अनामिका

अनामिका बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय।

विजय की कविताएँ-2025शिव -अदभुत, अनंत,नियंत्रित करतेअसंख्य परमाणु रिएक्टर जैसे शिवलिंगों को।विश्व शांति हेतु,हलाहल पान कर...
30/07/2026

विजय की कविताएँ-2025
शिव -
अदभुत, अनंत,
नियंत्रित करते
असंख्य परमाणु रिएक्टर जैसे शिवलिंगों को।
विश्व शांति हेतु,
हलाहल पान कर,
विश्व को संरक्षित करनेवाले,
शिव की जय हो।
"मृत्योर्मुक्षीय मामृतात"
कुछ न कुछ तो कहना है,
चुप नही रहना है|
ईश्वर का नाम जपना है,
हर कोई अब अपना है|
जीवन राष्ट का आभारी है,
सपना अब संसारी है|
चरैवेति|
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लोग कहते हैं
यह संसार सुखमय है,
साधु कहते हैं
ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या,
धोखेबाज़ कहते हैं
झूठ ही लेना, झूठ ही देना,
मरीज कहते हैं
झूठ ही भोजन झूठ चबेना,
अन्य धर्मों के लोग कहते हैं –
सनातन है मात्र एक कल्पना,
तुम भी कुछ कहो ना.
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जीवन की
ई पहली झलक
चुरा ही लेती है,
बिना बताए,
सुख-चैन,
हो जाते हैं दो नैना बेचैन,
लूट जाता है सबका चैन
सिर्फ आश और प्यास ही
साथी बने रहते हैं,
जीवन के अधूरेपन की,
ई- प्रेम की .
डॉ. विजय प्रकाश शर्मा
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बुढ़ापा
बुढ़ापा न अभिशाप न वरदान
बुढ़ापा जीवन की आन -बान
यह जीवन के अमृत का
आनंद लेने का समय है।
बचपन का आनंद लिया।
जवानी में बाधाओं से लड़ा।
अब बुढ़ापे में हूँ।
अब मैं शिखर पर खड़ा हूँ।
मेरा कर्तव्य है
अपनी जीवन कहानी साझा करना।
संघर्षों से सीखना ही जीवन है।
निरंतर आगे बढ़ना ही बुढ़ापा है।
यह जीवन यात्रा का अंतिम पड़ाव है।
न नीचे, न ऊपर, बल्कि सर्वोच्च ,
अति उत्कृष्ट।
डॉ. विजय प्रकाश शर्मा
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जीवन
बाल सूर्य के उदय की लालिमा
आह्लादित कर देती है जीवन.
और जीव तैयार होने लगतें है,
उसके प्रचंड तारुण्य के लिए,
क्योंकि वे जानते हैं की
जीवन ऊष्मा देने के बाद
सूर्य अपने लालित्य से परिपूर्ण
भेजेगा संध्या रानी को,
चांदनी को रात में ,
सहलाकर सुलाने के लिए.
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ध्रुव तारा
अब हम बड़े हो गए हैं।
हमारी माँ
इस दुनिया से चली गईं,
हम अब तक उनके बच्चे थे।
उनकी उम्र मात्र नब्बे वर्ष थी।
हमारी प्यारी माँ ,
वह हमारे बच्चों की प्यारी दादी थीं।
वह हमारी मार्गदर्शक थीं।
उन्होंने हमें तब अलविदा कहा
जब हमें उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।
हम चाहते थे कि वह घर पर हों,
हमारे गुनाहों को स्वीकार करें,
हम सेवानिवृत्त हो चुके थे,
लेकिन वह हमें छोड़कर चली गईं।
हमारी प्यारी माँ ,
अब आकाश में तारा हैं।
ध्रुव तारा।
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अश्क़
ढलते हैं तो ढलने दो
ये जो कहते हैं कहने दो।
गालों तक आकर ठहर जाएंगे
भटके कभी तो सम्हल जायेंगे।
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सुबह
नया जीवन लाती है.
दोपहरी –
श्रमस्वेद दे जाती है.
शाम –
तुम्हारी याद आती है.
और -रात –
करवटें बदलती है
सुबह के इन्तजारमें
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अपनत्व बोध
लोगों की उंगलिया भी उठती है
जब तुम्हारे कदम उठते हैं
चुगलियाँ पगुराती हैं
तुम्हारे अपने रूठ जाते हैं
फ़िर कोई मित्र सखा,
सखी आसमान से उतरते हैं
तुम्हारा साहसी कदम बढ़ जाता है एक और-
पुरवैया का दर्द सिमट जाता है
उनके अपनत्व बोध में
अब करना होता है एक निश्चय
चरैवेति चरैवेति चरैवेति।
मैं ढूंढता रहा अज्ञात में ज्ञात
अन्याय में न्याय
निःशब्द।
बहुत कठिनाई
नहीं हुई
खोज्नने में
असत्य में सत्य।
राम का क्षद्म रूप
और बाली वध
कृष्ण के इशारे
और गए मारे
भीष्म, द्रोण ,
दुर्योधन जरासंध.
कलियुग में तो
सबकुछ ज्ञात है
सत्य भी असत्य भी।
जीवित भी मृत्य भी।
-डॉ. विजय प्रकाश शर्मा

