम से करते थे। यह स्थानीय स्वावलंबन का अनूठा उदाहरण था।
लेकिन कोयला माफियाओं ने हथियारों के बल पर इन खदानों पर कब्ज़ा कर लिया। ग्रामीणों के सम्मान और अस्तित्व पर संकट आ गया। भय इतना बढ़ गया कि लोग अपनी ही खदानों में जाने से डरने लगे।
कई प्रभावशाली नेताओं से मदद माँगी गई, पर किसी ने साथ नहीं दिया।
तब दिशोम गुरू शिबू सोरेन चलकरी पहुँचे।
विद्यालय मैदान में हजारों ग्रामीणों के बीच उन्होंने जो सिंहगर्जना की, वह आज भी स्मृतियों में जीवित है। उन्होंने घोषणा की कि अन्याय अब नहीं चलेगा।
अगले दिन लालू सोरेन और रामू सोरेन के नेतृत्व में विशाल जनसमूह खदानों की ओर बढ़ा। जनता की एकजुट शक्ति के सामने माफियाई गिरोह टिक नहीं सके। उन्हें वहाँ से खदेड़ दिया गया।
उस रात पूरे क्षेत्र में दीप जलाए गए। लोगों ने पहली बार महसूस किया कि संगठित जनता किसी भी अत्याचार को पराजित कर सकती है।
वह केवल एक संघर्ष नहीं था; वह झारखंडी स्वाभिमान की ऐतिहासिक विजय थी।
विस्थापितों के सबसे बड़े संरक्षक
बेरमो, कथारा, ढोरी, बोकारो, तेनुघाट और डीआरएंडआरडी परियोजनाओं से प्रभावित हजारों विस्थापितों के लिए गुरूजी सदैव ढाल बनकर खड़े रहे।
वे जानते थे कि विकास की कीमत सबसे अधिक गरीब और आदिवासी समाज चुका रहा है। इसलिए वे बार-बार कहते थे कि बिना न्यायपूर्ण पुनर्वास के कोई भी विकास स्वीकार्य नहीं हो सकता।
डीआरएंडआरडी परियोजना के आंदोलनों में उनका बार-बार आना केवल राजनीतिक समर्थन नहीं था, बल्कि विस्थापितों के संघर्ष के प्रति उनकी नैतिक प्रतिबद्धता थी।
माफिया और शोषण के विरुद्ध निर्भीक आवाज़ :
सन् 1983 में कथारा क्षेत्र में बिहार कोलियरी कामगार यूनियन के छह नेताओं को सीसीएल प्रबंधन ने नौकरी से बर्खास्त कर दिया।
उस समय कोयला माफियाओं का प्रभाव चरम पर था।
ऐसे कठिन दौर में गुरूजी करगली पहुँचे और महिला मंडल में आयोजित विशाल सभा में सीसीएल प्रबंधन और माफिया गठजोड़ के विरुद्ध ऐतिहासिक भाषण दिया।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि श्रमिकों और विस्थापितों के अधिकारों का हनन होगा, तो जनता चुप नहीं बैठेगी।
उनके भाषण ने पूरे बेरमो कोयलांचल में नई चेतना और संघर्ष की ऊर्जा का संचार किया।
राजनीति नहीं, जनसेवा उनका धर्म था :
आज राजनीति अक्सर सत्ता प्राप्ति का माध्यम बन चुकी है, लेकिन गुरूजी ने राजनीति को जनसेवा का माध्यम बनाया।
वे सत्ता में रहे, विपक्ष में रहे, संघर्ष में रहे—परंतु जनता से कभी दूर नहीं हुए।
उनका विश्वास था कि लोकतंत्र की असली शक्ति संसद में नहीं, बल्कि जनता की संगठित चेतना में निहित है।
गुरूजी की सबसे बड़ी विरासत : आज झारखंड के सामने अनेक चुनौतियाँ हैं—विस्थापन, बेरोज़गारी, पलायन, जल-जंगल-जमीन पर बढ़ते संकट, आदिवासी अधिकारों का क्षरण और सामाजिक असमानता।
ऐसे समय में गुरूजी के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं।
उनकी विरासत हमें सिखाती है कि संघर्ष कभी समाप्त नहीं होता। न्याय, समानता और स्वाभिमान के लिए निरंतर लड़ना ही सच्ची श्रद्धांजलि है।
अंतिम प्रणाम : आज जब दिशोम गुरू हमारे बीच नहीं हैं, तब झारखंड स्वयं को एक अभिभावक से वंचित महसूस करता है। किंतु इतिहास ऐसे महापुरुषों को कभी मरने नहीं देता।
वे हर उस किसान में जीवित हैं जो अपनी जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
वे हर उस विस्थापित में जीवित हैं जो न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है।
वे हर उस युवा में जीवित हैं जो अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने का साहस रखता है।
वे झारखंड की हर नदी, हर पहाड़, हर जंगल और हर संघर्षशील इंसान की स्मृतियों में सदैव अमर रहेंगे।
दिशोम गुरू शिबू सोरेन अमर रहें।
उनका संघर्ष अमर रहे।
झारखंडी अस्मिता अमर रहे।
श्रद्धासुमन
नोट : (80 के दशक के कई अखबारी कतरन इसलिए पोस्ट कर रहा हूँ कि किसी के परिवार में इसमें नाम हों तो वे झारखंड आंदोलनकारी की सूची में शामिल होने के लिए आधार बना सकते हैं। बाद में भी हमारे पास उपलब्ध प्रमाणों को पोस्ट किया जाएगा। )