21/04/2026
🚩सनातन धर्म के सूर्य जगतगुरू आदि शंकराचार्य की जयंती की सर्व सनातनियों को शुभ मंगल कामनाएं🚩
गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु ,
गुरुर देवो महेश्वरः ,
गुरुर साक्षात परम ब्रह्म ,
तस्मै श्री गुरुवे नमः🙏
🚩🚩 जगतगुरू आदि शंकराचार्य को शत-शत नमन🚩🚩
🚩 *शंकरो शंकर: साक्षात* 🚩
शंकरं शंकराचार्य केशवं बादरायणम्।
सूत्रदेश्यकृतौ वंदे भगवंतौ पुनः पुनः ॥
- (तोटकाचार्य रचित तोटकाष्टकं)
अर्थात - श्री वेद व्यास को मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ
ब्रह्म सूत्र, जो कोई और नहीं बल्कि भगवान विष्णु हैं, और श्री
शंकराचार्य, उन सूत्रों के भाष्यकार, जो कोई और नहीं हैं
भगवान शिव के ही स्वरूप है।
आदरणीय मित्रो एवं महानुभावों , भारत मे असंख्य गुरु हुये हैं तथा समय समय पर उन्होने धर्म को स्थिर रखा एवं धर्म की पताका पुरे विश्वपटल पर फहराने का कार्य अपने ज्ञान एवं शक्ति अनुसार प्रयत्न भी किया। ऐसे ही भारत में एक महाज्ञानि एवं महा तेजस्वी गुरु हुये जो भारत के प्रथम जगतगुरु श्री आदि शंकराचार्य के नाम से प्रख्यात हैं।
इनके संन्यास ग्रहण करने के समय की कथा बड़ी ही विचित्र है। कहते हैं कि माता एकमात्र पुत्र को संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं दे रही थी। तब एक दिन नदी किनारे स्नान करते समय एक मगरमच्छ ने शंकराचार्यजी का पैर पकड़ लिया तब समय का लाभ उठाते हुए शंकराचार्यजी ने अपनी माता से कहा , माता मुझे सन्यास लेने की आज्ञा दिजिये अन्यथा , ये मगरमच्छ मेरा भक्षण कर जायेगा.., इससे भयभीत होकर माता ने शीघ्र ही इन्हें संन्यास लेने की आज्ञा प्रदान की। आश्चर्य की बात ये है कि जैसे ही माता ने आज्ञा दी वैसे ही मगरमच्छ ने शंकराचार्यजी का पैर छोड़ दिया। उन्होंने आचार्य गोविन्द भगवदपाद् जी को अपना गुरु मानकर संन्यास ग्रहण किया। जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने सनातन वैदिक हिंदू धर्म का प्रचार सम्पूर्ण विश्व में किया। उनके ज्ञान के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व ने सनातन वैदिक हिन्दू धर्मं को पुनः गहराई से जाना। शंकराचार्य जी को उनके अतुल्य योगदान के लिए "जगतगुरु" की उपाधि प्राप्त हुई और उन्होंने सनातन वैदिक हिन्दू धर्मं की जगतगुरु की परम्परा को आगे बढ़ाया । तब से आजतक आदि शंकराचार्य के नाम पर ' शंकराचार्य ' की उपाधि दी जाती है।
शंकराचार्य के विषय में कहा गया है ;
"अष्टवर्षेचतुर्वेदी, द्वादशेसर्वशास्त्रवित् षोडशेकृतवान्भाष्यम्द्वात्रिंशेमुनिरभ्यगात्"
अर्थात् आठ वर्ष की आयु में चारों वेदों में निष्णात हो गए, बारह वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत, सोलह वर्ष की आयु में शांकरभाष्य तथा बत्तीस वर्ष की आयु में शरीर त्याग दिया। आदि शंकर ने अपनी समझ एवम वेदों पर आधारित विचारों को सम्पूर्ण विश्व में फ़ैलाने का भरपूर प्रयास किया। शंकराचार्य ने विश्व को अज्ञानता से जगाने के लिए अथवा विश्व में सत्य सनातन वैदिक हिंदू धर्मं का प्रचार करने के लिए अपने आपको धर्म एवम विश्व के लिये दान कर दिया। उन्होंने हिंदुओं के सभी सम्प्रदायो एवम सभी जातियों के साथ साथ हिन्दू संस्कृति की रक्षा एवम विस्तार के लिए बहुत ही कम आयु में ही घर का त्याग करके सन्यास ले लिया था।