श्याम तेरी बसुरिया नहीं चाहिए,
तुम न हो तो वृन्दावन नहीं चाहिए,
पुष्प कब खिल सका है भ्रमर के बिना,
तुम न चहको वो उपवन नहीं चाहिए।
बीच में मैं तो बेबस खड़ी रह गई,
तुम जो आए ठगी की ठगी रह गई
पाप के भार से दब गई है पृथा,
भेजकर निज सुदर्शन बचiलो प्रभु।
श्याम तेरी मुरलिया नहीं चाहिए,
तुम न हो तो वृन्दावन नहीं चाहिए.
-डॉ विजय प्रकाश शर्मा.
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इस पार प्रिये जो कुछ भी है,
उस पार कभी वो ना होगा।
कविता भी कोई न होगी,
गीत भी कोई न होगा।
श्रृंगार भले मिल जाएंगे,
मंiसल मनुहार नहीं होगा।
डॉ विजय प्रकाश शर्मा.
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मोदी जीते, वाह जी वाह!
मोदी हारे, वाह जी वाह!
इंडिया जीता, वाह जी वाह!
पाकिस्तान हारा,
वाह जी वाह! मो
दी ने मारा, वाह जी वाह!
पाकिस्तान हारा,
वाह जी वाह!
घुस के मारा,
वाह जी वाह!
अपनी डफली, वाह जी वाह!
मोदी का राग, वाह जी वाह!
विद्रोही के दिल में,
लग गई आग, वाह जी वाह।
सुनो कहानी वाह जी वाह!
हम हिंदुस्तानी, वाह जी वाह!
रोक दिया पानी, वाह जी वाह!
उन्हें याद आ गई नानी, वाह जी वाह!
ख़त्म कहानी, वाह जी वाह.
डॉ विजय प्रकाश शर्मा.
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गुरेज है
पुजारी को पूजा से,
मुल्ला को शिक्षा से
नेता को विधान से
न्यायाधीश को संविधान से
गुरेज है.
विद्यार्थी को पढने से
आगे की तरफ बढ़ने से
गुरेज है।
स्त्री को रिश्ता बनाने से
गुरेज है।
होली मे-
दिखी हिरण सी आंखें ,
आज होली में।
चढ़ा भांग का तरंग
होली में
दिखी गुलाली नार
डोली में,
मन दौड़ा ले गुलाल,
होली में
में अबकी होगी पूरी रंगाई
होली में
चोटी पर है दिमाग
होली में,
उमरपार लोगों को मिले
साकार होली में
सतरंगी बाई का
हो
साथ होली में.
मन दौड़ा ले गुलाल,
होली में.
अब खोजते रहो
श्यामसुन्दर, घनश्याम- होली मे-

नहीं हीं वो खेत खलिहान,
नहीं वो सांझ नहीं विहान,
नहीं वो मुर्गे वाली बांग,
जिसे तुम ढूंढ रहे हो।
नहीं वो लकड़ी के दातून,
नहीं वो लंबे से नाख़ून,
नहीं अब अमरूद वाले बाग,
नहीं वो गन्ने वाले खेत,
जिसे तुम ढूंढ रहे हो।
नहीं वो बुधमनिया बुआ,
नहीं है तेतरी नानी,
जब मुरक जाते थे पांव,
लगा देती थी हल्दी -चुनापानी,
नहीं अब बतरे में बहाओ,
जिसे तुम ढूंढ रहे हो।
नहिं सोहराय पासी की लबनी,
नहिं भगन के चिनिया बादाम ,
कछकछवा बाबा के वो बेर,
गालियां सुनते थे जब ढेर,
जिसे तुम ढूंढ रहे हो।
नहीं वो गाँव नहीं, वो छाँव,
नहीं वो गेह नहीं वो नेह,
किसे तुम ढूंढ रहे हो?

