22/06/2026
राम के नाम पर राजनीति करने वालों से एक सवाल
जिस राम के नाम पर वर्षों तक राजनीति की गई, चुनावी मंच सजाए गए, करोड़ों लोगों की आस्था को वोटों की ताकत में बदला गया, आज उसी राम मंदिर के चढ़ावे में कथित करोड़ों रुपये की गड़बड़ी के आरोप सामने आते हैं तो देश के सामने सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा होता है — सच क्या है?
जो लोग कहते थे "राम को लाए हैं", आज उन्हें भी जवाब देना होगा कि राम के घर में चढ़ाए गए धन की सुरक्षा और पारदर्शिता की जिम्मेदारी किसकी थी?
कहा जा रहा है कि लगभग ₹200 करोड़ के चढ़ावे में अनियमितताओं के आरोप हैं। यदि यह आरोप सच साबित होते हैं, तो यह सिर्फ पैसों का मामला नहीं होगा बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के साथ विश्वासघात माना जाएगा। लेकिन सच क्या है, यह निष्पक्ष और पूरी जांच के बाद ही तय होगा।
सवाल उठता है — आखिर वे "बड़े लोग" कौन हैं जिनके नाम सामने आने की चर्चा की जा रही है? क्या जांच बिना किसी दबाव के पूरी सच्चाई देश के सामने ला पाएगी? यह सवाल देश के हर नागरिक को पूछना चाहिए।
और एक प्रश्न व्यवस्था पर भी है — यदि शुरुआत में एफआईआर दर्ज नहीं हुई, तो SIT के गठन की प्रक्रिया और उसके कानूनी आधार को लेकर भी जनता के मन में प्रश्न उठ सकते हैं। इन प्रश्नों के स्पष्ट जवाब आना लोकतंत्र में आवश्यक है।
यह मामला किसी दल या व्यक्ति की अंधभक्ति या अंधविरोध का नहीं है। भगवान राम किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हैं। राम करोड़ों भारतीयों की आस्था हैं। इसलिए राम के नाम पर सबसे अधिक राजनीति करने वालों पर भी सबसे अधिक जवाबदेही बनती है।
कभी कहा गया था — "मैं चौकीदार हूँ"। आज जनता पूछ रही है कि चौकीदारी का मतलब सिर्फ नारा है या जवाबदेही भी?
और एक बात समझने की जरूरत है — ₹200 करोड़ बहुत बड़ी राशि है, यदि कोई गड़बड़ी हुई है तो उसके दोषियों को कानून के अनुसार सजा मिलना और जनता के विश्वास की रक्षा करना है सरकार का धर्म है और सबसे पहले एफआईआर दर्ज होनी चाहिए फिर उसके बाद SIT गठन किया जाना चाहिए
आज प्रश्न सिर्फ इतना है —
राम के नाम पर राजनीति करने वाले राम के नाम पर हुई कथित गड़बड़ी की सच्चाई को सामने लाने के लिए कितने प्रतिबद्ध हैं?
जांच निष्पक्ष हो, दोषी चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे बचाया न जाए — यही लोकतंत्र और राम की मर्यादा दोनों की मांग है।