उनसे जुडे कुछ तथ्य एवम जानकारी इसप्रकार है ;
'शंकरो शंकर: साक्षात्'। अर्थात भगवान शंकर एवम शंकराचार्य दोनो एक ही है या कहे साक्षात है। ऐसे सनातन मान्यताएँ कहती है वो शंकर भगवान के अवतार थे। भगवान शिव द्वारा द्वारा कलियुग के प्रथम चरण में अपने चार शिष्यों के साथ जगदगुरु आचार्य शंकर के रूप में अवतार लेने का वर्णन पुराणशास्त्र में भी वर्णित हैं जो इस प्रकार हैं :-
"कल्यब्दे द्विसहस्त्रान्ते लोकानुग्रहकाम्यया।
चतुर्भि: सह शिष्यैस्तु शंकरोऽवतरिष्यति।।"
- (भविष्योत्तर पुराण - ३६ )
अर्थ :- " कलि के दो सहस्त्र वर्ष व्यतीत होने के पश्चात लोक अनुग्रह की कामना से श्री सर्वेश्वर शिव अपने चार शिष्यों के साथ अवतार धारण कर अवतरित होते हैं। "
शंकराचार्य के जन्म से संबंध में अनेक विद्वानों के अनेक मत हैं।
इससे संबंधित गोवर्धन मठ के पूज्य शंकाराचार्य श्री निश्चलानंद सरस्वती जी का मत है़ कि आदि शंकराचार्य जी का जन्म ५०७ ईसापूर्व हुआ अर्थात इस समय २०२६ ई.स. चल रहा हैं। इसमें ५०७ वर्ष और जोड़ देंगे तो आदि शंकाराचार्य जी का जन्म लगभग आज से २५३३ वर्ष पूर्व वैशाख शुक्ल पंचमी को हुआ था। इस बात की पुष्टि हेतु उनका वीडियो निम्न हैं।👇
https://www.facebook.com/govardhanpeeth/videos/447390206444557/
जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी का जन्मकाल शारदा पीठ में इस प्रकार अंकित है -
"युधिष्ठिर शके २६३१ वैशाखशुक्लापंचम्यां श्रीमच्ठछंकरावतार:।
……तदनु २६६३ कार्तिकशुक्लपूर्णिमायां ……श्रीमच्छंकरभगवत्पूज्यपादा…… निजदेहेनैव…… निजधाम प्राविशन्निति।"
अर्थात् युधिष्ठिर संवत् २६३१ में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को श्रीशंकराचार्य का जन्म हुआ और युधि. सं.२६६३ कार्तिकशुक्ल पूर्णिमा को देहत्याग हुआ। [युधिष्ठिर संवत् ३१३९ B.C. में प्रवर्तित हुआ था]
आदि शंकराचार्य जी का जन्म केरल के मालाबार क्षेत्र के कालड़ी नामक स्थान पर विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण (विश्वब्राह्मण) कुल के एक परिवार मे हुआ था। उनकी माता का नाम आर्यम्बा और पिता का नाम शिवागुरु आचार्य था। शंकाराचार्य के जन्म का नाम शंकर आचार्य था। दक्षिण भारत में सभी राज्यों के अधिकतर विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण ' आचार्य ' या आचारी , चारी आदि अपने उपनाम में प्रयोग करते है। उनकी जीवनी पर कई लेखकों के ग्रंथ प्रसिद्ध है शंकरा विजया, दिग्विजया शंकरा ,शंकरा दिग्विजया।
