अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा - संपूर्ण भारत

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स्व.निशा विश्वकर्मा के आत्मा की शांति हेतु एवं दोषियों को कठोर दंड दिलाने हेतु "विश्वकर्मा गायत्री यज्ञ " आयोजन एवं सामू...
30/04/2026

स्व.निशा विश्वकर्मा के आत्मा की शांति हेतु एवं दोषियों को कठोर दंड दिलाने हेतु "विश्वकर्मा गायत्री यज्ञ " आयोजन एवं सामूहिक गायत्री जाप डिजिटल माध्यम से संपूर्ण भारतवर्ष के जनमानस द्वारा।
स्थान - नालासोपारा, पालघर, मुंबई
समय - सुबह - 9 बजे से
दिनांक - 1 मई 2026
Fri, May 1

ज्यादा से ज्यादा संख्या में जुड़कर यज्ञ को सफल बनाइये एवं गायत्री जाप करके हमारा साथ दीजिये।

*यज्ञ में सहभागीता हेतु लिंक* 👇

https://calendar.app.google/LKJBYuuY9giHdTzTA

आयोजक -
*अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा®️ (संपूर्ण भारत)*

🚩भगवान नृसिंह प्रकट दिवस की सर्व सनातनियों को हार्दिक शुभ मंगलकामनाएं 🚩ॐ उग्र नृसिंहाय विद्महे, वज्र-नखाय धीमहि। तन्नो न...
30/04/2026

🚩भगवान नृसिंह प्रकट दिवस की सर्व सनातनियों को हार्दिक शुभ मंगलकामनाएं 🚩

ॐ उग्र नृसिंहाय विद्महे, वज्र-नखाय धीमहि।
तन्नो नृसिंह: प्रचोदयात्।

ध्याये न्नृसिंहं तरुणार्कनेत्रं सिताम्बुजातं ज्वलिताग्रिवक्त्रम्।
अनादिमध्यान्तमजं पुराणं परात्परेशं जगतां निधानम्।।

भगवान नृसिंह भगवान विष्णु के अवतार स्वरूप हैं। विष्णु उन निर्गुण निराकार परमात्मा के रूप हैं। यद्यपि , सर्वजगत उसी परमात्मा के ही अंश हैं विष्णु के सभी अवतार भी उन्हीं का ही स्वरूप हैं। पद्मपुराण में भगवान नृसिंह और भक्त प्रहलाद के साथ संवाद में भगवान नृसिंह अपने को उस निर्गुण निराकार परमात्मा विश्वकर्मा का ही साक्षात स्वरूप बता रहें हैं ;

*विश्वकर्मा ह्यहं साक्षात्परमात्मा परात्परः।*
*उदरेऽहं न वत्स्यामि यतोऽहं वै सनातनः॥*
(पद्मपुराण/खण्ड - ६ (उत्तरखण्डः)/अध्याय - १७४,श्लोक - ३६) (भगवान नृसिंह और भक्त प्रहलाद संवाद)
अर्थात - मैं विश्वकर्मा हूँ साक्षात परमात्मा अर्थात सर्वोच्च आत्मा हूँ , पारलौकिक सर्वोच्च हूँ। मैं गर्भ में नहीं निवास करूंगा क्योंकि मैं सनातन,शाश्वत हूँ अर्थात मैं ही आदि, मध्य और अंत हूँ।
🚩ॐ विश्वकर्मा परब्रह्मणे नमः🚩
ॐ नमो भगवते तुभ्य पुरुषाय महात्मने हरिंऽद्भुत सिंहाय ब्रह्मणे परमात्मने।
🚩नृम नृम नृम नर सिंहाय नमः🚩

- पं.संतोष आचार्य
अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा - संपूर्ण भारत

हमारी संस्था ने आधिकारिक रूप से निशा विश्वकर्मा प्रकरण पर संज्ञान लेते हुए पत्र (ईमेल) संस्था के आधिकारिक आईडी से मुख्यम...
24/04/2026

हमारी संस्था ने आधिकारिक रूप से निशा विश्वकर्मा प्रकरण पर संज्ञान लेते हुए पत्र (ईमेल) संस्था के आधिकारिक आईडी से मुख्यमंत्री जी एवं गृह मंत्रालय, मुख्यमंत्री कार्यालय के साथ-साथ जिलाधिकारी जिला गाजीपुर को भेज दिया है।
पीड़िता के परिवार को न्याय अवश्य मिलना चाहिए।

पं. संतोष आचार्य (संस्थापक अध्यक्ष)
अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा®️ संपूर्ण भारत

🚩सनातन धर्म के सूर्य जगतगुरू आदि शंकराचार्य की जयंती की सर्व सनातनियों को शुभ मंगल कामनाएं🚩गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु ,ग...
21/04/2026

🚩सनातन धर्म के सूर्य जगतगुरू आदि शंकराचार्य की जयंती की सर्व सनातनियों को शुभ मंगल कामनाएं🚩

गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु ,
गुरुर देवो महेश्वरः ,
गुरुर साक्षात परम ब्रह्म ,
तस्मै श्री गुरुवे नमः🙏

🚩🚩 जगतगुरू आदि शंकराचार्य को शत-शत नमन🚩🚩

🚩 *शंकरो शंकर: साक्षात* 🚩
शंकरं शंकराचार्य केशवं बादरायणम्।
सूत्रदेश्यकृतौ वंदे भगवंतौ पुनः पुनः ॥
- (तोटकाचार्य रचित तोटकाष्टकं)
अर्थात - श्री वेद व्यास को मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ
ब्रह्म सूत्र, जो कोई और नहीं बल्कि भगवान विष्णु हैं, और श्री
शंकराचार्य, उन सूत्रों के भाष्यकार, जो कोई और नहीं हैं
भगवान शिव के ही स्वरूप है।

