15/01/2026
पिता सूर्य देव और पुत्र शनि देव के प्रेम क्षमा भाव, परिवार पुनर्मिलन का प्रतीक माना जाता है मकर संक्रांति...
पौराणिक कथा के अनुसार, सूर्य देव की दो पत्नियां थीं- संज्ञा और छाया। माता छाया के पुत्र शनि देव थे। जन्म के समय शनि देव का रंग काला था, जिसे देखकर सूर्य देव ने उन्हें अपना पुत्र मानने से इंकार कर दिया और क्रोधवश उनका अपमान किया। पिता के इस कटु व्यवहार के कारण शनि देव और माता छाया को अलग होकर 'कुंभ' नामक घर में रहना पड़ा।
सूर्य देव के दुर्व्यवहार से आहत होकर माता छाया ने उन्हें कुष्ठ रोग का श्राप दे दिया। क्रोधित होकर सूर्य देव ने प्रतिशोध में शनि देव और छाया के घर को अपनी अग्नि से जलाकर भस्म कर दिया
जब सूर्य देव की पहली पत्नी संज्ञा के पुत्र यम को इस कलह का पता चला, तो उन्होंने पिता सूर्य देव को श्राप से मुक्ति दिलाई। यम ने पिता को समझाया और उनको माता छाया व शनि देव के प्रति स्नेहपूर्ण व्यवहार करने का आग्रह किया। अपनी भूल का अहसास होने पर सूर्य देव स्वयं शनि देव से मिलने उनके घर पहुंचे। जब सूर्य देव वहां पहुंचे, तो शनि देव का सब कुछ जल चुका था। फिर भी, उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक अपने पिता का स्वागत काले तिल से किया। पुत्र के इस प्रेम और क्षमा भाव से सूर्य देव गदगद हो गए।
सूर्य देव ने शनि को 'मकर' नाम का नया घर (राशि) भेंट किया। आशीर्वाद स्वरूप शनि देव 'मकर' और 'कुंभ' दोनों राशियों के स्वामी बने। सूर्य देव ने वरदान दिया कि जब भी वे मकर राशि में प्रवेश करेंगे, तो जो भी उन्हें काले तिल अर्पित करेगा, उसका जीवन सुख-समृद्धि से भर जाएगा। यही कारण है कि मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव की पूजा में काले तिल का विशेष महत्व है। यह दिन क्षमा, प्रेम और पारिवारिक पुनर्मिलन का प्रतीक माना जाता है।
#मकरसंक्रांति