29/05/2026
शाहजमाल ईदगाह की घटनाओं की रोशनी में पांच अहम सवाल
क्या धार्मिक आज़ादी सिर्फ कागज़ों तक सीमित हो चुकी है?
नाज़िम इलाही, राष्ट्रीय अध्यक्ष, परचम पार्टी ऑफ इंडिया
ईद-उल-अज़हा के मौके पर शाहजमाल ईदगाह के आसपास जिस तरह का माहौल बनाया गया, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पूरे इलाके को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया, १४० बैरिकेड लगा दिए गए, एक हजार से ज्यादा पुलिस कर्मियों की तैनाती की गई, ड्रोन कैमरों से निगरानी हुई और हर तरफ सख्त सुरक्षा का घेरा बना रहा। ऐसा महसूस हो रहा था मानो कोई धार्मिक त्योहार नहीं बल्कि किसी आपात स्थिति से निपटने की तैयारी हो रही हो। इस पूरे मामले को पांच महत्वपूर्ण सवालों की रोशनी में समझने की जरूरत है।
पहला सवाल : जब मुसलमान खुद सड़कों से परहेज़ कर रहे हैं तो फिर यह सख्ती क्यों?
पिछले कई वर्षों से मुसलमान खुद अनुशासन का परिचय देते हुए सड़कों पर नमाज़ से बचने की कोशिश कर रहे हैं। जगह की कमी के बावजूद दो-दो शिफ्टों में नमाज़ अदा की जा रही है। लोग सब्र और कानून के पालन का प्रमाण दे रहे हैं। इसके बावजूद हर साल ईद और जुमे के मौके पर प्रशासन की असामान्य गतिविधियां, सख्त निर्देश और डर का माहौल आखिर क्यों बनाया जाता है? अगर जनता सहयोग कर रही है तो फिर यह आक्रामक रवैया किसलिए?
दूसरा सवाल : क्या कानून सबके लिए बराबर है?
यह सवाल भी बेहद अहम है कि अगर सड़कों पर धार्मिक गतिविधियों से वास्तव में समस्या है, तो फिर यही नियम हर धर्म पर समान रूप से लागू क्यों नहीं होता? एक तरफ कुछ मिनट की नमाज़ को कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बताया जाता है, जबकि दूसरी ओर अन्य धर्मों के जुलूस, धार्मिक कार्यक्रम, लाउडस्पीकर, रास्तों की बंदी और सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल को परंपरा और आस्था का नाम देकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। क्या कानून की सख्ती सिर्फ मुसलमानों के लिए ही रह गई है?
तीसरा सवाल : क्या मुसलमानों को लगातार शक की निगाह से देखा जा रहा है?
कुर्बानी पर निगरानी, नमाज़ पर पाबंदी, अज़ान पर आपत्ति, मदरसों पर शक और हिजाब पर विवाद। आखिर क्यों हर धार्मिक मामले में मुसलमानों को ही सफाई देनी पड़ती है? शाहजमाल ईदगाह की घटना ने इस एहसास को और गहरा कर दिया कि मुसलमानों को हर समय शक और निगरानी के दायरे में रखा जा रहा है। क्या एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश में पूरी एक कौम को इस तरह डर और दबाव के माहौल में रखना उचित है?
चौथा सवाल : क्या धार्मिक मामलों को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है?
यह भी सोचने वाली बात है कि जब भी देश में महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य या अन्य जनसरोकारों से जुड़े सवाल बढ़ते हैं, अचानक धार्मिक मुद्दे सुर्खियों में आ जाते हैं। मुसलमानों के त्योहार, इबादत और धार्मिक पहचान को बहस का विषय बना दिया जाता है। मीडिया का एक वर्ग भी इसी माहौल को हवा देता है। सवाल यह है कि क्या यह सब महज संयोग है या फिर जनता का ध्यान असली मुद्दों से हटाने की एक राजनीतिक रणनीति?
पांचवां सवाल : क्या प्रशासन की जिम्मेदारी निष्पक्षता नहीं है?
कानून की इज्जत तभी कायम रहती है जब वह सबके लिए बराबर हो। अगर सख्ती सिर्फ एक वर्ग के लिए हो और दूसरों के लिए नरमी, तो फिर यह इंसाफ नहीं बल्कि भेदभाव महसूस होता है। प्रशासन की जिम्मेदारी सिर्फ कानून लागू करना नहीं, बल्कि जनता के भीतर भरोसा पैदा करना भी है। अगर कोई वर्ग खुद को लगातार निशाने पर महसूस करेगा तो इससे बेचैनी और दूरी ही बढ़ेगी।
जरूरत इस बात की है कि प्रशासन निष्पक्षता के साथ काम करे, सभी धर्मों के लिए एक जैसा मानदंड अपनाए और धार्मिक मामलों को संवेदनशीलता के साथ संभाले। इसी तरह मुसलमानों को भी सब्र, समझदारी और एकता के साथ अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाते रहना चाहिए। क्योंकि इंसाफ वही होता है जो सबके लिए बराबर हो।