20/04/2026
क्या भूलूं क्या याद करूं मैं,
अगणित उन्मादों के क्षण हैं,
अगणित अवसादों के क्षण हैं,
रजनी की सूनी की घडियों को किन-किन से आबाद करूं मैं,
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं ।।
याद सुखों की आंसू लाती,
याद दुख की दिल भारी कर जाती है,
दोष किसे दूं,
जब अपने से अपने दिन बर्बाद करूं मैं,
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं ।।
दोनों करके पछताता हूं,
सोच नहीं, पर मैं पाता हूं,
सुधियों के बंधन से कैसे अपने को आजाद करूं मैं,
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं,
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं ।।