30/07/2026
स्तक समीक्षा अन्तः सलिला : डॉ विजय प्रकाश शर्माप्रकाशक : संकल्प प्रकाशन , छतीसगढ़मूल्य : 249/ रुसच तब  भी था, जब बोला न ग...
07/05/2026

स्तक समीक्षा

अन्तः सलिला : डॉ विजय प्रकाश शर्मा
प्रकाशक : संकल्प प्रकाशन , छतीसगढ़
मूल्य : 249/ रु

सच तब भी था, जब बोला न गया था। कुल 110 कविताओं का शाब्दिक विस्फोट यहीं से आरम्भ होता है। यथार्थवादी और जागरूक सर्जक को मानव समाज, देश की चिंता होनी स्वाभाविक है। खासकर तब, जब कवि हृदय राष्ट्रीय स्तर पर ख्यात मानव शास्त्री हो। यही कारण है कि हर एक युग में साहित्य भी नई नई शब्दावलियाँ , नए नए बिम्ब , नई नई परिभाषाएँ गढ़ लेता है।
अन्तः सलिला का काव्य विधान बंधा भी है और मुक्त भी है। फिर भी इनकी भाव भूमि और भाषिक संरचना में अनुपम अन्विति विद्यमान है।
कवि जब कविता में जीता है तो उसका जीना , उसकी संवेदना,अनुभूति की तीव्रता ,निरन्तर आत्म साक्षात्कार करता हुआ आगे बढ़ता रहता है।वेशक, संवेदनाएँ तो प्रथमतः
आत्मगत ही होती है लेकिन जब यही संवेदना निर्वैयक्तिक होकर मानवीकरण का रूप धारण कर लेती है तो आलोचकों, समालोचकों की शैली में इसे आत्म तत्व का विसर्जन या फिर यथार्थवादी कविताओं का कोई प्रकार या विधा परिभाषित हो जाती है।
अन्तः सलिला की कविताएँ अलग अलग अभिव्यक्तियों में बहकर फैल तो गई है लेकिन उद्गम स्थल की मिठास, शीतलता, शांति, और आनन्द का विस्तार , चेतना की विराटता ,सब कुछ ज्यों का त्यों विद्यमान है।
इसी विराट वैभव के बूते कवि कह उठता है-
ईश्वर का अर्थ माँ ही तो है ( कविता संख्या 5)

कविताओं के छन्द जहां बंधे हुए हुए हैं वहाँ कवि भी बंधा हुआ महसूस करता है ।
क्योँ घूँघट में है सच ( कविता संख्या 23)
यह एक मौजूं बानगी है।
सभी कविताओं के अध्ययन मनन के बाद यह स्पष्ट हो ही जाता है कि कथ्य और कथन, भाषा और शैली का आपसी # फैंसी मैच # जमकर हुआ है ।
पाठकों को विल्कुल टटका आनन्द मिलेगा।
अब तो कोई भी सुधी संपन्न पाठक घर बैठे मोबाइल की टिप्स पर पुस्तक खरीद कर पढ़ सकता है ।
शुभस्य शीघ्रम । Jyotindra Mishra , Patna .

