स्वतंत्रता सेनानी वीरो सिंह संघर्ष मंच

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स्वतंत्रता सेनानी वीरो सिंह संघर्ष मंच भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी
नाम - क्रांतिकारी वीरो सिंह
पत्नी - भागो देवी
P.P.O.N. - S/C-16218 (POL)

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शतायु स्वतंत्रता सेनानी श्रद्धेय डॉ. जी. जी. पारिख जी को विन्रम श्रद्धांजलि अर्पित 🙏🏼💐 #2अक...
02/10/2025

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शतायु स्वतंत्रता सेनानी श्रद्धेय डॉ. जी. जी. पारिख जी को विन्रम श्रद्धांजलि अर्पित 🙏🏼💐
#2अक्टूबर2025

करो - मरो मैदान मुंबई से वीरो की भूमि बिहपुर में समाजवादी यात्रा के दौरान कई बार आना हुआ हैं। बिहपुर जी.जी की कर्मभूमि रही हैं। यहाँ उन्होंने बापू के विचारों को खूब प्रसारित किया था।

यह फोटो तब की हैं जब जी.जी समाजवाद की यात्रा के दौरान बिहपुर आए हुए थे। और उस समय उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी वीरो सिंह की जन्मभूमि औलियाबाद गाँव का भ्रमण किया था।

समाजवाद के शताब्दी नायक को अंतिम सलाम ❤️✊🏼
विनम्र श्रद्धांजलि 💐

क्रांतिकारियों की वीर भूमि  #बिहपुर_के_गौरवशाली_इतिहास का प्रतीक चिन्हबिहपुर के ऐतिहासिक विरासत को ज्वलंत रखने के लिए यह...
19/09/2025

क्रांतिकारियों की वीर भूमि #बिहपुर_के_गौरवशाली_इतिहास का प्रतीक चिन्ह

बिहपुर के ऐतिहासिक विरासत को ज्वलंत रखने के लिए यह प्रतीक चिन्ह तैयार किया गया हैं। जिसमें आजादी के दौरान बिहपुर में घटित महत्वपूर्ण घटना क्रम को दर्शाया गया हैं।

1. सन 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान लगातर छः माह तक चलने वाला सबसे लम्बा #बिहपुर_सत्याग्रह जो की स्वराज आश्रम को अंग्रेजी कब्जे से छुड़ाने के लिए चला था।

2. ऐतिहासिक #शहीद_गेट_बिहपुर जहाँ पर 9 जून 1930 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद पर अंग्रेजी सिपाहियों ने लाठी बरसाई थी।

3. 1857 की क्रांति का स्थल #गणशहीदा_मैदान_बिहपुर जहाँ पर मड़वा स्टेट के राजा बाबू झब्बन सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ किसान विद्रोह छेड़ा था। जिसमें हजारों क्रांतिकारियों शहीद हो गए थे , जिसकी कोई गिनती नहीं थी।

4. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बिहपुर की चर्चित सन 1943 में घटित #सोनवर्षा_फांड़ी_गोली_कांड की घटना जिसमें आठ वीर जवान शहीद हो गए थे।

5. अप्रैल - मई 1934 में महात्मा गाँधी का बिहपुर आगमन। जब बिहार में भयंकर भूकंप आया था, तो उस समय कांग्रेस द्वारा चलाए जा रहे राहत कार्य को देखने के लिए आए थे।

बिहपुर के क्रांतिवीर :  #पार्थ_ब्रह्मचारी (1885–2002)भागलपुर। बिहार की मिट्टी हमेशा से वीर सपूतों की जन्मभूमि रही है। इन...
08/09/2025

बिहपुर के क्रांतिवीर : #पार्थ_ब्रह्मचारी (1885–2002)

भागलपुर। बिहार की मिट्टी हमेशा से वीर सपूतों की जन्मभूमि रही है। इन्हीं महान सपूतों में एक नाम है क्रांतिकारी पार्थ ब्रह्मचारी जी का। भागलपुर जिले के बिहपुर थाना क्षेत्र के नन्हकार-जयरामपुर गांव में जन्मे ब्रह्मचारी जी का जीवन त्याग, साहस और तपस्या की अद्वितीय गाथा है।

हजारीबाग जेल कांड : जब कांप उठा ब्रिटिश साम्राज्य

क्रांतिकारी आंदोलन में सियाराम सिंह और पार्थ ब्रह्मचारी की जोड़ी पूरे इलाके में मशहूर थी। लेकिन असली पहचान उन्हें तब मिली जब उन्होंने इतिहास रच दिया। डॉ. राममनोहर लोहिया और लोकनायक जयप्रकाश नारायण को ब्रिटिश सरकार ने हजारीबाग जेल में कठोर सुरक्षा घेरे में बंद कर रखा था। मगर ब्रह्मचारी जी और उनके साथियों ने असंभव को संभव कर दिखाया। रात के अंधेरे में जेल की ऊँची दीवारें लांघकर दोनों नेताओं को आज़ाद कराया। इस दुस्साहसी कांड ने ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिला दीं और पार्थ ब्रह्मचारी का नाम क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास में अमर हो गया।