आदरणीय मित्रो एवं महानुभावों , भारत मे असंख्य गुरु हुये हैं तथा समय समय पर उन्होने धर्म को स्थिर रखा एवं धर्म की पताका पुरे विश्वपटल पर फहराने का कार्य अपने ज्ञान एवं शक्ति अनुसार प्रयत्न भी किया। ऐसे ही भारत में एक महाज्ञानि एवं महा तेजस्वी गुरु हुये जो भारत के प्रथम जगतगुरु श्री आदि शंकराचार्य के नाम से प्रख्यात हैं।
इनके संन्यास ग्रहण करने के समय की कथा बड़ी ही विचित्र है। कहते हैं कि माता एकमात्र पुत्र को संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं दे रही थी। तब एक दिन नदी किनारे स्नान करते समय एक मगरमच्छ ने शंकराचार्यजी का पैर पकड़ लिया तब समय का लाभ उठाते हुए शंकराचार्यजी ने अपनी माता से कहा , माता मुझे सन्यास लेने की आज्ञा दिजिये अन्यथा , ये मगरमच्छ मेरा भक्षण कर जायेगा.., इससे भयभीत होकर माता ने शीघ्र ही इन्हें संन्यास लेने की आज्ञा प्रदान की। आश्चर्य की बात ये है कि जैसे ही माता ने आज्ञा दी वैसे ही मगरमच्छ ने शंकराचार्यजी का पैर छोड़ दिया। उन्होंने आचार्य गोविन्द भगवदपाद् जी को अपना गुरु मानकर संन्यास ग्रहण किया। जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने सनातन वैदिक हिंदू धर्म का प्रचार सम्पूर्ण विश्व में किया। उनके ज्ञान के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व ने सनातन वैदिक हिन्दू धर्मं को पुनः गहराई से जाना। शंकराचार्य जी को उनके अतुल्य योगदान के लिए "जगतगुरु" की उपाधि प्राप्त हुई और उन्होंने सनातन वैदिक हिन्दू धर्मं की जगतगुरु की परम्परा को आगे बढ़ाया । तब से आजतक आदि शंकराचार्य के नाम पर ' शंकराचार्य ' की उपाधि दी जाती है।
शंकराचार्य के विषय में कहा गया है ;
"अष्टवर्षेचतुर्वेदी, द्वादशेसर्वशास्त्रवित् षोडशेकृतवान्भाष्यम्द्वात्रिंशेमुनिरभ्यगात्"
अर्थात् आठ वर्ष की आयु में चारों वेदों में निष्णात हो गए, बारह वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत, सोलह वर्ष की आयु में शांकरभाष्य तथा बत्तीस वर्ष की आयु में शरीर त्याग दिया। आदि शंकर ने अपनी समझ एवम वेदों पर आधारित विचारों को सम्पूर्ण विश्व में फ़ैलाने का भरपूर प्रयास किया। शंकराचार्य ने विश्व को अज्ञानता से जगाने के लिए अथवा विश्व में सत्य सनातन वैदिक हिंदू धर्मं का प्रचार करने के लिए अपने आपको धर्म एवम विश्व के लिये दान कर दिया। उन्होंने हिंदुओं के सभी सम्प्रदायो एवम सभी जातियों के साथ साथ हिन्दू संस्कृति की रक्षा एवम विस्तार के लिए बहुत ही कम आयु में ही घर का त्याग करके सन्यास ले लिया था।
उनसे जुडे कुछ तथ्य एवम जानकारी इसप्रकार है ;
'शंकरो शंकर: साक्षात्'। अर्थात भगवान शंकर एवम शंकराचार्य दोनो एक ही है या कहे साक्षात है। ऐसे सनातन मान्यताएँ कहती है वो शंकर भगवान के अवतार थे। भगवान शिव द्वारा द्वारा कलियुग के प्रथम चरण में अपने चार शिष्यों के साथ जगदगुरु आचार्य शंकर के रूप में अवतार लेने का वर्णन पुराणशास्त्र में भी वर्णित हैं जो इस प्रकार हैं :-
"कल्यब्दे द्विसहस्त्रान्ते लोकानुग्रहकाम्यया।
चतुर्भि: सह शिष्यैस्तु शंकरोऽवतरिष्यति।।"
- (भविष्योत्तर पुराण - ३६ )
अर्थ :- " कलि के दो सहस्त्र वर्ष व्यतीत होने के पश्चात लोक अनुग्रह की कामना से श्री सर्वेश्वर शिव अपने चार शिष्यों के साथ अवतार धारण कर अवतरित होते हैं। "
शंकराचार्य के जन्म से संबंध में अनेक विद्वानों के अनेक मत हैं।
इससे संबंधित गोवर्धन मठ के पूज्य शंकाराचार्य श्री निश्चलानंद सरस्वती जी का मत है़ कि आदि शंकराचार्य जी का जन्म ५०७ ईसापूर्व हुआ अर्थात इस समय २०२६ ई.स. चल रहा हैं। इसमें ५०७ वर्ष और जोड़ देंगे तो आदि शंकाराचार्य जी का जन्म लगभग आज से २५३३ वर्ष पूर्व वैशाख शुक्ल पंचमी को हुआ था। इस बात की पुष्टि हेतु उनका वीडियो निम्न हैं।👇

https://www.facebook.com/govardhanpeeth/videos/447390206444557/

जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी का जन्मकाल शारदा पीठ में इस प्रकार अंकित है -
"युधिष्ठिर शके २६३१ वैशाखशुक्लापंचम्यां श्रीमच्ठछंकरावतार:।
……तदनु २६६३ कार्तिकशुक्लपूर्णिमायां ……श्रीमच्छंकरभगवत्पूज्यपादा…… निजदेहेनैव…… निजधाम प्राविशन्निति।"
अर्थात् युधिष्ठिर संवत् २६३१ में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को श्रीशंकराचार्य का जन्म हुआ और युधि. सं.२६६३ कार्तिकशुक्ल पूर्णिमा को देहत्याग हुआ। [युधिष्ठिर संवत् ३१३९ B.C. में प्रवर्तित हुआ था]
आदि शंकराचार्य जी का जन्म केरल के मालाबार क्षेत्र के कालड़ी नामक स्थान पर विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण (विश्वब्राह्मण) कुल के एक परिवार मे हुआ था। उनकी माता का नाम आर्यम्बा और पिता का नाम शिवागुरु आचार्य था। शंकाराचार्य के जन्म का नाम शंकर आचार्य था। दक्षिण भारत में सभी राज्यों के अधिकतर विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण ' आचार्य ' या आचारी , चारी आदि अपने उपनाम में प्रयोग करते है। उनकी जीवनी पर कई लेखकों के ग्रंथ प्रसिद्ध है शंकरा विजया, दिग्विजया शंकरा ,शंकरा दिग्विजया।
जगतगुरु आदि शंकराचार्य की आत्मकथा 'शंकरा विजया' में उल्लेख है कि जब वो जगतगुरु की उपाधि लेकर दक्षिण भारत पहुँचे तो वहाँ के विद्वानों ने उनसे उनकी पहचान पूँछी तो आदि शंकराचार्य जी ने इसका उत्तर अपने स्वरों द्वारा गायन के रूप मे दिया और कहा "आचार्यो शंकरानामो त्वाष्ट पुत्रो नासंसया विप्रकुले गौरोरदिक्षा विश्वकर्मन्तु ब्राह्मणा " (ग्रंथ - शंकरा विजया) अर्थात - " मेरा नाम शंकर आचार्य है और मै एक त्वस्टा (विश्वकर्मा) का पुत्र हू ,मै विप्र अर्थात ब्राह्मण कुल को पुरोहित के रुप मे सभी संस्कारो के साथ गुरु की दिक्षा देता हूँ और मै विश्वकर्मा कुल मे जन्मा एक ब्राह्मण हूँ। " जिन्हें अब के भारत में विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण / विश्व-ब्राह्मण / विश्वकर्मा वैदिक शिल्पी ब्राह्मण / अथर्ववेदीय विश्वकर्मा ब्राह्मण कहा जाता है। प्रमाण क्या कहते है इसके लिये रॉयल एशियाटिक सोसाइटी (श्रीलंका) के सिलोन शाखा के सदस्य, सिलोन द्वीप के सुप्रीम कोर्ट के प्रोक्टर अल्फ्रेड एडवर्ड रॉबर्ट्स (Alfred Edward Roberts) की लिखी पुस्तक ' Vishwakarma and his descendant ' जो १९०९ में छपी थी जिसके पृष्ठ २८ (नया संस्करण) में आदि शंकराचार्य के विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण त्वष्टा कुल के होने की पुष्टि की है।