वेदना की संवेदना(डॉ. विजय प्रकाश शर्मा के काव्य-संग्रह संवेदना की पुस्तक समीक्षा)डॉ. विजय प्रकाश शर्मा का काव्य-संग्रह ‘...
07/05/2026

वेदना की संवेदना
(डॉ. विजय प्रकाश शर्मा के काव्य-संग्रह संवेदना की पुस्तक समीक्षा)

डॉ. विजय प्रकाश शर्मा का काव्य-संग्रह ‘संवेदना’ उपनिषदों के ‘पंचकोश’ सिद्धांत की दृष्टि से देखा जाए तो तैत्तिरीय उपनिषद के “अन्नमय कोश” अर्थात भौतिक ज्ञान तथा “मनोमय कोश” अर्थात भावनात्मक चेतना—दोनों का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है। एक ओर डॉ. शर्मा मानव वैज्ञानिक के रूप में अपने गहन बौद्धिक व्यक्तित्व से परिचित कराते हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी कविताओं के माध्यम से वे भावनात्मक संवेदनशीलता की गंभीर उपस्थिति दर्ज कराते हैं। इस प्रकार उनका व्यक्तित्व मनसा, वाचा और कर्मणा से परिपूर्ण दिखाई देता है।
संग्रह के आरंभिक मुक्तकों को यदि स्वादिष्ट साहित्यिक ‘स्टार्टर’ कहा जाए, तो शेष कविताएँ वास्तव में भावनाओं के समृद्ध ‘मेनकोर्स’ के समान हैं। संवेदना, प्रतीक्षा, प्रेम-ग्रन्थि, विभ्रम, अलख और भ्रम-गन्ध जैसी रचनाएँ प्रेम की सूक्ष्म अनुभूतियों, विरह, प्रतीक्षा और भावनात्मक गहनता को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करती हैं। इन कविताओं में प्रेम की पावस फुहार तन-मन को आच्छादित करती प्रतीत होती है।
विशेष रूप से “बादलों के पार” कविता भारतीय ग्राम्य जीवन से दूर आजीविका की तलाश में भटकते श्रमिकों की वेदना को अत्यंत मार्मिक रूप में प्रस्तुत करती है। कुछ ही पंक्तियों में कवि ने विस्थापन, गाँव की स्मृतियों और मातृभूमि के आकर्षण का ऐसा चित्र खींचा है जो पाठक के अंतर्मन को स्पर्श करता है। इसी प्रकार शिक्षण संस्थान, ईमानदारी तथा आह्वान जैसी कविताओं में सामाजिक व्यवस्था, शैक्षिक विसंगतियों और नैतिक पतन पर तीखा किंतु संयत प्रहार दिखाई देता है। कवि का आक्रोश यहाँ “थोड़ा लिखा, अधिक समझना” की शैली में प्रभावोत्पादक बन जाता है।
संवेदना केवल एक कविता का शीर्षक नहीं, बल्कि पूरे संग्रह की आत्मा है। कवि ने विविध रचनाओं के माध्यम से यह स्थापित करने का प्रयास किया है कि संवेदनशीलता प्रत्येक मनुष्य के भीतर विद्यमान वह अनिवार्य तत्व है, जो उसे दूसरे के सुख-दुःख से जोड़ता है। अध्यापन से लंबे समय तक जुड़े रहने के कारण कवि की रचनाओं में सहज रूप से मार्गदर्शन, सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों का संदेश परिलक्षित होता है।
समग्रतः ‘संवेदना’ एक ऐसी कृति है जिसे “गागर में सागर” कहना समीचीन होगा। इसमें प्रेम, सामाजिक चेतना, मानवीय करुणा, संघर्ष, व्यवस्था-विरोध और अतीत के प्रति मोह—सभी भावनाएँ समाहित हैं। कवि की रचनाओं में नॉस्टेल्जिया की हल्की छाया भी है, जो उन्हें और अधिक आत्मीय बनाती है। यह संग्रह प्रत्येक आयु-वर्ग के पाठकों में संवेदनाओं को जागृत करने की क्षमता रखता है तथा समकालीन हिंदी काव्य-जगत में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराता है।
-पुस्तक समीक्षक
-डॉ.दयानंद अवस्थी

यादों को मत रखिए अपने कंधों पर, ये हमेशा आपके कानों में फुसफुसाती रहेगी, ताउम्र दिगभ्रमित करती रहेगी, कि आप बहुत अच्छे ह...
07/05/2026

यादों को
मत रखिए अपने कंधों पर,
ये हमेशा
आपके कानों में
फुसफुसाती रहेगी,
ताउम्र दिगभ्रमित करती रहेगी,
कि आप बहुत अच्छे हैं।
विजय प्रकाश शर्मा.

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KHAIRA, Aurangabad
Bihar
822131

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