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27/09/2025
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27/09/2025

Plant one tree this week

26/09/2025

अगर आपको किसी पेड़ से बात करने का मौका मिले, तो आप क्या पूछेंगे? 🌱

If you had a chance to talk to a tree, what would you ask it? 🌱

26/09/2025

कहानी: “आख़िरी पीपल का पेड़”

एक छोटे से कस्बे में पीपल का एक विशाल पेड़ खड़ा था। उसकी उम्र किसी इंसान से कहीं ज़्यादा थी। कहते थे कि उस पेड़ ने कस्बे के तीन सौ साल के इतिहास को अपनी आँखों से देखा था। गाँव के बुज़ुर्गों की कहानियाँ, बच्चों की किलकारियाँ, परिंदों का बसेरा, सब उसी पेड़ की छाँव में पलता था।

गर्मी की तपती दोपहरों में जब धरती झुलसती, लोग उसी पेड़ की छाया में बैठकर ठंडी हवा का आनंद लेते। सर्दियों की ठंडी रातों में उस पर बसे कबूतर और चिड़ियाँ पास-पास सिमटकर सोते। बरसात में तो जैसे पूरा पेड़ गाँव की छत बन जाता, बूंदें पत्तों पर टकराकर संगीत सी धुन बजातीं।

लेकिन वक्त बदल रहा था। कस्बे में नई सड़कें बन रही थीं। दुकानों और घरों के लिए ज़मीन चाहिए थी। धीरे-धीरे खेत सिकुड़ने लगे और जंगल काटे जाने लगे। जहाँ कभी चारों तरफ हरियाली थी, वहाँ अब सीमेंट और कंक्रीट के ढेर नज़र आते।

लोगों की नज़र अब उस पीपल के पेड़ पर भी थी। नगरपालिका ने फ़ैसला किया कि सड़क चौड़ी करनी है, और उसके बीच में वही पेड़ खड़ा था। ठेकेदार ने मशीनें मंगवाईं और एक दिन घोषणा कर दी कि अगले हफ्ते पेड़ काट दिया जाएगा।

यह खबर सुनकर पूरे कस्बे में खामोशी छा गई। बूढ़े लोग आँखें पोंछते हुए कहने लगे—
“बचपन से इसे देखा है, ये पेड़ हमारे साथ ही बड़ा हुआ है।”

बच्चे उदास हो गए। वे जानते थे कि अगर यह पेड़ चला गया तो उनकी खेल की जगह, उनका दोस्त, सब छिन जाएगा।

इसी कस्बे में बारह साल की एक लड़की थी—आर्या। वह रोज़ अपनी किताबें लेकर उसी पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाई करती थी। उसे लगता था जैसे पेड़ उसकी बातों को सुनता है, उसे समझता है। जब वह उदास होती तो हवा से हिलते पत्ते उसे सांत्वना देते। आर्या के लिए यह पेड़ कोई साधारण चीज़ नहीं था, बल्कि उसका सच्चा मित्र था।

आर्या ने तय किया कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह पेड़ को बचाएगी।

उसने अपने दोस्तों के साथ मिलकर पोस्टर बनाए:
“पेड़ बचाओ, जीवन बचाओ।”
“एक पेड़ हज़ार सांसें।”

उन्होंने कस्बे के हर घर में जाकर लोगों को समझाया कि पेड़ सिर्फ लकड़ी या छाया नहीं देता, बल्कि वह जीवन देता है—हवा, पानी, मिट्टी सबको संतुलित रखता है।

शुरुआत में कुछ लोग हँस दिए, कुछ ने कहा, “बेटी, बड़े-बड़े लोग फ़ैसले करते हैं, हम क्या कर सकते हैं?” लेकिन आर्या हार मानने वाली नहीं थी। उसने कस्बे के स्कूल में बच्चों को इकट्ठा किया और सबने मिलकर एक अभियान शुरू किया—“आख़िरी पीपल बचाओ।”

हर सुबह वे पेड़ के नीचे इकट्ठा होते और धरना देते। बच्चे तख्तियाँ उठाए खड़े रहते। यह देखकर बुज़ुर्गों का दिल पिघल गया। धीरे-धीरे और लोग भी जुड़ते गए।

एक दिन नगरपालिका के अधिकारी आए और बोले,
“देखो बच्चो, हमें सड़क बनानी है, विकास के लिए यह ज़रूरी है। पेड़ तो कहीं और भी लगाए जा सकते हैं।”

आर्या ने साहस करके जवाब दिया,
“साहब, हम नए पेड़ ज़रूर लगाएंगे, लेकिन इस पेड़ को बचाना भी उतना ही ज़रूरी है। यह सिर्फ लकड़ी का ढांचा नहीं, यह हमारी साँसों का सहारा है। अगर यह कटा तो हमें इतिहास माफ़ नहीं करेगा।”

उसकी बात ने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया। मीडिया तक खबर पहुँच गई। अखबारों में छपा—“बच्चों की जिद ने रोका पेड़ कटना।”

कुछ दिनों तक यह लड़ाई चली। लेकिन आखिरकार अधिकारियों को मानना पड़ा। सड़क का नक्शा बदला गया ताकि पेड़ बचा रहे।

जब यह फ़ैसला हुआ तो पूरा कस्बा खुशी से झूम उठा। बच्चे रोते-रोते हँसने लगे, बुज़ुर्गों ने कहा, “आज हमें हमारी अगली पीढ़ी पर गर्व है।”

आर्या पेड़ के पास गई, उसका तना गले लगाकर बोली,
“तुम अब हमेशा हमारे साथ रहोगे। वादा है हम तुम्हारे और दोस्तों को भी लगाएंगे।”

उस दिन कस्बे के हर घर में यह बात पहुँच गई कि पेड़ बचाना सिर्फ ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि जीवन की गारंटी है। लोग अपने-अपने आँगन और खेतों में नए पेड़ लगाने लगे। धीरे-धीरे कस्बा फिर से हरा-भरा होने लगा।

कई साल बाद जब आर्या बड़ी होकर पर्यावरण वैज्ञानिक बनी, तो उसने वही कहानी सुनाई—
“अगर एक बच्ची और कुछ बच्चों की जिद से एक पेड़ बच सकता है, तो सोचिए हम सब मिलकर पूरी धरती को बचा सकते हैं।”

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