जगद्गुरु शंकराचार्य के अनुसार-
"ब्राह्मण वही है जो "पुंस्त्व" से युक्त है , जो "मुमुक्षु" है, जिसका मुख्य ध्येय वैदिक विचारों का संवर्धन हो , जो सरल हो , जो नीतिवान हो, वेदों पर प्रेम रखता हो, जो तेजस्वी हो, ज्ञानी - विज्ञानी हो , जिसका मुख्य कर्म वेदो का अध्ययन और अध्यापन हो , वेदों/उपनिषदों/दर्शन शास्त्रों का संवर्धन करने वाला ही ब्राह्मण है। " (सन्दर्भ ग्रन्थ - आदि शंकराचार्य रचित विवेक चूडामणि, सर्व वेदांत सिद्धांत सार संग्रह, आत्मा - अनात्मा विवेक)।
आदि शंकराचार्य ने सभी सम्प्रदायों को इकट्ठा करके 'दशनामी संप्रदाय' बनाया और साधु समाज की अनादिकाल से चली आ रही धारा को पुनर्जीवित कर चार धाम की चार पीठ का गठन किया। जिसपर चार शंकराचार्यों की परम्परा की शुरुआत हुई। उन्होने सनातन हिंदू धर्म कि रक्षा के लिये सभी सनातनीयो को शास्त्रो के साथ साथ शस्त्र को भी धारण करने का आवाहन किया और इसके लिये उन्होने अखाडो की परम्परा शुरू की तथा इसके माध्यम से साधुओ को धर्म की रक्षा के लिये शास्त्र एवम शस्त्र दोनो धारण करवाये। ऐसे साधुओं कि परम्परा शुरू कि जो शास्त्र के साथ साथ शस्त्र विद्या मे भी पारंगत हुये जो ' नागा ' साधुओं के नाम से प्रचलित हुये। नागा साधुओं ने धर्म की रक्षा के लिये विभिन्न कालखंडों मे अपनी आहुतियों से इतिहास लिखा और वर्तमान मे इस परम्परा को जीवित रखने का संघर्ष कर रहे है। जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने सम्पूर्ण भारतवर्ष में फैले शक्तिपीठों का पुनरोद्धार किया एवम ही सदियो से चली आ रही कुम्भ मेले की परम्परा का जीर्णोद्धार किया ऐसी मान्यता है़। आदि शंकराचार्य जी ने उस समय सत्य सनातन वैदिक हिंदू धर्म का पुनरोद्धार एवम जीवित किया जिस समय बौद्ध धर्म अपनी चरमसिमा पर था और नास्तिकवाद पुरे भारतवर्ष अर्थात आर्याव्रत मे अपनी जडे फैला चुका था। उन्होने बौद्धों एवं अन्य मतांतर पंथों से शास्त्रार्थ कर उनको पराजित करके पुन: सनातन हिंदू धर्म मे लाया। इसप्रकार जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी ने सनातन हिंदू धर्म के डुबते हुये सुर्य को अस्त होने से बचाया इसलिये उनको सनातन वैदिक हिंदू धर्म का सूर्य भी कहा जाता है।
मात्र बत्तीस वर्ष की उम्र में वे निर्वाण (समाधी) प्राप्त कर ब्रह्मलोक चले गए। इस छोटी-सी आयु में ही उन्होंने भारतवर्ष का भ्रमण कर सभी को शास्त्रार्थ मे पराजित कर वेदों पर आधारित अद्वैतवाद सिद्धांत का प्रचार किया। आदि शंकराचार्य के दो वेदांत कथन प्रसिद्ध हुये। प्रथम कथन - " अहम ब्रह्मास्मि, तत्वम असि " अर्थात - मै अर्थात मुझमें भी ब्रह्म है और तुममे भी वही ब्रह्म है या कहे सभी जीवों में ही ब्रह्म अर्थात ईश्वर या ब्राह्मण अर्थात ज्ञान का वास है और इसे खुद ही ढूंढो और पहचानो। इससे यह सिद्ध होता है की हममें ही सब कुछ है । द्वितीय कथन - " ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या " अर्थात ब्रह्म या आत्मा या ईश्वर ही सत्य है और सम्पूर्ण भौतिक जगत एक मिथ्या अर्थात छलावा के समान है। जब वो काशी पहुँचे तब उनका सामना उस समय के आर्याव्रत के सबसे बड़े वैदिक विद्वान मंडल मिश्र से हुआ। उनको एवम उनकी धर्म पत्नी महाज्ञानी भारती देवी को भी शास्त्रार्थ मे पराजित किया। हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोने के लिए चार मठों ही स्थापना की और शास्त्रार्थ मे पराजित उनके शिष्यता स्वीकार कर चुके मंडल मिश्र को दक्षिण भारत के श्रृंगेरी शारदापीठ का प्रथम शंकराचार्य नियुक्त किया और वो श्री सुरेश्वराचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुये। उनके चारों शिष्य चारों वर्णों से थे ऐसी मान्यता है । चार मठ के शंकराचार्य ही सनातन हिंदुओं के केंद्रिय आचार्य माने जाते हैं ये वेदों शास्त्रों के प्रकाण्ड एवम सर्वोच्च विद्वान माने जाते है। इन्हीं के अधिन अन्य कई मठ हैं। चार प्रमुख मठ निम्न हैं:-
१. वेदान्त ज्ञानमठ, श्रृंगेरी (दक्षिण भारत)।
वेद - यजुर्वेद , महावाक्य - 'अहं ब्रह्मास्मि'
संन्यासी पहचान पद - सरस्वती, भारती तथा पुरी
२. गोवर्धन मठ, जगन्नाथपुरी (पूर्वी भारत)
वेद - ऋग्वेद, महावाक्य - 'प्रज्ञानं ब्रह्म'
संन्यासी पहचान पद - आरण्य
३. शारदा (कालिका) मठ, द्वारका (पश्चिम भारत)
वेद - सामवेद , महावाक्य - 'तत्त्वमसि'
संन्यासी पहचान पद - 'तीर्थ' और 'आश्रम'
४. ज्योतिर्मठ, बद्रिकाश्रम (उत्तर भारत)
वेद - अथर्ववेद , महावाक्य - 'अयमात्मा ब्रह्म'
संन्यासी पहचान पद - 'गिरि', 'पर्वत' एवं ‘सागर’