जगतगुरु आदि शंकराचार्य की आत्मकथा 'शंकरा विजया' में उल्लेख है कि जब वो जगतगुरु की उपाधि लेकर दक्षिण भारत पहुँचे तो वहाँ के विद्वानों ने उनसे उनकी पहचान पूँछी तो आदि शंकराचार्य जी ने इसका उत्तर अपने स्वरों द्वारा गायन के रूप मे दिया और कहा "आचार्यो शंकरानामो त्वाष्ट पुत्रो नासंसया विप्रकुले गौरोरदिक्षा विश्वकर्मन्तु ब्राह्मणा " (ग्रंथ - शंकरा विजया) अर्थात - " मेरा नाम शंकर आचार्य है और मै एक त्वस्टा (विश्वकर्मा) का पुत्र हू ,मै विप्र अर्थात ब्राह्मण कुल को पुरोहित के रुप मे सभी संस्कारो के साथ गुरु की दिक्षा देता हूँ और मै विश्वकर्मा कुल मे जन्मा एक ब्राह्मण हूँ। " जिन्हें अब के भारत में विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण / विश्व-ब्राह्मण / विश्वकर्मा वैदिक शिल्पी ब्राह्मण / अथर्ववेदीय विश्वकर्मा ब्राह्मण कहा जाता है। प्रमाण क्या कहते है इसके लिये रॉयल एशियाटिक सोसाइटी (श्रीलंका) के सिलोन शाखा के सदस्य, सिलोन द्वीप के सुप्रीम कोर्ट के प्रोक्टर अल्फ्रेड एडवर्ड रॉबर्ट्स (Alfred Edward Roberts) की लिखी पुस्तक ' Vishwakarma and his descendant ' जो १९०९ में छपी थी जिसके पृष्ठ २८ (नया संस्करण) में आदि शंकराचार्य के विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण त्वष्टा कुल के होने की पुष्टि की है।
जगद्गुरु शंकराचार्य के अनुसार-
"ब्राह्मण वही है जो "पुंस्त्व" से युक्त है , जो "मुमुक्षु" है, जिसका मुख्य ध्येय वैदिक विचारों का संवर्धन हो , जो सरल हो , जो नीतिवान हो, वेदों पर प्रेम रखता हो, जो तेजस्वी हो, ज्ञानी - विज्ञानी हो , जिसका मुख्य कर्म वेदो का अध्ययन और अध्यापन हो , वेदों/उपनिषदों/दर्शन शास्त्रों का संवर्धन करने वाला ही ब्राह्मण है। " (सन्दर्भ ग्रन्थ - आदि शंकराचार्य रचित विवेक चूडामणि, सर्व वेदांत सिद्धांत सार संग्रह, आत्मा - अनात्मा विवेक)।
आदि शंकराचार्य ने सभी सम्प्रदायों को इकट्ठा करके 'दशनामी संप्रदाय' बनाया और साधु समाज की अनादिकाल से चली आ रही धारा को पुनर्जीवित कर चार धाम की चार पीठ का गठन किया। जिसपर चार शंकराचार्यों की परम्परा की शुरुआत हुई। उन्होने सनातन हिंदू धर्म कि रक्षा के लिये सभी सनातनीयो को शास्त्रो के साथ साथ शस्त्र को भी धारण करने का आवाहन किया और इसके लिये उन्होने अखाडो की परम्परा शुरू की तथा इसके माध्यम से साधुओ को धर्म की रक्षा के लिये शास्त्र एवम शस्त्र दोनो धारण करवाये। ऐसे साधुओं कि परम्परा शुरू कि जो शास्त्र के साथ साथ शस्त्र विद्या मे भी पारंगत हुये जो ' नागा ' साधुओं के नाम से प्रचलित हुये। नागा साधुओं ने धर्म की रक्षा के लिये विभिन्न कालखंडों मे अपनी आहुतियों से इतिहास लिखा और वर्तमान मे इस परम्परा को जीवित रखने का संघर्ष कर रहे है। जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने सम्पूर्ण भारतवर्ष में फैले शक्तिपीठों का पुनरोद्धार किया एवम ही सदियो से चली आ रही कुम्भ मेले की परम्परा का जीर्णोद्धार किया ऐसी मान्यता है़। आदि शंकराचार्य जी ने उस समय सत्य सनातन वैदिक हिंदू धर्म का पुनरोद्धार एवम जीवित किया जिस समय बौद्ध धर्म अपनी चरमसिमा पर था और नास्तिकवाद पुरे भारतवर्ष अर्थात आर्याव्रत मे अपनी जडे फैला चुका था। उन्होने बौद्धों एवं अन्य मतांतर पंथों से शास्त्रार्थ कर उनको पराजित करके पुन: सनातन हिंदू धर्म मे लाया। इसप्रकार जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी ने सनातन हिंदू धर्म के डुबते हुये सुर्य को अस्त होने से बचाया इसलिये उनको सनातन वैदिक हिंदू धर्म का सूर्य भी कहा जाता है।
