30/10/2025
व्यक्ति को आत्मज्ञान प्राप्त होते ही शरीर उससे नहीं छूट जाएगा। यह शरीर आगे भी रहेगा और संसार भी रहेगा। लेकिन हम रहते हुए भी नहीं रहेंगे। संसार और शरीर दोनों हमारे लिए स्वप्नवत हो जाएंगे। हमको सारा संसार सपने जैसा लगेगा। हम एक लम्बा सपना देख रहे होते हैं। शरीर किस स्थिति में है, वह स्थिति भी हमारे लिए स्वप्नवत हो जाएगी। योगिगण इसी अवस्था को सन्यास की अवस्था' कहते हैं। हम सन्यास को उपलब्ध हो जाएंगे।
सन्यास का अर्थ है संसार और शरीर में रहते हुए भी दोनों से मुक्त। जो सन्यास को उपलब्ध हो जाता है, उसे परमज्ञान और ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करने में देर नहीं लगती। जहाँ ये दोनों ज्ञान प्राप्त हुए, फिर संसार में आने का कोई प्रयोजन ही नहीं रह जाता है, जीवन-मरण से सदैव के लिए मुक्त। आवागमन से हमेशा-हमेशा के लिये मुक्त।
यहां यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि उक्त दोनों ज्ञान को उपलब्ध होने पर भी हम संसार और शरीर में बने रहेंगे। इसलिए कि ज्ञान चाहे कोई भी हो उससे कर्म का क्षय नहीं होता। पिछले जन्मों के कर्मों को तो भोगना ही पड़ेगा, जब तक उनका पूर्णरूप से क्षय नहीं हो जाता, संसार में रहना ही पड़ेगा। कर्मफल-भोग से ही कर्म-क्षय हो सकता है। ब्रह्मज्ञान को उपलब्ध हो जाने पर भी हम तबतक संसार और शरीर में बने रहेंगे जबतक पूर्वकृत कर्म का क्षय पूर्णरूप से नहीं हो जाता, भले ही इसके लिए हमें सैकड़ों वर्ष जीना पड़े।
जहां पर जाकर वेद, पुराण जैसे पुस्तक बंद होती है संन्यास वहाँ से शुरू होता है। पुस्तक खुलने का अर्थ है गृहस्थाश्रम की शुरुआत। संन्यासी कभी भी भगवत गीता, या अन्य किसी भी ग्रंथ को दिमाग में रख ही नहीं सकता है। बहुत से मिल जाएंगे हम गीता के एक-एक श्लोक का कितना चिंतन करते हैं। ये सब ना समझ लोग हैं। सांसारिक के लिए जो धर्म ग्रंथ है, वही संन्यासी के लिए रद्दी का ढेर है। पूजा पाठ संन्यासी करता नहीं है, क्यों कि उसका पूजा प्रसाद कोई देवी देवता ग्रहण करेगा ही नहीं। संन्यासी तो मृत शरीर है, वो अपना पिंडदान कर चुका है, तो उससे न देवी देवता और न ही सांसारिक लोग कुछ भी नहीं ले सकता है। संन्यासी किसी शादी विवाह का हिस्सा भी नहीं हो सकता है। लोग कह देते है नव वर वधू को आशीर्वाद दे दो, ये अशुभ है। मृत शरीर की उपस्थिति किसी शुभ कार्य में कैसी ?
संन्यासी गृहस्थाश्रम की चौखट के बाहर तक ही जगह बनती है, ‘मां भिक्षाम देही” । चौखट के भीतर यदि जाता है तो धूर्त और पापी है।
संन्यासी कभी शास्त्र पर प्रवचन नही देंगे। संन्यासी शास्त्रों को जानते है लेकिन वो उसे त्याग चुके है। शास्त्रों पर बोलने का अर्थ है, स्त्री पर बोलना, धन, जमीन, संतान आदि पर बोलना। सामाजिक अनुशासन तो सब इन्हीं शब्दों के अंदर है।
इसीलिए संन्यासी मौन होते हैं |
जय जगदंबा
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