शंकराचार्य के चार शिष्य : -
१.मंडन मिश्र(सुरेश्वराचार्य) - वेदान्त ज्ञानमठ, श्रृंगेरी (दक्षिण भारत)
२. पद्मपाद (सनन्दन) - गोवर्धन मठ, जगन्नाथपुरी (पूर्वी भारत)
३. हस्तामलक (पृथ्वीधर) - शारदा (कालिका) मठ, द्वारका (पश्चिम भारत)
४. तोटक (तोटकाचार्य)। - ज्योतिर्पीठ, बद्रिकाश्रम (उत्तर भारत)
कुछ विद्वानो की ये मान्यता है़ कि उनके ये शिष्य चारों वर्णों से थे और कुछ की मान्यता है़ चारों परंपरा से ब्राह्मण कुल से थे।

श्रृंगेरी पीठ के जगदगुरु के लघु संदेश:
श्रृंगेरी जगदगुरु पर आदि शंकरा की विनम्रता जब भगवान वेद व्यास भेष में आते हैं।
कौन गुरु कह सकता है? इन दिनों, कई लोग खुद को गुरु कहते हैं गुरुओं की तुलना शिशुओं की तुलना में अधिक हो सकती है!
हालांकि, श्री आदि शंकराचार्य कहते हैं:
"को गुरुः? अधिग्रहिततात्व: अनुयायी होना"
अर्थात केवल उनको गुरु कहा जा सकता है जो शास्त्रों में प्रकट हुए तत्त्व को प्राप्त कर लिया है, एक शिष्य के संदेह को स्पष्ट करने में सक्षम है और शिष्य के उत्थान करने का इरादा है। श्री आदी शंकराचार्य के ज्ञान और करुणा स्वयं, असीम हैं। यहां तक ​​कि अगर आज हम आचार्य के भाषणों का अध्ययन करते हैं, तो सीखने के लिए नए पहलू होते हैं। उन्होंने 16 साल की उम्र में इन भाषणों को लिखना पूरा कर लिया। उन्होंने भगवान वेद व्यास के साथ एक बहस की थी जो एक बुजुर्ग ब्राह्मण की आड़ में आचार्य के पास आए थे।

ब्राह्मण ने आचार्य से कहा, "मैंने सुना है कि आपने ब्रह्मसूत्रों पर एक भाष्य लिखा है, क्या आप एक प्रश्न का उत्तर देंगे और सूत्र की व्याख्या करेंगे?" आचार्य ने उत्तर दिया:
"सूत्रधारित कन्धिरस्ति नो मेरु सुत्रर्थविद्भ्योस्तु नमो गुरुभ्यः, यद्यपि यतिप्राचिस तदबवीमी।"
ऐसे कई लोग हैं जो भगवान वेद व्यास के ब्रह्म सूत्रों का अर्थ जानते हैं, और मैं उन सभी को प्रणाम करता हूं। इसलिए, मैं वेद व्यास के सूत्रों के अर्थ को जानने के लिए एकमात्र व्यक्ति होने का दावा नहीं करता हूं। फिर भी मैं जो कुछ भी आपका सवाल है, उसका जवाब दूँगा।

श्री भागवतपादा (आदि शंकराचार्य) द्वारा इस तरह की नम्रता का प्रदर्शन किया गया था। ब्रह्मा ने ब्रह्मा सूत्रों के तीसरे अध्याय से एक प्रश्न पूछा और बहस सात दिन तक खत्म हो गई। यह आचार्य के शिष्य पद्मपादा थे जिन्होंने महसूस किया कि बुजुर्ग ब्राह्मण भगवान वेद व्यास स्वयं थे:

"शंकरो शंकर: साक्षात् व्यास नारायणो हरिः
तयोर्विविडे संप्राप्त किकरः को करीम्यहम्"
श्री आदी शंकर खुद भगवान शंकर हैं जबकि वेद व्यास श्रीमान नारायण खुद हैं। अगर ये दोनों एक बहस में लगे हैं तो क्या किया जा सकता है?

भगवान वेद व्यास ने स्वयं को ब्रह्मा सूत्रों पर अपनी टिप्पणी के लिए आचार्य की प्रशंसा की और कहा;
गोविन्दशिष्य कथं सुधारितम्
गोविन्द भगवतपादा की शिक्षा का अर्थ गलत कैसे हो सकता है? "
इस प्रकार, श्री आदि शंकराचार्य स्वयं ही गुरु की पहली विशेषता के लिए अनुकरणीय थे - अधिग्रहिततत्व: - जिसने तत्त्व प्राप्त किया है
कॉपीराइट: दक्षिणमैन्या श्री शारदा पीठम, श्रृंगेरी
वीडियो: https://youtu.be/yhWNxDvBZJQ
स्रोत: http://vijayayatra.sringeri.net/archiveyatra/ongole- नवम्बर-9-10-2012/

आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रणेता, धर्म के उद्धारक , पंचायतन पूजा के प्रवर्तक है। विचारोपदेश आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं जिसके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है।
शंकराचार्य ने निम्नलिखित ग्रंथों पर भाष्य लिखा है-
ब्रह्मसूत्र , ऐतरेयउपनिषद , वृहदारण्यक उपनिषद, ईश उपनिषद (शुक्ल यजुर्वेद), तैत्तरीय उपनिषद (कृष्ण यजुर्वेद), श्वेताश्वतर उपनिषद (कृष्ण यजुर्वेद) , कठोपनिषद (कृष्ण यजुर्वेद) , केनोपनिषद (सामवेद), छान्दोग्य उपनिषद (सामवेद) , माण्डूक्य उपनिषद तथा गौडपादकारिका , मुन्डक उपनिषद (अथर्ववेद) प्रश्नोपनिषद (अथर्ववेद) , भागवद्गीता (महाभारत), विष्णु सहस्रनाम (महाभारत), सानत्सुजातिय (महाभारत) गायत्री मंत्र आदि।
प्रकरण ग्रन्थ-
विवेकचूडामणि , उपदेशसाहस्री , शतश्लोकी आदि।
स्तोत्र ग्रंथ - आदि शंकराचार्य ने शिव, विष्णु, देवी, गणेश एवं सुब्रमण्य की स्तुति के लिए बहुत सी रचनाएँ कीं।
इन सभी ग्रंथों का निर्माण कर वैदिक धर्म एवं दर्शन को पुन: प्रतिष्ठित करने के लिए अनेक श्रमण, बौद्ध तथा हिंदू विद्वानों से शास्त्रार्थ कर उन्हें पराजित किया।
" जगतगुरु आदि शंकराचार्य द्वारा विश्व को दिए गए ज्ञान के लिए शत शत नमन.. 🚩🙏
🚩ॐ शंकराय नमः 🚩🙏

- पं.संतोष आचार्य
अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा - संपूर्ण भारत

🚩 *भगवान परशुराम के अवतरण दिवस पर सभी सनातनीयो को हार्दिक शुभ कामनायें ।*🚩 *ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि तन्नो प...
19/04/2026