मात्र बत्तीस वर्ष की उम्र में वे निर्वाण (समाधी) प्राप्त कर ब्रह्मलोक चले गए। इस छोटी-सी आयु में ही उन्होंने भारतवर्ष का भ्रमण कर सभी को शास्त्रार्थ मे पराजित कर वेदों पर आधारित अद्वैतवाद सिद्धांत का प्रचार किया। आदि शंकराचार्य के दो वेदांत कथन प्रसिद्ध हुये। प्रथम कथन - " अहम ब्रह्मास्मि, तत्वम असि " अर्थात - मै अर्थात मुझमें भी ब्रह्म है और तुममे भी वही ब्रह्म है या कहे सभी जीवों में ही ब्रह्म अर्थात ईश्वर या ब्राह्मण अर्थात ज्ञान का वास है और इसे खुद ही ढूंढो और पहचानो। इससे यह सिद्ध होता है की हममें ही सब कुछ है । द्वितीय कथन - " ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या " अर्थात ब्रह्म या आत्मा या ईश्वर ही सत्य है और सम्पूर्ण भौतिक जगत एक मिथ्या अर्थात छलावा के समान है। जब वो काशी पहुँचे तब उनका सामना उस समय के आर्याव्रत के सबसे बड़े वैदिक विद्वान मंडल मिश्र से हुआ। उनको एवम उनकी धर्म पत्नी महाज्ञानी भारती देवी को भी शास्त्रार्थ मे पराजित किया। हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोने के लिए चार मठों ही स्थापना की और शास्त्रार्थ मे पराजित उनके शिष्यता स्वीकार कर चुके मंडल मिश्र को दक्षिण भारत के श्रृंगेरी शारदापीठ का प्रथम शंकराचार्य नियुक्त किया और वो श्री सुरेश्वराचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुये। उनके चारों शिष्य चारों वर्णों से थे ऐसी मान्यता है । चार मठ के शंकराचार्य ही सनातन हिंदुओं के केंद्रिय आचार्य माने जाते हैं ये वेदों शास्त्रों के प्रकाण्ड एवम सर्वोच्च विद्वान माने जाते है। इन्हीं के अधिन अन्य कई मठ हैं। चार प्रमुख मठ निम्न हैं:-
१. वेदान्त ज्ञानमठ, श्रृंगेरी (दक्षिण भारत)।
वेद - यजुर्वेद , महावाक्य - 'अहं ब्रह्मास्मि'
संन्यासी पहचान पद - सरस्वती, भारती तथा पुरी
२. गोवर्धन मठ, जगन्नाथपुरी (पूर्वी भारत)
वेद - ऋग्वेद, महावाक्य - 'प्रज्ञानं ब्रह्म'
संन्यासी पहचान पद - आरण्य
३. शारदा (कालिका) मठ, द्वारका (पश्चिम भारत)
वेद - सामवेद , महावाक्य - 'तत्त्वमसि'
संन्यासी पहचान पद - 'तीर्थ' और 'आश्रम'
४. ज्योतिर्मठ, बद्रिकाश्रम (उत्तर भारत)
वेद - अथर्ववेद , महावाक्य - 'अयमात्मा ब्रह्म'
संन्यासी पहचान पद - 'गिरि', 'पर्वत' एवं ‘सागर’
शंकराचार्य के चार शिष्य : -
१.मंडन मिश्र(सुरेश्वराचार्य) - वेदान्त ज्ञानमठ, श्रृंगेरी (दक्षिण भारत)
२. पद्मपाद (सनन्दन) - गोवर्धन मठ, जगन्नाथपुरी (पूर्वी भारत)
३. हस्तामलक (पृथ्वीधर) - शारदा (कालिका) मठ, द्वारका (पश्चिम भारत)
४. तोटक (तोटकाचार्य)। - ज्योतिर्पीठ, बद्रिकाश्रम (उत्तर भारत)
कुछ विद्वानो की ये मान्यता है़ कि उनके ये शिष्य चारों वर्णों से थे और कुछ की मान्यता है़ चारों परंपरा से ब्राह्मण कुल से थे।
श्रृंगेरी पीठ के जगदगुरु के लघु संदेश:
श्रृंगेरी जगदगुरु पर आदि शंकरा की विनम्रता जब भगवान वेद व्यास भेष में आते हैं।
कौन गुरु कह सकता है? इन दिनों, कई लोग खुद को गुरु कहते हैं गुरुओं की तुलना शिशुओं की तुलना में अधिक हो सकती है!