कुश्ती, योग और तपस्या से बना ‘ब्रह्मचारी’ नाम

पार्थ जी कुश्ती और योग के माहिर थे। उनका जीवन अनुशासन और संयम का प्रतीक था। देशसेवा में इतना रमे रहे कि लगभग 60 वर्ष तक विवाह नहीं किया। इसी कारण लोग उन्हें सम्मान से ‘ब्रह्मचारी’ कहने लगे। बाद में चिकित्सकों की सलाह पर विवाह किया, लेकिन उनका जीवन अंत तक समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित रहा।

आज़ादी के बाद का जीवन : राजनीति से दूर, सेवा में समर्पित

देश स्वतंत्र होने के बाद ब्रह्मचारी जी कटिहार में बस गए। उन्होंने सत्ता और राजनीति का मोह नहीं पाला। वे युवाओं को प्रेरित करते रहे, समाजसेवा में सक्रिय रहे और अपने क्रांतिकारी व्यक्तित्व को जिंदा रखा।

117 वर्षों का गौरवशाली सफ़र

1885 में जन्मे और 2002 में देहांत हुए पार्थ ब्रह्मचारी जी ने 117 वर्षों का लंबा जीवन जिया। उनके शौर्य और त्याग की कहानियाँ आज भी बिहपुर की धरती गुनगुनाती है। वे केवल एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि उत्तर बिहार के स्वाभिमान, त्याग और आज़ादी की लौ के सजीव प्रतीक थे।

स्वतंत्रता सेनानी वीरो सिंह संघर्ष मंच

 #स्वतंत्रता_सेनानी_वीरो_सिंह_स्मृति_सम्मान अमर रहें ! 🙏🏼💐 िंद 🇮🇳
25/08/2025

#स्वतंत्रता_सेनानी_वीरो_सिंह_स्मृति_सम्मान

अमर रहें ! 🙏🏼💐

िंद 🇮🇳

Dainik Bhaskar
16/08/2025

Dainik Bhaskar

भास्कर न्यूज | नारायणपुर | dainikbhaskar

15/08/2025

जश्न - ए - आजादी मुबारक़

🧡🤍💚

12/08/2025
06/08/2025

आजादी के गुमनाम सिपाही को नमन 💐

जय हिंद 🇮🇳

 #शहीद_दशरथ_महतो================================थाना बिहपुर के लत्तीपुर रेलवे स्टेशन घटना में शहीद 21 वर्षीय आजादी के गु...
20/07/2025

#शहीद_दशरथ_महतो
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थाना बिहपुर के लत्तीपुर रेलवे स्टेशन घटना में शहीद 21 वर्षीय आजादी के गुमनाम नौजवान नायक

बिहपुर थाना कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष सत्यदेव राय थे। जबकि भागलपुर जिला कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष उपेन्द्रनाथ मुखर्जी व सचिव मेवालाल झा थे।

घटना 17 अगस्त 1942 की है। बिहपुर स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में कितना संवेदनशील रहा है आप इस घटना से अंदाज लगा सकते हैं। 9 अगस्त 1942 को मुम्बई के अगस्त क्रांति मैदान से 'करो-मरो का नारा" देते है और बिहपुर कर गुजरता है...

बिहपुर थाना युद्ध समिति के संचालक राजेंद्र झा 'स्वतंत्र' ने एक बैठक बुलाकर तय किया कि थाना, पोस्ट ऑफिस, रजिस्ट्री ऑफिस, डाक बांग्ला, और स्टेशन बगैरह पर कब्जा किया जाए। दूसरे ही दिन इलाके भरके बेशुमार लोग जमा हो गए। जिनके सहयोग से कुछ चुने हुए आंदोलनकारी आगे बढ़े और थाना, रेलवे स्टेशन आदि सभी सरकारी इमारत तथा ऑफिस में आग लगा दी। स्टेशन रक्षा के लिए जो हथियारबंद सिपाही पहरा दे रहे थे। वो इतनी बड़ी भीड़ और इतना ज्यादा जोश देखा उन्हें काठ मार गया। स्टेशन मास्टर, पोस्ट मास्टर सबों ने आग की फैलती हुई लपेट देखकर अपने-अपने घर की रह ली। कुछ देर में सरकार का सारा सामान जल कर राख हो गया। जो चहल-पहल की जगह थी वो शमशान बन गई। काफी लोग लूटपाट में लग गए। सरकारी गोदाम और लड़ाई का सामान लूटना शुरू कर दिया। गल्ला, कपड़े, तेल, फूलेल व अन्य सामान लाखों का माल लूट गया।