🚩 *भगवान परशुराम के अवतरण दिवस पर सभी सनातनीयो को हार्दिक शुभ कामनायें ।*🚩

*ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि तन्नो परशुराम: प्रचोदयात्।।*
*ॐ रां रां ॐ रां रां परशुहस्ताय नम:।।*
*जय परशुराम* 🚩

*'ॐ ब्रह्मक्षत्राय विद्महे क्षत्रियान्ताय धीमहि तन्नो राम: प्रचोदयात्।। '*
*जय श्रीराम..🚩*

ॐ भगवान परशुराम त्रेता युग (रामायण काल) में अवतरित हुये थे। उन्हें भगवान विष्णु का छठा अवतार भी कहा जाता है। पौरोणिक वृत्तान्तों के अनुसार उनका जन्म भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को हुआ था। वे भगवान विष्णु के आवेशावतार थे। पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम, जमदग्नि का पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और शिवजी द्वारा प्रदत्त परशु धारण किये रहने के कारण वे परशुराम कहलाये। आरम्भिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से सारंग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ। तदनन्तर कैलाश गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान शंकर के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। शिवजी से उन्हें श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। चक्रतीर्थ में किये कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया।
वे शस्त्रविद्या के महान गुरु थे। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। उन्होंने एकादश छन्दयुक्त "शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र" भी लिखा। इच्छित फल-प्रदाता परशुराम गायत्री है- *"ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नोपरशुराम: प्रचोदयात्।"*
वे पुरुषों के लिये आजीवन एक पत्नीव्रत के पक्षधर थे। उन्होंने अत्रि की पत्नी अनसूया, अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा व अपने प्रिय शिष्य अकृतवण के सहयोग से विराट नारी-जागृति-अभियान का संचालन भी किया था। अवशेष कार्यो में कल्कि अवतार होने पर उनका गुरुपद ग्रहण कर उन्हें शस्त्रविद्या प्रदान करना भी बताया गया है। सनातन वैदिक धर्म को वर्णाश्रम धर्म भी कहलाता है इसलिए जिनके जैसे कर्म होते है वो उस वर्ण को प्राप्त हो जाते है।
*आत्मत्राणे वर्णसंकरे वा ब्राह्मणवैश्यौ शस्त्रमाददियाताम्।*
*क्षत्रियस्य तु तत्रित्यमेव रक्षणाधिकारात्॥*
- (वशिष्ट स्मृति तृतीयोध्याय:)
- (अस्टादशस्मृति ग्रन्थ पृष्ठ -४५५)
अर्थात - अपनी रक्षा के समय में और वर्णों की संकर भ्रष्टता के समय में ब्राह्मण और वैश्य भी शस्त्र धारण कर ले तो उसे शस्त्र धारण करने का दोष नहीं लगता। कारण , तब क्षत्रिय बनकर अपनी रक्षा करने का अधिकार उन्हें प्राप्त हो जाता है।

वैसे ही भगवान परशुराम भी ब्राह्मण कुल मे जन्म लेने के उपरांत भी जब कुछ क्षत्रियों ने अधर्म का मार्ग अपनाया तो उन्होंने धर्म की रक्षा हेतु शास्त्र के साथ शस्त्र भी धारण किया। ऐसा ही कृत्य यदुवंशी क्षत्रिय कुल मे जन्मे श्रीकृष्ण ने भी किया जब उन्होंने यदुवंशी अधर्मी कंस का वध किया। जब परशुराम जी को ये आभास हो गया कि विष्णु जी के अवतार के रूप मे महाप्रतापी सूर्यवंशी क्षत्रिय वंश मे भगवान राम का पृथ्वी पर अवतरण हो गया है तो उन्होंने अपने शस्त्र त्यागकर महेंद्र पर्वत पर तप मे लीन हो गए। भगवान राम ने क्षत्रिय धर्म निभाते हुये त्रेतायुग में ब्राह्मणो एवं साधुओं के साथ साथ धर्म रक्षा के लिए अधर्मियो का समूल विनाश किया।
अथर्ववेद जो ब्रह्मवेद है उसमें क्षत्रिय राजा और ब्राह्मणो के सन्दर्भ में अनेकों मंत्र है कुछ निम्न है ;

' *यस्य राज्ञो जनपदे अथर्वा शान्तिपारगः।*
*निवसत्यपि तद्राराष्ट्रं वर्धतेनिरुपद्रवम्॥ '*
- (अथर्ववेद कांड -१, सूक्त-३२,मंत्र-३)
अर्थात - जिस राजा के राज्य में अथर्ववेद जानने वाला विद्वान् अर्थात ब्राह्मण शान्तिस्थापन के कर्म में सदैव समर्पित रहता है, वह राष्ट्र उपद्रवरहित होकर निरन्तर सुख संपदा अर्थात उन्नति के पथ पर अग्रसर होता जाता है।

*उग्रो राजा मन्यमानो ब्राह्मणं यो जिघत्सति।*
*परा तत सिच्यते राष्ट्रं ब्राह्मणों यत्र जीयते॥*
- (अथर्ववेद कांड -५, सूक्त-१९,मंत्र-६)
अर्थात - जो राजा अपने आपको उग्र मानकर ब्राह्मण को पीड़ित करता है और जो राष्ट्र में ब्राह्मण दुःखी होता है , वह राष्ट्र अत्यंत पतित हो जाता है।

भगवान परशुराम भृगु कुल में उत्पन्न हुये थे और भृगु ऋषि ब्रह्मर्षि अंगिरा के भ्राता भी थे और शिष्य भी थे। जिस ब्रह्मज्ञान रूपी अथर्ववेद के ज्ञान को परमात्मा ने ब्रह्मर्षि अंगिरा के हृदय के प्रकट किया था उसी अथर्ववेद का ज्ञान इन्हें भी अंगिरा जी द्वारा प्राप्त हुआ जिस कारण ये ' भृगुअंगिरस ' कहलाए और अथर्ववेद का एक नाम ' भृगुअंगिरस वेद ' भी कहलाया। जो अथर्ववेदी ब्राह्मणो का प्रमुख वेद है जिसके ब्रह्मज्ञान के कारण अथर्ववेदी ब्राह्मण यज्ञ में ' ब्रह्मा ' पद (प्रधान यज्ञकर्ता) का अधिकारी होता। जिस यज्ञ में अथर्ववेदी ब्राह्मण को ' ब्रह्मा पद ' पर नहीं सुशोभित किया जाता वो यज्ञ नष्ट अर्थात असफल हो जाता है। ब्राह्मण शिरोमणि परशुराम ने वर्ण से क्षत्रियता से परशु धारण करके क्षत्रिय पराक्रम का अदम्य साहस इस धरा पर धर्मशांति हेतु दिखाया।