हालांकि, श्री आदि शंकराचार्य कहते हैं:
"को गुरुः? अधिग्रहिततात्व: अनुयायी होना"
अर्थात केवल उनको गुरु कहा जा सकता है जो शास्त्रों में प्रकट हुए तत्त्व को प्राप्त कर लिया है, एक शिष्य के संदेह को स्पष्ट करने में सक्षम है और शिष्य के उत्थान करने का इरादा है। श्री आदी शंकराचार्य के ज्ञान और करुणा स्वयं, असीम हैं। यहां तक कि अगर आज हम आचार्य के भाषणों का अध्ययन करते हैं, तो सीखने के लिए नए पहलू होते हैं। उन्होंने 16 साल की उम्र में इन भाषणों को लिखना पूरा कर लिया। उन्होंने भगवान वेद व्यास के साथ एक बहस की थी जो एक बुजुर्ग ब्राह्मण की आड़ में आचार्य के पास आए थे।
ब्राह्मण ने आचार्य से कहा, "मैंने सुना है कि आपने ब्रह्मसूत्रों पर एक भाष्य लिखा है, क्या आप एक प्रश्न का उत्तर देंगे और सूत्र की व्याख्या करेंगे?" आचार्य ने उत्तर दिया:
"सूत्रधारित कन्धिरस्ति नो मेरु सुत्रर्थविद्भ्योस्तु नमो गुरुभ्यः, यद्यपि यतिप्राचिस तदबवीमी।"
ऐसे कई लोग हैं जो भगवान वेद व्यास के ब्रह्म सूत्रों का अर्थ जानते हैं, और मैं उन सभी को प्रणाम करता हूं। इसलिए, मैं वेद व्यास के सूत्रों के अर्थ को जानने के लिए एकमात्र व्यक्ति होने का दावा नहीं करता हूं। फिर भी मैं जो कुछ भी आपका सवाल है, उसका जवाब दूँगा।
श्री भागवतपादा (आदि शंकराचार्य) द्वारा इस तरह की नम्रता का प्रदर्शन किया गया था। ब्रह्मा ने ब्रह्मा सूत्रों के तीसरे अध्याय से एक प्रश्न पूछा और बहस सात दिन तक खत्म हो गई। यह आचार्य के शिष्य पद्मपादा थे जिन्होंने महसूस किया कि बुजुर्ग ब्राह्मण भगवान वेद व्यास स्वयं थे:
"शंकरो शंकर: साक्षात् व्यास नारायणो हरिः
तयोर्विविडे संप्राप्त किकरः को करीम्यहम्"
श्री आदी शंकर खुद भगवान शंकर हैं जबकि वेद व्यास श्रीमान नारायण खुद हैं। अगर ये दोनों एक बहस में लगे हैं तो क्या किया जा सकता है?
भगवान वेद व्यास ने स्वयं को ब्रह्मा सूत्रों पर अपनी टिप्पणी के लिए आचार्य की प्रशंसा की और कहा;
गोविन्दशिष्य कथं सुधारितम्
गोविन्द भगवतपादा की शिक्षा का अर्थ गलत कैसे हो सकता है? "
इस प्रकार, श्री आदि शंकराचार्य स्वयं ही गुरु की पहली विशेषता के लिए अनुकरणीय थे - अधिग्रहिततत्व: - जिसने तत्त्व प्राप्त किया है
कॉपीराइट: दक्षिणमैन्या श्री शारदा पीठम, श्रृंगेरी
वीडियो: https://youtu.be/yhWNxDvBZJQ
स्रोत: http://vijayayatra.sringeri.net/archiveyatra/ongole- नवम्बर-9-10-2012/
आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रणेता, धर्म के उद्धारक , पंचायतन पूजा के प्रवर्तक है। विचारोपदेश आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं जिसके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है।
शंकराचार्य ने निम्नलिखित ग्रंथों पर भाष्य लिखा है-
ब्रह्मसूत्र , ऐतरेयउपनिषद , वृहदारण्यक उपनिषद, ईश उपनिषद (शुक्ल यजुर्वेद), तैत्तरीय उपनिषद (कृष्ण यजुर्वेद), श्वेताश्वतर उपनिषद (कृष्ण यजुर्वेद) , कठोपनिषद (कृष्ण यजुर्वेद) , केनोपनिषद (सामवेद), छान्दोग्य उपनिषद (सामवेद) , माण्डूक्य उपनिषद तथा गौडपादकारिका , मुन्डक उपनिषद (अथर्ववेद) प्रश्नोपनिषद (अथर्ववेद) , भागवद्गीता (महाभारत), विष्णु सहस्रनाम (महाभारत), सानत्सुजातिय (महाभारत) गायत्री मंत्र आदि।
प्रकरण ग्रन्थ-
विवेकचूडामणि , उपदेशसाहस्री , शतश्लोकी आदि।
स्तोत्र ग्रंथ - आदि शंकराचार्य ने शिव, विष्णु, देवी, गणेश एवं सुब्रमण्य की स्तुति के लिए बहुत सी रचनाएँ कीं।
इन सभी ग्रंथों का निर्माण कर वैदिक धर्म एवं दर्शन को पुन: प्रतिष्ठित करने के लिए अनेक श्रमण, बौद्ध तथा हिंदू विद्वानों से शास्त्रार्थ कर उन्हें पराजित किया।
" जगतगुरु आदि शंकराचार्य द्वारा विश्व को दिए गए ज्ञान के लिए शत शत नमन.. 🚩🙏
🚩ॐ शंकराय नमः 🚩🙏
- पं.संतोष आचार्य
अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा - संपूर्ण भारत