नारायणपुर स्टेशन को तोड़-फोड़ कर फूंक डाला गया। पोस्ट ऑफिस के कागजात जला दिए गए। नारायणपुर से नवगछिया तक और बिहपुर से महादेवपुर तक के तार काट फेंके गए और बहुत बड़ी तादाद में रेल की पटरिया उखाड़ फेंकी गई। महादेवपुर घाट से जो रेलगाड़ी आ रही थी, उसको कांग्रेस सरकार की ओर से जप्त कर लिया गया। मुसाफिरों को उतर जाने का आदेश दिया गया। गार्ड और ड्राइवर को गिरफ्तार कर लिया गया। उसके बाद पेट्रोल छिड़क कर समूची गाड़ी में आग लगा दी गई। गाड़ी धुआं और लपटे फेंकते हुए काफी देर तक जलता रहा और अंततः जलकर राख हो गई। उसकी लोहे की बेंच ही ब्रिटिश साम्राज्य की किस्मत पर रोने के लिए बची रही। आंदोलनकारी ने थाने भर में आवाकारी की दुकानों को बंद कर दिया और पोस्ट ऑफिस के कागजात जला दिए गए।

लत्तिपुर स्टेशन पर भी हमला हुआ और उसका बहुत सा सामान नष्ट कर दिया गया। (लत्तिपुर के पश्चिम एक गांव गौरीपुर है जहां अंग्रेज जमीनदार निल्हे साहब की कोठी थी। यहां के किसानो से जबरन नील की खेती करवाई जाती थी। किसानो पर कराई से टैक्स वसूली किया जाता था। किसानो और अंग्रेज जमीनदार के साथ टकराव जारी रहता था। इसी गांव से थाना कमिटी अध्यक्ष सत्यदेव राय थे।) और वहां की रेलवे लाइन छिन्न-भिन्न कर दी गई।

इन्हीं दिनों यह एक घटना हुई । एक गोरा सार्जेंट लगभग एक दर्जन हथियार बंद सिपाहियों को लेकर रेलवे लाइन के किनारे-किनारे भागलपुर जा रहा था। लत्तीपुर के लोगों ने इसे देखा और बंदूक छीन लेने की तुरंत से योजना बनाई। लगभग 40 लोगों की तादाद में सतरूप महतो व इनके 21 वर्षीय बेटा दशस्थ

महतो के नेतृत्व में ये सब गोरा सार्जेंट व पुलिस का पीछा करने लगा। पहले तो इन्हें पीछा करते देख सार्जेंट बंदूक दिखाकर भागना चाहा पर जब ये लोग भागने के बजाय पीछा ही कर रहा है तो गोरा सार्जेंट तेज कदम से भागलपुर की ओर बढ़ने लगा। इधर ये लोग समझा कि अंग्रेज पुलिस टोली के पास गोली नहीं है इसलिए बंदूक दिखा रहा है। तब सतरूप महतो ने कहा इस पर पत्थर मारो और देखो ये लोग क्या करता है। बस देखना क्या था रेलवे किनारे पत्थरों का भरमार ही था। सतरूप महतो अपने बेटा दशरथ महतो से कहा आगे बढ़ते जाओ और पत्थर चलाते जाओ। पुलिस भी जबाव में पत्थर की गोली बंदूक से चलाने लगा।

इन क्रांतिकारियों का हौसला बढ़ता चला गया इन्हें लगा अब इनके पास गोली नही है बस इसे पत्थर मार-मार कर परेशान कर दिया जाए और फिर इसकी सारी बंदूके छीन ली जाए।

पहले इन्होंने कुछ देले फेक जिसके जवाब में सिपाहियों ने भी बंदूक में पत्थर की गोलियां भर-भर कर छोड़ना शुरू किया। लेकिन जब दोनो दल नजदीक हुए तो सतरूप महतो ने अपने लड़के दशरथ माता से कहा की देखो अब न गोरे सार्जेंट को गोली है और न ही सिपाहियों को। देखो न हमारे ढेलों के जवाब में भी यह ढेले और पत्थर ही फेंक रहे हैं। यही मौका है बढ़ो बेटा गोरे सार्जेंट को एक ढीला खींच कर मारो फिर बंदूक को छीन लो। 21 वर्षीय गबरू जवान दशरथ महतो लपक करआगे बढ़े और गोरे सार्जेंट पर जोर से पत्थर दे मारा लेकिन अबकी बार ऑरिजनल गोली चली और तब तक चलती रही जब तक लोग गिर न पड़े और भाग न गए।

गिर पड़ने वालों में 21 वर्षीय गबरू जवान दशरथ महतो जो तत्काल शहीद हो गए।

आज भी लत्तिपुर चौक पर पहुँचते ही एक रोमांच पैदा करता है कितना साहसी था हमारा पुरखा। लेकिन हाय रे नेता विधायक-सांसद कौन है जो सुधि लेगा कि कोई सतरूप महतो थे जो अपने बेटे को आजादी की आंदोलन में शहीद कर दिया।

किया है! हम आपको नमण करते है! आपने हम सबका सिर ऊँचा

शहीद, अमर रहे ! 💐
जय हिंद 🇮🇳

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