एक कथा भगवान परशुराम के सन्दर्भ में है जब माता पृथ्वी ने श्री विष्णु से की विनती की ..
पुराणों के अनुसार कार्तवीर्य अर्जुन नाम का राजा था जो महिष्मती नगरी पर शासन करता था। राजा कार्तवीर्य और उसके अनेकों सहयोगी क्षत्रिय राजा मित्र विनाशकारी कार्यों में लिप्त थे और वह सब मिलकर अकारण ही निर्बलों पर अत्याचार करते थे। उनके अनाचार और अत्याचार से सभी जगह हाहाकार मच गया,निर्दोष जीवों के लिए जीना कठिन हो गया। इस सबसे दुखी होकर माता पृथ्वी ने भगवान नारायण से पृथ्वी और निर्दोष प्राणियों की सहायता करने के लिए विनती की। माता पृथ्वी की मदद के लिए भगवान विष्णु ने परशुराम के रूप में देवी रेणुका और ऋषि जमदग्नि के पुत्र के रूप में अवतार लिया।भगवान परशुराम ने कार्तवीर्य अर्जुन तथा सभी अनाचारी राजाओं का अपने फरसे से वध कर माता पृथ्वी को उनकी हिंसा और क्रूरता से मुक्त कराया।
ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य एवं शूद्र जिस राज्य में राष्ट्रहीत एवं धर्महीत के कार्यों में लगे रहते है वो राज्य सुख-संपत्ति एवं संपदा से इस पृथ्वी पर सदैव स्थिर रहता है।

सत्य सनातन वैदिक हिन्दु धर्म की जय 🚩
🚩चारों वर्णों की जय 🚩
🚩जय परशुराम..🚩जय श्रीराम..*🚩

- पं.संतोष आचार्य
अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा - संपूर्ण भारत

मीडिया प्रभारी पद हेतु चयन प्रक्रिया प्रारंभ AVBM 🚩अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा® कार्य क्षेत्र - सम्पूर्ण  भारत वर्ष ...
14/04/2026

मीडिया प्रभारी पद हेतु चयन प्रक्रिया प्रारंभ AVBM 🚩
अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा® कार्य क्षेत्र - सम्पूर्ण भारत वर्ष के सभी राज्यों के लिए मीडिया प्रभारी पद हेतु चयन प्रक्रिया प्रारंभ की जा रही है।

जो भी भाई-बहन इस पद के लिए आवेदन करना चाहते हैं, वे कृपया अपनी जानकारी नीचे दिए हुए लिंक पर साझा करें।

संस्था की टीम आपके द्वारा दी गई जानकारी का सत्यापन करने के पश्चात आपसे संपर्क करेगी तथा आपको संगठन के कार्यों से जोड़ने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।

कृपया नीचे दिए हुए लिंक पर अपनी जानकारी सबमिट करें

LINK:-https://forms.gle/KR5D2JhRofVfbNkV8









अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा - संपूर्ण भारत

ऊँ नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा ||नमो हनुमते तुभ्यं नमो मारुतसूनव...
02/04/2026

ऊँ नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा ||
नमो हनुमते तुभ्यं नमो मारुतसूनवे ।*
*नमः श्रीरामभक्ताय श्यामास्याय च ते नमः ॥*
(विभीषणकृत हनुमत स्तोत्र - १)
अर्थात - हे हनुमान! आपको नमस्कार है। मारुतनन्दन ! आपको प्रणाम है। श्रीराम-भक्त ! आपको अभिवादन है। आपके मुखका वर्ण श्याम है, आपको नमस्कार है।
🚩ॐ हनुमते नम:🚩
🚩 सर्व सनातनियों को हनुमान जयंती(जन्मोत्सव) की हार्दिक शुभ मंगल कामनाएं 🚩
- पं.संतोष आचार्य
अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा - संपूर्ण भारत

30/03/2026
🚩 *प्रदेश कार्यकारिणी बिहार प्रदेश एवं सोशल मिडिया प्रभारियों की घोषणा* 🚩अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा®️ संपूर्ण भारत ...
20/03/2026

🚩 *प्रदेश कार्यकारिणी बिहार प्रदेश एवं सोशल मिडिया प्रभारियों की घोषणा* 🚩

अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा®️ संपूर्ण भारत की दिनांक ८ मार्च २०२६ के दिन राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में बिहार प्रदेश की राज्य कार्यकारिणी की प्रथम पांच सदस्यों की घोषणा कर दी गई है। सनातनी हिंदू नव वर्ष एवं नवरात्रि के पावन पर्व पर सोशल मीडिया प्रभारियों की भी घोषणा की गई है

🚩*नवनियुक्त प्रदेश कार्यकारिणी बिहार* 🚩

१) पं.दत्तात्रेय शर्मा (गया)
पद - कार्यकारी अध्यक्ष

२) पं.रमाकांत ठाकुर (मोतिहारी)
पद - प्रदेश उपाध्यक्ष

३) पं.सुनील शर्मा (सीतामढ़ी)
पद - प्रदेश महामंत्री

४) पं.आशुतोष राणा (रोहतास)
पद - प्रदेश सचिव

५) पं. विष्णु शर्मा (औरंगाबाद)
पद - प्रचार मंत्री

🚩*सोशल मिडिया प्रभारी* 🚩

१) पं. धनंजय शर्मा (कुशीनगर, उ. प्र.)
२) पं.रोहित शर्मा (दिल्ली)

उपर्युक्त, नवनियुक्त पदाधिकारियों से आशा एवं विश्वास है कि वह संस्था के संवैधानिक उद्देश्यों एवं विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण समाज के साथ सनातन हिन्दू धर्म के हितार्थ तत्पर होकर कार्य करेंगे। सभी पदाधिकारियों को उनके उज्जवल भविष्य हेतु शुभ मंगल कामनाएं 🙏🌺

पं. संतोष आचार्य (संस्थापक अध्यक्ष)
*अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा®️*(संपूर्ण भारत)*

🚩*माघ शुक्ल त्रयोदशी ' विश्वकर्मा प्रकट दिवस ' की सर्वसनातनियों को बहुत बहुत बधाई* 🚩ॐ देवशिल्पिने विद्महे  देवाचार्याय ध...
31/01/2026

🚩*माघ शुक्ल त्रयोदशी ' विश्वकर्मा प्रकट दिवस ' की सर्वसनातनियों को बहुत बहुत बधाई* 🚩

ॐ देवशिल्पिने विद्महे देवाचार्याय धीमहि ।
तन्नः विश्वकर्मा प्रचोदयात् ॥
ॐ देवशिल्पाय नमः 🙏

🚩 *देवाचार्य देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा जी का दिव्य स्वरूप लक्ष्मीनारायण संहिता में वर्णित हैं यथा प्रमाण* 🚩

*विश्वकर्मा चतुर्बाहुरक्षमालां च सूत्रकम् ।*
*गजं कमण्डलुं धत्ते त्रिनेत्रो हंसवाहनः ।।*
- (लक्ष्मीनारायणसंहिता/खण्ड-२/अध्याय-१४२,श्लोक- १०)
अर्थात - देवाचार्य देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा जी चार भुजाओं वाले हैं। वे अपने हाथों में अक्षमाला (रुद्राक्ष की माला) तथा सूत्र (यज्ञोपवीत) धारण करते हैं। वे गज (मापन की इकाई, मापक पट्टी यंत्र) और कमण्डल भी रखते हैं। उनके तीन नेत्र हैं और हंस उनका वाहन है।

🚩 *माघ शुक्ल त्रयोदशी ' विश्वकर्मा प्रकट दिवस ' का दिव्य प्रमाण* 🚩

विश्वकर्मा जी के शास्त्रों में विभिन्न स्वरूप है प्रथम स्वरूप निर्गुण निराकार परमात्मा विश्वकर्मा, द्वितीय स्वरूप ब्रह्मा विश्वकर्मा एवं तृतीय स्वरूप मुख्य रूप से देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा जी का है, जिनका स्वरूप आज कलयुग में ज्यादा लोगों में प्रचलित है। सभी को विदित रहे यह तीनों मुख्य स्वरूप वेद शास्त्रों में भिन्न-भिन्न हैं और अपनी अलग-अलग महत्वता रखते हैं।

माघ मास के शुक्ल पक्ष के तेरवें दिन देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा जी का प्रकट हुआ था। परंतु, इस कलयुग में शास्त्रों एवं गुरु परंपरा से लोगों का संपर्क टूटने के उपरांत इसका कोई शास्त्रीय प्रमाण हमारे संज्ञान में आज तक किसी विद्वान की पुस्तक में नहीं प्राप्त हुआ था अपितु, शास्त्रों में इसका प्रमाण वर्णित है। परंपरागत दृष्टिकोण से माघ शुक्ल त्रयोदशी के दिन मुख्य रूप से उत्तर और पश्चिम भारत में लोग विश्वकर्मा प्रकट दिवस के रूप में मनाते आ रहें हैं और अन्य क्षेत्रो में भी इसका प्रचलन पहले था जो किसी कारणवश लुप्त होते जा रहा था। इसी विश्वकर्मा प्रकट दिवस को लक्ष्मीनारायण संहिता में विश्वकर्मा जयंती भी कहा गया है जिसके प्रमाणों का उसमें मुख्य रूप से उल्लेख है। माघ शुक्ल त्रयोदशी से लेकर तीन दिनों तक पवित्र नदी में स्थान करने के बाद व्रत करने वाले व्रति को देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा जी के जैसी कला कौशल के साथ-साथ सुख समृद्धि प्राप्त होती है। इन तीन दिनों में पवित्र नदी में स्नान करने के साथ-साथ विश्वकर्मा देव की पूजा करने का फल जन्म जन्मांतर के पापों से मुक्ति के साथ-साथ हज़ारों अश्वमेध यज्ञों से भी श्रेष्ठ होता है ऐसा शास्त्रों में वर्णित है।

आप सभी महानुभावों के समक्ष आज इस दिव्य प्रमाण को रखना चाहूंगा जिसमें देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा जी के प्रकट होने का स्पष्ट उल्लेख है, इससे विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण समाज एवं अन्य सनातनियों में विश्वकर्मा जी के जन्म से संबंधित सभी भ्रांतियां मिट जाएंगी।
माघ मास पवित्र नदियों में स्नान करने का एक विशिष्ट महत्व है उसमें भी माघ मास शुक्ल पक्ष के तेरवें दिन से लेकर तीन दिनों तक स्नान का विशेष महत्व है, यथा प्रमाण ;

*माघशुक्लत्रयोदश्यां समारभ्य दिनत्रयम् ।*
*शीतजलेन संस्नानं निशान्ते सरिति प्रिये ।।*६ १ ।।
*कुर्यादार्द्रवाससैव देवं संपूजयेद् व्रती ।*
*जन्मान्तरादिपापानि नश्यन्त्येव न संशयः ।।* ६२ ।।
(लक्ष्मीनारायणसंहिता/खण्ड-१ (कृतयुगसन्तान)/अध्याय-२७८, श्लोक- ६१-६२)
अर्थात - माघ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि से आरंभ कर तीन दिनों तक, हे प्रिय! निशा (रात्रि) के अंत में अर्थात ब्रह्ममुहूर्त से लेकर सूर्योदय के बीच तक शीतल जल में पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए। व्रतधारी व्यक्ति को गीले वस्त्र धारण कर देवता (विश्वकर्मा जी ) की पूजा करनी चाहिए। इस व्रत के प्रभाव से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है।

माघ शुक्ल त्रयोदशी के दिन से लेकर तीन दिनों तक पवित्र नदी में स्नान के साथ वो स्नान प्रयागराज में हो तो इसका और विशिष्ट महत्व है यथा प्रमाण ;

*माघस्नानं फलं स्याद्वै नानाकामप्रपूरकम् ।*
*प्रयागे माघमासे तु त्र्यहं स्नानस्य यत्फलम् । ।* ६३ ।।
*ना ऽश्वमेधसहस्रेण तत्फलं लभते भुवि ।*
*तत्र स्नानं जपो होमः पूजनं स्यादनन्तकम् । ।* ६४ ।।
(लक्ष्मीनारायणसंहिता/खण्ड-१ (कृतयुगसन्तान)/अध्याय-२७८, श्लोक- ६३-६४)
अर्थात - माघ मास के स्नान का फल विभिन्न इच्छाओं की पूर्ति करने वाला होता है। प्रयागराज में माघ मास में तीन दिनों के स्नान का जो फल प्राप्त होता है, वह हजारों अश्वमेध यज्ञों से भी अधिक श्रेष्ठ होता है। वहां (प्रयाग में) स्नान, जप, हवन और पूजन अनंत (असीम) फलदायी होता है।

अब इसी माघ मास के शुक्ल पक्ष के तेरवें दिन अर्थात माघ शुक्ल त्रयोदशी के दिन देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा जी का प्रकट हुआ था अर्थात इस दिन से लेकर तीन दिन तक मुख्य रूप से देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा जी का पूजन करना चाहिए, क्योंकि इसी दिन ब्रह्मा के स्वरूप में देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा जी का जन्म अर्थाय प्रकट हुआ था।
यथा प्रमाण ;

*कल्पादितिथिरेषैव विश्वकर्मजयन्त्यपि ।*
*हरिर्ब्रह्मा स्वयं विश्वकर्मणो जन्मवानभूत् । ।* ६५ ।।
*मण्डपं कारयेद् रम्यं कलाचित्रैः प्रशोभयेत् ।*
*विश्वकर्माणिमान्यस्य पूजयेत् सर्ववस्तुभिः ।।* ६६ ।।
(लक्ष्मीनारायणसंहिता/खण्ड-१ (कृतयुगसन्तान)/अध्याय-२७८, श्लोक- ६५-६६)
अर्थात - यह (माघशुक्लत्रयोदशी) वही तिथि है जो कल्प के आरंभ में भी थी और यही तिथि विश्वकर्मा जयंती भी है। स्वयं भगवान हरि (विष्णु) ब्रह्मा के स्वरूप में प्रकट होकर विश्वकर्मा के रूप में जन्मे। इस दिन सुंदर मंडप का निर्माण कर उसे कलात्मक चित्रों से सजाना चाहिए तथा देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा देव की विधिपूर्वक (धूप, दीप, नैवेद्य आदि से) पूजा करनी चाहिए।

आगे लक्ष्मीनारायण संहिता में बताया गया है कि देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा देव की पूजा किस तरह करनी चाहिए, जिसका फल अन्य सनातनियों के साथ साथ मुख्यरूप से विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण ब्रह्मशिल्पीयों के लिए विशेष होता है, ऐसा शास्त्रों में वर्णित है, यथा प्रमाण ;

*नीराजयेद् भोजयेच्च दद्याद् दानानि सूरिणे ।*
*वाद्यगानैर्व्रती रात्रौ जागरं च समाचरेत् ।।* ६७ ।।
*प्रातः प्रपूज्य संभोजयित्वा स्तुत्वा विसर्जयेत् ।*
*एवं कृत्वा व्रतं शिल्पी प्राप्नुयाद् विश्वकर्मताम् । ।*६८ ।।
*धनधान्यसुतापुत्रदारागोसम्पदादिभिः ।*
*सुखी स्यात् स्वकलाकीर्तिं लभेतात्र परत्र च । ।* ६९ ।।
(लक्ष्मीनारायणसंहिता/खण्ड-१ (कृतयुगसन्तान)/अध्याय-२७८, श्लोक- ६७ से ६९)
अर्थात - देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा जी की पूजा के पश्चात आरती करें, भोग लगाएं और विद्वानों को दान दें। व्रती को संपूर्ण रात्रि वाद्य (संगीत) और गायन के साथ जागरण करना चाहिए। प्रातःकाल पुनः पूजन कर, भोज कराकर, स्तुति कर विसर्जन करना चाहिए। इस प्रकार जो भी शिल्पी (ब्रह्मशिल्पी ब्राह्मण) इस व्रत का पालन करता है, वह विश्वकर्मा के समान कला-कौशल प्राप्त करता है। ऐसा करने से व्यक्ति धन, धान्य, पुत्र, स्त्री, गौधन और समृद्धि आदि से सम्पन्न होता है। वह सुखी रहता है और अपनी कला की कीर्ति इस लोक और परलोक में प्राप्त करता है।

उपर्युक्त प्रमाणों से यह सिद्ध हो गया कि माघ शुक्ल त्रयोदशी ही देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा जी का प्रकट दिवस है, जो ब्रह्मा जी के स्वरूप अर्थात अंश के रूप में प्रकट हुए थे अर्थात उनके जैसी कला कौशल एवं सृजन करने की क्षमता भी थी।
स्कंद महापुराण का निम्न श्लोक भी यह प्रमाणित करता है कि देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा ब्रह्मा जी के अंश स्वरूप हैं ;

*विश्वकर्माभवत्पूर्वं ब्रह्मणस्त्वपरा तनुः ।*
*त्वष्टुः प्रजापतेः पुत्रो निपुणः सर्वकर्मसु ।।*३।।
(स्कन्दपुराणम्/खण्डः ४ (काशीखण्डः)/अध्याय- ८६,
श्लोक - ३)
अर्थात - विश्वकर्मा जी, जो ब्रह्मा की दूसरी (अपरा) देह हैं अर्थात स्वरुप या अंश हैं , वे पूर्व में भी थे। वे प्रजापति त्वष्टा के पुत्र और सभी कर्मकांडो एवं कलाओं में निपुण हैं।

निम्न प्रमाणों के माध्यम से देवाचार्य विश्वकर्मा जी के कुल वंश का परिचय ;
*बृहस्पतेस्तु भगिनी भुवना ब्रह्मवादिनी ॥*
*प्रभासस्य तु सा भार्या वसूनामष्टमस्य च ॥* ॥६॥
*विश्वकर्मा सुतस्तस्याः सृष्टिकर्ता प्रजापतिः॥*
*देवानां तक्षको विद्वान्मनोर्मातामहः स्मृतः ॥*७॥
(स्कन्दपुराण/खण्डः ७ (प्रभासखण्डः)/प्रभासक्षेत्र माहात्म्यम्/अध्यायः ११०, श्लोक - ६-७)
अर्थात - भुवना, जो ब्रह्मविद्या में निपुण (ब्रह्मवादिनी) थी, वह देवगुरु बृहस्पति की बहन थीं। वह वसुओं में आठवें वसु 'प्रभास' की धर्मपत्नी थीं। भुवना के पुत्र विश्वकर्मा जी थे, जो सृष्टिकर्ता एवं प्रजापति माने जाते हैं। वे देवताओं के आचार्य एवं श्रेष्ठ शिल्पी (ब्रह्मशिल्पी, देवशिल्पी, तक्षक) और महान विद्वान थे। वे मनु (विश्वकर्मा जी की पुत्री संज्ञा के पुत्र) के नाना (मातामह) के रूप में भी जाने जाते हैं।

*देवाचार्यस्य तस्येयं दुहिता विश्वकर्मणः।*
*सुरेणुरिति विख्याता त्रिषु लोकेषु भामिनी ॥*
- (स्कन्दपुराण/खण्डः ७ (प्रभासखण्ड)/प्रभासक्षेत्र माहात्म्यम्/अध्यायः ०११/श्लोक - ७५)
अर्थात - देवताओं के आचार्य विश्वकर्मा की सुंदर पुत्री जो है वो तीनों लोकों में सुरेणु (संज्ञा) के नाम से प्रसिद्ध है।

उपर्युक्त, सभी प्रमाणों से ये सिद्ध होता है कि देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा जी ब्रह्मा जी के मानस पुत्र अर्थात एक अंश स्वरूप थे और ऋषि प्रभास एवं भुवना के पुत्र के रूप में माघ शुक्ल त्रयोदशी के दिन प्रकट हुए थे। यह तिथि कल्प के आरंभ में भी थी अर्थात यह तिथि प्राचीन है। इससे देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा जी की प्राचीनता भी सिद्ध होती है। वे देवताओं के आचार्य एवं शिल्पी भी हैं। सर्व सनातनियों को एवं विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण समाज को मुख्य रूप से माघ शुक्ल त्रयोदशी की तिथि के दिन से लेकर तीन दिनों तक व्रत करना चाहिए एवं विधि विधान से देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा जी की पूजा करनी चाहिये साथ ही विश्वकर्मा प्रकट दिवस हर्षोल्लास से मनाना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार ऐसा करने से व्यक्ति धन, धान्य, पुत्र, स्त्री, गौधन और समृद्धि आदि से सम्पन्न होता है। वह सुखी रहता है और अपनी कला की कीर्ति इस लोक और परलोक में प्राप्त करता है।
ॐ नमो विश्वकर्मणे 🙏🚩
पं.संतोष आचार्य
अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा®️(संपूर्ण भारत)

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